शशि कांडपाल

मन्नों दी...


बचपन याद आते ही मन्नों दी का याद आना बड़ा लाजमी-सा हो जाता है ऐसा क्यों? वो न तो मेरी सगी दीदी थीं न रिश्तेदार फिर भी वो मेरे बचपन का इतना बड़ा हिस्सा क्यों थी भला? कई बार मन्नों दी के बारे में  लिखने की सोची लेकिन कोई सिरा हाथ आने को तैयार ही नहीं होता जबकि उनकी यादें हैं कि अक्सर  चली आती हैं और मैं मुस्कुराते हुए उनको दो चार पल जी ही लेती हूं। आइए मिलाती हूं उन सगी से भी ज्यादा सगी दी से---
बात उन दिनों कि है जब हम  बच्चे पार्क में  खेला करते थे। भरी गरम दोपहरियों को आम,जामुन के पेड़ों पर चढ़ा करते थे। कच्ची अमियों को कुतरने या जंगल जलेबी बीनने चोरी से जाया करते। ये सुविधा हमें सिर्फ मन्नू दीदी के साये में मिलती। हम गिरते तो सहलाती, चोट खाते तो झट से कुछ पत्तियां मसल हरी बूंदें टपका देती और दर्द हवा हो जाता। हमारा चटपटा नमक थी मन्नू दी, डांट खाने से बचाने की दीवार भी। हमसे सात, आठ साल ही बड़ी होंगी लेकिन ग्रामीण और शहरी परिवेश की मिश्रण थीं। साड़ी ही पहनतीं क्योंकि उनके पिता का आदेश था लेकिन हमारे साथ धमाचौकड़ी मचाने में साड़ी कोई बाधा न बनतीं, हां किसी को नाले में उतारना हो या डाल झकझोर कर कोई फल गिराना हो तो खूब काम आती। गर्मियों की छुट्टियों में अक्सर मोहल्ले के बच्चों की दोपहर मेरे ही घर के बरामदे में बिता करती जहां खस की चिक पर पानी डालने से सोंधी खुशबू हवा में उड़ती और बालू में, गले तक डूबा मिट्टी का घड़ा, ठंडा पानी देता जिसे छूने की इजाजत सिर्फ मन्नू दी को होती। हमें तो बस पानी से भरे अमृतदाई ग्लिास मिलते जिनको याद करके आज भी गला तृप्त हो जाता है। 
हमारे मोहल्ले में हम करीब आठ बच्चे थे, मन्नू दी को पूरी दोपहर हम बंदरों की टोली को संभालना होता ताकि हम सबकी मांएं चैन से सो सकें और हम उस चिलचिलाती धूप में न जाकर दीदी की जादू भरी कहानियों को कल्पना में जीते हुए सो जाएं। मन्नू दी अघोषित संरक्षिका और हमारे कार्यकलापों की संचालिका थीं। ये सारा किस्सा पुराने लखनऊ के ऑफिस के पीछे के बने घरों का है। तब इंसानों के बीच इतनी दूरियां नहीं हुआ करती थीं। वो समय था जब पद से ज्यादा इंसान की उम्र को आदर दिया जाता था। पद में बड़े होकर भी आदर का लिहाज था और ऊंच-नीच का भाव भी न था। 
मन्नों दी के पिता ऑफिस के चैयरमेन के चपरासी हुआ करते थे और बड़ी सी बड़ी बात को साम दाम से सल्टा लेने वाले आदरणीय बुजुर्ग भी। मोहल्ले वाले भी उनकी सलाह मानते और वो भी अपने अधिकार का सबकी भलाई में इस्तेमाल करते। जब भी उनके गांव की खेती से चने का साग, मटर, गन्ने का रस, सिरका, आंधी तूफान में झड़ी अमियां या पके आमों का टोकरा साइकिल में बांध उनका भतीजा 
