अपूर्व जोशी

बस कुछ यूं ही

जो कामयाबी है उसकी खुशी तो पूरी है
मगर ये याद भी रखना बहुत जरूरी है
कि दास्तां हमारी अभी अधूरी है
बहुत हुआ है मगर फि़र भी ये कमी तो है
बहुत से होठों पे मुस्कान आ गई लेकिन
बहुत-सी आंखें हैं जिनमें अभी नमी तो है!
(15 अगस्त, 2007 संसद भवन में जावेद अख़्तर)

बीते माह, अगस्त 2019 में ऐसा बहुत कुछ हुआ जो भविष्य के भारत पर बड़ा असर डालने का माद्दा रखता है। दमदार बहुमत के साथ दोबारा केंद्र की सत्ता पाने वाली मोदी सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाये जिन्हें लेकर देशवासियों का एक बड़ा वर्ग खासा उत्साहित है। अंध राष्ट्रप्रेम, उग्र हिन्दुत्व के साथ कुछ इस कदर घुल-मिल गया है कि एक धर्म विशेष में दशकों से चली आ रही कुप्रथा पर रोक के लिए बनाए गए कानून से दूसरे धर्म के अनुयायियों में ज्यादा उत्साह और जश्न का सा माहौल है, बजाय उस धर्म के अनुयायियों में जहां यह कुप्रथा स्त्री शोषण का एक बड़ा औजार थी। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करना और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील करना भी एक बड़ा ऐतिहासिक कदम, मोदी सरकार का विगत् माह रहा। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय वहां की अवाम और शासक दोनों को ही मंजूर नहीं था। विलय हुआ लेकिन विशेष परिस्थियों के चलते। महाराजा हरि सिंह के पास इसके सिवा कोई विकल्प 1948 में तब नहीं था जब पाकिस्तानी सेना कबाइलियों का रूप धर श्रीनगर हवाई अड्डे तक आ पहुंची थी। यदि हरिसिंह भारत संग विलय नहीं करते तो कश्मीर राज्य पूरी तरह पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता। मजबूरन महाराज ने सशर्त भारत संग जाने की घोषणा करी। इन शर्तों को मानने के सिवा तत्कालीन भारत सरकार के पास भी कोई अन्य विकल्प नहीं था। इसलिए विकल्पहीनता का दोनों तरफ होना अनुच्छेद 370 के जन्म का कारक बना। इसके बाद इस विकल्पहीनता के दंश ने जम्मू-कश्मीर में जो कहर ढहाया वह सबके सामने है। अपनी कश्मीरियत वाली गंगा-जमुनी संस्कृति के लिए मशहूर इस जन्नत में धर्म के नाम पर वहशत का खूनी तांडव तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों की जलावतनी का कारण बना। वे बच्चें जिन्हें आजाद मुल्क में उच्च शिक्षा हासिल कर एक नेक नागरिक बनने का मौका उपलब्ध होना चाहिए था, दहशतगर्दी के माहौल में बढ़े और स्वयं दहशतगर्द बन गए। हालात इतने खराब हैं कि यदि अंध राष्ट्रभक्ति के चश्में से दूर रह, खुली सोच और खुले दिमाग से कश्मीर घाटी में खेली जा रही खून की होली का सच देखने निकलें तो यह तय कर पाना लगभग असंभव होगा कि खाकी और खादी के दामन में लहू के दाग ज्यादा हैं या फिर दहशतगर्दो के। फिर यह पता लगाना तो नामुमकिन ही है कि इन लहू के दागों में कितना खून उन निरपराधों का है जिन्हें न तो जेहाद चाहिए था, न ही किसी धर्म विशेष से उनकी कोई अदावत थी। ऐसे सीधे-सच्चे कश्मीरी खून में उन दोनों मजहबों