शशि कांडपाल

मन्नों दी...


बचपन याद आते ही मन्नों दी का याद आना बड़ा लाजमी-सा हो जाता है ऐसा क्यों? वो न तो मेरी सगी दीदी थीं न रिश्तेदार फिर भी वो मेरे बचपन का इतना बड़ा हिस्सा क्यों थी भला? कई बार मन्नों दी के बारे में  लिखने की सोची लेकिन कोई सिरा हाथ आने को तैयार ही नहीं होता जबकि उनकी यादें हैं कि अक्सर  चली आती हैं और मैं मुस्कुराते हुए उनको दो चार पल जी ही लेती हूं। आइए मिलाती हूं उन सगी से भी ....

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