मोहनलाल गंज से लखनऊ आता, तो साईकिल कभी मोहल्ले के बने आखिरी घर में चुपचाप नहीं चली जाती बल्कि मन्नों दी के पिता जिन्हें सब गुरुजी कहते, खुद पहले घर से शुरुआत कर,  आवाज दे-दे कर सभी घरों में सामान बटवाते। हां अगर बीस, तीस किलो वाला तरबूज जो अब लुप्तप्राय है आता तो उसे जीवन चाचा के वहां से खास छुरा मांग कर धारियों से काटा जाता और हम बच्चें घर-घर पहुंचाते। आज शायद ये परंपरा किसी को याद भी न होगी। 
ऑफिस आगे के हिस्से में एक बड़ी-सी कोठी में चलता था। जिसके चारों तरफ फूल, फलों के पेड़ थे। यूकैलिप्टस के ऊंचे-ऊंचे पेड़ उस कोठी की पहचान थे और शानदार लॉन जिसे हम सुबह नौ बजे से पहले तथा शाम को छह बजे के बाद इस्तेमाल कर सकते थे। उसमें एक केंटीन भी थी जिसमें हर शाम दुनिया भर से ज्यादा स्वादिष्ट समोसे बना करते थे लेकिन हमारे पास पैसे नहीं होते थे लेकिन स्वाद के लिए जुबान तो थी। कभी-कभी हम मां से जिद करते तो वो दिला देतीं लेकिन दिल तो रोज खुशबू से मचलने लगता, ऐसे में हमारा एकमात्र सहारा होतीं मन्नू दी! जो हमारी आंखों से जान जाती कि हम सब कितनी शिद्दत से समोसे खाना चाहते हैं। वो अक्सर अपने  भेंट में  मिले रुपये, हम सबको समोसा खिलाने में खुशी-खुशी खर्च कर देतीं और खुश होती  लेकिन हम भी अपने मिले पैसे उन्हीं के पास जमा करवाते जिसकी खबर हमारी मांओं को मिलती। 
मन्नों दी बिन मां की, गुरुजी की सबसे छोटी बेटी थीं। गुरुजी ने अपनी इस बेटी की जिम्मेदारी मोहल्ले की हर गृहणी को दे रखी थी ताकि वो कामकाज में, व्यवहार में निपुण बनें और सबसे हिलमिल कर रहे। हालांकि उनकी दो और बेटियां थीं जो ब्याहता थीं। सबसे बड़ी सीता, जिसका पति अपने किसी रिश्तेदार की हत्या में जेल में था। सीता अपने मायके ही आ गई क्योंकि ससुराल वालों ने उसकी तथा उसके पति की हर हरकत, जिम्मेदारी से किनारा कर लिया था। सीता हर वक्त, हर इंसान के सामने सिर्फ ये रोना-रोती कि उसके पति ने खून नहीं किया बस गुस्से में धक्का दिया और रिश्तेदार का सर फट गया तो उसमें किसी की क्या गलती और हर पंद्रह दिन में साज-समान के साथ जेल में मिलने जाती। साथ में उसकी कमर पर हमेशा उसका दुबला-सा बच्चा लटका रहता। जाहिर था कि जेल में बंद दामाद के बीड़ी, चाय के खर्चे के साथ-साथ इन दोनों की जिम्मेदारी मन्नों दी के पिता पर आ गई थी, दामाद भी बोझ था और बेटी भी नकारा घूमती। 
मन्नों दी के घर की हालत कुछ ठीक न होते हुए भी सामान्य ही लगती थी। मन्नों दी अक्सर चिकन के कुर्त्ते काढ़ा करती और मैंने भी कई बारीकियां उनसे सीखी। आज भी चिकन के कपड़े को उंगलियों से छूते ही मन्नों दी की आवाज सुनती हूं ‘‘देख ये जाली है, ये मुर्री है, ये कच्चा काम है और ये रही बखिया---’’ जालियां उनसे अच्छी शायद ही कोई बना पता होगा, अक्सर भराई का सारा काम होने के बाद जालियां बनाने के लिए रुखसत आपा कुर्तियों के बंडल मन्नों दी को दे जातीं और सुना उसके अच्छे पैसे मिलते। 
