महाभूत चंदन राय

या अल्लाह हे राम

 

अल्लाह मियां खैर करे! न जाने कहां जाकर ठहरेगी इस दुनिया की आबादी। ज़मीन तो बची ही नहीं रहने के लिए। कमबख़्त आसमान में सीढियां लगाये चढ़ी जा रही है ये दुनिया। ये ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें, इमारतें, मुझे तो देखते ही चक्कर आतें हैं। मुई जाने कब हम पर भरभरा कर गिर पड़ें। मुझे तो ख़ब्त होती हैं इनसे। तुम भी न अम्मीजान! कमाल करती हो! दुनिया है की चांद पर डेरा डालने की तैयारी कर रही है। हम मंगल ग्रह पर जिंदगी के निशान ढूंढने में लगे हैं और तुम हो की तुम्हे बस इतनी सी ऊंचाई से खब्त होती है।

---तो ये हैं नाजिया आपा और उनकी बेटी जोया। नाजिया बेवा हैं और जोया जवानी की दहलीज पर अभी-अभी उतरी है। शौहर का इंतकाल हुए जमाना हो चुका है। ये अल्लाह का नेक करम ही था कि जब उनके शौहर का इंतकाल हुआ वो अपनी बेगम के लिए एक छोटे से रहाइशगाह का इंतजाम कर चुके थे। तभी से नाजिया आपा पांचों वक्त की नमाजी हैं। नमाज की इतनी पक्की की चाहे कयामत भी आ जाए एक वक्त भी नागा नहीं करती। जोया एक छोटी से ब्यूटी सैलून में कामगार हैं।

नाजिया और जोया में उम्र का ही फर्क नहीं है सोच का भी लम्बा फर्क हैं। आप उम्मीद कर रहे होंगे कि कथाकर होने के नाते मैं दोनों की सोच और उसके फर्क को जरूर प्रतिपादित करूंगा। गर आप ऐसा सोच रहे हैं तो बिल्कुल गलत सोच रहे हैं। कहानी पढि़ए और खुद जानिए।

दोस्तों नाजिया आपा जहां रहती हैं वो कोई अन-अथॉराइज्ड कालोनी नहीं जिसमे कोई भी शराबी, जुआरी, लफंडर। छैला, मजनूं खुले आम अपनी बदनाम लपूझन्ना चीप टाइप की हरकतें कर सके। ये वो कॉलोनी नहीं है जिसमे कोई भी बेधड़क किसी के दर्द में होने पर बिना दरवाजा खटखटाये दूसरे के सुख-दुःख-दर्द में बिना बुलाये देवता की तरह धमक सकता है।

ये कोई रहीशों का मोहल्ला भी नहीं है। लेकिन इस मोहल्ले में रहीशों के मोहल्ले वाले गुणधर्म आटे में नमक बराबर गुण की तरह मौजूद है। गर आपको आटे में नमक बराबर मुहावरा सर पर बगुले की तरह उड़ गया है तो आप को बता दूं कि आटा एक 

रहाइश सैक्टर के लिए और नमक ऐसे ही किसी सेक्टर में बनी सरकारी हाउसिंग कालोनियों के लिए प्रयुक्त हैं।

कुल मिलाकर सेक्टर मतलब सुख सुविधाओं वाली अच्छाई की शांतिपीठ जहां दौलतमंद नहीं नहीं अच्छे आचरण वाले लोग रहते हैं! अच्छा होना मतलब दूसरे के सुख दुःख से अभिनज्ञ होकर अपने वातानुकूलित कमरे में कैद रहना। लेकिन दोस्तों मेरी भी अपनी एक परिभाषा है सेक्टर--- मतलब समाजिकता की हत्या और कॉलोनी--- मतलब जिंदगी का उत्सव। खैर नाजिया आपा एक ऐसे ही सेक्टर के भीतर बनी अथॉराइज्ड कॉलोनी की रहवासी हैं! अच्छा हो जाने की चाह के बीच संभवतः पैसों की कमी के कारण वो इस सैक्टर की कॉलोनी जितनी अच्छाई ही कमा पायी हैं। यहां छोटे-छोटे फ्रलैट एक दूसरे से पीठ लगाएं अपनी-अपनी शान में अकड़े खड़े हैं और उनके भीतर अपनी-अपनी आन में अकड़े हुए लोग। जहां किरायेदार और मकान मालिक पूरी मुहब्बत यानी के पुरे सिर-फुटौव्वल तहजीब के साथ एक दूसरे के साथ रहते हैं।

नाजिया आपा एक माले वाले फ्रलैट के पहले माले में पुरसुकून से रहती हैं। सांझ का वक्त है। नाजिया बरामदे में खड़ी है। ज़ोया एक कमरे वाले इस फ्रलैट के दूसरे रसोई कम कमरे में चाय पका रही हैं। नीचे एक ट्रक से किसी का घरेलू सामान उतर रहा है।

‘‘अल्लाह खैर करे--- कोई नया किरायेदार आया लगता है। या अल्लाह हमारे साथ वाले फ्रलैट में न आया हो। कमबख्त मारी वही रोज़-रोज़ की चिक-झिक फिर चालू हो जायेगी।’’

चाय पकड़ती हुई जोया ‘‘अम्मी तुम भी न बस--- अरे अच्छा हैं न--नए किरायेदार आएंगे तो इसी बहाने तुम्हारा मन लगा रहेगा न। पूरे दिन पड़ी रहती हो बिस्तर पर। झाडू, पौछा, पांच वक्त की नमाज, खाना और सोना---आखिर तुम्हारी जिंदगी में और है भी क्या अम्मी--?’’

‘‘वो तो ठीक है जोया पर--- अल्लाह ख़ैर करे किरायेदार कोई हिंदू न हा!’’

‘‘लो अम्मी अल्लाह ने तुम्हारी दुआ खूब कबूली--- हा--- 

हा--- हा--- हा किरायेदार हिंदू ही है!’’

नाजिया ने नीचे झांका! किरायेदार पति-पत्नी यानी दो जन थे! पत्नी के गले में बड़ी सी चांदी की हंसुली झूल रही है! मांग में सिंदूर और गले में हिंदू होने की 

आधिकारिक पहचान मंगल सूत्र। 

‘‘या अल्लाह---!’’

