उमा शंकर चौधरी

वे सब अब हमारी संख्याओं में हैं

वे सब अब हमारी संख्याओं में हैं
(कोरोना की दूसरी लहर में बहुत ही भयावह स्थिति के बीच 19/05/2021 को लिखी गयी कविता)

जो अब हमारे बीच नहीं हैं
वे सब अब हमारी संख्याओं में हैं
कल जो मेरा दोस्त मरा है
वह कभी मेरे लिए अपने कोबे में भरकर
लेकर आया था ओस की बूंदें
उसे भी मुझे अब महज एक संख्या में जानना है
हम यहां चुकुमुकु बैठे हैं और गिन रहे हैं
संख....

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