मुकुल जोशी

छावनी में घर

डिनर करने के बाद जयदेव आदतन जब स्टडी रूम में आया, तो एक बार फिर वही विचार उसके दिमाग में कौंधा, विचार था- कई पुराने तथ्य, मान्यताएं जिन्हें पहले सार्वभौमिक सत्य माना जाता था। कालांतर में वे वैज्ञानिकों, विचारकों, शिक्षाविदों के अनवरत शोध और परिश्रम के कारण गलत साबित हुए और फिर मानव सभ्यता और विकास की कहानी भी यही तो है। 

परंतु कुछ तथ्य, कुछ खोज, कुछ आशातीत परिणाम, वर्षों से पाली गई हसरतें बिना प्रयास के अनायास ही उपलब्ध हो जाती हैं। अंग्रेजी में जिसे ‘मैना फ्रॉम हैवन’ कहते हैं। सेना से रिटायरमेन्ट के बाद जयदेव अपने नए फ्रलैट में आया है। अक्सर वह घर के अंदर और घर के बाहर घूमते मन-ही-मन आनंदित होते कह उठता है, ‘होम इज व्हैर द हार्ट इज’।

दरअसल उसे यह घर एक ईश्वरीय उपहार यानी ‘मैना फ्रॉम हैवन’ के रूप में मिला है।

आज उसे स्टडी रूम में बैठे उन तीन कहानियों को दुबारा पढ़ने की इच्छा हुई जिन्हें वह करीब दस वर्ष पहले पढ़ चुका था। उसकी इस अप्रत्याशित खुशी का सबब यह था कि उसने बिना शोध और परिश्रम किए अरसे पहले पढ़ी गई कहानियों के निष्कर्ष को अपने संदर्भ में झुठला दिया था। आंशिक रूप में ही सही। यद्यपि अधिकांश जनता के लिए उन तीन कहानियों के निष्कर्ष निर्विवादित रूप से आज भी सत्य हैं और रहेंगे। वह कुर्सी से उठा और सामने बुक-रैक में उन किताबों को ढूंढ़ने लगा। कुछ देर ढूंढ़ने के बाद ही उसे वे दो किताबें मिल गईं। पहली किताब का नाम था, ‘आधी सदी का सप़फ़रनामा’ जिसमें उसके प्रिय कथाकार स्वयंप्रकाश की वो दो कहानियां भी थी, ‘गौरी का गुस्सा’ और ‘कहां जाओगे बाबा।’ दूसरी किताब का नाम था, ‘उर्दू कथाकार गुलाम अब्बास की कहानियां’ जिसमें उनकी मशहूर कहानी ‘आनंदी’ भी संकलित थी।

स्टडी चेयर पर पसर कर वह उन पहले पढ़ी हुई कहानियों को बढ़े चाव से पढ़ने लगा। बीच-बीच में पढ़ते वह रुककर खिड़की से बाहर झांक लेता। कुछ सोचते हुए। फिर किताब में नजर गड़ा देता। तीनों कहानियां पढ़ने के बाद कुर्सी में बैठे-बैठे अपने को स्ट्रैच करते हुए उसने अंगड़ाई ली। फिर कमरे से बाहर निकल टेरिस में चहलकदमी करते सामने हवा से झूमती पेड़ों की डालियों, टेरिस में बजती विंड-चाइंस को निहारते-सुनते सहसा वह गाने लगा आ चल के तुझे मैं ले के चलूं, इक ऐसे गगन के तले, जहां गम भी न हो, आंसू भी न हो, बस प्यार-ही-प्यार पले, इक ऐसे गगन के तले।

उसे पूरा विश्वास था कि जिस तरह एक शराबी किसी अनजान शहर अथवा गांव में भी शराब की दुकान ढूंढ़ कर शाम को दारू पीने का अपना जुगाड़ कर ही लेता है। उसी तरह साहित्य प्रेमी पाठक उसकी इस कहानी को पढ़ने से पहले अथवा बाद में पहले उद्धृत उन तीन कहानियों को ढूंढ़ कर पढ़ ही लेगा। भले ही यू-ट्यूब पर पढ़े।

टेरिस की बालकनी में खड़े होकर वह आकाश में खिले चांद को टकटकी लगाए देखने लगा। दूर तक खुले छावनी के पेड़ाें के झुरमुटों से लेकर उसके घर तक असीम सुकून से भरी नीरवता बिखरी पड़ी थी। मंद-मंद हवा बह रही थी। वह कुछ सोचते हुए बुदबुदाया- ‘गौरी का गुस्सा’ कहानी में जब नंदी पर आरूढ़ शिव-पार्वती आकाश मार्ग पर विचरण कर रहे थे, तब पार्वती जी की नजर सिर्फ रतन लाल अशांत पर ही नहीं पड़ी, जो पंचरतन 

टॉकीज के सामने फत्तू नाई के केबिन के बाहर बैठा अपनी किस्मत को कोस रहा था। अपितु उस पर भी पड़ी जो छावनी के क्रॅास-कंट्री रूट के सुनसान रास्ते पर अजदा पाइकर तोप के सामने से समाधिस्थ भाव से ईवनिंग-वॉक पर निकला था। बीच-बीच में टहलते हुए वह हसरत भरी निगाह से छावनी से एकदम सटे और छावनी से ही तीन साइड से घिरे फ्रलैट्स को देख लेता, जो बन ही रहे थे। फिर उस सुनसान रास्ते के वायुमंडल में एक उच्छवास छोड़ते, एक अपनी हसरत भरे गुब्बारे को अंतरिक्ष में छोड़ते हुए कहता, काश! यहां फ्रलैट मिल जाता।

पार्वती जी तो अंतर्यामी हैं। उन्होंने दोनों के मन को पढ़ लिया। रतनलाल की इच्छाएं असीमित थी। वह पूरी दुनिया को ही अच्छा बनाना चाहता था। और दुनिया तो पूरा विश्व ठहरा। पूरे विश्व को अच्छा बनाना पार्वती जी को तर्क-संगत नहीं लगा होगा। क्योंकि यदि पूरी दुनिया अच्छी बन जाती, तो बुरे कर्म करने वाले, पापियों, अपराधियों को भी वे सब सुख-सुविधाएं अनायास ही प्राप्त हो जाती, जो सत्कर्म, सदाचारी और धर्म-परायण लोगों को तप और परिश्रम से मिलती हैं।

यह कैसे हो सकता था! असंभव था यह तो!

