सुधा गोयल

लावारिस

चीरफाड़ घर के आगे लोगों का हुजूम लगा था। शहर के संभ्रात लाला हरसरनदास के पुत्र का किसी ने मर्डर कर दिया था। वह लाला का इकलौता पुत्र था। और लाला की पहुंच जिले के उच्चाधिकारियों के साथ-साथ मिनिस्टरों से भी है। शहर में पुलिस की सरगर्मियां तेज हो गई । हत्यारे शीघ्र ही पकड़े जाने चाहिए। डॉक्टर पर भी दबाव था कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट भी जल्दी चाहिए।

लाश आ चुकी है। जमादार वीरा ने लाश को एक मेज पर लिटा दिया है। डॉ- रंजन के पहुंचने से पहले वह स्वयं लाश को निर्वस्त्र कर अच्छी तरह देख लेता। फिर बराबर वाली मेज पर लाश चीरने की छुरी, दो चार कांटे, धागा सुई तथा डॉक्टर का पैड और कलम वहां रख देता।

कई बार लाशों को डॉक्टर देखता ही नहीं। जमादार जो-जो बोलता जाता वह लिख देता और मुआयना करके उठकर चला जाता। वैसे लाश को चीरने और सिलने का काम वीरा का होता है। हजारों मुर्दे उसने चीरे और सिले हैं। शुरू-शुरू में उसे। ये सब अच्छा नहीं लगता था लेकिन अब लाश उसे कागज का लिफाफा लगती है। उसके मन में कोई ममता या करुणा नहीं जागती। एक-एक दिन में कई-कई लाशे चीरनी और सिलनी पड़ती हैं। दंगे के दौरान लाशें बिना चीरे ही लौटा दी जाती हैं डॉक्टर रंजन ने भी रटी रटाई भाषा में दो वाक्य लिखकर और साइन करके खाना पूर्ती कर दी थी। कौन देखने वाला है।

यही हाल लावारिस लाशों का होता है। मेज पर पड़ी जब वे बदबू देने लगती हैं तब नगरपालिका की गाड़ी आकर उन्हें उठाकर ले जाती। श्मशान भूमि में ले जाकर थोड़ा-सा पेट्रोल छिड़कर तीली दिखा दी जाती। जिसका कोई नहीं उसकी लाश से किसी को क्या ममता।

 जो लाशें खास लोगों की होती हैं उन्हें अच्छी प्रकार देखकर डॉक्टर को रिपोर्ट लिखनी होती है। कई बार होता कुछ है और लिखना कुछ पड़ता है। इसमें डॉक्टर के साथ उसकी भी चांदी रहती। डॉक्टर रंजन उसके आने के आधा घंटे बाद आते। सौदा कब कहां होना है वीरा यह नहीं जानता। लेकिन कई बार अधिक मुट्ठी गरम होने पर स्वयं कहकर भी रिपोर्ट बदलवाई है। कल से एक अपरिचित, अनजान लाश मेज पर पड़ी है। वीरा सोचता है डॉक्टर आते ही होंगे। आज दोनों लाशों का पोस्टमार्टम साथ-साथ हो जाएगा। शाम तक ये लाश भी बदबू देने लगेगी।

वह पहले लाला के बेटे की लाश का मुआयना करता है। एक गोली छाती में घुसकर पीछे कमर में बड़ा-सा छेद करती हुई बाहर निकल गई है। गोलियां और भी लगी हैं। एक कंधे को रगड़ती हुई निकली है और दूसरी सीधे हाथ में धंसी है।

अब वह कल वाली लाश के पास जाता है। यह किसी औरत की लाश है। औरत जवान है। यही कोई पच्चीस-छब्बीस की होगी। वह धीरे-धीरे उसके कपड़े उतारता है। लाश के गले में सोने से मढ़ा एक ताबीज है। वह उसे झट से निकालकर अपनी जेब में डाल लेता है। लाश के कानों मे बुंदे भी हैं। वह उन्हें जोर से खींच लेता है। कान कट जाते हैं।