‘‘अल्लाह खैर करे---’’ नाजिया ने अपना माथा पकड़ लिया।

ऊपर के दो फ्रलैटों तक जाने के लिए एक कॉमन सीढ़ी है और ऊपर के दो फ्रलैटों का एक कॉमन गलियारा है, जो अधिकतर एक छोटी-सी दीवार से अपने-अपने हिस्से तक अलग-अलग विभाजित होता है। जो यहां नहीं है।

‘‘रुपेश पता नहीं अपने पड़ोसी कैसे हों---’’, ‘‘कैसे होंगे क्या मतलब मनोरमा? होंगे तो इंसान ही न---?’’

‘‘मेरा मतलब हैं मुस्लिम-वुस्लिम न हो!’’ कैसी बातें करती हो यार-- तुम पढ़ी-लिखी हो-- कम से कम तुम्हारे मुंह से ये बातें शोभा नहीं देती। ‘‘शोभा-वोभा गया भाड़ में--- आई टोल्ड यूं न--! दीज मुस्लिम्स यार--- दे आर सो मच अनहाइजनिक! दे ईट बुलशीट्स! डू यू नो दे ईट अवर कॉव मीट यार--- गाय हमारी माता है यार! आई केन नेवर बीअर विथ देम एंड नेवर विल बी---!’’

‘‘स्टॉप आल दीज नानसेंस मनोरमा। तुम्हे इतना हाइपर होने की जरूरत नहीं है।’’

‘‘तुम्हारी इस संकीर्ण सोच से मुझे ये कहते हुए शर्म आती है कि तुम मेरी पत्नी हो। तो तुम यहीं सीढ़ी पर लड़ना शुरू कर दो! नए घर में अभी घुसे ही नहीं कि तुम्हारा लड़ना चालू हो गया।’’

‘‘अच्छा चुप करो। पड़ोसी सुनेंगे तो क्या कहेंगे---? कैसे लोग 

है---?’’

मनोरमा और रुपेश अपने फ्रलैट का ताला खोल रहे हैं! 

मनोरमा उत्कंठा में सामने वाले फ्रलैट के दरवाजे और उसकी दीवारों की ताका-झांकी कर अपने पडोसी के बारे में जाने की कोशिश कर रही है।

सामने की दीवार पर ऊपर गूदे अक्षरों को पढ़ते ही मनोरमा चीखी--- ‘‘हे राम---!’’

नए और पुराने पड़ोसी को एक दूसरे की अगल-बगल में रहते हुए लगभग पंद्रह दिन बीत चुके हैं। दोनों फ्रलैट के लिए बनी हुई कॉमन सीढ़ी की सफाई, दोनों फ्रलैटों का कॉमन गलियारे की सफाई और दोनों की ज्वाइंट छत पर पानी की टंकियों से पानी के ओवर फ्रलो होने के कुछ ज्वलनशील मुद्दे होने के बाबजूद दोनों के बीच अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है।

इसके लिए न तो नाजिया ने मनोरमा से कहा और न कभी 

मनोरमा ने खुद इसके लिए पहल की। लेकिन दोनों परिवारों की स्त्रियों के बीच शीत-युद्ध सी तना-तनी है। दोनों के बीच लड़ने की कोई ठोस वजह नहीं है। हां ये बात जरूर है कि बीच-बीच में दोनों ने एक दूसरे को सुना-सुना कर ताना जरूर मारा।

जैसे कि, ‘‘अरे आदमी को चाहिए कि अपने आसपास की सफाई रखे! कम से कम उन चीजों की जिनमे वो बराबर की सहभागी हो। मैं किरायेदार जरूर हूं किसी की नौकर नही हूं! जी में आएगा करुंगी, नहीं आएगा नहीं करुंगी।’’

आखिरकार हुआ वही जो होना था! तकदीर का लिखा होकर रहता है! आदमी कितनी योजनाएं कितनी सावधानियां बरत ले। घूम फिर के वहीं पहुंचता है जहां ईश्वर ने उसका पहुंचना तय कर दिया है, तो दोनों पड़ोसी ईश्वर की योजना के अनुरूप (आप ऐसा भी समझ सकते हैं मेरी योजना के अनुरूप कहानी आगे बढ़ सकती है) तयशुदा जगह पर पहुंच चुके है जहां से जिंदगी आगे बढ़ सकती है।

दोनों पड़ोसियों के बीच अभी तक शत्रुता करने की वजह तो है पर अभी तक आपसी मन मुटाव और खुन्नस निकालने का कोई भी कारण नहीं पनपा। मतलब--- सीधा-सा वैज्ञानिक सिद्धांत है कि दो अभिकारक आपस में जब तक प्रतिक्रिया नहीं करते जब तक उनके बीच कोई उत्प्रेरक इस अभिक्रिया में संयोजित नहीं हो--- जब तक उनके बीच की अभिक्रिया के लिए पर्याप्त तापमान और परिस्थिति न हो। इंसान बर्तनों की तरह होते हैं। पास रहते है तो खड़कते जरूर है। अतः एक महीने एक दूसरे के आमने-सामने आने और एक दूसरे से छोटी-छोटी शिकायतों को कहे जाने की जरूरत को दबा लेने के बावजूद आखिरकर दोनों पड़ोसियों का खड़कना और मानवीय प्रतिक्रिया का जन्म लेना दोनों शुरू हुआ। जैसे एक छोटी-सी चिंगारी एक भयानक आग का रूप लेती है ठीक उसी तरह।

जैसे कई दिनों से घर का जमा कूड़ा कूड़ेदान में पड़ा सड़ रहा है। फ्रलैट में आने वाली पानी की सप्लाई की बिल्कुल ख़राब है। पानी इतना गंदा और रेत-बालू मिला है कि जिसे चाहते हुए भी नहीं पिया जा सकता। ऊपर से जिस दिन सप्लाई का पानी न आये उस दिन बिना पानी के होने वाली घरेलु परेशानियां और पतिदेव की चिक-चिक, ताज़ा हरी सब्जियों की दुकान का पता, श्रृंगारिक जरूरतें और जैसे एक अच्छे अदब दजऱ्ी का पता जो अच्छा सूट सील सकता हो। आमतौर वो दैनिक परेशानियां जिससे किसी नई जगह कोई नई गृहिणी कम जानकारी होने के कारण जूझ सकती है। 