उसी रात सपने में उसे शिव-पार्वती दिखे, जो ओझल होने से पहले ‘तथास्तु’ कह गए। और अगले ही दिन दोपहर के दो बजे से पहले वह उस छावनी से सटे फ्रलैट की अग्रिम रजिस्ट्रेशन जमा-राशि को चौक बिल्डर के ऑफिस में जमा कर आया था।

गार्डन-चेयर को उसने अनफोल्ड किया और फिर उस पर पसर कर विंड चाइंस की टिंक-लिंक को सुनते छावनी के खुले तारों से भरे आसमान को निहारते वह अतीत के अंतरिक्ष में उड़ने लगा।

तब वह अरुणाचल की सरहद पर पोस्टेड था। चार वर्ष ही रह गए थे उसके रिटायरमेंट में, फैमिली उसकी सेपरेटेड फैमिली एकॉमोडेशन में हैदराबाद थी, जहां वह पहले पोस्टेड था। तब से ही वह चिंतित रहने लगा था कि सेना से रिटायरमेंट के बाद घर बनाए तो कहां! भाई-बहन, रिश्तेदार, गांव के लोग उससे छुट्टियों पर घर जाने पर कहते रहते- भई जयदेव, अब अपने हिस्से की जमीन पर घर कब बना रहे हो। सबको पूरा यकीन था कि 

औरों की तरह वह भी अपने पैतृक गांव में ही घर बनाकर रिटायरमेंंट के बाद रहेगा। अपना गांव सुहागपुर छोड़े हुए उसे 

पैंतीस वर्ष हो गए थे। दरअसल सुहागपुर के आस-पास कॉलेज न होने की वजह से उसे ग्रेजुएशन के लिए बाहर जाना पड़ा। फिर सेना में नौकरी लगते ही गांव आना साल में दो बार ही हो पाता। उन छुट्टियों में भी आठ-दस दिन रिश्तेदारी निभाने में इधर-उधर जाने में बीत जाते। जब तक मां-बाबू जिंदा थे, गांव का घर ‘घर’ लगता था। तमाम अभावों और असुविधाओं के 

बावजूद। चूंकि उस पुराने एजबैस्टेस की छत वाले घर से 

संवेदनाएं जुड़ी थी। वह यादों में बसा घर अब गांव में नहीं है। खंडहर होते उस घर केा तोड़कर सपाट कर दिया गया है। एक बाउंड्री वॉल खड़ी कर दी गई है उस सपाट जमीन की सुरक्षा हेतु। परंतु वह पुराना घर-आंगन जहां उसका बचपन, लड़कपन, परिवार और दोस्तों के साथ बीता, अपनी मीठी यादों के साथ उसके तीस वर्षों के सेवाकाल के दौरान उसके साथ-साथ चलते गया। इस समय बाहर टेरिस में बैठे-बैठे वह उस पुराने 

एजबैस्टैस की छत वाले मकान को शून्य के पर्दे पर देखते उसके अंदर घुस सकता है।

परंतु अब!

तीन दशकों से भी ज्यादा का अंतराल!

और समय के इस बड़े अंतराल को और अधिक निष्ठुर और अमानवीय बना दिया है- उपभोक्तावादी संस्कृति ने। जीवन फलसफे में आए इस परिवर्तन के प्रभाव से क्या कोई शहर, कस्बा, गांव बच पाया है? तो सुहागपुर कैसे बच पाता!

और फिर पिछले तीस वर्षों से सेना में नौकरी के दौरान छावनी के सुरक्षित, स्पॉटलैस क्लीन, खुले हुए, हरियाली से लबरेज, किसी भी प्रकार के प्रदूषण से रहित और अपने आप में सर्व-सम्पन्न और व्यवस्थित माहौल में रहने का वह और उसका परिवार इतना अभ्यस्त हो चुका था कि सिविल इलाके में रहने का ख्याल तक उनको असहज कर देता।

‘आइ एम फॉरचुनेट’- वह बुदबुदाया। वरना हर आदमी की वही समस्या है जो रतनलाल और मास्टर राम रतन वर्मा की थी। और फिर ‘आनंदी’ भी तो लगभग हर शहर, कस्बों में पहुंच गई है।

काश! रतनलाल ने छावनी के अंदर-बाहर चार-पांच चक्कर लगाए होते, तो शर्तिया वह पार्वती जी से यही अर्ज करता- माते! मुझे छावनी से सटे इलाके में कही भी घर दिलवा दो।

अचानक हवा जोरों से बहने लगी। पेड़ों की डालियां एक दूसरे से गलबहियां डालते फुसफुसाहट में संवाद करने लगी। विंड-चाइंस अपनी ही धुन में ध्वनित करता मधुर संगीत से रात के इस माहौल को रोमानी बनाने लगा। अंदर कमरे से कुछ फड़फड़ाने की आवाज से वह चौंका। उसने खिड़की से अंदर झाेंका। दीवार पर टंगा वर्ल्ड-मैप का कैलेंडर अचानक आए हवा के झौंकाें से झूलते फड़फड़ा रहा था। यह कर्कश ध्वनि उसे उसके सुकून भरे लम्हों को बाधित करती लगी। वह अंदर गया और उस कैलेंडर को उतार टेबल पर रख दिया। कुछ देर तक दुनिया के नक्शे के हर महाद्वीप पर हाथ फेरते-देखते हुए फिर कैलेंडर को रोल कर एक कोने में रख दिया। एक बार फिर वह बाहर टेरिस पर आकर कुर्सी पर बैठ गया। कुछ सोचते हुआ वह जोर से बोल उठा, ‘दुनिया! कौन-सी दुनिया!’

हर आदमी की एक दुनिया होती है। और उस दुनिया का एक अलग ही भौगोलिक मानचित्र होता है। उसी भौगोलिक दुनिया की आबोहवा से उस व्यक्ति का अपना एक सामाजिक, 

मानसिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मानचित्र निर्मित होता है। आदमी की दुनिया का मतलब जहां के भौगोलिक मानचित्र में उसके दिन-रात गुजरते हैं। वही उस आदमी की दुनिया होती है। सत्ताईस वर्षों तक नेलसन मंडेला दक्षिण अफ्रिका की एक जेल में जब कैद थे, तब उनकी दुनिया का मैप जेल की चार दिवारी की परिधि तक ही सीमित था। हर आदमी के लिए उसकी दुनिया  उसका घर, आस-पड़ोस का इलाका और उसकी कार्य-क्षेत्र की सीमा ही होती है।

‘‘थम कौन आता है! पहचान के लिए आगे बढ़!’’ सहसा इस बुलंद आवाज की ललकार ने उसकी तंत्र तोड़ी।

टेरिस के दाई तरफ जहां से आवाज आई थी, उसने उस तरप़फ़ देखा। ‘ओह! तोपची गेट का संतरी है।’ उसके फ्रलैट का टैरेस ट्रेनिंग बटालियन के तोपची द्वार से एकदम सटा होने के कारण अक्सर यह आवाज सुनाई पड़ जाती है। गेट पर कोई आया होगा। वह सोचने लगा। यह चिर-परिचित संबोधन की ललकार- ‘थम कौन आता है! दोस्त या दुश्मन!’ सेना की एस-ओ-पी- (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसीजर) के मुताबिक है जिससे छावनी की सरहद पर विभिन्न गेट्स पर खड़े राइफल थामे संतरी मुस्तैदी के साथ चौबीस घंटे पहरा देते हैं। सिविल का ‘चलता है’ वाला कल्चर यहां नहीं चलता। ‘थम कौन आता है!’ संतरी की ललकार उसे अतीत में उन्नीस सौ पचासी में खींच ले गई।