मैं अक्सर उन्हें दो घुटनों के बीच कपड़ा तान कर जाली बनाते देखती और दुनिया भर की बातें पूछती, तुम फ्रेम क्यों नहीं लगाती? ये इतना गंदा कैसे है? साफ कैसे होगा? सिर्फ सफेद धागा क्यों लगाती हो, रंगीन लगाओ न! वो भरसक सुनती फिर अपनी गर्दन उठा कर सुस्ताती-सी बोलती ‘‘तुझे पता है कभी भी सिलाई करने वाले के दाईं तरफ और रोने वाले के बाईं तरफ नहीं बैठना चाहिए?’’ मैं लाख कहती कि क्यों बता दो न! तो उत्तर होता कम से कम चार लोगों से पूछ कर आओ यदि उत्तर न मिले तो मैं हूं ही--- लोग उत्तर न देकर हंसते। हारकर मन्नों दी के ही पास हमारे सारे जिज्ञासा के समाधान होते। वो रोज शर्त के साथ एक पहेली, प्रोजेक्ट देती और हम दिनभर उसी में उलझे रहते, गर्मियों की छुट्टियां बीतती रहतीं। 
स्कूल खुलने से पहले ड्रेस लानी हो या किताबें, बैग लेना हो या जूते, मन्नों दी की जरूरत पड़ती। सुबह मां रसोई में व्यस्त रहतीं। बाल बनवाना सबसे कठिन काम होता क्योंकि घुंघराले बाल सुलझने में टाइम लेते सो खींच-खांच कर बनाए जाते और रोते हुए मन्नों दी के पास जाना होता। वहां पहले से किसी के बाल या तो बन रहे होते या कोई प्रतीक्षा में होती। हम सबको यहां तक कि लड़कों को भी मन्नों दी के बनाए बाल ही सही लगते। 
मन्नों दी के जीवन में या हम सबके जीवन में तूफान तब आया जब उनकी अमीर घर में ब्याही रीता दीदी को उनके ससुराल वाले टी-बी- होने की वजह से मायके छोड़ गए। पूरे मोहल्ले में सन्नाटा छा गया। लोग उनके घर हाल-चाल तक लेने न जाते। गुरुजी जब ऑफिस के लिए निकलते तो उन्हीं से पूछ कर सहानुभूति जता दी जाती। मन्नू दी के भाई की कुछ ही महीने पहले शादी हुई थी और नयी बहू ने ये सेवा करने, उस कमरे में जाने से भी इंकार कर दिया। तीन कमरों का मकान मिला था जिसे बहू आने के बाद फूस का छप्पर डालकर आंगन को बैठक कि शक्ल में बदला गया था लेकिन बरसात के लिए मुफीद न था। एक कमरे में भाई भौजाई, एक में सीता अपने बच्चे के साथ रहती, मन्नों दी तथा गुरुजी का कमरा रीता को देना पड़ा क्योंकि उसे सबसे अलग रहना था सो गुरुजी अपने मंदिर समेत आंगन में आ गए लेकिन मन्नों दी कहां जातीं? वो रोगिणी के साथ दिनभर सेवा में रहती, रात चौकन्नी हो आंगन में सोती ताकि रीता आवाज लगाए तो सुन सकें। 
अचानक मन्नों दी का हमारे जीवन से चला जाना हमें खाली कर गया। स्कूल से आकर हमें मन्नों दी से शाम का खेल क्या होगा सुनने की आदत थी लेकिन अब हमें वहां जाने कि सख्त मनाही थी और उन्हें रोगिणी के साथ रहने के कारण थोड़ा रूखेपन से अलग रहने की हिदायत दी जाती। अब न मेरी खजूरी चोटी बनती न पहेलियां बुझाने को मिलती न कोई समोसे खिलाने की फिक्र करता। मैं बहुत रोती कि मन्नों दी की क्या गलती है जो उन्हें ऐसे कैद रखा जा रहा है? 
