अपूर्व जोशी

जड़ विचारधाराओं के खतरे

 

अरे! ये तो बड़ा ही झंझटी मामला है। ‘पाखी’ की शुरुआत तो केवल साहित्य के प्रति अनुराग के चलते की थी। नहीं तब हल्का-सा भी इल्हाम था कि यहां भी वही सब भारी तादात में मौजूद है जो अपने आस-पास रोज देखते महसूसते हैं। जलन, कुंठा, घात-प्रतिघात, खेमेबाजी, विचारधाराओं से जकड़े बुद्धिवादियों का ऐसा जमघट जो एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हर उस छल-कपट का सहारा लेने को तत्पर है जिसको हम कॉरपोरेट या राजनीति की दुनिया तक सिमटा समझते थे। शनैः शनैः समझ में आया कि वहां तो वह छिछले, क्रूड फार्म में है, यहां बड़ा बारीक, बहुत महीन, इतना कि इसकी मार का असर जब तक महसूस हो, तब तक आपकी चारित्रिक हत्या का प्लाट रच दिया जाता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। हैं तो इसी समाज का हिस्सा वे रचनाकार भी जिन्हें उनकी रचनाओं से जान-समझ हर कोई उनके मुरीद हो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसा फिल्मों में आम आदमी के लिए जान तक की बाजी लगाने वाले ‘अमिताभों’ को देख हम इतने अभिभूत रहते हैं कि उन्हें सदी का महानायक तक कहने से गुरेज नहीं करते। शायद इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया। तो मामला इसलिए बड़ा पेचीदा और झंझटी है क्योंकि विचारधाराओं के बंधन से बचते हुए, इनके भीतर समाहित खेमेबाजी-गुटबंदी से दूर रह ‘पाखी’ को ‘सृजन की खुली उड़ान’ बनाने की यात्र कुछ ही समय बाद उन्हीं आरोप-प्रत्यारोप के भंवर में फंस गई। कथाकार प्रभात रंजन ने फेसबुक में लिख मारा कि ‘‘साहित्य के चक्कर में मत पडि़ए नेताओं की तरह आप साहित्य में गुटबाजी करने लगे हैं। आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’’ अब ये तो केवल वे ही स्पष्ट कर सकते हैं कि किस प्रकार की राजनीति या गुटबाजी को मैं प्रश्रय दे रहा हूं, मैं इस पर केवल इतना भर कह सकता हूं कि ‘पाखी’ किसी गुट या किसी खेमे की पत्रिका कम-से-कम मेरे संपादन काल में तो बनने से रही। कारण बहुत स्पष्ट है। मैं किसी भी विचारधारा को साहित्य सृजन के मार्ग का रोड़ा नहीं बनने दे सकता। 
मेरी स्पष्ट मान्यता है साहित्य किसी विचार विशेष का न तो संवाहक, न ही भौंपू हो सकता है। वह तो दरअसल, किसी भी विचार से ऊपर केवल और केवल संवेदनाओं का, सत्य का, भावनाओं का झरना है। बालकृष्ण भट्ट के शब्दों में- ‘‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।’’ मेरे लिए, मेरी समझ अनुसार विचारधारा की जकड़ खुलेपन की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इससे इंकार नहीं कि विश्व भर के रचनाकारों के लिए विचारधारा अपने समय और समाज का सच सामने लाने के लिए पथ प्रदर्शक का काम करती है। यही कारण है कि साहित्य विचार का पक्षधर और नए विचार को जन्मने की उर्वरक जमीन होता है। 
संकट यह कि विचार जब धारा में परिवर्तित हो जाता है तो उसके अनुगामी उसे जड़ बना देते हैं। जो जन्म लेता है किसी कुरीति के खिलाफ, स्थापित सामाजिक मान्यता के खिलाफ या फिर शोषण के खिलाफ, वह स्वयं आगे चलकर इन्हीं का कारक बन जाता है। कहां तो उसका उद्देश्य था समाज में बदलाव का, जड़ता इतनी उसके भीतर आ जाती है कि समय, परिस्थिति अनुसार वह स्वयं में बदलाव करने को तैयार नहीं होता। वामपंथ का उदाहरण सामने है। प्रेमचंद का कथन है- ‘‘प्रत्येक समय में जीवन को नियंत्रित करने का एक कारक हुआ करता है। किसी समय यह काम धर्म का था, आज उसका स्थान विचारधारा ने ले लिया है।’’ यदि इसे सच मान लिया जाए तो विचारधारा को स्वयं में बदलाव लाने के लिए भी तैयार रहना होगा। समय बदलेगा तो समाज भी बदलेगा, ऐसे में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है। समय-काल-परिस्थिति अनुसार बदलाव न होने के चलते विचारधारा के जड़ होने का संकट आ खड़ा होता है। बोल्शेविक क्रांति के बाद मार्क्सवाद उन सभी के लिए आदर्श बन बैठा जो श्रम के महत्व को पहचानते थे, जो पूंजी की अधिकता से उत्पन्न होने वाली विसंगतियों के दुष्परिणाम समझते थे। एक पूरी सदी का साहित्य इससे ओत-प्रोत रहा। संकट लेकिन तब उत्पन्न हुआ जब वामपंथ अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद जड़ हो गया। 