तब वह आइ-एम-ए- देहरादून से पास आउट होने के बाद पहली पोस्टिंग में लद्दाख के तुरतुक इलाके में गया था। बटालियन में आए हुए उसे एक सप्ताह भी नहीं हुआ था। रात को अफसर मेस में डिनर के बाद मेस से बाहर निकलते हुए बटालियन के टू आइ सी मेजर कटनेश्वरकर ने उससे पूछा था -‘जय, टु नाइट यू आर द ड्यूटी अफसर एंड यू हैव टू विजिट एंड चेक ऑल द सैंट्री पोस्ट इन द नाइट आफ्रटर ट्वेंटी थ्री हंड्रेड आवर्स। होप यू नो द पास-वर्ड!’ ‘यस सर!’ बोल कर वह अपने रूम में आ गया था। यूं तो दो-तीन दिन में ही उसने बटालियन का पूरा एरिया और संतरी पोस्टों को देख लिया था। परंतु जब वह रात के बारह बजे बाहर निकला, तो दिन में जानी-पहचानी जगह भी अनजान और रहस्यमयी लगी। ऊपर से चिल्ले-कलां की बर्फानी कड़कड़ाती हवाएं टीन की छत के बने शैल्टर्स से टकराते वीभत्सतता लिए फरफराहट कर रही थी। पहली पांच सैंट्री पोस्ट को चौक करने के बाद जब वह मन ही मन पास-वर्ड को दोहराता छठी पोस्ट के पास जा रहा था, तब अचानक संतरी के बूट पहने पांव जमीन पर पटकने और राइफल को कॉक करने के साथ ‘थम कौन आता है!’ की गर्जना सुनकर वह हकबका गया और पासवर्ड ही भूल गया। बस गिड़गिड़ाते हुए हाथ ऊपर किए इतना ही कह पाया! यार मैं दोस्त हूं। 

सैकेंड लैफ्रिटनैंट जयदेव। चार-पांच दिन पहले ही बटालियन में पोस्टिंग आया हूं। सी ओ साब का नाम कर्नल मिरफ़याजुद्दीन है, टू आई सी मेजर कटनेश्वरकर और एडजुटैंट कैप्टन अजय सिंह। और हां, सुबेदार मेजर धन सिंह थापा। मुझे पता नहीं था यहां भी सैंट्री पोस्ट होगी--- सॉरी यार माफ करना--- एक ही सांस में कह गया था वह।

संतरी का उत्तर उसे आज भी याद है। अक्षरशः बोला था- साब! ये सरहद है। पासवर्ड नहीं बता पाने पर सीधे शूट करने का आदेश है। वो तो मैंने आपको पहचान लिया। कल आपने हमारे लंगर में खाना खाया था। आगे से ये गलती मत करना साब!

‘क्या बजा होगा?’- यह कहते उसने कमरे के अंदर वॉल-क्लॉक पर नजर डाली। सवा ग्यारह बजने को थे। एक बार फिर अंदर जाने से पहले उसने चारों तरफ नजर डाली। बाहरी निस्तब्धता को मन में समाए वह अंदर बैडरूम में आ गया। अन्नू अभी-अभी ही लेटी थी। ‘सो जाइए अब’ कहकर उसने अपने ऊपर चाद्दर डाल ली। लाइट ऑफ कर वह भी अंधेरे का लिहाफ ओढ़े बेड पर लेट गया। लेटते ही एक बार फिर वह अपने गांव के पुराने एजबैस्टेस की छत वाले घर में घुस गया था। सोते समय ऐसा अक्सर हो जाया करता है।

तो अब जयदेव क्या करे! क्या करे कि कहानी पढ़ने के बाद, कि रतनलाल अशांत और मास्टर रामरतन वर्मा सरीखे असंख्य लोगों को यह पता लग जाए कि किस प्रकार शिव-पार्वती की कृपा से उसने पहले उद्धृत तीन कहानियों के प्रमाणित सत्य बिना प्रयास के अनायास ही खंडित कर दिए। अपने संदर्भ में ही सही। उसके लिए, उसके परिवार की दुनिया के लिए यह सत्य तो रहेगा ही।

लेटे-लेटे वह सोचने लगा। मुख्य रूप से रतनलाल और मास्टर रामरतन वर्मा ने भी तो अपने लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ, खुले और शांत इलाके में घर के सपने संजोए थे। और ये तो आदमी की मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिन्हें उन्नीस सौ तैंतालीस में अमेरिकन मनोवैज्ञानिक अब्राहम मेसलोव ने ‘हाइरॉर्की ऑफ नीड्स’ में उल्लेख किया है और ये थ्योरी आज भी प्रासंगिक है और हमेशा रहेगी। हां, सिर्फ रतनलाल की तीन और नाजायज मांगें थी। ढेर सारा पैसा, ठाठदार मकान और उस पर लड़कियां मरें। पहले तो उसे छोटी-मोटी नौकरी ही चाहिए थी। पर पता नहीं कैसे रतनलाल को उसी समय एक टी-वी- सीरियल- ‘कहने में क्या हर्ज है’ याद आ गया। आदमी का चंचल मन ही ठहरा और उसने मौके का फायदा उठा पार्वती जी से कह डाली वही तीन नाजायज मांगें।

बैड पर लेटे-लेटे उसने बाएं तरफ करवट ली। नींद नहीं आ रही थी। फिर अंधेरे में अमूर्त अपार जनसमूह को संबोधित कर वह मन-ही-मन बोलने लगा, ‘‘जरा सोचिए, आप हम को यदि राह में चलते अकस्मात पार्वती जी प्रकट होकर बोलें- तुम्हें क्या चाहिए वत्स! तो, आप-हम तो न जाने क्या-क्या मांग लें। आप मुझसे सहमत हैं न! मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर में हम हजारों चीजें मांगने ही तो जाते हैं। फिर भगवान से सौदा करते हैं कि फलां चीज मिल जाएगी तो हजार रुपये की भेंट चढ़ाऊंगा। वगैरह-वगैरह।’’

तो अब समय हो गया है, जयदेव का एक दिन का 

रोजनामचा देख लेते हैं। यानि उसकी दुनिया का भौगोलिक, मानचित्र। जहां उसके चौबीस घंटे गुजरते हैं। यानी सुबह, दोपहर, शाम और रात। और उसकी जिंदगी के शेष दिन भी इसी तरह गुजरेंगे। थोड़ा-बहुत दिनचर्या में किसी कारणवश परिवर्तन हो सकता है।

तो चलिए!

सुबह पौने पांच बजने को हैं। जयदेव की बायोलॉजिकल क्लॉक ने उसे उठा दिया है। थोड़ी ही देर में वह अपनी पत्नी अनुराधा जिसे प्यार से वह अन्नू कहता है, बाहर निकलने को तैयार हो रहे हैं।

‘तो चलें हुजूर!’- स्पोर्ट्स-शू का फीता बांधते वह बोला। ‘चलिए! लिपि, अंदर से दरवाजा बंद कर लो’- अन्नू बेटी को जगाकर बाहर निकल पड़ी।

वे दोनों चार कदम चलने के बाद ही एक विशाल घर के अंदर प्रविष्ट होने वाले थे। इस विशाल घर की परिधि लगभग चार किलो मीटर की थी। 

और यह विशाल घर था- छावनी।

पिछले दो सौ वर्षों से भी अधिक समय से जब अंग्रेजों ने भारत में छावनियां बनाई थी, तब से लेकर आज तक उनके भौगोलिक मानचित्र के मूलरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया था। हां, सुविधाओं की संरचना वक्त के साथ बेहतर होती चली गई। इस चार कि-मी- की छावनी की सरहद की परिधि पर कई गेट थे जिन पर प्रत्येक गेट पर हथियार बंद सैनिक चौबीस घंटे मुस्तैद रहते। इसके अलावा दो फौजी गाडि़यों पर क्यू आर टी (क्विक रिएक्शन टीम) पूरी छावनी में बीच-बीच में चक्कर लगाती संतरियों से कनैक्टेड होते हुए किसी भी अवांछित घटना को 

रोकने के लिए तत्पर रहती। सिविल सरकारी तंत्र की तरह नहीं कि जब प्यास लगे, तभी कुआं खोदा जाए।

‘जै हिंद साब!’, छावनी के मुख्य द्वार पर खड़े संतरी ने सैल्यूट मारते हुए कहा।

‘जै हिंद! कैसे हो?’