एक दिन जब दोपहर में चहलपहल कम थी तो मैं करीब दस दिन से न दिखी मन्नों दी को देखने मचल पड़ी। चुपके से उठी और तीर की तरह मन्नों दी के पास पहुंच गई। वो आंगन में ऊंघती-सी चिकन की कढ़ाई कर रही थीं। मुझे देखते ही कपड़ा दूर फेंक लिपट कर चूमने लगीं और फूट-फूट कर रोने लगीं। रो हम दोनों रहे थे कि अचानक लगा एक कमरे की देहरी पर कोई खड़ा है और मैं डर के मारे चीखने लगी। मन्नों दी ने मेरा मुंह कस कर दबा दिया और चुप कराने कि कोशिश करने लगी। वो काया एक कंकाल-सी थी जिसकी आंखें कोटरों में गहरे धसीं हुई थीं और पतली उंगलियों से चौखट पकड़े वो कुछ बुदबुदा रही थी। मन्नों दी मुझे भी चुप करा रहीं थीं, उसे भी बोलने से मना कर रहीं थीं और खुद तो रो ही रही थीं। वो डरावना मंजर जेहन में आज भी जस का तस है--- वो टीबी की मरीज रीता दी से मेरा पहला परिचय था। 
उस  मकान में पिछवाड़े से भी, बिना मोहल्ले की नजर में आए, घर में आया जा सकता था लेकिन रास्ता मस्जिद के कब्रिस्तान से जाता था अतः बहुत मजबूरी के सिवा उधर से आना-जाना बंद था लेकिन मन्नों दी का मोह इतना ज्यादा था कि मैं यदा-कदा चोरी छिपे उनसे मिलने जाने लगी बस रीता दी से सामना करने की हिम्मत न थी लेकिन समय के साथ वो खुद इतना कमजोर हो गईं कि बिस्तर से उठने लायक नहीं रहीं। 
धीरे-धीरे हम बच्चों की पूरी टोली उस पिछवाड़े के कच्चे गेट पर पहुंचने लगी और मन्नों दी लक्ष्मण रेखा की तरह बीच में खड़ी हो हमारी बातें सुनतीं, हरी मिर्च वाला नमक पीस कर देतीं, हमारी बटोरी जंगल जलेबियां गिनती और साथ में टूंगती और जल्दी से भगा भी देतीं लेकिन हम संतुष्ट होते। 
मैं उनकी ज्यादा लाड़ली थी सो कुछ मंगवाना हो या काम हो मुझसे कहती। उन्हें पता होता मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी और कोई जरूरत होने पर उन्हें समान भी ला दूंगी। मैं उनसे मिलने रोज जाती। उन्होंने हमें कुल्फी के दो डिब्बों से फोन बनाना भी सिखाया था जो एक डोरी से बंधा होता था। हम उसे टेलीफून कहते और आपस में, आमने सामने बैठकर, बारी-बारी से बात करते सो मैं जिद पर थी कि उसी फोन को बड़ा कर लिया जाए ताकि तार इतना बड़ा हो कि इस घर से मेरे घर तक पहुंच जाए और हम दोनों जरूरी बातें कभी भी कर सकें। वो मेरे सर पर चपत लगा, दोहरी हो कर, आंचल मुंह में ठूंस हंसती, मेरा बाल मन खीज उठता कि ये हमारी इस समस्या को हल क्यों नहीं करती? आखिर फोन काम क्यों नहीं करेगा?