‘‘रुपेश मैं रोज-रोज की इन छोटी-छोटी-सी परेशानियों से तंग आ गई हो। तुम कुछ करते क्यों नहीं? किसी कूड़े वाले से बात करो न घर का कूड़ा उठा ले जाया करेगा। पानी की कंडीशन भी खराब है। पीने के पानी की बड़ी दिक्कत है। तुम्हे तो घर के काम के लिए कोई फुर्सत नहीं है।’’ तो यार मैं क्या करूं? मैं ऑफिस की टेंशन लूं कि तुम्हारे घर की टेंशन लूं? ‘‘यार छोटी-मोटी चीजें तो तुम्हे खुद निपटानी चाहिए न! पढ़ी लिखी हो--- आत्मनिर्भर बनो! डोंट बी डिपेंडेबल ओन मी एवरी टाइम!’’

‘‘तुम्हीं बता दो मुझे क्या करना चाहिए?’’

‘‘देखो हम दोनों इस शहर में नए हैं। हम दोनों की नई-नई शादी हुई है। हम दोनों को मिलकर मैनेज करना है न यार। सामने पड़ोस वाली आंटी जी से बात करो न। उनका कूड़े वाला भी तो आता है। मैने देखा है शायद उन्होंने फ्रेश ड्रिंकिंग वाटर बोतलों की सप्लाई लगवा रखी है। तुम बात करों न उनसे।’’

तुम्हें पता है न हैं वो मुस्लिम हैं। मैं उनसे बात नहीं  कर सकती। हाऊ बुलशिट यू आर टॉकिंग। टी-वी- पर नेताओं की साम्प्रदायिक बकवास सुन सुन कर तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। तुम्हारी तरह अगर हर कोई सोचने लगे तो दुनिया का बेड़ा गर्क हो जाए। कल को तुम कहोगी। मुझे फलाने की आवाज़ पसंद नहीं है। फलाने की बोली, फलाने का पहनावा। इतने छोटे दिल और छोटी सोच से जिओगी तो कैसे जी पाओगी। मनोरमा अकेले अपनी समझ के साथ जी लेना कोई चौलेंजिंग काम नही है। आपके व्यक्तित्व की असली परख़ तो जब आप मतान्तरों, विभिन्नताओं को जी कर दिखाएं। 

‘‘आखिरकर हम लोग समाज नाम की बेहद जरूरी चीज का हिस्सा हैं। समाज जिसका अपना न कोई विशेष मज़हब होता है न जाति और न ही सोच। वह विभिन्नताओं से बनी सामूहिकता का युग्म है। समाज हमारा प्रतिनिधित्व करता है और हमे भी उसका 

प्रतिनिधि बनना ही होगा वरना हमे टूटकर अकेले पड़ते देर नहीं लगेगी। तुम समझ रही हो न! मैं ये कहना चाह रहा हूं कि बात आपके पसंद नापसंद की नहीं है। अपितु उसके साथ जी लेने की आपकी व्यवहारिक क्षमता की है और यही हमे बेहतर मनुष्य के रूप में विकसित भी करता है।’’

‘‘मुझे नहीं समझ आती तुम्हारी ये फालतू फंड की यूजलेस 

फिलोशफिकल ओपनियन!’’

‘‘नहीं समझ सकती तो बीअर करो जब तक के कुछ इंतजाम नहीं हो जाता।’’ रुपेश ऑफिस के लिए जा चुका है! आज एम-सी-डी की पानी की सप्लाई न आने के कारण घर के झूठे बर्तन-बासन, झाड़ू-पोछा, कपडे़, नहाना-धोना, सब कुछ जस का तस पड़ा हुआ है! उदास मनोरमा बैड पर पसरी लेटी हुई है!

‘‘भाभी--- भाभी---?’’ 

‘‘कौन है---?’’ 

‘‘मैं हुं जोया--- आपकी पड़ोसी!’’

‘‘ओ भाभी हमारा फ्रिज खराब हो गया है न--- तो प्लीज ये सब्जियां और पानी की बोतले अपने फ्रिज में रख लें।’’ मनोरमा थोड़ी झिझकी--- सकुचाई पर जो कोई भी कारण रहा हो--- मनोरमा न चाहते हुए भी ज़ोया को मना न कर सकी। जरूरत आदमी से क्या नहीं करवा ले।

 मनोरमा के भीतर भी अब बदले में जोया से मदद मांगने की छटपटाहट कुलबुला रही थी। उसके भीतर अहम, उसकी मान्यताओं और उसकी मजबूर जरूरतों के बीच अंतर्द्वंद्व चल रहा था। आखि़रकार जरूरतें हमेशा की तरह फिर जीतीं।

‘‘सुनिए मेरी टंकी का पानी खत्म हो गया है। बर्तन कपड़े लत्ते सब ऐसे ही पड़े हैं। थोड़ा-सा पानी मिल सकता है क्या---? क्यों नहीं भाभी---?’’

और इस तरह नियति उन्हें उस तरफ ले जा रही है, जहां उनका जाना पहले से तय है। इंसान एक दूसरे से अलग-थलग रहने की लाख कोशिश कर ले। लेकिन जरूरतें इंसान को आखिरकर एक दूसरे के करीब ले ही आती हैं। फिर जरूरत कब आदत और आदत कब आदत की जरूरतों में और कब आदत की जरूरतें विश्वास में, विश्वास दोस्ती में और कब दोस्ती इतने मजबूत आत्मिक रिश्ते में तब्दील हो जाती है कि आदमी को पता ही नहीं चलता।

फिर दो इंसान जब एक दूसरे से किसी कारणवश अलग होते है तो उन्हें असहनीय पीड़ा होती है। यही है ईश्वर की रची नियति का वो चमकदार फार्मूला जिससे ये दुनिया चलयमान है। इस कहानी में आप मुझे ईश्वर की संज्ञा दे सकते हैं!

