उस्मान

इलाहाबाद डायरी से

 

भट्ट साहब बड़े ‘लल्लन टाप’ आदमी थे, मुझ पर उनकी असीम कृपा थी। मुझसे ज्यादा सम्भवतः किसी पर भरोसा नहीं करते थे। और हमने भी उनकी चर्चा कभी किसी से नहीं की। अपनी महिला मित्रें की चर्चा मुझसे खुलकर करते थे। उनके इस विकट वाक-चातुर्य को, मैं ‘साष्टांग प्रणाम’ करता था।

मैं उनसे कहता, ‘महाराज’ तनी ई, कौशल हमें भी सिखा दो। भट्ट साहब गंभीर हो कर कहते, ‘‘उस्मान अभी इलाहाबाद में नए-नए आए हो, जब पुराने हो जाओगे तो तुम भी इसमें महारथी हो जाओगे।’’

‘‘पर मैं, खुदा से तुम्हारे लिए यही दुआ करुंगा कि तुम इसमे बिल्कुल भी वाक-चार्तुय न हो। ये ‘वाग-जाल’ जिसे तुम ‘वाक-चार्तुय’ समझ रहे हो तुम्हें बिल्कुल भी न आए। क्योंकि इसके रास्ते ‘पाप की संकरी गलियों से होते हुए विनाश के मरघट तक पहुंचते हैं।’’

मैंने कहा ‘‘भट्ट साहब बात कुछ समझ नहीं आई। कुछ विस्तार से बताइए।’’ उन्होंने चेहरे पर गंभीरता प्रदर्शित करते हुए बात को टाल दिया।

‘भट्ट साहब’ ज्ञानी और ध्यानी दोनाें आदमी थे, पर ज्ञान किसी को नहीं देते थे, और मेरे अलावा, किसी से राय लेने लायक किसी को समझते नहीं थे।

‘सुरा सुंदरी और साहित्य’ के प्रेमी थे। साहित्य का प्रेम सिनेमा तक, और सिनेमा का प्रेम सनक तक पहुंच  चुका था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एम-एस-सी- ‘रसायन शास्त्र’ में कर चुके थे। ‘दृष्टिकोण’ वैज्ञानिक और साहित्यिक दोनों था परन्तु मन केवल साहित्य में ही रमता था।

मुझमें और ‘भट्ट साहब’ में काफी समानताएं थीं। सिनेमा, साहित्य और शायरी, उनमें से प्रमुख थीं। मैं ठहरा ‘चायखोर’ और पंडित जी मतलब ‘भट्ट साहब’ सुरा-प्रेमी व्यक्ति।

मन कभी बहक जाता तो ‘मीरगंज की गलियां’ भी घूम आते, इसकी चर्चा मेरे अलावा किसी से नहीं करते थे।

भट्ट साहब की खोजी प्रवृत्ति ने उन्हें, जीवन की उन पहलुओं को देखने का जिज्ञासु बना दिया था, जो ‘अंधेरे कोनों’ में दुबके पड़े थे। ‘भट्ट साहब’ के लिए ‘कॉलेज और कोठे’ का फर्क करना मुश्किल हो गया था।

शुक्रवार का दिन था, और मैं ‘राजकरन टॉकीज’ में पहला शो देखने का आदी था, यह सिलसिला पिछले तीन सालों से चल रहा था। एक दिन मेरी जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी, ‘भट्ट साहब’ ने जब मुझसे पूछा, ‘‘क्यों बे उसमान, तुम फिल्म देखने नहीं गए आज?’’ तो मैंने कुछ नहीं कहा।

‘भट्ट साहब’ समझ गए लौंडे के पास पैसे वैसे नहीं 

होंगे, ‘भट्ट साहब’ ने ‘मीरगंज’ की योजना रदद् कर, अपने वॉलेट के सारे पैसे मुझे दे दिए। मेरे लाख मना करने पर भी उन्होंने उन पैसों को हाथ भी नहीं लगाया पूरे ‘तीन हजार रुपए’ थे।

मैंने कहा, भट्ट साहब इसमें एक फिल्म तो ठीक है, साल भर की सभी फिल्में देखी जा सकती है। ‘भट्ट साहब’ मुस्कुराए और कहा, ‘‘पैसों का क्या है, यह तो वैसे भी ‘मीरगंज के मुजरे’ में लूटने वाले थे। अब तुम इसे अधिक रचनात्मक प्रयोग में लाओगे।’’

‘भट्ट साब’ को कितना विश्वास था मुझ पर, इस विश्वास से में कभी-कभी डर जाता था, कि जब इलाहाबाद में भट्ट साब’ नहीं होंगे तब मैं किससे पैसे मांगूगा। कौन मुझ पर 

भरोसा करेगा।

एक दिन भट्ट साहब ने कहा यू-पी-एस-सी- की तैयारी करने दिल्ली जाना है। हमने कहा हो आइये। दिल्ली में रहते हुए उन्हें दो वर्ष हुए, और दोनों में ही दो मेंस लिखे परंतु अंतिम सफलता नहीं मिली।