अब वह निर्वस्त्र लाश को गौर से देखता है। औरत का पेट उभरा हुआ है। उसके स्तनों पर काटने के निशान हैं। जांघो पर जले के निशान हैं। आंखें बाहर को निकली पड़ रही हैं। गले की नसें उभरी हुई हैं। लगता है किसी ने गला दबाकर हत्या की है। लाश को चीरने के लिए छुरी उठाता है, फिर पता नहीं क्या सोचकर हाथ रोक लेता है। चादर से उस लाश को ढक देता है। डॉक्टर आ गए हैं। बाहर शोर तेज हो जाता है। वह मुस्तैदी से डॉक्टर के पास आकर खड़ा हो जाता है। फिर डॉक्टर के इशारे से पेट चीरता है। एक शीशी में पेट की धोबन भरता है। डॉक्टर एक नजर लाश का मुआयना करता है। फिर अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ जाता है। वीरा बोलता है-

‘‘तीन गोलियां लगी हैं। एक छाती को चीरती हुई पीछे कमर में छेद करती हुई निकल गई है। दूसरी गोली कंधे को छूकर और तीसरी सीधे हाथ में लगी है।मौत का कारण छाती मे लगी गोली है।’’

डॉक्टर रिपोर्ट लिखकर अपने हस्ताक्षर कर देता है। अभी पेट की धोवन का टेस्ट होना है। वीरा बाहर खड़े कांस्टबिल को थमा देता है। धीरे से किसी लेबोरेट्री का नाम फुसफुसाकर बताता है।

डॉक्टर कलम बंद कर जेब मे रखते हैं। चलने को होते हैं। तभी वीरा टोकता है- ‘‘साब, एक और लाश कल से पड़ी है। लावारिस है। आप देख लें तो नगरपालिका वालों को सौंप दूं। वरना थोड़ी देर में बदबू आने लगेगी।’’

वीरा लाश से चादर हटा देता है। लाश देखकर डॉक्टर रंजन चौंक उठते हैं। एक ही नजर में उनकी दृष्टि निर्वस्त्र पड़ी युवती का अवलोकन कर लेती है। वे जल्दी से चादर से लाश को ढक देते हैं। उनके चेहरे पर एक साथ दुख, क्षोभ, ममता और घृणा के भाव आते हैं। वीरा हतप्रभ-सा डॉक्टर के चेहरे के बदलते भावों को देख रहा है। ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि डॉक्टर ने अपने हाथ से किसी लाश को चादर से ढका हो। वह देख रहा है कि डॉक्टर एकदम बहुत गम्भीर और उदास होकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाते हैं।

वीरा बोलता है- ‘‘मृतका का नाम नहीं मालूम। मौत गला घोंटने से हुई है। मृतका गर्भवती है।’’

लेकिन डॉक्टर जैसे कहीं दूर खो गये हैं। वे अपनी जेब से कलम नहीं निकालते। पैड पर लगे कागज हवा से फड़फड़ा रहे हैं। डॉक्टर के जेहन में फ्रॉक पहने नन्ही विनिता घूम रही है। वे घोड़ा बने हैं, विनिता उनकी पीठ पर बैठी अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से धकियाती तोतली आवाज में बोल रही है- चल मेरे घोड़े टिक टिक।

जिद् करती विनिता, मचलती विनिता, रोती विनिता, पापा के गले मे बाहें डालकर अपनी बात मनवाती विनिता, अचला की साड़ी बांधकर घूमती विनिता। असंख्य रूपो में विनिता उनके सामने चित्रित हो उठती है। और एक दिन पांच साल पहले विनिता की जगह विनिता की मेज पर उसके हाथ की लिखी चिठ्ठी मिलती है- 