इस तरह इन तीनों स्त्रियों नाजिया, जोया और मनोरमा के बीच आत्मीयता पनपती गई। वो तीनों जान ही नहीं पायी कि समय इस बीच उनके भीतर कितना कुछ बदल चुका है। संभवतः इसके परखने का कोई अवसर अभी तक ईश्वर ने रचा ही नहीं कि वो सावधानी बरत पातीं कि वो अपनी मान्यताओं से विपरीत कुछ और हो रही है। जिसकी वो कभी कल्पना भी नहीं करतीं। उनकी हर सुबह हर शाम आपस में गप्पे मारते इधर-उधर की बातें करते हुए बीतती! अचानक से जैसे मनोरमा नाजिया और जोया का अकेलापन दूर हो गया था। पर क्या सचमुच उनके भीतर कोई मानवीय बदलाव हुआ था या आपसी जरूरतें उन्हें केवल एक-दूसरे की आदत हो जाने तक ही बदल पायी थी? अक्सर हम संवेदना के स्तर पर होते ऐसे बदलाव को सही से समझ नहीं पाते। यही कारण है कि हम अपनी भावनाओं को जिस तरह से स्थापित करना चाह रहे होते हैं और स्थापित हो रहे होते हैं उनमें बहुत अंतर होता है।

आईये कुछ घटनाक्रमों पर गौर करते हैं--- रमजान का मुकद्दस पाक महीना यानि की खुदा की रहमत, बरकत  मगफिरत का महीना अब बीतने को है।  नाजिया और जोया दोनों रमजान की रोजेदार हैं। आज रमजान के महीने का अंतिम दिन है! ईद मनाई जा रही है! जोया ने ईद के मीठे पकवान और सेवइयां तैयार की है।

जोया सेवइयां और मिठाईयां एक जगह तैयार मनोरमा के पास लेकर आई है! रुपेश भी आज घर पर है!

‘‘भाभी और भैया ईद मुबारक---’’

‘‘ईद मुबारक जोया---’’ 

‘‘ये लीजिये भाभी हमारी तरफ से आपको ईदी---’’ 

‘‘शुक्रिया जोया---’’

जोया जा चुकी है! रुपेश जैसे ही सेवइयों का एक कौर उठकर मुंह में भरने को होता है मनोरमा उसे रोक देती है। ‘‘रुकिए ये कर रहे हैं आप। तुम्हे दिखाई नहीं देता सेवइयां खा रहा हूं।’’

‘‘नहीं इसे मत खाइये। ये मुस्लिम के घर का है। वो लोग गाय का मांस खाते हैं। हम जो करते हैं उसका उल्टा करते हैं। आतंकवादी हैं। दंगा करते हैं। हम उसके घर का खाएंगे तो अशुद्ध हो जायेंगे। पाप लगेगा हमको। हमारे देवी देवता सब मलिन हो जाएंगे। हम धर्मभ्रष्ट हो जाएंगे।’’, ‘‘तुम भी न बस कमाल करती हो--- कहां से आई है तुम्हारे भीतर इतनी घृणा?’’

‘‘ये घृणा उन हत्याओं से आई है जो मुसलमान आतंकवादी करते हैं।’’ 

‘‘मुसलमान! मतलब तुमने पूरी कौम को किन्ही अपराधियों के घृणित करतूतों के दोष से रंग दिया। एक झटके में मनुष्यों की एक पूरी जमात को खारिज कर दिया।’’

‘‘तो क्यों न करूं? बर्बर हत्यारे हैं सब के सब अपराधी!’’

‘‘हां यही--- आखिर तुम्हारे मन ने जाने अनजाने असल सत्य को कह ही दिया।’’

‘‘मैं भी यही मानता हूं। मगर तुम्हारा मानना जहां खत्म हो रहा है मेरा मानना वहां से शुरू होता है।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब ये कि तुम्हारे हमारे जैसे लोगों की मुसीबत तब शुरू होती है जब हम किसी गुनहगार में धर्म की पहचान अधिक देखने लगते हैं। उन पहचानों को खोजने लगते हैं जो मनुष्य के रूप में हमारी घृणाओं को एक विशेष संप्रदाय के प्रति उत्तेजित कर देती है। एक दूसरे की संस्कृतियों, प्रथाओं, परंपराओं के होने के गर्वबोध को केवल अपने अपने समूहों की पवित्रताओं के प्रति सीमित कर देती है।’’ 

‘‘यही से हमारे समाज के बंटवारे का असल संकट शुरू होता है जो विविधताओं के आदान-प्रदान से बनी हुई, इस समाज नाम की खूबसूरत चीज को छिन्न-भिन्न कर देता है। जिसको और अधिक बांटने और भड़काने का काम हमारे नेता लोग करते हैं। तुम्हारे जैसे नादान लोग जिसके लिए कठपुतलियों की तरह इस्तेमाल होते रहते हैं।’’

‘‘ये तो हुई एक बात। अब मान लो कि मैं तुम्हारी बात मान भी लूं और इस फ्रेज पर हामी भर दूं तो क्या तुम भी मेरे फ्रेज पर हामी भरोगी।’’ 

‘‘पहेलियां मत बुझाओ!’’

‘‘मेरी प्यारी भारतीय महिला! मैं यह कहना चाह रहा हूं कि ये जो हमारे देश की जेलों में बंद है न, तुम्हारे हिसाब से सोचूं तो 

हिंदूओं के आतंकवाद और उसकी सो कॉल्ड धार्मिक पवित्रताओं की पोल खोलता है।’’ 

‘‘अब सोचो कि हिंदू क्या नहीं है?’’