एक दिन सारे मोहल्ले ने देखा कि मन्नों दी के सजीले जीजा और उनकी पतली, गोरी, पान से रंगे पतले होंठो वाली मां, रिक्शे से उतरे। मैंने जब भी ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ की कहानी ‘लाल पान की बेगम’ पढ़ी, चरित्र सटीक न बैठने के बावजूद नाम के हिसाब से जीजा की  मां को हमेशा उसमें फिट पाया। हाथ में पर्स झुलाती, करीने से पहनी साड़ी में, 
खूबसूरती से सबको घायल करती, सबकी नमस्ते का जवाब देती अचानक अपने समधियाने में आ धमकीं। थोड़ी ही देर में  दनदनाती बीमार रीता दी के कमरे में पहुंच उन्हें अपने आलिंगन में भींच लिया। उस दुबली काया को अपनी सासे समेटने में शायद वक्त लगा होगा लेकिन सास ने अपने अभिनय की खूब छटा बिखेरी। बहू को गले लगा वो अचानक बेहद ममतामयी सास का खिताब पा गईं साथ में इस रोग से खुद को अलग न रख, एक बेहद संवेदनशील इंसान का भी। बाहर आते ही उसकी सेवा में जुटी मन्नों को गले लगा लिया और अच्छा घर बर का वरदान दे हाथ जोड़ कर खड़े अपने समधी, गुरुजी के पास खड़ी हो गईं। फुसफुसाते शब्दों में यही सुना गया कि रीता की खूब सेवा तो हो रही है लेकिन उसका मोह करना बेकार है। मन्नों का ध्यान दें ताकि बात आगे बढ़े और कहीं और की  लड़की लाने से अच्छा हैं मन्नों को ही ब्याह ले जाएं।
उस दिन एक तीर से कई शिकार करे गए। 
अब जीजा हर पंद्रह दिन में आता। मन्नों दी मुझे पहले ही घर पहुंच जाने की हिदायत देती ताकि जरूरत अनुसार दही, मिठाई, चीनी लेने दौड़ सकूं। एक दिन देखा मन्नों दी लोटे में चीनी, नींबू को पानी में डाल, हाथ से मसल रही थी, मैंने आंखों से पूछा ये क्या है? ये शरबत तो गंदा हो गया तो बोली चम्मच की आवाज न आए और बगल के कमरे की 
बातचीत भी सुनाई दे इसलिए ये तरीका अपना रही हैं। आज भी अक्सर सोचती हूं कि दोनों बातों में से ज्यादा महत्वपूर्ण क्या रहा होगा? क्या सौतिया डाह का अंश भी आया होगा?
जीजा अक्सर छोटी-मोटी चीजें तोहफे में लाता। जिसे आंगन के एक कोने में सकुचाई खड़ी मन्नों दी को देखते हुए, मुझे पकड़ा जाता। मुझे उससे एक अजीब गंदा एहसास होता और मैं तुरंत दीदी को चीज पकड़ा कर भाग जाती। शायद बच्चे इंसान की भावनाओं को तो समझ जाते हैं लेकिन व्यक्त नहीं कर पाते। मैं चाहती कि मन्नों दी इसे डांटकर भगा दें लेकिन मेरी आशा के विपरीत वो कृतज्ञ-सी सर झुका लेती। जीजा मुस्कुराता लंबे-लंबे डग भरता चला जाता। इस बढ़ते संबंध से घरवालों को आखिर क्या आपत्ति होती लेकिन रीता की हालत दिन पर दिन बिगड़ती ही गई। उस तक शायद ये बात पहुंच ही गई कि उसके मरने का इंतजार हो रहा है। अब वो अपने पति के ससुराल आने पर विरोध करती लेकिन जीजा फल, पैसे दे जाता साथ में रीता की कुछ सांसे कम कर जाता और मन्नों की बढ़ा जाता।
स्कूल से आकर मां से सुनती आज जीजा दो साडि़यां लाया था, आज सास भी आई थी, रीता को  पान पसंद है लेकिन बीड़े रीता और मन्नू दोनों के लिए लाई और दूसरे दिन उसी पान की पीक में, खून उगलते-उगलते, रीता ने अजीब नजरों से, मन्नों को देखते हुए दम तोड़ दिया--- कहतें हैं मरने वाली के मोटे-मोटे आंसू पलकों पर अटके से थे---
रीता के मरने के दौरान उसकी ससुराल से कोई नहीं आया, न बाद में खोज खबर ली गई। मन्नों के शादी का प्रस्ताव तब तक सारे मोहल्ले, बिरादरी में फैल चुका था। रीता अपने मायके में करीब डेढ़ साल जिंदा रही। शुरू के एक साल में उसके स्वास्थ्य में सुधार भी हो रहा था लेकिन बाद के छह महीनों में, उसके पति से मन्नों की  शादी का प्रस्ताव उसे जीते जी तोड़ गया होगा। इंसान और उसके रिश्ते कितने खोखले हैं।