‘ठीक साब’।

दिन में दो-तीन बार छावनी में आना हो ही जाता है। छावनी के बगल में फ्रलैट खरीदने के बाद ही वह कैनन ऑफिसर्स 

इंस्टिट्यूट कैनन गॉल्फ क्लब, कैनन स्पोर्टस कॉम्प्लैक्स, लाइब्रेरी का मेम्बर बन गया था। इसलिए लगभग सभी संतरी उसे जानते हैं। वो बात अलग है कि आदतन अपना आइडैंटिटी, कार्ड वह जेब में रख लेता है ताकि नई पोस्टिंग पर आए संतरी को वह अपना कार्ड दिखा छावनी के अंदर जा सके। अन्नू भी अपना आई-कार्ड हमेशा छावनी के अंदर जाने से पहले अपने पास रख लेती है। हालांकि वह छावनी के अंदर आर्मी प्री-स्कूल की प्रिंसपल है, जहां छावनी के बच्चे पढ़ते हैं। 

अब वे दोनों छावनी के मुख्य पथ के बोलेवार्ड के साथ-साथ किनारे बने वॉकिंग प्लाजा ट्रैक पर चलने लगे। पिछले तीस सालों से इसी तरह छावनी की जानी-पहचानी आबो हवा में चलते हुए वे बिल्कुल घर-सा महसूस करने लगे। छावनियां किसी भी शहर में हों, लगभग एक जैसी ही होती हैं। जिसके खुले विस्तार में होते हैं- हॉकी, फुटबाल, पी-टी- ट्रेनिंग एरिया के कई मैदान। इसके अलावा बास्केट बॉल, वालीबॉल, टैनिस कोर्ट, स्कवाश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, गॉल्फ कोर्स, तरण-ताल। पूरी छावनी हरे-भरे पेड़ाें से आच्छादित एक अशोक वाटिका ही होती है। दरअसल छावनियां उस शहर के ‘फेफड़े’ अथवा ‘लंग स्पेस’ होते हैं जहां सिविलियन आम जनता को जीने के लिए वायुमंडल में 

ऑक्सीजन की जरूरत होती है। बोलेवार्ड में दूर तक लगे घने लंबे पेड़ों की कतारें हवा में झूमती सुंदर लग रही थी। वॉकिंग प्लाजा के ट्रैक पर हर सौ मीटर पर लगे स्पीकरों से एक पुरानी फिल्मी धुन का वाद्य-संगीत वातावरण को सुरम्य बना रहा था।

‘सुनो! ये बज रही धुन किस गाने की है?’

‘एक सैकेंड। सुनने दो पहले।’

अन्नू संगीत के साथ कुछ पल गुनगुनाने लगी--- ‘अरे हां, वो गाना है जो तुमने जम्मू के उस्मान ऑफीसर्स इंस्टिट्यूट में 

हजबैन्ड्स नाइट में गाया था- मेरे गीतों में तुम, मेरे ख्वाबों में तुम, हो चुके हम तुम्हारी मुहब्बत में गुम, मन की बीना की 

धुन---।

‘एबसॉल्यूटली राइट।’

कुछ दूर तक वे दोनों उसी धुन को गुनगुनाते चलते रहे। वाद्य-संगीत की पुरानी फिल्माें की धुन पर गुनगुनाते हुए सुबह-शाम वॉक पर निकलना उनकी दिनचर्या का संगीत से सराबोर करने वाला अनुभव होता है।

‘बजरंग बली की जै!’- रैक्रूट्स की एक टोली कदम से कदम मिलाते दौड़ती मंदिर के गेट के सामने से जयघोष करती गुजरी।

कुछ दूर चलने के बाद वे दोनों अब पी-टी- मैदान से गुजरने लगे। यह मैदान उनके बाएं तरफ था। पी-टी- उस्तादों के संचालन में रैक्रूट्स सिट अप, पुश अप, चिन अप, मंकी रोप, वर्टिकल रोप, हॉर्स जंप आदि कर रहे थे। सब गतिविधियों में एक सहज प्रवाह और उत्साह नजर आ रहा था, कुछ समर्थ रिक्रूट्स अपने कमजोर साथी को तरीका बताते उसका हौसला बढ़ा रहे थे।

‘‘शुरू-शुरू में ट्रेनिंग के दौरान मुझसे भी मंकी रोप नहीं होती थी। यहां से रोज गुजरते मुझे अपने कैडेट डेज की याद हो आती है और फिर मैं यहां वॉक करते देहरादून चला जाता हूं।’’

‘‘मुझे आपने बताया था। एक पीटी उस्ताद हवलदार भुजबल के बारे में आप बहुत बात करते हैं। वो तो आपके पीछे ही पड़ गया था न!’’ अन्नू वर्टिकल रोप करते रिक्रूट्स को देखकर बोली।

‘‘हां, वो नहीं होता तो मैं रोप नही पास कर पाता।’’

अब वे रिक्रूट्स के पीटी ग्राउंड से दूर निकल आए थे। डैंटल हॉस्पिटल के पास।

‘‘चलो! थोड़ा अब जॉगिंग कर ली जाए। वॉर्म-अप भी हो जाएंगे स्पोटर््स-कॉम्प्लैक्स पहुंचने तक।’’

थोड़ी ही देर बाद वे अब गॉल्फ के मैदान के किनारे 

जॉगिंग करने लगे। आज गॉल्फ का ऑफ डे है अतः गॉल्फ-ग्रीन पर जगह-जगह स्प्रिंकलर से पानी का छिड़काव हो रहा है। 

गॉल्फ के दूर तक फैले हरे-भरे मैदान में मोर घूम रहे हैं। कभी स्प्रिंकलर की फुहार के नीचे आकर अपने पंखों को पूरा फैलाकर गोल-गोल घूमते नाच रहे हैं। बड़ा ही मनोहारी दृश्य होता है यह। वे दोनों उन्हीं नाचते मोरों को देखते जॉगिंग कर रहे हैं। नीचे नहीं देख रहे हैं जहां उनके पैर पड़ रहे हैं। क्योंकि उन दोनों को पता है कि छावनी के किसी भी रास्ते पर वे सब नहीं हैं जो सिविल एरिया में कहीं भी दिख जाता है, मसलन सड़क पर गड्डे़ सड़ांध छोड़ते यहां-वहां कूड़े के ढेर, पॉलिथीन, केले के छिल्के, कीचड़, सड़क पर घूमते आवारा कुत्ते, गाय-भैंस, चोर, उचक्के, मनचले, गाडि़यों की रेलमपेल। छावनी के अंदर सब कुछ एकदम स्पॉट-लैस क्लीन-सड़कें, पार्क, खेल के मैदान, शॉपिंग कॉम्प्लैक्स, फैमिली क्वाटर्स, स्कूल, मंदिर, हॉस्पिटल, मेस, लंगर, बाथ-रूम। सब जगहें स्वच्छ और स्वास्थवर्धक। सड़कों पर कभी इक्का-दुक्का गाड़ी एक-दो मिनट के अंतराल में गुजर जाती है, बस। वो भी दस से पंद्रह कि-मी- प्रति घंटा की रफ्रतार से। जंगल राज जो नहीं है। न गाडि़यों के हॉर्न की हॉकिंग, न मंदिर व मस्जिद के लाउड्स्पीकरों का शोर। एक दो बार तो वह शाम के वक्त छावनी के अंदर आंख बंद करके, खुद को अजमाने के लिए सौ मीटर तक पैदल चला है। वो बात अलग है कि जिस तरह पहली बार रिक्शा चलाने पर रिक्शा सीधा न चलकर एक ही दिशा में मुड़ता जाता है। उसी तरह आंख बंद कर चलने पर वह भी थोड़ी देर बाद टेढ़ा चला गया था गॉल्फ-कोर्स की तरफ।

‘‘सुनो! क्या तुम इस तरह ट्रैक सूट पहने अपने गांव 

सुहागपुर में जॉगिंग कर सकती थी?’’