‘‘हिंदू बलात्कारी, हिंदू चोर, हिंदू ठग, हिंदू हत्यारा, हिंदू अपहरणकर्ता, हिंदू घोटालेबाज--- वगैरह--- वगैरह--- बाई दे वे 

मनोरमा! मैं तुम्हारे ही प्वाइंट ऑफ व्यू का ग्लोरिफिकेशन कर रहा हूं। नाराज मत होना।’’

‘‘मनोरमा! अपराधी की एक ही पहचान होती है उसका अपराध। अपराधी होते ही वह उससे जुड़ी सारी जन्मगत पहचानों को खो देता है। हमें उसे इसकी इस नई पहचान से ही जानना चाहिए जब तक कि वह कोई नई मनुष्यगत पहचान नहीं बनाता।’’

‘‘यह जो मुस्लिम आतंकवाद जैसी चीज को हवा दी जाती है न! केवल राष्ट्राध्यक्षों और राजनीतिज्ञों द्वारा दी जाती है और सिर्फ इसलिए एक बहुसंख्यक सामाजिक घृणा पैदा की जा सके ताकि सत्ता प्राप्ति के प्रपंच में एक झूठे राष्ट्रवाद की लहर उनके काम आ सके। तुम जो सोचती हो तुम्हारे दिमाग में स्थापित कर दी गयी सोच के अनुसार सोचती हो।’’ 

‘‘आतंकवाद या दंगो के ज्यादातर धार्मिक पहचान पर खड़े किए मुकद्दमे फर्जी निकलते हैं। जिसमें बेकसूर लोगों की गिरफ्रतारियां होती हैं। मगर अफसोस नेता अपने मनचाहे ध्रुवीकरण में सफल हो जाते हैं। नेता क्या? वो ढोंगी मौलवी और योगियों का गिरोह भी, जो धर्म के नाम पर युवाओं को हिंसा और फसाद के लिए बरगलाते हैं।’’

‘‘और बताओ? और उनकी किस चीज से नफरत है तुम्हें?’’

‘‘उनका धर्म! उनकी कट्टरता!’’ 

‘‘एक आदमी, चार पांच बीबियां? बेहिसाब बच्चे! एक झटके में तलाक और हलाला न जाने क्या क्या?’’

‘‘और तुम्हारा धर्म कम कट्टर नहीं है? सती प्रथा! बाल विवाह! डायन! अकेले दहेज प्रथा से हमारे धर्म में हर साल हजारों हिंदुओं स्त्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। बाकि घरेलू हिंसा, जातिगत झगड़ों की बात तो छोड़ दो।’’

‘‘हर धर्म में कुछ खामियां और खूबसूरतियां होती हैं। ये दोनों बातें हमारे धर्म में भी है और उनके धर्म में भी। हो सकता है हमारा धर्म समय के साथ अधिक इवॉल्व कर गया हो। उनका कम। या यह हो सकता कि यही बात इसके विपरीत हो।’’

‘‘फिर ह्यूमन सिविलाइजेशजन तो लगातार विकसित और ग्रोथ होने की प्रक्रिया है। धर्म भी इसी प्रोसेस का हिस्सा है और हम सब धर्म के हिस्से। हम बदलेंगे तभी तो यह सब बदलेगा। हमारे रुकने से या यूं कह लो कट्टर होने से न केवल हमारे धर्म में कट्टरता आएगी अपितु मनुष्य के रूप हमारी असीमित मानवीय संभावनाओं का क्रम भी टूट जाएगा। इतनी घृणा से तो इस धरती का भला नही हो सकता।’’

‘‘मुझे नहीं सुनना तुम्हारा ये फालतू का उपदेश! मैंने कह दिया न बस। बस मतलब बस।’’

मरता क्या न करता? इससे पहले कि मनोरमा अपने सर पर आसमान उठा ले। रुपेश ने सेवइयां न खाना ठीक समझा।

अगले दिन मनोरमा ने अपनी शादी की सालगिरह की खुशी में गोश्त पकाया। मनोरमा बेहद खुश थी और जैसा कि मनुष्य की स्वभावगत आदत है। अपनी खुशी साझा करने के लिए छटपटा रही थी। बर्तनों में खाने की चीजों के साथ खुशियों की अदलाबदली, यही वो रोज की आदत है जो मध्यमवर्ग परिवारों के बीच आत्मीयता बचाये रखती है। खुशियां बाटने से दोगुनी हो जाती हैं।  उनके अनुभव का आनंद अलग ही हो जाता है। यही सोचकर मनोरमा जोया के दिए बर्तन में गर्म गोश्त लेकर नाजिया के पास पहुंची।

‘‘जोया--- जोया---’’ 

‘‘हां--- भाभी---!’’

‘‘ये लो गरमागरम गोश्त। आज हमारी शादी की सालगिरह है न।’’

‘‘ओह--- मुबारक हो! भाभी।’’ 

‘‘मुबारक हो! मनोरमा’’ 

‘‘मनोरमा अपने कमरे में जा चुकी है। जोया ने जैसे ही गोश्त का एक टुकड़ा अपने मुंह में भरने की कोशिश की नाजिया ने उसे तपाक से मना कर दिया।’’

‘‘नहीं बेटी! हिंदू के घर का गोश्त है। हम नहीं खा सकते। पता नहीं कैसे पकाती है। पूरा घर बदबू देता है। उसका रीति-रिवाज अलग है। हमारा रीति-रिवाज़ अलग है। हम उसके घर का नहीं खा सकते बेटी।’’

‘‘कैसे उलटी बात करती हो अम्मी।’’

‘‘ये क्या रीजन हुआ? हिंदू के घर का खा नहीं सकते! 

उन्होंने भी तो हमारी दी सेवइयां खायी है न---?’’

‘‘जोया मैं कह रही हूं न---’’

‘‘मुझसे जुबान मत लड़ाओ!’’

‘‘नहीं अम्मा! ये भी कोई बात हुई? हिंदू है तो उसका मत खाओ!’’

‘‘हां हिंदू है इसलिए हां केवल इसलिए। यही हिंदू जब कोई दंगा होता है तो राक्षस हो जाते हैं। इनकी महान हिंदू संस्कृति, उसका धर्मोपवित कहां लुप्त हो जाती है। हमारा मुसलमान होना इनके लिए गुनाह हो जाता है। इतना बड़ा गुनाह कि हत्या, बच्चियों का बलात्कार इनके लिए राम आचरण हो जाता है। क्या कसूर था तेरे अब्बू 

का---?’’

