अपूर्व जोशी

कुछ अपनी नाकामी पर
संस्कृति का अंधेरा/राजनीति का अंधेरा/कला का अंधेरा/कौन-सा ध्वनि-चित्र तैयार कर रहे हो तुम? और देखो तुम्हारी क्रिया में तो/ध्वनि और चित्र भी अंधेरे में छिप ग्ए।कितने खुश हो तुम नियन्ता/अपने चक्र में तुम कितने खुश हो/जिसे जहां से चाहो समाप्त कर दो/ संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण। सब तुम्हारे बस में हैं/लेकिन कभी किसी ने तुम्हें पहचान लिया हो?उस पहचान को क्या पहचान दोगे/किस संज्ञा, किस क्रिया, किस विशेषण से/तुम उसे अभिहित करोगे किसकी होगी जीत/तुम्हारी या उसकी जो तुम्हारे फैलाऐ अंधेरे को भी कभी पहचान लेगा/और तुम्हें किसी अनाम दृष्टिहीन करागार में फेंक देगा। 
 
-शिकुटी लाल वर्मा
 



तो अन्ततः तमाम बुद्धिजीवियों के, देश की नब्ज पहचानने का भ्रम पाले रविश कुमारो के, सच को सच कहने का दावा करने वालों के, संवैधानिक संस्थाओं में पिछले कुछ वर्षों से आ रहे नैतिक क्षरण से थर्राये कथित धर्म और पंथ निरपेक्ष भारत वासियों की तमाम कोशिशें और ‘बगलोली’ के बावजूद देश ने एक बार फिर से नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी के नेतृत्व में आस्था व्यक्त कर डाली। वे अगले पांच बरस के लिए भारत के प्रधानमंत्री चुन लिए गए हैं। उनकी सोच, उनके व्यवहार, उनके विजन और उनकी समझ पर देश की जनता ने इतना बड़ा समर्थन दिया है तो ऐसे सभी को अपनी क्षमता पर, जन मानस की नब्ज टटोलने की अपनी विधा पर आत्म चिंतन का समय आ चुका है। मैं स्वयं ऐसों में शामिल हूं और नरेंद्र मोदी साहब के पिछले पांच वर्ष का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बाद अपनी बात पर जो मैं बजरिए अपने संपादकीय, अपने यू ट्यूब चैनल व अन्य माध्यमों के जरिए कहता आया हूं, उस बात पर डटा हूं और डटा रहूंगा जब तक या तो मैं अपनी समझ की नासमझी को समझ पाऊं या फिर नरेंद्र मोदी अपने ‘कहन’ पर खरे उतरते मुझे नजर आये। सबका साथ, सबका विकास महज जुमला ना रह कर एक आदर्श शासन व्यवस्था का प्रस्थान बिंदु बन यदि उभरता है तो मैं खुले मन से अपनी ना-समझी के लिए माफी मांगने का साहस रखता हूं। हाल-फिलहाल कुछ चिंतन मंथन इस आम चुनाव-2019 के नतीजों पर करने का जो प्रयास किया उसे आप सबसे साझा कर रहा हूं, इस अनुरोध और इस अपेक्षा के साथ कि आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया हमें मिलेगी, नरेंद्र मोदी और भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत पर मेरे नजरिए पर, साथ ही ‘पाखी’ के पिछले तीन अंकाें पर भी। तो चलिए मैं भाजपा को इन आम चुनावों में मिले जनादेश पर बगैर किसी दुराग्रह को साथ लिए, अपने मंथन-चिंतन से आपका परिचय कराता हूं। मेरा मानना है कि आजादी पूर्व से ही, कम से कम 1923 से जो एक हिंदुत्व की पहचान स्थापित करने का प्रयास या प्रयोग शुरू हुआ था, वह अब 96 वर्ष बाद जाकर पूरा होते दिख रहा है। पहली बार सावरकर ने द्विराष्ट्र का सिद्धांत अपनी पुस्तक में दिया था जो 1923 में प्रकाशित हुई थी। इसी के आस-पास मोहम्मद अली जिन्ना की भाषा बदलने लगी थी। कभी अखंड भारत का समर्थन करने वाले जिन्ना आगे चलकर पाकिस्तान यानी मुस्लिमों के लिए अगल राष्ट्र की मांग के सबसे बड़े पेरौकार बन उभरे। बहरहाल, जैसे जिन्ना एक मुस्लिम राष्ट्र के पैरोकार थे वैसे ही कुछ हिन्दू भी भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे। जनसंघ जो कालांतर में राष्ट्रीय स्वयं हिन्दू संघ बना, आजादी के बाद से ही अपनी इस मुहिम में जुट गया था। 1980 में भाजपा का जन्म इसी उग्र हिन्दुत्व को अवधारणा को मूर्त रूप देने की लक्ष्य सिद्धि के लिए हुआ। जो 2019 आते-आते कुछ हद तक अपने मुकाम के निकट पहुंचता नजर आ रहा है। दरअसल, विचारधाराओं के मोहपाश का नतीजा यह रहा कि आयातित मूल्यों को ढोते-ढोते कथित धर्मनिरपेक्षवादी अपनी ही संस्कृति का माखौल उड़ाने लगे जिसका फायदा मिला है उनको जो गंगा-जमुनी संस्कृति को अपना नहीं मानते, जिनकी दृष्टि में बहुसंख्यक होने का। सीधा अर्थ है खुद को देश का असली नागरिक मानना और अल्पसंख्यक को दोयम दर्जे का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आप और हम भले ही कितना भी असहमत हों, हमें स्वीकारना होगा कि वह एक बेहद अनुशासित संगठन है जो अपनी विचाराधारा को अमली जामा पहनाने में इसलिए सफल होता नजर आ रहा है। 