‘‘सवाल ही पैदा नहीं होता। मेरी छोड़ो, तुम्हें जॉगिंग करते देख वहां सब ये ही कहते- चढ़ी जवानी बुढ़्े नू। और कैसी टूटी-फूटी सड़क है। धूल उड़ती रहती है। आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं। एक बार घूमते तुम्हें एक कुत्ते ने काटा भी था। याद है?’’ अन्नू हांफते हुए बोली।

‘कैसे भूल सकता हूँ! चौदह इंजेक्शन लगे थे’।

अब वे दोनों स्पोर्ट्स कॉम्प्लैक्स पहुंच चुके थे।

‘जै हिंद साब!’

‘जै हिंद! कर्नल मलिक साब नहीं आए अभी?’

‘‘साब, वे स्क्वॉश कोर्ट के अंदर वॉर्म-अप करते आपका इंतजार कर रहे हैं’’ ट्रे में पानी भरा गिलास दिखाते जवान बोला।

‘‘ओके। अन्नू तुम चलो बैडमिंटन कोर्ट। मिसेज मलिक वहां तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।’’

करीब चालीस मिनट खेलने के बाद पसीने से नहाए वह और कर्नल मलिक कोर्ट से बाहर निकले।

‘पानी साब!’,

‘थैंक्यू यार!, चलें!’, उसने अन्नू को आवाज दी।

‘ओ के। बाय!’

अब वे दोनों वापस एक विशाल घर से अपने एक छोटे घर की तरफ चलने लगे। अब किसी भी मैदान में कोई हरकत नहीं थी। चारों तरफ नीरवता फैली थी। चूंकि दूसरा पीरियड रिक्रूट्स के तैयार होकर ब्रेक-फास्ट करने का होता है।

‘‘जै हिंद साब!’’ छावनी के मुख्य द्वार पर खड़ा संतरी बोला।

‘जै हिंद भाई’।

कुछ ही देर में वे दोनों अपने घर के मुख्य द्वार पर पहुंच कर बैल बजाने लगे। ‘गुड मॉर्निंग सर!’ पड़ोस के कर्नल शर्मा अपने टैरेस के झूले पर बैठे चाय पीते बोले।

‘गुड मॉर्निंग, आज आपको स्पोर्टस कॉम्प्लैक्स में नहीं देखा।’

‘सर, सुबह बेटे को लेने एयरपोर्ट चले गए थे’।

‘ओके, तभी, वरना तो यू आर वेरी रेग्युलर।’

घर के अंदर दाखिल होते ही अन्नू किचन के काम 

निपटाने चल दी। उसे पौने आठ बजे छावनी के अंदर के स्कूल जो जाना था। वह योगा मैट बिछाकर योगा करने लगा। उसने जो कही नहीं जाना था। रिटायरमेंट के बाद नौकरी के कई ऑफर आए। परंतु अब उसे नौकरी की जरूरत ही नहीं। पैंशन के पैसे इतने हो जाते हैं कि महीने के खर्च के बावजूद तीस हजार बच जाते हैं। फिर क्यों मारा-मारी। अब तो बस अपनी रूचियों को जीना है- पढ़ना, लिखना, गाना गाना, वाद्य-यंत्र सीखना, घूमना और यह सब करते हुए छावनी के बच्चों अथवा सेना में 

कमीशन के लिए प्रयासरत जवानों को सप्ताह में चार दिन निःशुल्क कोचिंग करते समाज सेवा करना। सेवाकाल के दौरान भी उसने एस एस बी और ए सी सी इंट्रैंस एक्जाम की कोचिंग भी दी है।

‘चाय लीजिए!’

योगा मैट को रोल कर उसने दीवार के एक कोने में रख दिया और फिर चाय पीने लगा।

‘‘देखो, ब्रैक-फास्ट बना कर मैंने कैसरोल में रख दिया है। लंच के लिए दाल, सब्जी बना दी है। चावल आकर बनाऊंगी। और हां, इस पेपर पर मैंने आज के काम लिख दिए हैं। आपके छुट्टी पर घर चले जाने से कई काम पेंडिंग पड़े थे। आज कर देना प्लीज’’ पेपर को डाइनिंग टेबल पर रखते अन्नू बोली। 

‘ओके। सब हो जाएगा आज ही’।

‘‘अच्छा चलती हूं, बाय!’’ वॉल-मिरर के हुक से स्कूटी की चाभी निकालते बोलती हुई अन्नू बाहर निकल गई। बाहर मतलब दूसरे बड़े घर मतलब छावनी।

‘पापा, मैं भी कॉलेज जा रही हूं, बाय!’

अब अन्नू और लीपिका के जाने के बाद वह घर पर अकेला था। दरवाजा बंदकर वह घर के पिछवाड़े आया। सामने बापूघाट के जंगल के घने पेड़ों के पीछे से नवजात सूर्य की लालिमा छनकर उसके घर के अंदर दाखिल हो रही थी। धूप का एक टुकड़ा उसके घर के मुख्य द्वार से चिपक गया था। सामने स्टैंड पर रखे तुलसी के पौधे से उसने तीन-चार पत्ते तोड़े, फिर कुछ पल देखने के बाद मुंह में डाल दिए। सहसा उसे अपने गांव सुहागपुर के घर में लगे पौधे और बचे रह गए चंद पेड़ों की पत्तियों पर जमी काली-सफेद राख की परत याद हो आई। उसके गांव से आधा कि-मी- दूर पश्चिम की दिशा में बनी राइस मिल से जलती हुई धान की भूसी की राख से पूरे पेड़-पौधे, सूखने के लिए आंगन-छत पर तार पर डाले गए कपड़े, अंदर का फर्नीचर सब पर राख की पर्त जम जाती है। पानी की फुहार से गमलों में लगे पौधों को रोज ही धोना पड़ता है। कपड़े अब अंदर टांग कर फैन ऑन करना पड़ता है। और यहां तो उसने बिना पानी से धोए तुलसी की पत्तियां मुँह में डाल ली। आबोहवा का ये अंतर कितना स्वास्थ्य वर्धक है!