‘‘बेचारे एक बड़ी प्रोसेस्ड मीट इंडस्ट्री में ड्राइवरी की जॉब करते थे। सीधी-साधी-सी जिंदगी। मेरी तरह न हिंदू-मुस्लिम वाली सोच। पर क्या हुआ उनके साथ?  कुछ सिरफिरे हिंदू लोगों ने उनकी गाडी में गाय का मांस ले जाने के शक भर पर बिना उससे कुछ पूछताछ किये उन्हें मार-मार कर मौत के घाट कर उतार दिया। कोई कानून नही। कोई गिरफ्रतारी नहीं।’’ 

‘‘उल्टे पांच साल अदालत के चक्कर खाए। ये प्रूफ करने के लिए तेरे अब्बू किसी बीफ गिरोह का हिस्सा नही है।’’

‘‘हरामियों ने झूठी थ्प्त् दर्ज कराई कि घटना के पीछे मुख्य कारक गौ-गुंडे नहीं रोड रेज है। उनके मुताबिक तेरे अब्बू ने पहले तो पीछे से गाड़ी ओवरटेक की। फिर जैसे ही उन गुंडों ने अपनी गाड़ी से उनका पीछा करना शुरू किया तेरे अब्बू ने अपनी गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी और इस तरह उनके बीच सड़क पर एक अघोषित रेस प्रतियोगिता शुरू हो गई।’’ 

‘‘उन्होंने लिखवाया कि वो सब तो बड़े सेकुलर लोग हैं। उन्हें किसी की लंबी दाढ़ी और सर पर टोपी होने से कोई फर्क नही पड़ता। वो तो खान साहब ने आड़ी तिरछी गाड़ी काटनी शुरू कर दी। जिससे उन लोगों का एक्सीडेंट होते होते बचा। आखिरकर उन्होंने तेरे अब्बू को रोक लिया और हर्जाने के लिए जब सवाल जबाब करने लगे तो तेरे अब्बू ने उन्हें धमकी दी कि उनके आका पाकिस्तान में बैठे हैं। वे पाकिस्तान से बम मंगाएगे और न केवल उनको उड़ा देंगे। बल्कि पूरा इलाके को धमाकों से नेस्तानाबूद कर देंगे।’’

‘‘यही सुनकर उन गौ-गुंडों और तथाकथित नकली राष्ट्रवादियों का खून खौल गया। यही नही तेरे अब्बू ने उन पर पहले हाथ छोड़ा। हाथापाई के बीच ही जब कोई इस बारे में चिल्लाया कि गाड़ी में गाय का मांस है तो वो हरामी चाह कर भी हिंसा को रोक नहीं पाए। वो तो उस बीफ का सैंपल देकर पीछे हट जाते। मगर ड्राईवर की हिंसा से अपनी प्रतिरक्षा करते करते अचानक लगे धक्के से सड़क पर सर लगने से ड्राईवर की मौत हो गई।’’

‘‘तुम जानती हो अख़बारों, न्यूज चैनलों ने मिनट नही लगाया घटना को इस ऐंगल से प्रोत्साहित करने में। उन्होंने ऐसे मेंफैक्चर्ड सवाल खड़े किये कि घटना रोडरेज, आत्मरक्षा, गाय और पाकिस्तान भर का मुस्लिम कलंक बन कर रह गई। यह सवाल ही मर गया कि सड़क पर किसी की हत्या हुई थी। पीडि़त अपराधाी हो गया और मरने के बाद सात साल उसकी बेवा ने उसके मुसलमान होने की हिंदू सजा भुगती। कभी देखा किसी हिंदू ने की एक मुसलमान की बेवा दंगे और दंगे के बाद किस तरह की जिंदगी जीती है। अपना ही घर अपना नहीं लगता है।’’

‘‘अपना ही देश किराए का देश हो जाता है। बार-बार 

मुसलमान होने की वजह से हमे ही क्यों अपना देशप्रेम प्रमाणित करना पड़ता  है? मतलब हिंदू बहुसंख्यक है तो देश उनका हो गया। हम अल्पसंख्यक तो शरणार्थी। जब चाहे देश से तड़ीपार करने की धमकी दे दो।’’

‘‘क्यों किसी हिंदू से नहीं पूछा जाता कि तुम कितने भारतीय हो? क्या हिन्दू होने से वो अधिक भारतीय हो गए। हम मुस्लिम होने की वजह से कम। भावनाएं कोई जमीन का टुकड़ा तो नही है न! कि जिसके हिस्से जमीन नही उसे इस देश से प्यार नहीं। बल हक का दावा हो सकता पर वो किसी के प्रेम का अंतरिम दावा तो नही हो सकता।’’

‘‘जोया मुझे हिंदुओं से नफरत है और इंताह की हद तक नफरत है और जब तक है जब तक वो हिंदू भर से भारतीय नहीं हो जाते।’’ जोया खामोश थी। शायद उसे खामोश रहना चाहिए। मैं नहीं जानता पर इस समय वो बेहद खामोश खड़ी है।

ये है इन दो हिंदू-मुस्लिम पड़ोसियों का सच। मैं सोच रहा हूं लोग जो घृणा को इतना बल देते हैं प्रेम को इतना समर्पण क्यों नही देते? वे जो नफ़रत को इतना संभाल कर रखते हैं प्रेम को एक बार संभाल कर तो देखें। वे नही जानते घृणा एक चूका हुआ विचार है जिसे वे अधिक दिन जीवित नही रख सकते।

खैर दोनों पड़ोसियों के बीच चीजें देने और लेने और फिर फैंक देने का झूठा उपक्रम चालू है। दोनों एक दूसरे के बनाये पकवान का एक तिनका भर नहीं चखते। लेकिन उसके स्वाद की झूठी तारीफें करते नहीं थकते। दोनों की बीच बातें होती हैं, उठना बैठना होता है पर मतलबपरस्ती भर का। दोनों अपने अभिनय से अपनी भीतर की घृणा को छुपा लेते हैं। दोनों इस खुशफहमी में जीते हैं कि मैंने पड़ोसी होने के नाते एक-दूसरे के प्रति आवश्यक आत्मीयता का निर्वाह भी किया और अपने हिंदू या मुसलमान होने के धर्म से भी नहीं भटके। मगर वे नही जानते इंसानी प्रेम दो अजनबियों के बीच इसी रास्ते से गुजरता हैं। जो इस रास्ते से गुजरा, उसे प्रेम पकड़ेगा ही। उन्हें एक दूसरे की आत्मीयता में रंग कर ही मानेगा। आखिरकर ये प्रेम का इलाका है और वे उसके इलाके में घुस रहे थे।