की बराबर की हिस्सेदारी है। एक वे जो बुतपरस्त हैं तो दूसरे  जो बुतपरस्ती को नहीं मानते। इसलिए केंद्र सरकार का कदम भले ही 1948 के करार से मुकर जाना क्यों न हो, वक्त की जरूरत के अनुसार मुझे ठीक प्रतीत हुआ। फिर से विकल्पहीनता सामने आ जाती है। दशकों से जम्मू-कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है का राग अलापती रही हिन्दुस्तानी हुकूमत घाटी को भारत संग जोड़ न सकी। किसका दोष रहा, कहना बेहद कठिन है। इतिहास शायद तय कर पाये कि क्या वाकई जम्मू-कश्मीर संग न्याय हुआ या नहीं, हम और आप इसे तय नहीं कर पायेंगे। मानवीय सरोकार हमेशा अंध राष्ट्रप्रेम के आगे हार जाता है। केंद्र के इस निर्णय ने कम-से-कम आर या पार की स्थिति तय कर डाली है। अनिर्णय कभी-कभार इतना घातक हो उठता है कि सारे मानवीय सरोकार, सारी संवेदनायें उसके चलते त्रही-त्रही करने लगती हैं। इसलिए अनिर्णय से पल्ला झाड़ जो निणर्य लिया गया है वह निश्चित ही भविष्य के भारत पर जबरदस्त प्रभाव डालेगा। अच्छा या बुरा भी भविष्य के गर्भ में छुपा है। ठीक ऐसी ही स्थिति मुस्लिम समाज में व्याप्त तीन तलाक पर कानूनी रोक की है। 1829 में भारत के 
तत्कालीन शासक लॉर्ड विलियम बैंटिक ने हिन्दू समाज की कुरीति, घोर अमानवीय सती प्रथा पर जैसे रोक लगाई, नरेंद्र मोदी सरकार के ट्रिपल तलाक पर निर्णय को ठीक उसी नजरिए से देखा जाना चाहिये। इस विर्मश को परे रख कि ऐसा इस सरकार ने अपने घोषित हिन्दू राष्ट्र के ऐजेंडे चलते उठाया है। हां इतना अवश्य ताल ठोक के कहा जा सकता है कि वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान प्रतिपक्ष की आवाज सुनने को कतई तैयार नहीं। फिर चाहे ऐसी आवाज विपक्षी दलों की हो, आंदोलनकारी ताकतों की हो या फिर स्वयं उसके घर से उठ रही हों। इसे भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद नाना पटोले के बयान के बरक्स ज्यादा आसानी से समझा जा सकता है। बकौल पटोले प्रधानमंत्री मोदी के आवास में यदा-कदा आयोजित होने वाली भाजपा संसदीय की बैठकों में मॉनोलॉग होता है।। यानी पीएम या फिर पार्टी प्रमुख अमित शाह ‘प्रवचन’ देते हैं, बाकि सब भक्तगण उन प्रवचनों से आंनदित तो हो सकते हैं, प्रश्न पूछना, मोदी जी या पार्टी प्रमुख को नागवार गुजरता है। बहरहाल, इन दो मुद्दों पर बहुत कहा, लिखा, सुना जा चुका है तो इसे भविष्य के हवाले कर अब कुछ साहित्य की बात।
पिछले दिनों मुझे एक संदेश मिला। एक मोहतरमा ने सूचित किया कि वे पुणे से दिल्ली आ रही हैं। मिलना चाहती हैं ताकि अपनी दो पुस्तकें मुझे भेंट कर सकें। संदेश सामान्य सा था। केवल एक बात मुझे खटकी, संदेश कुछ पर्सनल टच लिए था। बहरहाल, अपनी भुलक्कड़ी के लिए मैं कुख्यात हूं ही। तो बगैर इन्हें पहचाने मिलने का समय तय किया। प्रभा ललित सिंह ने बहुत उत्साह और आत्म विश्वास के साथ मेरे कक्ष में प्रवेश किया। एक शानदार गुलाब के फूलों वाला बुके मुझे थमाया फिर आगे बढ़कर चरण र्स्पश। मैं इस पूरे समय अपनी याद्दाश्त को कोसता रहा। न तो नाम, न ही शक्ल पहचानी लगी। कुर्सी पर विराजते समय जब प्रभा ने कहा ‘अंकल आप बिल्कुल नहीं बदले। जितने यंग 12 बरस पहले थे, आज भी वैसे ही हैं।’ अपने बांकपन की बात मुझे खासी सुहाई फिर सीधे पूछ डाला ‘क्या तुम मुझसे पहले भी मिली हों।’ अब हतप्रभ होने की बारी प्रभा की थी। फिर उसने जो बताया वह पूरा अध्याय मेरी याद्दाश्त पर बड़ा प्रश्न चिन्ह् बन मेरे सामने है। मैं प्रभा का दिल्ली में स्थानीय अभिभावक था। 2006-2007 में। संदर्भ हैं घनिष्ठ मित्र पी-सी- तिवारी। उनके मित्र की बेटी जब दिल्ली नौकरी की तलाश में आई तो मुझे यह जिम्मेदारी पी-सी- तिवारी ने सौंपी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि मैंने बकौल प्रभा यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई। उसे पहला ब्रेक एक टीवी चैनल में दिलाया। जरूरत पड़ने पर वह मुझसे मिलती भी रही। फिर शादी कर पुणे जा बसी। इस पूरे प्रसंग में मेरी शानदार याद्दाश्त के किस्से से ज्यादा उत्तराखंड के सुंदर पहाड़ी जनपद बागेश्वर की इस बालिका का एक अच्छी 
टी-वी- जर्नलिस्ट बनना तो है ही, एक लेखिका के रूप में उसके दो उपन्यास हैं जिन्हें मुझे भेंट देने वह आई थी। एक उपन्यास मैं पढ़ चुका हूं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चमक-दमक वाली दुनियां के काले सच को बहुत सादे सरल शब्दों में लिखा गया यह उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है। नाम है ‘सेक्टर सिक्सटीन, वन वे स्ट्रीट’। एक मीडिया हाउस में काम करने वाली तेजतर्रार पत्रकार को किन-किन परिस्थियों से गुजरना पड़ता है, किस प्रकार शार्टकट के जरिए आगे बढ़ने की चाह मीडिया की दुनिया के बड़े शार्क सम्मुख उनके आत्मसमर्पण का कारण बनती हैं, आदि प्रभा ने इस उपन्यास के जरिए सामने लाने का साहसपूर्ण प्रयास किया है। पुस्तक पढ़ते समय मुझे जायरा वसीम याद आ गई जो फिल्मों को अल्लाह से दूरी का कारण बता काम छोड़ देती हैं। हबीर उर रहमान भी याद आए जिन्हें जायरा वसीम प्रसंग पर मेरा लिखा नहीं सुहाया। उन्होंने जायरा की तरफदारी करते हुए मुझे लिखा कि फिल्म इंडस्ट्री में शोषण होता है जो अल्लाह की राह में बाधा है। मीडिया के काले सच को देखते हुए क्या जो लड़किया यहां काम कर रही हैं, उन्हें भी हथियार डाल घर बैठ जाना चाहिए हबीब? बहरहाल भाषा के स्तर पर उपन्यास कमजोर है लेकिन पहला प्रयास, बकौल राजेंद्र यादव ‘मुबारक पहला कदम’ की तर्ज पर अच्छा है। प्रभा के इस उपन्यास ने मुझे एक बार फिर यह 
सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमारे यहां, हिंदी साहित्य की दुनियां में, मर्डर मिस्ट्री, जासूसी लेखन को दोयम दर्ज का क्यों माना जाता है? क्यों उसे लुगदी साहित्य कह हाशिए में डाल दिया गया? क्या यह कहानी के अकहानी और कविता के 