एक शाम को फोन आया, बोले, ‘‘इलाहाबाद आ रहा हूं, रूम की जुगाड़ जमाना।’’ हमने कहा, ‘‘महाराज रूम क्या पूरा इलाहाबाद खाली करवा देंगे।’’, ‘भट्ट साहब’ हंसने लगे।

इलाहाबाद के मनमोहन से फोन किया। मुझे ‘मनमोहन पार्क’ पर आने का आदेश हुआ, मेरे सामने फिर वही जिंदगी का साथ निभाने वाला शख्स साहिर लुधियानवी उर्फ ‘भट्ट साब’ थे। मुझे देखते ही गले से लग गए।

सबसे पहले ‘भट्ट साहब’ मुझे शराब के ठेके पर लेकर गए, मैंने कहा, ‘‘यार महाराज प्लीज अब  पीना छोड़ दो।’’ ‘भट्ट साहब’ कहते अमा यार छोड़ देंगे, तुम यही खड़े रहो बस हम यूं गये, और यूं आये।

मैं बीस मिनट तक शराब के ठेके के बाहर खड़ा रहा तब भट्ट साहब पूरे टुल होके बाहर आते हैं।

मैंने तब ‘भट्ट साब’ का मोर्चा संभाला। दूसरे दिन 

राजापुर में रूम खोजा गया और वहां से बहुत जल्दी ‘भट्ट साब’ का मन उचट गया।

मुझे फोन लगाकर कहा, ‘‘यार अब इलाहाबाद में नहीं रहना, दिल्ली जाना है’’ मैंने कहा, ‘‘फिर से?’’, ‘भट्ट साब’  ने कहा हां।

दोपहर मैं इलाहाबाद जंक्शन से रिजर्वेशन था, और सारा सामान मैंने रिक्शे से ट्रेन में रखवाया था। चार भारी भरकम किताबों से भरे बैग स्टेशन पर रखवाये। ये भट्ट साब से हमारी आखिरी भेंट होने वाली थी, किसे पता था।

कुछ दिनों के बाद भट्ट साहब का फिर फोन आया उस्मान भाई यू-पी-एस-सी- का इंटरव्यू काल आया है, इलाहाबाद आएंगे इंटरव्यू के लिए, ‘‘बताओ प्रतापगढ़ से तुम्हारे लिए क्या ले आएं?’’ मैंने कहा ‘भट्ट साहब’ आप खुद ही आ जाइए, इससे बड़ा तोहफा और क्या होगा। ‘‘अरे नहीं ‘उस्मान’ कुछ न कुछ तो लाना ही पड़ेगा।’’ मैंने कहा कुछ नहीं, बस आप ही आ जाइए। भट्ट साब ने कहा, ‘‘प्रतापगढ़ का आंवला बड़ा फेमस है, और अचार भी। साथ में आंवले की कैंडी भी बड़ी फेमस है, वही ले आऊंगा तुम्हारे लिए।’’

इलाहाबाद से इंटरव्यू देकर ‘भट्ट साब’ बिना मिले ही प्रतापगढ़ चले गए, मैंने फोन लगाया तो ‘भट्ट साब’ ने कहा कि बहुत आवश्यक काम आ गया था तुरंत बिहार में अपने मित्र की शादी में निकलना था, गया (बिहार) से तुरंत आकर मिलते हैं, मैंने कहा ठीक है।

मनमोहन पर सुबह की चाय पीते हुए ‘भट्ट साहब’ के परम मित्र ‘इसरार खान’ टकरा गए। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘भट्ट साहब का पता है?’’ मैंने यूं ही मजाक में कहा। ‘‘वह तो चल बसे।’’ असरार भाई ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा? ‘‘क्या तुम्हें पता है? मैंने कहा क्या?’’

उन्होंने कहा भट्ट साहब की ‘रेल हादसे’ में मौत हो गई मैंने कहा, क्या बक रहे हो अभी कुछ दिन पहले ही तो वो इंटरव्यू देकर, बिहार गए हैं। मुझे इस पर यकीन नहीं हो रहा था मैंने तुरंत कॉल किया उनका नंबर ‘स्विच ऑफ’ जा रहा था।

खुदा गवाह है, मैं ‘बुत’ बना हुआ इसी उधेड़ बुन में कब रूम पर आ गया  पता ही नहीं चला। ‘भट्ट साहब’ आप ऐसे नहीं जा सकते इतनी भी क्या जल्दी थी जाने की, और मिलकर भी नहीं गए। अब ‘इलाहाबाद’ आपके बगैर सूना है।

कुछ दिनों के बाद ‘उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग’ का परिणाम आया और ‘भट्ट साहब’ (एस डी एम)  बन चुके थे। और मैं फोन की स्क्रीन पर उनका नाम देखकर, अथाह शून्य में था।

मैंने अपने ‘वॉलेट’ में रखी उनकी पासपोर्ट साइज फोटो निकाली, और आधी रात तक उसे लिये, बस पथरायी आंखों से देखता रहा।

 

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