ठक--- ठक---

ठक--- ठक---

दरवाजे पर कोई था। मगर मनोरमा यह अंदाजा लगाते हुए भी कि दस्तक की प्रतिध्वनि उसी के दरवाजे से आ रही है,उसे अनसुना कर बैठी रही। दरवाजे के इधर से ही उसने अपने मुसलमां पड़ोसी के घर की चिटकनी गिरने की आवाज सुनी।

ढड़क--- चर्र--चर्र--

उसके सामने जैसे दूसरी तरफ होने वाली ध्वनियां फिल्म की तरह दृश्य बन चलने लगे। जिन्हें वह बिना दरवाजा खोले भी साफ-साफ देख पा रही थी। जिसमें किसी देखे जा रहे दृश्य की भांति ही मन मष्तिष्क पर होने वाली उथल-पुथल की उतनी ही आंच थी।

‘‘नमस्कार पंडित जी!’’

‘‘नमस्कार दीदी!’’

‘‘कहिये?’’

‘‘कुछ नहीं आप तो जानती हैं पूजा पाठ के सिवा कहीं आना जाना तो ही नहीं पाता। आपके पास भी फिलहाल केवल इसी धर्म के काज से आया हूं।’’ 

‘‘बताईये मुझसे जो हो सकेगा जरूर करूंगी।’’

‘‘बात ये कि अगली पूर्णिमा को अपने इस छोटे से मंदिर में 

भगवान श्री राम और माता जानकी की मूर्ति स्थापना की योजना है। बस उसी के लिए चंदा मांगने के लिए निकला हूं। आपको जो श्रद्धा हो दे दीजिए। खान साहब थे तो इस चंदागिरी में अलग आनंद था। न केवल हाथ बांट जाता था। बल्कि वो तो मंदिर की हर मूर्ति स्थापनाओं, पर्व, उत्सवों, जगराते और भंडारे जैसी छोटी बड़ी चीजों में बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे। मगर हमारे यहां कहते हैं न भगवान अच्छे लोगों को जल्दी अपने घर बुला लेता हैं।’’

पता नहीं क्यों मनोरमा ने यह देखने का आभास किया कि नाजिया ने पंडित को यह कहते हुए चंदा देने से मना कर दिया कि वह मुस्लिम है। जबकि यह आवाज अभी घटित भी नहीं हुई थी। लेकिन इसके तुरंत ही उसे आवाज के इस नए बनते दृश्य ने लगभग एक इलेक्ट्रिक शॉक दिया।

‘‘ये लीजिये पंडित जी।’’

ठक--- ठक---

मनोरमा ने जैसे ही दरवाजा खोला। सामने पान चबाता, धोती कुर्ता पहने एक अधेड़ उम्र का नाटा व्यक्ति था। कान में जनेऊ, गले में तुलसी की कंठी, ललाट पर चंदन का तिलक और चेहरे पर चिरपरिचित पंडितों वाली सविनय मुस्कान।

‘‘आप यहां नई आई मालूम पड़ती हैं?’’

‘‘जी--- बेटी ऐसा है कि मैं अपनी गली के कोने पर जो पार्क में मंदिर हैं ना उसका पुजारी हूं। चंदे के लिए आया हूं।’’

इससे पहले कि पंडित कुछ और कह पाता मनोरमा ने उसकी तरफ 100 रूपये बढ़ा दिए। 

‘‘बस इतना ही--- आप के पड़ोसी ने तो 500 रूपये दिए हैं।’’ 

(उसने यह बात इस लहजे में कही जैसे कि वह मनोरमा को नाजिया के मुसलमान होते हुए भी अधिकतम हिंदू होने और 

मनोरमा के हिंदू होते हुए भी कमतर हिंदू व्यवहार करने का ताना मार रहा हो।)

मनोरमा को अचानक न जाने क्या हुआ कि वो तेजी से अंदर गई और पंडित के हाथ में दो हरे गांधी छाप सौंप दिए।

‘‘हे---हे---हे---हे---’’

आप इन ध्वनियों को पंडित की कृतध्न हंसी या फिर उसके जाने की पदचाप भी पढ़ सकते हैं। कारण ये कि इस हंसी में इतने किस्म की बनावट है कि इस हंसी का ठीक ठीक उद्देश्य मुझ तक पहुंचा ही नहीं।

दोपहर की घटना से मनोरमा अब तक अवाक् और मनोस्थिति में घायल सी है। टी-वी- चल रहा है पर वह कहीं और जाने कुछ सोचती हुई गुम-सी है। शायद उसे नाजिया का मुसलमानियत हैरान कर रही है या शायद इंसानियत। वह शायद खुद को व्यवहारिक स्तर पर खुद से ही अपमानित किया महसूस कर रही हो। इस बात का केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है। फिर आप कहानी के लेखक ही क्यों न हो? किसी के जेहन में तो नही झांक सकते। 

‘‘क्या बात है? मनोरमा! तुम्हें तो आते ही पड़ोसियों की संगत की लत लग गई। पाकिस्तानी चैनल। मुस्लिम प्रोग्राम। जिंदगी--- जोड़े दिलों को--- जिंदगी गुलजार है---’’

मनोरमा चौंकी कि ये किसने उस पर तंज कसा? ये बेइजाजत  घर के भीतर कौन दाखिल हो गया? मनोरमा हड़बड़ाहट में रिमोट ढूंढने के लिए उठी तो रूपेश से बस टकराते टकराते बची। उसकी सांसों की रफ्रतार कुछ यूं तेज हो गई। जैसे किसी ने उसके मन की चोरी को पकड़ लिया हो। जैसे किसी ने उसके मन का दरवाजा खोल देख लिया हो कि अरे यहां तो झूठी पैदा की गई मुस्लिम नफरत तो है ही नहीं। बल्कि जबरदस्ती दबा कर रखा हुआ इंसानी प्रेम है। जो किसी धर्म का भेद नही जानता। 

जो यह कहकर बार बार मजाक उड़ा रहा है कि हाय मनोरमा तुम कितनी झूठी हो। जब कोई नफरत नही है तो क्यों झूठा दिखावा किए फिरती हो? 

