प्रज्ञा शर्मा

गुज़र रही हूँ ये किस इम्तिहाँ की हद से मैं

गुज़र रही हूँ ये किस इम्तिहाँ की हद से मैं
निकल न जाऊँ कहीं जिस्म -ओ- जाँ की हद से मैं

अभी से ज़िक्र करूँ दूसरे जहाँ का क्या
अभी तो निकली नहीं इस जहाँ की हद से मैं

शदीद धूप में जलने का डर भी है लेकिन
निकलना चाहती हूँ सायबाँ की हद से मैं

पहुँच चुकी हूँ मैं अपने ही इक सिरे पर अब
निकल चुकी हूँ कहीं दरमियाँ की हद....

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