करीब एक घंटे के अंदर वह बाथरूम से निवृत होकर ब्रेक-फास्ट करने डाइनिंग टेबल पर आकर बैठा। कैसरॉल खोलकर देखा। पोहा बना था। पोहे को प्लेट पर डालकर उसने ऊपर से टोमेटो सॉस डाला। और धीरे-धीरे खाते हुए उसने टेबल पर रखे पेपर पर एक नजर डाली जिस पर अन्नू ने आज होने वाले कामों के बारे में लिखा था। कैंटीन से सामान की लिस्ट, ग्रॉसरी शॉप से फल-सब्जी, इंडेन गैस के ऑफिस से नये सिलैंडर के बारे में बताना, पोस्ट ऑफिस जाकर स्पीड पोस्ट से भाइयों को राखी 

भेजना, बैंक के लॉकर में बड़ी बेटी के गहने रखना, एटीएम से रुपए निकालना, पास बुक अपडेट करना आदि।

न्यूज पेपर पढ़ने के आधे घंटे बाद जब वह तैयार होकर निकला, तो सवा दस बज गए थे। तीन मिनट के अंदर वह छावनी के शॉपिंग कॉम्प्लैक्स में अपनी कार पार्क कर चुका था। कार से बाहर निकला ही था कि एक सुबेदार ने पास आकर सैल्यूट किया।

‘‘जै हिंद साब! सुना है आप एस-एस-बी- की कोचिंग छावनी के रिक्रूट्स को देते हैं। मेरा बेटा एन-डी-ए- की लिखित परीक्षा में पास हो गया है। आप की कृपा हो तो उसको आपके पास भेज दूं।’’

‘‘क्यों नहीं! कल से ही भेज दो। मैं वन ट्रेनिंग के 

एजुकेशन ब्लॉक में क्लास लेता हूं दस से बारह बजे तक। हफ्रते में चार दिन।’’

‘‘थैंक्यू साब! आप जो भी फीस लेंगे, मैं दूंगा। प्लीज साब।’’

‘‘हां तो कह रहा हूं साब। कल दस बजे भेज देना। और हां, मैं फीस नहीं लेता।’’

‘‘थैंक्यू साब! जै हिंद साब!’’

सुबेदार के चले जाने के बाद उसकी इच्छा हुई कि काश! वह बता पाता कि वह भी फीस लेता है- छावनी के विशाल घर की सुरक्षा प्रदान करने वाली समीपता से, उसकी स्वास्थ्य-वर्धक आबोहवा से, छावनी के अंदर विभिन्न प्रकार की सुख-सुविधाओं की उपलब्धता से, छावनी के अंदर परिलक्षित अनुशासन, व्यवस्था और परस्पर सौहार्द और भाईचारे के व्यवहार से। परंतु ये सब अमूर्त और रूहानी सुकून की बातें सुबेदार की समझ के बाहर की थी। अतः वह सिर्फ मुस्कुरा भर दिया।

‘‘हूं, तो अब सबसे पहले एटीएम चला जाए’’ कार को लॉक कर पेपर देखते उसने खुद से कहा।

जैसे ही वह एटीएम के अंदर पहुंचा, तीन रिक्रूट्स एटीएम के अंदर लाइन में खड़े थे।

‘‘जै हिंद साब! पहले आप निकाल लें’’, साइड में होते वे बोले। 

‘‘नहीं भई, मैं रिटायर्ड हूं। समय ही समय है मेरे पास, तुम निकाल लो। तुम्हें क्लास में भी तो जाना है।’’

वे रिक्रूट्स अब एटीएम ऑपरेट करने लगे। वह पीछे मुड़कर एटीएम के शीशे की दीवारों से बाहर देखने लगा। न कोई भीड़, न चोर-उचक्कों का डर। ऊपर से आदर-सम्मान अलग। जैसे कि एटीएम आपके घर के ही अंदर हो। सामने के पीटी मैदान में अभी भी कई जवान वर्टिकल रोप, चिन अप और हॉर्स कर रहे थे। पार्किंग एरिया का संतरी शॉपिंग कॉम्प्लैक्स के गेट के पास मुस्तैदी से खड़ा बीच-बीच में सीटी बजाते इक्का-दुक्का गाडि़यों को 

रैगुलेट कर रहा था। पार्किंग एरिया में लाइन के अंदर तरतीब से वाहन पार्क किए गए थे, मसलन- कारें एक साथ, स्कूटर, मोटर साईकल एक साथ और साईकिल एक साथ। एक क्रमबद्ध रूप में। मोटर साईकिल को आप कार पार्किंग में नहीं रख सकते और कार को स्कूटर पार्किग में। काश! ऐसा अपने देश के शहरों, 

कस्बों में होता।

रिक्रूट्स के एटीएम बूथ से निकल जाने के बाद उसने रुपए निकाले। फिर बगल में लगी मशीन से अपनी और अन्नू की 

पासबुक अपडेट करने लगा।

बूथ से बाहर निकलकर उसने एक बार फिर पेपर को निकाल पढ़ा। ‘कैंटीन चला जाय’- खुद निश्चय कर वह मुड़ा ही था कि उसकी नजर बार्बर-शॉप पर पड़ी। सहसा उसके हाथ बालों पर गए- पहले बाल कटा लिए जाएं। बड़े हो गए हैं, यह सोचते वह बार्बर शॉप में घुस गया। 

‘‘राम-राम साब! बहुत दिन बाद आए!’’

‘‘राम-राम। छुट्टी पर घर गया था। और क्या हाल है?’’

‘बस साब, आप लोगों की दुआ है।’

करीब आधे घंटे के अंदर हेयर कट और हैड मसाज लेकर उसने बार्बर को तीस रुपये दिए। यही छावनी के अंदर का रेट है। शॉप से बाहर निकलते ही उसे अच्छा और हलका महसूस हुआ। शहर में इतने के सौ-डेढ़ तक ले ही लेते। 

बार्बर शॉप से ही लगा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक्सटेंशन ब्रांच है। उसने सोचा, बैग में रखे तनु के गहने पहले लॉकर में रख देते हैं। यदि सिविल एरिया में स्थित बैंक होता, तो वह डरते हुए सबसे पहले बैंक ही जाता। कितने लोगों के गहने-रुपए चोरों ने बैंक आते-जाते लोगों से लूट लिए हैं। अक्सर न्यूज-पेपर में आते ही रहती हैं इस तरह की खबरें।

बैंक के काम से निपट कर अब वह कैंटीन की तरफ चल दिया। धीरे-धीरे चलता, दाएं-बाएं देखता वह रुककर कुछ 

सोचने-सा लगा। 

छावनी का शॉपिंग सेंटर करीब सौ मीटर इलाके में फैला है जहां रोजमर्रा की हर जरूरत का सामान मिल जाता है। क्या नहीं है यहां, कैंटीन, लिकर शॉप, ग्रॉसरी शॉप, टेलर शॉप, हेयर सैलून, ब्यूटी पार्लर, जिम, आइस क्रीम पार्लर, रेस्टोरेंट, फोटो स्टूडियो, मोबाइल शॉप, पोस्ट ऑफिस, रेलवे रिजर्वेशन काउंटर, इंडेन गैस सर्विस ऑफिस, सैनिक अस्पताल, डैंटल अस्पताल, फ्रूट जूस कार्नर, पिक्चर हाल, लाइब्रेरी, वैट कैंटीन। इसके अलावा आधे कि-मी- की परिधि में कैनन ऑफिसर्स इंसटिट्यूट, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरजाघर, स्विमिंग-पूल, स्पोर्टस कॉम्प्लैक्स, गिफ्रट शॉप वगैरह-वगैरह। यदि उसका घर सिविल के किसी एरिया में होता, या सुहागपुर में ही होता, तो अन्नू द्वारा पेपर पर लिखे कामों को करने के लिए उसे कई दिशाओं में कम से कम पांच-छह 

कि-मी- तो गाड़ी चला कर जाना ही पड़ता। ऊपर से भीड़, गाडि़यों की रेलमपेल में गाड़ी चलाने का टेंशन। पेट्रोल का खर्च अलग। पार्किंग एक अलग सिरदर्द। धूल-धुआं, शोर-शराबा अलग। कम से कम सब मिला कर तीन-चार घंटे तो लग ही जाते। लेकिन यहां पैदल चल कर ही सब काम हो रहे हैं, सुकून के साथ। 

करीब एक घंटे में उसके सब काम हो गए थे। उसने घड़ी पर नजर डाली। साढे़ बारह बजे थे। सामान से भरी ट्रॉली को सरकाते वो अपनी कार के पास ला रहा था तभी पार्किंग एरिया की तरफ आते उसे मंदिर के पंडित जी दिख गए।

‘पंडित जी, सादर नमस्कार!’