क्योंकि कथित धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने वालों ने धर्म और जाति का ऐसा बीज बो डाला जिसने आगे चलकर उनके लिए भस्मासुर बन गया। मोदी दरअसल, अपने पिछले पांच वर्ष की उपलिब्धयाें के चलते नहीं जीते। उपलब्धियां चूंकि शून्य थी इसलिए उन्होंने राष्ट्रवाद को हथियार बनाया। जनता जर्नादन के मन मस्तिष्क में धावा बोला। कहते रहे आप और हम कि मोदी अल्पज्ञानी हैं, उनका इतिहास बोध निल बट्टा सन्नाटा है। साथ ज्ञान बघारिये कि सिकंदर कभी बिहार नहीं पहुंचा था, या फिर कोणार्क के सूर्य मंदिर दो हजार नहीं सात सौ बरस पुराने हैं या फिर गुरु गोरखनाथ, कबीरदास और गुरुनानक देव का जन्म अलग-अलग शताब्दियों में हुआ था। जनता जो सुनना चाहती थी मोदी उसी सुर में बोले, उन्होंने कभी भी यह नहीं स्वीकारा कि उन्होंने गलत तथ्य दिए, यहां तक की उन्होंने विज्ञान को गलत साबित अपनी रडार थ्यौरी से कर डाला। जो यह समझते हैं कि पीएम अल्पज्ञानी हैं, वे भारी मुगालते में हैं, मोदी मार्केटिंग सिकल्स् के बेजोड़ बादशाह हैं। उन्होंने ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ को सही पकड़ा। उनके विरोधी अपने भौथरे हो चुके हथियारों के दम पर ही भरोसा करते रह गए और मोदी सिकंदर बन गए। आप और हम लाख इवीएम पर सवाल उठाऐ, जायज सवाल उठाए, इस सच से मुंह मोड़ना भयंकर भूल होगी यदि हम यह अब भी नहीं स्वीकारे कि अपने वातानुकूलित कमरों में बैठ हम जनता की नब्ज भापने का भ्रम पालते रहे, संघ और भाजपा ने हिंदुत्व की अपनी अवधारणा को जन मानस के भीतर पैठ बना ली है। यदि ऐसा नहीं होता तो इन चुनावों के नतीजें कुछ अलग ही होते। पूरे देश भर में, सभी जगह नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, औद्योगिक क्षेत्र में पिछले पांच साल में आई भारी गिरावट जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार की घोर आलोचना करते भारतवासी आपको गली-नुक्कड से लेकर पंच तारा होटलों में मिलेंगे। अमीर और गरीब, सभी एक स्वर में यही कहते नजर आएंगे। इस सबके बावजूद अधिकांश यह भी कहते सुने गए कि मोदी को एक और मौका मिलना चाहिए। कारण पूछा तो यही उत्तर मिला कि मुसलमान औकात में हैं, पाकिस्तान सहमा है, चीन बैकफुट में हैं, लब्बो-लुवाब यह कि देश से बहुसंख्यक का असली राज मोदी के चलते ही आया। इसका अर्थ सीधा और सपाट यह है कि भले ही खाने को रोटी, रहने को घर और पहनने को कपड़ा ना हो, स्वाभिमान से अपना सिर तो उठा सकते हैं। यह हम सब देख-समझ रहे थे लेकिन स्वीकारने को अपना अहंकार तैयार नहीं था। हम इस हद तक सुविधाभोगी, भ्रष्ट और निक्कमें हो चले हैं कि सड़क में उतरने का साहस रखते नहीं, कागज काले करने मात्र से ही अपने कतर्व्य की इतिश्री मान लेते हैं। बौद्धिक अहंकार हमें ‘टुकड़े-टुकड़े’ कर देगें। सेन्टर वालों का पक्षधर तुरंत बना देता है, हिन्दू आतंकवाद के खिलाफ बोलना इंडि़या इन्टरनेशनल, खान मार्केट जैसे अÕयासी के अड्डों का शगल बन चुका है, लेकिन यदि इनमें से कोई इस्लामिक आतंकवाद पर कुछ बोल दे तो वह दक्षिणपंथी करार दे दिया जाता है। तो भुगतिए अपने कर्मों की सजा। जरा चिंतन-मंथन करो मित्रे, सोचो जब तक जनता जनार्दन अपने नियंताओं का सच पहचानेगी, तब तक कितना क्षरण हमारी गंगा-जुमनी संस्कृति का हो चुका होगा? अपने कम्फर्टजोन से बाहर निकलिये, विचारधाराओं के बोझे को उतार फेंकिये जनता की नब्ज भापने के लिए उसकी बोली-भाषा में सोचिए तब मुकाबला कर पाऐेंगे। 
वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की सोच से अन्यथा आपकी-हमारी मूर्खताओं का खामियाजा हमारा लोकतंत्र, हमारी आने वाली नस्ले तो भोगने को अभिशप्त होगी ही, हम भी इतिहास में कायर और अपराधी करार दिए जाऐंगे। 
चलते-चलते ‘पाखी’ के पूर्व संपादक प्रेम भारद्वाज को उनकी नई पारी ‘भवन्ति’ के संपादक के लिए हृदय से शुभकामनाएं।

 

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