अपूर्व जोशी

अंधेरे के गीत

In the dark times

Will there also be singing,

Yes there will also be singing

About the dark times.

Bertolt Brecht

आज का समय उन्माद के दौर का समय है। ऐसा समय जहां चारों तरफ वहशीपन है, हाहाकार और अत्याचार है। ऐसा समय जहां तेज रफ्रतार से दौड़ती बुलेट ट्रेनों के सपने देखने को वे सब अभिशप्त हैं जिनके पास न रोटी है, न कपड़ा और न मकान। फिर भी वे उनसे लाख गुना अच्छे हैं जिनके पास ये तीनों तो हैं लेकिन इन तीनों को बचाए रखने के लिए जिन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है और वह कीमत है सब कुछ देखते, समझते हुए भी खामोशी से अख्तियार सहने की विवशता। भला इससे ज्यादा अंधेरा तो कभी काला नहीं रहा होगा। अब इसे बहुत से या अधिकांश मेरी नकारात्मक सोच कह सकते हैं। बात भी सही है। अब नए भारत के निर्माण का समय है। नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ को कूडे़दान में डाल, प्राचीन सभ्यता के अवशेषों को गढ़कर उनके सहारे राष्ट्र के नवनिर्माण का समय है। कहां है अंधकार? चारों तरफ शोर है कि पूरा देश खुला शौचमुक्त हो चुका है, अब हर घर में नल के जरिए पानी पहुंचेगा, बुलेट ट्रेन देश में दौड़ेगी और हर गांव को रौशनी मयसर होगी। तब भला किस अंधकार की बात आपसे, (मैं) कर रहा हूं। इंडिया इज शायंनिग, भारत उदित-मुदित हो रहा है। विश्वगुरु बनने की कतार में है। तो चलिए मैं आपको समझाता हूं, अपनी समझ अनुसार कि अंधकार मुझे क्यों घटाटोप नजर आ रहा है। 
समस्या दरअसल, मेरी खुद की है। मुझे स्वयं से घबराहट इन दिनों महसूस होती है। लगता है जीवन यूं ही रीत-बीत गया। सपने आने बंद हो गए है। (शायद ‘तद्भव’ में राजेंद्र यादव और नामवर सिंह की बातचीत में यह कथन था) जी हां सपने न तो खुद के सुखद भविष्य से जुड़े, न ही समाज और देश से जुड़े। बस यूं ही, निरर्थक-सा, कुछ बेबस और कुछ लाचार-सा जीवन बीत रहा है। बचपन में अवश्य सपने आते थे। भविष्य के सुनहरे सपने। जितनी समझ थी उससे यह खूब आभास था कि गांव की रौशनी फाइलों के जाल में उलझ कर रह गई है, वह रौशनी यदि पानी है तो क्रांति ज्वार के मोती बोने पड़ेंगे। स्वप्न समाज में बदलाव के, स्वप्न जन आंदोलनों के आते थे। लेकिन यह सब दशकों पुरानी बातें हैं। अब कहीं कोई आंदोलन की सुगबुगाहट तक नहीं। सूचना क्रांति के इस विस्मयकारी, तिलस्मी समय में सब कुछ यंत्रचलित-सा हो चुका है। नन्हीं बच्चियों के संग बलात्कार हों या फिर इलाज के अभाव में तड़पते, मरने को अभिशप्त बच्चे, आई-सी-यू- में डॉक्टरों को डराते क्रांतिकारी ‘मसीजीवि’ पत्रकार। गला फाड़कर चिल्लाती न्यूज एंकर जिनके जेहादी तेवरों को स्त्री विमुक्ति कह पुकारा जाता है। कुछ समय तक हो-हल्ला फिर गहरी खामोशी। मानो सब कुछ ठीक हो चुका हो। आंदोलनों की ऐसी नई शैली जो मोमबत्ती बुझने तक का इंतजार नहीं करती। ऐसे में भला किसे याद रहेगा भंवरी देवी संग हुआ अत्याचार? किसे फुरसत है? इस फुरसत का न होना ही तो असल कारण है कि कभी पुलिस की ‘शूट एंड साइड’ आर्डर के निशाने पर रहा व्यक्ति जनता के सबसे पवित्र मंदिर लोकसभा में नेहरू-गांधी की पार्टी का नेता चुन लिया जाता है। इसलिए यह ऐसे अंधेरे का दौर है जो बेहद काला है। ऐसा नहीं कि आंदोलन परिदृश्य से बिल्कुल गायब हो। असल जन अंदोलनों की जगह कॉरपोरेट पोषित आंदोलन ने ले ली है। अल्बेयर कामू का कथन ‘‘हर क्रांति शोषण का नया मुखौटा पहनी होती है’’ आज ज्यादा समझ में आ रहा है। आंदोलन है लेकिन कैसे? एक आंदोलन राम मंदिर के नाम पर आयोजित किया गया। नब्बेे के दशक में शुरू हुआ यह आंदोलन भले ही आज एक दल विशेष को केंद्र की सत्ता में पूरी तरह काबिज करा पाने में सफल रहा हो, मिला क्या देश को? हरचरणा को? एक अंधराष्ट्रवाद जिसने समाज को विभक्त करने का काम कर डाला है। सुथन्ना तो फटा ही है, अब जरूर हरचरणा रसूल चाचा को खूनी नजरों से देखने लगा है। दलितों को काशीराम ने जिस सत्ता के शिखर तक पहुंचाने का स्वप्न दिखाया वह मायावती की धन लिप्सा ने निगल