अकविता वाले दौर में शुरू हुआ एक ‘बौद्धिक षड्यंत्र’ है। ‘रागदरबारी’ जैसी कालजयी रचना के लेखक श्रीलाल शुक्ल ने भी दो एक जासूसी उपन्यास लिखे। एक तो ‘नीला जहर’ ही है जिसे मैंने पढ़ा है। लेकिन उन्हें भी हारकर इस लेखन से तौबा करनी पड़ी। सुरेंद्र मोहन पाठक हिंदी के बड़े मिस्ट्री राइटर हैं। पिछले ‘पाखी’ महोत्सव में उन्हें एक बातचीत में शामिल करने का प्रस्ताव मेरे ही साथियों को नहीं भाया था। चूंकि मुझेे ‘मालिक’ होने का दर्जा मिला है इसलिए मेरी जिद्द के चलते उन्हें बुलाया गया। भला हो भाई प्रभात रंजन का जो सुरेंद्र मोहन पाठक को मंच तक लाने में सफल रहे। अब पाठक जी कई जगह ऐसे कार्यक्रमों से शिरकत करते हैं।
बहरहाल विदेश, विशेषकर यूरोपियन देशों में ऐसा नहीं है। वहां के समाज में हमारे तरह का दोगला व्यवहार भी तो नहीं है। हम स्वयं को उच्चतर दिखाने की हीनभावना चलते अगाथा क्रिस्टी या सिडनी शेल्डन को तो हवाई या रेलयात्र में गर्व संग पढ़ते नजर आते हैं, सुरेंद्र मोहन पाठक या वेदप्रकाश शर्मा को अकेले में, किसी कोने में दुबक कर पढ़ आनंदित होते हैं। पाठक जितने भारत में लोकप्रिय हैं, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन, एचआरएफ कीटिंग आदि विदेश में। फर्क सिर्फ इतना कि उन्हें अपने मुल्कों में उसी सम्मान और इज्जत से नवाजा जाता है जितना शेक्सपीयर, मार्क ट्वेन, इलियट, चार्ल्स 
डिकेन्स, तोलस्तोय आदि को। शायद हमारी हीन ग्रंथि और विचारधाराओं की जकड़ इस भेदभाव का मूल कारण कारण है। 
‘पाखी’ संग हालिया बातचीत में नामचीन कवि मदन कश्यप ने मंचीय और गैरमंचीय कविता के बीच मौजूद खाई को एक बड़ी भूल माना है। वे स्वीकारते हैं कि इससे कविता की हानि हुई है। मैं लगातार इस मुद्दे पर अपनी बात कहता आया हूं। हमें यह स्वीकारना होगा, मंथन-चिंतन कर पुरानी खताओं को सुधारने का मार्ग तलाशना ही होगा। डॉ- कुमार विश्वास को ‘पाखी’ के संग बातचीत के लिए बुलाने के मेरे आग्रह को जिसे मित्र लोग ‘मालिक’ का आदेश भी कहते हैं, स्वीकारा तो गया लेकिन उन्हें जलील करने की पूरी तैयारी की गई। अभ्रदता के स्तर पर पहुंच जिसे ‘बौद्धिक लिंचींग’ कहूं तो ज्यादा उपयुक्त होगा, कुमार को घेरा गया। वह तो कुमार विश्वास का ही दम-खम, ज्ञान और हौसला था कि वे सब प्रश्नों का माकूल जवाब दे गए। मुझे लेकिन अकेले में इतना अवश्य कहा ‘‘पंडित जी इतने निगेटिव माहौल में आपका रहना खतरनाक साबित होगा।’’ मुझे कुमार हमेशा ‘पंडित जी’ कहकर पुकारते हैं। यह उनकी भाषाई शैली है। इसका यह अर्थ कत्तई नहीं कि कुमार वर्ण व्यवस्था के संवाहक हैं। प्रभाष जोशी भी मुझे ‘महापंडित’ कहकर पुकारते थे। उनके सरोकारों को भी संदेह से मात्र इसलिए देखना क्योंकि उन्होंने एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया क्या उचित है? राजेंद्र यादव अक्सर स्नेह से मुझे ‘अबे गुंडे’ कहा करते थे। तो क्या मैं यह मान लूं कि वे चूंकि यादव थे इसलिए उनकी भाषा और सोच निम्नतर थी? लगता है लिखते-लिखते कुछ भटक सा गया हूं। वैसे जब भटक ही गया तो कुछ चर्चा खुद के खिलाफ चली ऐसी ही लिंचिंग की भी कह