विनिता अपने किसी दोस्त के साथ विदेश जा रही है।

विनिता जैसे आदमियों के महासमुद्र में समा गई। बहुत ढूंढा लेकिन कहीं नहीं मिली। रो-धोकर पति-पत्नी शान्त होकर बैठ गये। और अपना घरबार छोड़कर अनजाने लोगों के बीच अनजानी जगह आ गये। जहां उन्हें और विनिता को जानने वाला कोई न था। दोनों भगवान की प्रतिमा के सामने आकर केवल यही मांगते कि एक बार विनिता मिल जाए। वह जहां भी हो खुश हो, लेकिन जिस रूप में भगवान ने उनकी मुराद पूरी की है, इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। क्या अचला को विनिता का ये रूप दिखाएं? क्या वह सह पाएगी? लोग क्या कहेंगे? डॉक्टर रंजन की बेटी लावारिस हाल मे? समाज के ढेरों प्रश्नों के बीच हिना और रजत का भविष्य अनेक कांटों से बिंधा आंखों के सामने आ गया। हथेलियों पर गिरी दो गरम बूंदे उन्हें धरातल पर वापिस ले आती हैं। वे धीरे से उठते हैं। वीरा अभी भी अचम्भित है।

वीरा की हथेली पर हजार-हजार के दस नोट रखते हैं। लाला के बेटे की लाश जा चुकी है। बाहर सन्नाटा है। वे वीरा के कंधे पर हाथ रखते हैं और बहुत धीमे स्वर में कहते हैं, ‘‘वीरा इस लाश का क्रियाकर्म विधिवत कर देना। चार बजे तुम्हारी ड्यूटी समाप्त होती है।’’

डॉक्टर एक नजर मेज पर लेटी युवती पर डालते हैं। फिर तेज-तेज कदमों से कमरे से बाहर निकल जाते हैं। वीरा एक अबूझ पहेली में उलझ जाता है। वह कभी लाश का चेहरा देखता है कभी हाथ मे थामे रुपये और कभी खाली कुर्सी मेज को, जहां अभी-अभी डॉक्टर रंजन बैठे थे।

वीरा तेजी से दौड़कर बाहर आता है लेकिन तब तक वे अपनी गाड़ी मे बैठकर चले गये।

शाम का धुंधलका फैला है। डॉक्टर रंजन अपनी कोठी के लॉन में अकेले खोये-खोये से बैठे हैं। पत्नी कई बार आकर तबियत के बारे मे पूंछ गई है लेकिन वे हर बार टाल गये हैं। उनका चेहरा देखकर लगता है कि वे महीनों से बीमार हैं।

उसी समय फाटक खोलकर वीरा को अंदर आते देखते हैं। वीरा एक पुडि़या उनकी ओर बढ़ा देता है। वे उसे खोलकर देखते हैं। पुडि़या में एक लॉकेट है, कानों के बुन्दे हैं और थोड़ी-सी राख है। वे पुडि़या की राख को पागलों की तरह चूमने लगते हैं। जैसे वे पुडि़या को नहीं विनिता को चूम रहे हैं। वीरा अपनी नम हो आईं आंखो को कुर्ते की बांह से पोंछता गेट के बाहर चला जाता है। 

डॉक्टर रंजन आवाज लगाकर पत्नी अचला को बुलाते हैं और वह पुडि़या उसे पकड़ाते हुए कहते हैं- 

‘‘अचला, अपनी गुमशुदा बेटी से मिलो।’’

अचला पुडि़या खोलकर देखती है- एक मुट्ठी राख, लाकेट और ईयररिंग। ‘‘ये सब क्या है?’’ आश्चर्य से डॉक्टर को देखने लगती है।

‘‘अपनी विनिता संभाल कर पकड़ो।’’ और अब तक अपने को संभाले डॉक्टर रंजन फफक कर रो पड़ते हैं। दोपहर से जो पत्थर अपने दिल पर रखा था अचला के सामने उसे हटा देते हैं। आंखों में आंसू भरे दोनों राख की पुडि़या को चूमने लगते हैं जैसे वे 

विनिता को सहला रहे हैं---।

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