लिया। पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक सर्वहारा के हितों की बात करने वाले वामपंथियों ने शासन किया। अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए उन्होंने हर वह हथकड़े अपनाये जो हर तानाशाह के हथियार होते हैं। जब जनता का भ्रम टूटा तो ममता को सत्ता मिल गई। ‘मां-माटी और मानुष’ की बात करने वाली ममता के राज में बंगाल की दुर्दशा हमारे सामने है। देश की सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ‘जब लोकतंत्र खतरे में है’ कहना शुरू कर दें तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की बुनियाद कितनी कमजोर हो चली है। मीडिया की कमान उन हाथों में है जिनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं शुद्ध व्यापार है। जाहिर है ऐसे में सच सामने लाने वाली कलम झूठ को जन्म देने की मशीन बनकर रह गई है। इससे ज्यादा काला अंधेरा भला कब रहा होगा, जैसा अब है? जिनके पास खोने को कुछ नहीं, उनके पास जरूर कुछ पाने के सपने हैं। उन्हें इसीलिए बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया जाता है, वे स्मार्ट सिटी के मोह में भी फंस जाते हैं। उन्हें इन सपनों के सहारे कठोर जीवन जीने में थोड़ी राहत मिल जाती है। लेकिन उनका क्या जो सपने की हकीकत को जान-समझ रहे हैं। वे ज्यादा त्रसद हैं। जो कुछ उनके पास है, उसे बनाए रखने की मजबूरी उन्हें अंधा, बहरा, गूंगा बने रहने को मजबूर कर देती है। ये कायर लोगों की वह जमात है जिसमें आप और हम भी शामिल हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठ हम सरीखे कुछ बौद्धिक विलास कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं तो कुछ हमें पढ़-सुन कर अपनी निर्वीय प्रतिक्रिया दे शांत हो जाते हैं। 
डॉ- राममनोहर लोहिया गजब के भविष्य दृष्टा थे। उन्होंने साठ के दशक में ही भविष्य के भारत का खाका खींच दिया था। उन्होंने लिखा- ‘‘समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब है जिसमें कहीं-कहीं कमल उग गए हैं। कुछ जगहों पर ऐयाशी के आधुनिकतम तरीके के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमाघर और महल बनाए गए हैं। और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सबका कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो गरीब, उदास, दुखी नंगे और भूखे हैं।’’
तब से आज तक गंगा में बहुत पानी बह चुका, यहां तक की गंगा ‘पवित्र पावनि’ से ‘प्रदूषित पावनि’ हो चुकी है। मैं ज्यादा भयभीत इसलिए हूं कि साठ के दशक उम्मीद का था, सत्तर का दशक उस उम्मीद को पाने की जदोजहद का, सपनों का आंदोलन का दशक था। फिर धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा। आज वह इतना काला है कि न तो सपने आते हैं, न साहित्य मार्ग दर्शन करता दिख रहा है, न ही कविता हमारी मृतप्राय संवेदनाओं को झकझोर पा रही है। ऐसे दौर में ब्रेख्त की कविता का स्मरण हो आता है कि ‘अंधेरे समय में क्या गीत गाए जाएंगे, हां गीत गाएं जाएंगे। अंधेरे समय की बाबत।’ वैसे सच तो यह भी है कि हर कालखंड में अंधेरा शायद इतना ही काला रहा होगा। शायद मनुष्य होने की सबसे बड़ी शर्त, सबसे बड़ी त्रसदी यही है कि उसे स्वार्थी, क्रूर, फरेबी होना होगा। जिसमें यह गुण ज्यादा होगा, वही सुखी होगा, वही ताकतवर होगा और राजा होगा। विश्व कथा साहित्य का एक बड़ा नाम सआदत हसन मंटो मात्र चालीस वर्ष जिए। 1933 में उनकी पहली कहानी ‘तमाशा’ छपी थी। 1952 में उनका निधन हो गया। मंटो का जिक्र इसलिए क्योंकि आज तक हमें (मुझे) वर्तमान में अंधेरा ज्यादा काला नजर आ रहा है, मंटो को आजादी पूर्व ही ऐसा आभास होने लगा था। अपनी कहानी ‘कत्ल व खून की सुर्खियों’ में वे इंसान के क्रूर और बेरहम होने की बात करते हैं। कहानी के अंत में एक प्रश्न वे छोड़ जाते है ‘‘लेकिन यह इंसानियत कहां हैं? इसके रखवाले कहां हैं?’’ आज मैं भी आपसे यही सवाल पूछ रहा हूं। जानता हूं जवाब किसी के पास नहीं है, फिर भी!  

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