डालूं। पिछले दिनों ऐसी ही एक सोची-समझी ‘बौद्धिक लिंचिंग’ से गुजरना पड़ा। आश्चर्य होता है, खुद को संवेदनशील, गुणी, मानवीय संस्कारों से लबरेज मानने वाले बगैर एक क्षण गवाएं हमलावर की मुद्रा में सोशल मीडिया के प्लेट फार्म में उतर जेहादी बन जाते हैं। उससे बड़ा आश्चर्य या त्रसदी यह कि इनकी संवेदनशीलता केवल ‘बकैती’ तक सीमित रहती है। कई मित्रें ने सलाह दी, स्वयं राकेश सिंह की ‘पाखी’ के अगस्त अंक में प्रकाशित आपबीती ‘लो आज गुल्लक तोड़ता हूं’ की तर्ज पर कुछ लिखने का मन मैंने भी बनाया। फिर लगा पूरा जीवन दूसरों को सकारात्मक सोच पर ज्ञान बाटता रहा, आज खुद पर आई तो प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी। फिर मंथन किया तो यह सोच शांति पसर गई कि कम-से-कम घोर आर्थिक संकट के दौरान भी वह सब तो कर पा रहा हूं जो लगभग असंभव सा है। यह भी सोच स्वयं को खुश कर लिया कि बतौर दि संडे पोस्ट के संपादक-पत्रकार कभी कलम में समझौता या गद्दारी तो नहीं की। अपने बेहद करीबी राजनेताआें की सत्ता को भी खुलकर ललकारा। शायद इसी सच्चाई का फल है कि घटाटोप अंधेरा भी मुझे उजाले की दिशा दिखाने का मार्ग प्रशस्त करता है। ‘पाखी’ का संपादक और फिर ‘मालिक’ रहते न किसी को अनावश्यक प्रमोट किया, न ही कोई मित्रता निभाई। यहां तक की जब कभी भी ‘पाखी’ के व्यक्ति केंद्रीत विशेषांक निकाले तो उसमें भी स्तुतिगान से बचने का प्रयास किया। नामवर जी, जिनका मुझे ढेर सारा स्नेह, आर्शीवाद मिला, उन पर केंद्रित अंक में भी कुछ ऐसा था। जिसे स्वयं नामवर सिंह ने बनारस में ‘पाखी महोत्सव’ के दौरान पत्रिका के पन्ने पलटते हुए धीमे शब्दों में ‘बेसुरा’ कह डाला। यह उनका बड़प्पन और शालीनता थी कि मेरे प्रति उनका अनुराग बना रहा। यह सोच भी प्रसन्न हूं कि कम-से-कम कोई यह आरोप नहीं लगा सकता कि किसी ‘व्यक्ति विशेष’ के प्रति अनुराग चलते मेरी कलम किसी पुस्तक के मूल्यांकन में ऐसी कमियों पर पर्दा डाल गई जो आलोचक ने लेखक विशेष की कृति की बाबत लिखी। मैं इसे संपादक के अधिकार क्षेत्र से बाहर मानता हूं। नये रचनाकारों की रचना को ठीक करना एक अच्छे संपादक का दायित्व है ताकि रचनाकार अपनी कमियों को भविष्य में सुधार सकें। लेकिन किसी पुस्तक का मूल्यांकन, वह भी स्थापित लेखक की पुस्तक का मूल्यांकन यदि कोई प्रतिष्ठित लेखक करे तो संपादक के अधिकार क्षेत्र में उसे दुरुस्त करना नहीं है। हां, यदि आलोचना पूर्व ग्रसित लगे तो प्रकाशित करने, न करने का अधिकार है, काट-छांट का नहीं। बहरहाल, ‘निंदक नियरे राखिए’ को आदर्श मान चलना ही उचित मार्ग मेरी समझ से है। अतं में ‘पाखी पब्लिशिंग हाउस’ की नींव प्रेमचंद जयंती के अवसर पर हमने रखी है। आप सभी सुधीजनों से आग्रह है कि इस प्रोजेक्ट में हाथ बटाएं अपने उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, आलेख संग्रह आदि हमें प्रकाशित करने का जरूर एक मौका दें। इति! 
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