मन्नों में अपराधबोध भी आ गया था और सूनापन भी, बदनामी भी हो रही थी और कोई खबर न मिलने से चिंता भी। आखिर एक दिन भाभी के तानों से तंग आ, मन्नों के भाई संतोष ने जीजा के परिवार से आगे बातचीत करने के लिए डालीगंज पहुंचा। जीजा के घर की रौनक से लगता था अभी-अभी कोई शुभ कार्यक्रम हुआ है। जीजा की मां एक बड़ा-सा लड्डू उसकी ओर बढ़ाती  हुई बोली ‘‘ये लो लल्ला मुंह मीठा करो, हमारे बिटवा का अभी-अभी बियाह तय हुआ है। न्योता दूंगी सब लोग जरूर आना।’’ पान गुलगुलाते हुई फिर बोलीं ‘‘भाई क्या करें किसी के जाने से दुनिया तो नहीं रुकती न! हमारे बिटवा का तो कोई बच्चा भी नहीं है जिसके सहारे जिनगी काट ले।’’ और घर समेटने लगीं। भाई से रहा न गया तो चिल्ला उठा कि छह महीने से वो नाटक हमारे घर में क्यों किया? मेरी बहन और हम सबके साथ मजाक क्यों किया? हमने तो ऐसी कोई इच्छा आपसे जताई नहीं थी। 
सास गुस्से में उबलती बोली ‘‘वो सब इसलिए करना पड़ा क्योंकि जबसे तुम्हारी बहन रीता इस घर में आई  मेरा घर तबाह हुआ, दो साल बाद भी कोई औलाद नहीं हुई ऊपर से टीबी का रोग लगाकर बैठ गई। और वो मन्नों उसे अपनी सेवादारी से ठीक कर फिर ससुराल पहुंचा देती तो? नहीं रखना तुम्हारे परिवार से मुझे कोई रिश्ता, निकलो यहां से!’’
उस दिन मोहल्ले भर में सन्नाटा छा गया, लगा मन्नों दी भी नहीं बचेगी। उसका अपने जीजा के आने से पहले दिन से ही, सारा घर सर पर उठा लेना, जीजा को ये पसंद है, वो पसंद है की रट लगाना। वो तकिये का गिलाफ, रुमाल काढ़ कर देना जिसका इंतजाम हम सबनें चोरी-चोरी किया था। आए 
मेहमान की सेवा में हम सबको दौड़ाना और उनके वापस जाते समय किसी की भी परवाह न करते हुए उसे मेन गेट तक छोड़ने जाना। सभी की नजर में वो रिश्ता पक्का-सा था सो सभी से मन ही मन स्वीकारिता भी मिलती थी, आशीष भी।  आखिर खुद लड़के को मां ने आगे बढ़कर ये प्रस्ताव रखा है सो शक का कोई कारण नहीं था। मन्नों दी जीजा पर सरेआम हक जताती और बहुत खूबसूरत लगतीं। 
रिश्ता टूटने की और इस धोखे की खबर उस मोहल्ले के एचआर घर पर गिरी गाज के समान था। अब क्या होगा? ऐसे भी लोग होते हैं? मन्नों को कौन ले जाएगा?
धोखेबाजी की भी  हद होती है जैसी बातों के बीच मन्नों दी सूख कर कांटा हो गई। टीबी रोगी के साथ रही थी सो जांच भी कराई गई लेकिन कुछ नहीं मिला। इस बीच जीजा के शादी के लड्डू भी आ गए जिन्हें मन्नों दी ने जी भर के, रो-रो कर खाया और सबको खिलाया। हम मना करते तो कहती ‘‘खा न! मेरी शादी के होते तो तुम लोग न खाते क्या? ये लड्डू मुझे यकीन दिलाते हैं कि जीजा की शादी हो गई है।’’ और गला बंद होने तक लड्डू ठूंस के बुरी तरह खांसने लगती। हम सांत्वना तो क्या दे पाते बस लड्डू फेकफांक घर लौट आते। 
उनके पिता से ये हालत देखी न गई। उन्हाेंने वर ढूंढ़ना शुरू किया, मन्नों एक शर्त पर राजी थी कि वर जीजा जैसा हो। पिता इधर-उधर जाते, लड़के देखते आखिर महीनों बाद, मन्नों लायक वर मिला। शादी का दिन तय हुआ और हमें पता चला कि बारात तीन दिनों तक टिकेगी। ये बेहद नई बात थी लेकिन हमें तीन दिनों टीके मन्नो दी के साथ ही रहना होगा ये खुशी की बात थी। बारात आई और छत पर ताने, शामियाने में रुकी। हम मन्नों दी की वानर सेना थे, सो वो जो चाहे हमसे काम करवा सकती थीं।
 ‘‘जाओ एक कागज पर वर से नाम लिखवा कर लाओ।’’ शायद वर पढ़ा लिखा है या नहीं देखना चाहती हों। ‘‘जाओ वर की लंबाई नाप कर लाओ, देखो तुम उनके कहां तक आते हो?’’ शायद वो अपने सपने के राजकुमार से मिलान करना चाहती हों! जब बारात आई थी तब सिर मौर में दूल्हे का चेहरा छुपा था अब सारे बड़े लोगों में उसे कैसे 
पहचानेंगे?