‘प्रणाम सर! कैसे हैं?’

‘‘पंडित जी, आपके पास भी आना था। दरअसल। मेरे पिताजी और माताजी का श्राद्ध चार और पांच फरवरी को है। पिछली बार भी आप आए थे। आप आ जाए तो।’’

‘‘सर! क्यों शर्मिंदा करते हैं। आप छुट्टी जाने से पहले मुझे बता के गए थे। मेरी डायरी में नोट है।’’

‘धन्यवाद पंडित जी। नमस्कार।’

कार के अंदर बैठने के बाद उसने एक बार घड़ी फिर देखी, कुछ सोचते हुए। बारह चालीस हुए थे। अन्नू के आने में अभी एक घंटा था। लाइब्रेरी में बैठा जाए कुछ देर यह सोचते उसने कार पचास मीटर दूर स्थित लाइब्रेरी की तरफ बढ़ा दी।

‘जै हिंद साब!’- लाइब्रेरी एन सी ओ बोला।

‘‘जै हिंद! यार एक महीने पहले मैंने लाइब्रेरी के डिमान्ड रजिस्टर में तीन-चार किताबें लिखी थी। वो अभी आई या नहीं?’’

‘साब, कुछ किताबें आई हैं। वो ‘न्यू अराइवल’ स्टैंड पर 

डिस्प्ले हैं।’ ‘‘ओके’’ कहकर वह उसी दिशा की तरफ बढ़ा।

थोड़ी देर किताबों को देखने के बाद उसके मुंह से ‘वाउ’ निकला। उसकी डिमांड की हुई तीनों किताबें डिस्प्ले थी। तीनों किताबों को लेकर वह सोफे पर पसर कर उलटने-पलटने लगा। फिर उनमें से एक किताब विक्टर फैंकल की ‘मैन्स सर्च फॉर अल्टीमेट मीनिंग’ को लेकर पढ़ने बैठ गया। किताब में वह ऐसा डूबा कि पता ही नहीं चला कब डेढ़ बज गया। यदि लाइब्रेरी एन सी ओ ने साब, लाइब्रेरी बंद होने का टाइम हो गया कहकर जगाया न होता, तो वह बैठा ही रह जाता।

‘‘यार ये किताब मुझे इश्यू कर दे।’’

किताब को लेकर कार के पास जाते समय उसने सोचा अब तो अन्नू भी पहुंच गई होगी।

और एक सौ बीस सेकेंड यानी दो मिनट के अंदर वह ‘बड़े घर’ से छोटे घर में आ गया। अन्नू उससे पहले ही घर पहुंच चुकी थी। फ्रेश होकर बाथरूम से जब वह बाहर निकला, तो उसने देखा, खाना डाइनिंग टेबल पर लग चुका था। डाइनिंग चेयर पर बैठ वह सलाद खाने लगा। इस बीच अन्नू राइस ट्रे पर भाप निकलते चावल लाकर कुर्सी पर बैठ गई।

‘‘सुनो, राखी स्पीड पोस्ट से भेज दी?’’

‘‘अरे! कैसे भूलता, पोस्ट ऑफिस भी तो कैंटीन के बगल में है, बल्कि जो काम तुमने पेपर पर नहीं लिखे थे, वो भी कर दिए। मसलन, मंदिर के पंडित जी को चार और पांच फरवरी को श्राद्ध में पूजा घर में करने को कह दिया है।’’

‘‘अरे! आज कैनन इन्सटिट्यूट में सोशल ईवनिंग है। व्हाट्स ऐप में मैसेज आया है। तंबोला, पार्टी गेम्स एंड म्यूजिकल प्रोग्राम भी हैं। पड़ोस के कर्नल शर्मा, कर्नल प्रसाद भी जा रहे हैं। उनकी मिसेज ने बताया।’’

‘‘नेकी और पूछ-पूछ। जरूर चलेंगे।’’

रोज की तरह लंच करने के बाद वे बेड पर लेटकर आराम करने लगे।

‘‘अरे! तुम्हें बताना भूल ही गई। लिपि के लिए शादी डॉट काम से चार लड़कों के इन्ट्रेस्ट आए हैं। तुम तब छुट्टी पर थे। पंडित जी को मैंने कुंडली भी दिखाई। एक सॉफ्रटवेयर इंजीनियर है, एक डॉक्टर, एक आइआइटियन, जो इंटरप्रिन्योर है, अपना 

बिजनेस है उसका और चौथा आर्मी का मेजर, डॉक्टर से कुंडली नहीं मिली। बाकी से मिल गई है।’’

‘‘ठीक है। पहले लिपि की पसंद पूछ लो। फिर देखेंगे।’’

करीब दो घंटे आराम करने के बाद साढ़े चार बजे वे एक बार फिर अपने घर से निकल ‘बड़े घर’ की तरफ दाखिल हो रहे थे। तीन-चार कि-मी- वॉक करने चलते-चलते जयदेव को महसूस हुआ कि रतनलाल और मास्टर राम रतन वर्मा, यानी आम जनता को बताया जाय कि ईश्वरीय उपहार स्वरूप मिले इस ‘बड़े घर’ में कौन लोग रहते हैं। तो सुनिए, वे दिखने में आम जनता जैसे ही होते हैं। जिनके बारे में सिविल जनता उदासीन, अनभिज्ञ रहती है। परंतु जब सांप्रदायिक दंगों की मार-काट, 

आगजनी, मुंबई जैसे आतंकी हमले, प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूनामी, भूकंप की तबाही से सिविल के नेता, नौकरशाह, पुलिस हाथ खड़े कर देते हैं, तब इस ‘बड़े घर’ के अंदर रहने वाले संकट मोचक हनुमान बन स्थिति को नियंत्रित करते हैं। जब शहर धू-धू कर जल रहा होता है, तब भी यह ‘बड़ा घर’ पूर्ववत शांत और स्थिर रहता है।

