दीपक शर्मा

कुनबेवाला


दीये गिन तो। मेरे माथे पर दही-चावल व सिंदूर कातिलक लगा रही मां मुस्कुराती है। वह अपनी पुरानी एक चमकीली साड़ी पहने है। उस तपेदिक से अभी मुक्त है जो उसने तपेदिक-ग्रस्त मेरे पिता की संगति में पाया था। सन् 1944 में। जिस वर्ष वह स्वर्ग सिधारे थे।
‘‘भाई को गिनती आती है’’ साथ में बहन खड़ी है। रिबन बंधी अपनी दो चोटियों व नीली सलवार कमीज में। वैधव्य वाली अपनी उस सफेद साड....

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