 महावर से!
 ‘‘जिसके पैर आलता से पूरे रंगे हों वही दूल्हा है।’’ और हम बुद्धू से जनवासे में घंटों खड़े रहे क्योंकि दूल्हा तो अधलेटा-सा उठ ही नहीं रहा था।
‘‘अच्छा ये बताओ रंग कैसा है?’’ हम चाहकर भी नहीं कह पाये कि सांवला है। मन्नों दी दौड़ाती रहीं और हम भाग-भाग कर सूचनाएं पहुंचाते रहे। रात में शादी के वक्त, सारी रात मन्नों दी सुबकती रहीं। सुबह जब आंख खुली तो वातावरण मन्नों दी की रुलाई से भारी था, जिबह होने जा रहे किसी निरीह जानवर-सी आवाजें! मैं नंगे पांव दौड़ी तो देखा वो सबसे लिपट-लिपट कर रो रहीं थीं, उनका दूल्हा भी उनके साथ घिसट-सा रहा था। मन्नों दी चली गईं। 
दूसरे दिन फिर से गुरुजी के घर में चीख पुकार मची थी सब देखने दौड़े और जड़ हो गए। खबर थी कि मन्नों दी की कल रात उनके ससुराल के कुएं में गिरने से मौत हो गई--- गांव में बिजली तो थी नहीं सो कुएं से पानी 
निकालने गई और उसमें  गिर गई। जब तक पता चलता तब तक कुएं की गहराई और धोखे की चोट ने उन्हें मार 
डाला--- या शायद खुद छलांग लगा सारे दुखों से निजात पा ली हो--- इतने सालों बाद भी मन्नों दी मेरे लिए यहीं-कहीं हैं जो भागकर मेरे जूतों की लेस बांध देंगी या कांच का ग्लिास टूटने पर इल्जाम अपने सर ले लेंगी, चांद पर चरखा कातती बुढि़या को मेरी कल्पना में जीवंत कर देंगी, सिर्फ चूमने से मेढ़क राजकुमार बन जाएगा। 
सीधे पल्ले की थोड़ी-सी-ऊंची साड़ी पहने मेरी मन्नों दी! पहली बार लिपस्टिक लगा उसे आंचल से रगड़ कर छुटाती, उंगलियों से शरबत घोलती, मां की चारखाने वाली गुलाबी साड़ी मन्नों दी पर खूब फबती थी गाल भी गुलाबी लगते थे। वो छुईमुई-सी मन्नों दी! सिर्फ आठवीं पास लेकिन दुनियाभर की जानकार मन्नों दी! एक कुएं से निकल दूसरे गहरे कुएं में जान देती मन्नों दी!
सोचती हूं उस पुरुष से पूछूं जो इसका उत्तरदाई भी है और गुनहगार भी कि दो स्त्रियों के साथ छल करके किस तरह जिया? क्या उसे कभी अपने बनाए जाल के मार्मिक अंत पर मलाल हुआ? उसकी आत्मा कांपी या यूं ही दो जिंदगियों को बर्बाद कर तीसरी के साथ आनंद से जिया?

 

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