वाम विचार को अंतिम सत्य समझने की भूल करने वाले या फिर उसमें संशोधन के लिए कतई तैयार न रहने वाली बुर्जुवा सोच है जिसका नतीजा हम विश्व भर में कम्युनिस्ट आंदोलन के, कम्युनिस्ट पार्टियों के पूरी तरह हाशिए में चले जाने के तौर पर देख सकते हैं। इस जड़ता से सबसे बड़ा खतरा नए विचारों के जन्म न लेने या पनप न पाने का है। बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद के पक्ष या विरोध में संघर्ष चल रहा था। यह संघर्ष अंततः उन शक्तियों की जीत का आधार बना जो तर्क और विज्ञान विरोधी थी। यह कहना अतिशोक्ति नहीं होगी कि अब किसी भी प्रकार के शोषण विरुद्ध विचार केन्द्रित स्वर नहीं उभरेंगे। अन्ना आंदोलन इसका एक उदाहरण है। जहां जन संघर्ष तो था लेकिन विचारहीन। नतीजा कुछ ही समय में उसका भट्ठा बैठ गया। धर्म एक बार फिर राजनीति और समाज का केंद्र बिन्दु बन गया। यदि भारतीय समाज की जटिलता को समझते हुए वाम विचार को प्रतिपादित किया जाता तो शायद हालत और होते। इसलिए विचारधारा का बोझ, उसके साथ जुड़ी जड़ता ही उसके क्षरण का मूल कारण बना उठती है। जब हमारी पीढ़ी बड़ी हो रही थी तब बोल्शेविक क्रांति के नायक हमारे आदर्श हुआ करते थे। हरेक अपने भीतर एक ‘पावेल’ को महसूसता था। किताबें हमारी अभिन्न मित्र, हमारे लिए दुनिया का साक्षात्कार कराने वाली खिड़की हुआ करती थी। अब दौर खिड़की के बजाए ‘विन्डोज’ का है। गूगल आपको चंद क्षणों में ही पूरी दुनिया सामने रख देता है। ऐसे समय में विचार का बीमार होना स्वाभाविक है लेकिन विचार अजर-अमर है, वह मर नहीं सकता। मानवीय संवेदनाएं अवश्य मर सकती हैं, मर रही हैं। समतामूलक समाज का विचार रोग शैय्या पर है, उसका स्थान एक बार फिर धर्म ने ले लिया है। 
धर्म दरअसल, सबसे ताकतवर, अवैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला ऐसा विचार है जो पैदा तो मनुष्य की विकास यात्र के दौरान उसे सामाजिक प्राणी बनाने के लिए पैदा हुआ, आज लेकिन वह ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है कि जब कभी भी मनुष्यता के अंत की घोषणा होगी तो उसके मूल में धर्म ही होगा। बहरहाल, मैं वापस अपने मूल प्रश्न पर लौटता हूं कि यह गुट-वुट, खेमा-वेमा इत्यादि का तात्पर्य क्या है और इससे कैसे साहित्य को मुक्त रखा जाए। सच यह कि किसी भी खेमे अथवा गुट-वुट के साथ न होना अपने आप में एक नए खेमे या गुट का निर्माण करने जैसा है। नेहरू ने शीतयुद्ध के दौर में निर्गुट आंदोलन की नींव रखी तो उसमें शामिल मुल्क निर्गुट गुट के कहलाए जाने लगे। ठीक वैसे ही हिन्दी साहित्य में जिसे भारतेंदु मंडल, सरस्वती मंडल कह पुकारा गया, थे वे भी अंततः गुट ही। इसलिए यदि ‘पाखी’ के पाठक-रचनाकार उसे किसी गुट विशेष का मान रहे हों तो मेरे प्यारे बंधुओं मैं ‘पाखी’ को बैठक नहीं बनाना चाहता बल्कि साहित्य की चौपाल बनाने की दिशा में प्रयत्नशील हूं जहां किसी विचारधारा विशेष की 
आवाजाही न होकर हर प्रकार के पूर्वाग्रह-दुराग्रह से मुक्त उत्कृष्ट रचनाओं का जमघट रहे। मेरे लिए अर्नेस्ट फिशर का कथन इस दृष्टि से आदर्श है कि ‘सच्ची कला हमेशा ही अपने समय की विचारधारात्मक सीमाओं का अतिक्रमण कर उस यर्थाथ को सामने लाती है जिन्हें विचारधाराएं छिपाने में जुटी होती हैं।’ मेरे लिए बतौर संपादक वॉल्टेयर का कहा ब्रह्म वाक्य समान है-‘मैं तुम्हारी बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं लेकिन मरते दम तक इस बात का समर्थन करूंगा कि तुम्हें अपनी बात कहने का पूरा-पूरा हक है।’
...