वॉकिंग प्लाजा पर ब्रिस्क वॉक करते, इन्स्ट्रमैंटल म्यूजिक सुनते वे दोनों अब वॉकिंग-योगा कर रहे थे। यानी चार कदमों में श्वास को इनहेल करते और फिर चार कदमों में इक्झेल। दृष्टि और दिमाग सिर्फ दो क्रियाओं पर केंद्रित थे-आगे बढ़ते कदम और उन्हीं कदमों के साथ-साथ चार बार सांस अंदर लेना और चार बार सांस बाहर छोड़ना। थोड़ी ही देर में वे बैडमिण्टन कोर्ट के सामने से गुजर रहे थे। स्पोर्टस कॉम्प्लैक्स में चहल-पहल थी। बच्चे, बड़े, लेडीज टैनिस, बास्केट बाल, बैडमिंटन खेल रहे थे। अफसरों के बूढ़े मां-बाप सड़क पर, गार्डन में सुरक्षित, सहज और उनमुक्त भाव लिए घूम रहे थे। कोई ट्रैफिक, भीड़-भाड़, लूट-पाट का डर ही नहीं।

घर पहुंचने से पहले उसने अन्नू से कहा- ‘‘कल तुम सुबह अकेले वॉक पर निकल जाना। कल मैं गोल्फ खेलूंगा।’’

घर के दरवाजे पर पहुंचते ही लिपि बाहर ट्रैक सूट में निकलती दिखी। 

‘‘पापा मैं वॉक पर जा रही हूं।’’

‘‘जल्दी आ जाना। आज सोशल ईवनिंग है।’’

कुछ देर टेरिस पर वह बैठकर सुस्ताने लगा। थोड़ी देर में अन्नू पानी और चाय ले आई। वे दोनों चाय पीते हुए इस समय रिलेक्स महसूस कर रहे थे।

‘‘सर, गुड ईवनिंग! चल रहे हैं सोशल ईवनिंग में?’’, यह कर्नल शर्मा थे जो टेनिस रैकेट पकड़े अभी-अभी घर पहुंचे थे।

‘‘हां जनाब। एक ही गाड़ी में चलेंगे। ठीक पौने आठ बजे।’’

पौने आठ बजे जब वे सब कर्नल शर्मा की कार में बैठे, तो उन्हें कर्नल प्रसाद भी हाथ हिलाते ‘सोशल ईवनिंग!’ कहते दिखे।

‘‘येस, मोर द मैरियर’ कर्नल प्रसाद की तरफ देखते वह बोला। तो अब जयदेव के रोजनामचा की रात का आखिरी प्रहर देख लेते हैं। जिसमें वह अपने परिवार और फौजी पड़ोसियों के परिवार के साथ कैनन ऑफिसर्स इंस्टिट्यूट में सोशल ईवनिंग एंज्वॉय करने जा रहा है। इस तरह की सोशल ईवनिंग शनिवार की शाम या किसी त्योहार की छुट्टी की पूर्व संध्या या फिर किसी सीनियर अधिकारी के आगमन पर होती हैं। वीक डेज में भी आप इन्सटिट्यूट आकर उसके बार में या बाहर के सुंदर मैनीक्योर्ड रंगीले फव्वारों से सजे लॉन में बैठकर डिंªक्स कर सकते हैं। स्नैक्स खा सकते हैं। डिनर करना हो तो एक दिन पहले पूर्व सूचित करना होता है। वेटर आपको सर्व करने को तैयार मिलेंगे। सिविल के रेस्टोरेंट अथवा पब की तरह कोई चिघांड़ता म्यूजिक नहीं। अभद्रता, अश्लीलता, धक्का-मुक्की नहीं। हर तरफ शालीनता और जेंटल मैनलीनैस। और सब तरफ लाइक माइंडेड लोग। यदि कोई फौजी अपरिचित भी मिले, तो किसी न किसी फ्रंट, कोर्सेज, सीनियर अफसर की बातें करते वे ऐसे घुल-मिल जाएंगे, जैसे पहले से जानते हों। दरअसल सरहदों, इनसर्जेंसी, सीमा की गोली-बारी, एकेडेमीडेज के विचित्र अनुभवों का जखीरा होता ही कुछ ऐसा है कि दो अनजान फौजियों के बीच की वेव-लैंथ एकदम मिल जाती है। और फिर ऐसा फौजी मिल जाए आस-पड़ोस में अथवा किसी सोशल गेट-टूगेदर में तो वह यही गाना गाएगा- तुम मिले, दिल खिले, और जीने को क्या चाहिए।

सोशल ईवनिंग पार्टी के बारे में बताना कहानी को बेवजह खींचना होगा। पाठक समझदार होता है और ‘समझदार को इशारा काफी।’

रात के करीब साढे़ दस बजे कार में ठहाके लगाते वे घर पहुंचे। कपड़े बदलकर वे दोनों बेड पर पसर कर टी-वी- देखने लगे। परंतु जयदेव देखते हुए भी टी-वी- नहीं देख रहा था। एक और स्क्रीन टी-वी- के आगे आ गई थी। 

‘‘सुनो!’’ उसके अंदर से आवाज़ निकली। यह आवाज़ उसके मुंह से उच्चरित नहीं हुई। इसलिए अन्नू ने नहीं सुना।

यह संबोधन दरअसल, अन्नू से ज्यादा रतनलाल और मास्टर रामरतन वर्मा सरीखे पाठकों के लिए था जिन्हें वह संबोधित कर उनसे स्वीकृति चाहता था- ‘‘सुनो, आप भी ऐसे ही इलाके में घर चाहते हैं न, जहां ‘आनंदी’ न पहुंचे, जहां सुरक्षित, शांत, प्रदूषण रहित, स्वच्छ, सुविधायुक्त और सुकून भरा माहौल, होय भाई-चारा, सौहार्द, शालीनता और शिष्टाचार होय व्यवस्था, अनुशासन होय, धर्म-निरपेक्षता, और सहिष्णुता होय थोड़े में आनंदित होने का जीवन-फलसफा हो---।’’

‘‘सुनो!’’ यह विश्वास के साथ ध्वनित हुई आवाज थी। दरअसल, इस आवाज के पीछे एक गहन चिंतन था। जिसे अन्नू ने सुना।

‘‘देखो, हर पैरेनट्स अपने बच्चों के लिए यही तो चाहते हैं कि वो सुरक्षित, स्वस्थ्य और सुकून के साथ जिंदगी जिये। जहां वो सब हो, जो छावनी के अंदर होता है।’’

‘‘कम टू द मेन प्वॉइंट।’’ अन्नू ने टी-वी- को म्यूट कर कहा। 

‘‘लिपि के लिए शादी डॉट कॉम से जिस आर्मी के मेजर का इंट्रैस्ट आया है। उससे ‘हां’ कर देते हैं। कुंडली तो पंडित जी से पहले ही मिला ली थी। रही बात उसके गुजराती होने की। तो तुम्हें पता ही है कि फौजी का एक ही रंग और धर्म होता है- वह है यूनीफॉर्म का ऑलिव ग्रीन। यदि हम लिपि को दहेज में ‘एक बड़ा घर’ दे पाएं, तो शायद इससे बड़ा उपहार कोई नहीं होगा।’’

‘‘उसको भी आर्मी लाइफ पंसद है।’’

‘‘ओह! ग्रेट फिर तो बात बन गई।’’

लाइट और टी-वी- बंद करने के बाद जब वह बैड पर लेटा तो सोचने लगा, ‘‘हमारे देश के शहरों में जो कुछ सुरक्षित, स्वच्छ, प्रदूषण रहित, हरियाली से लबरेज, व्यवस्थित 

नकलिस्तान बचे रह गए हैं और शायद तीन-चार पीढि़यों तक बचे रहें, उनमें ये छावनियां ही हैं। ‘जै माता की!’’, कहकर उसे शीघ्र ही नींद ने अपने आगोश में ले लिया।

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