इब्बार रब्बी

इब्बार रब्बी की तीन कविताएं

यह जो कुरता पहना हुआ है
यह वस्त्र नहीं किसी के हाथ हैं
किसके हाथ हैं मैं नहीं जानता
हाथ वाला मुझे नहीं जानते 
हम दोनों नहीं जानते दोनों को 
कुरता भी नहीं जानता
न कपास जानती है न धागे जनाते हैं
जो हाथ इसे धोते हैं उन्हें जानता हूं मैं 
उन्हें कौन नहीं जानता!
जो सिलते हैं वस्त्र उन्हें नहीं जानता 
धोने वाले हाथ घर-घर में हैं
उन्हें जग जानत....

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