साक्षी मिश्रा, एक जनप्रतिनिधि की बेटी, ऐसे जनप्रतिनिधि की जिसका वास्ता उस दल से है जो विश्व के सबसे विशाल राजनीतिक संगठन बनने का खिताब स्वयं को दे चुका है और जिसकी न केवल केंद्र बल्कि अस्सी प्रतिशत राज्यों की सत्ता में भी कब्जा हो चुका है। ऐसे व्यक्ति की बेटी यदि घर से भागकर एक गैर-ब्राह्मण वह भी दलित से विवाह कर ले तो निश्चित ही यह अनादिकाल से स्त्री की यौनिकता से भयभीत समाज के लिए बड़ा सदमा है। यही कारण है कि ‘स्त्री मुक्ति’ के प्रबल समर्थक हमारे ‘मुख्यधारा के मीडिया’ ने यकायक ही अपने सुर बदलते हुए विधायक राजेश मिश्रा को ऐसे पिता के रूप में पेश करना शुरू कर डाला जिसके प्यार, जिसकी परवरिश, जिसके दिए संस्कारों की धज्जियां उड़ाते हुए साक्षी ने मानो घोर अपराध कर डाला हो। अजितेश, साक्षी के प्रेमी/पति का चरित्र हनन इसी स्त्री यौनिकता से भयभीत समाज का एक षड्यंत्र है। बहुत संभव है कि अजितेश सही में चरसी हो, कामी हो या फिर नाना प्रकार की अन्य बुराइयों का पिण्ड हो। प्रश्न लेकिन एक ब्राह्मण की बेटी के एक दलित संग विवाह करने से पैदा हुई उन परिस्थितियों का है जिनके चलते इस नवविवाहित जोड़े की जान पर बन आई। प्रश्न वर्ण व्यवस्था के इक्कीसवीं शताब्दी में भी कहीं गहरे भारतीय समाज को अपनी जकड़ में लिए रखने और उससे कहीं अधिक इस पूरे प्रसंग का स्त्री-विरोधी मानसिकता से जुड़े होने का है। साथ ही पूरे मामले में वैचारिक टकराहट का भी है जिसके चलते मुख्य मुद्दा षड्यंत्र का शिकार हो राजनीतिक गोलबंदी के जाल में उलझ जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक बेहतरीन अदाकारा जायरा वसीम को उसके धर्म के कट्टरपंथी इस कदर प्रताडि़त कर देते हैं कि वह अपने पेशे की तमाम कथित बुराइयों से बचने का सबसे मुफीद तरीका अल्लाह का वास्ता देकर फिल्मी दुनिया को अलविदा करने पर मजबूर कर दी जाती है। अब चूंकि ऐसी ही दुनिया का निर्माण हम कर पाये हैं तो भुगतिए अपनी करनी का फल और गुनगुनाइएें रफी साहब को- ‘‘ये तख्तों, ये ताजों, ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया... ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’’

***

editor@pakhi.in

 
 

पूछताछ करें