मनोरमा अपने अंतर्द्वंद्व से बाहर आ ही नहीं पा रही। थोड़ी देर पहले उसकी भीतर की चेतना जो अनुभव के उस परिष्कृत बिंदु तक पहुंच गई थी जहां बिना हुआ देखा भी उसके सामने भर सुनने भर से दृश्य बन जीवित हो गया। वही चेतना अब उसे शून्य में धकेल रही थी। जहां बाह्य संसार में उसके साथ फिलहाल घट रही सारी क्रियाएं और उनका अहसास नगण्य हो गया। वो जैसे एक कोठरी में बंद और चारो तरफ एक सवाल कि कहां से आई तुम्हारे भीतर ये नफरत? कोठरी के  दरवाजे पर कोई ताला नहीं है। वो चाहे तो भाग सकती है मगर वो जाने क्यों भागना नहीं चाह रही।

‘‘रूपेश--- रूपेश---’’

‘‘मुझे तुम्हारा मोबाईल देखना है?’’

‘‘यूं अचानक! क्या करोगी?’’

‘‘मेरी कोई गुप्त प्रेमिका नही है भई!’’

‘‘मजाक मत करो---’’

‘‘आई एम डैम सीरियस---’’

‘‘ये लो---’’

टूं--- टूं---

रंजिश ही सही दिल को दुखाने के--- टूं--- टूं---टूं--- इन दिनों जब सामूहिकता का अर्थ भीड़, भेड़तंत्र या गिरोह भर गया है।

टूं--- टूं---

‘‘अरे क्या ढूंढ़ रही हो? मुझे तो भी बताओ?’’

रूपेश वो वाला वायरल वीडियो कहां है जिसमें एक मुसलमान दंगा फैलाने के लिए जानबूझकर डाक कांवड़ ले जाते कांवडि़यों की गाड़ी के नीचे आ गया था।’’

‘‘वो तो मैंने डिलीट कर दिया। ऐसे फालतू के झूठ और घृणा फैलाने वाले मैसेज मैं नही रखता।’’ 

‘‘और कहीं दंगा भड़क गया तो तुम्हारा जबाब क्या होगा रूपेश? तब तो न मानोगे न तुम अपने प्यारे मुसलमानों की करतूतों का सच।’’

रूपेश असमंजस में पड़ गया। वह सोचने लगा मनोरमा ठीक ही तो कह रही है यह तो वह मानता है न कि इस वीडियो के बारे में बताई जारी बातें कोरी मनगढ़ंत हैं। मगर मनोरमा जैसे जाने कितने ही लोगों ने इसके सच होने का ओपीनियन तो बना ही लिया होगा। उनके मन में बिना सच्चाई जाने मुस्लिमों के प्रति घृणा ने घर कर लिया होगा आखिर उसके आस-पास, जान-पहचान के लोग भी तो इसी तरह की बात कह रहे थे। ऑफिस के साथियों के साथ तो उसकी अच्छी खासी बहस हुई थी। यहां तक कि गाली-गलौच और हाथापाई तक की नौबत आ गयी थी। उसके ही खास दोस्त जो उसके साथ रोज लंच टाईम में एक साथ बैठकर रोटियों के कौर तोड़ते हैं उसे मुल्लों का हिमायती बता उसका उपहास उड़ा रहे थे। उनका कहना था कि तुम जैसे कुछ हिंदुओ ने हिंदुस्तान को बर्बाद कर दिया है।

‘‘कहां गुम हो गए?’’

‘‘एक सेकेंड मेरा मोबाईल देना मनोरमा। ’’

‘‘ये लो। पर अब तुम्हे क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नही बस तुमने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। मेरे भीतर की नागरिकता मुझे बार बार आवाज दे रही है कि अपने लिए तो रोज मरते हो। प्रत्यक्ष तौर पर भी तो  देश की शांति समृद्धता के लिए कुछ करो। कि कोई कहीं से भी, कैसे भी देश्ा की आबोहवा को बर्बाद कर रहा है और तुम हाथ पर हाथ धरे चुपचाप बैठे हुए हो।’’

‘‘तुम क्या कहना चाहते हो? क्या करना चाहते हो? मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा।’’

‘‘तुम चाय बनाओ। मैं अभी आया।’’ 

दोस्तों! मैं रूपेश आपकी तरह का एक साधारण आम भारतीय नागरिक। नाम से हिंदू और व्यवहार से मनुष्य। मुझे नहीं पता किसी प्रोफेशनल वीडियो को कैसे शूट किया जाता है। कैसे बोला जाए कि बात वायरल हो जाए। मगर मैं जानता हूं जब अखबारों, टीवी, न्यूज चैनलों, हर ओर झूठ घृणा और हिंसा का बोलबाला हो। जब सत्ता ने लगभग हर माध्यम पर अपने झुठ का कब्जा जमा लिया हो। जब हमारे सौहाद्र और भाईचारे में कोई दरार डाल रहा हो। जब हमारी भारतीयता खतरे में पड़ने लगे तो हम में से एक को प्रेम और सद्भाव के एक अंतहीन स्त्रेत में तब्दील हो जाना चाहिए। हम में से हर एक आगे आए और घृणा के इस फर्जी राष्ट्रवाद के के सामने सच का औजार बन कर खड़ा हो जाए। एक ऐसे स्वतंत्र और निर्भीक विचार में जिसे केवल मनुष्यता की चिंता है।

अभी मैंने एक वीडियों देखा जो इन दिनों खूब वायरल है। इसमें एक आदमी जो कांवडि़यों के ट्रक के नीचे जानबूझकर कूद रहा है। यह दावा किया जा रहा है वो आदमी मुसलमान था। यह भी बोला जा रहा है कि इस तरह कांवडि़यों के ट्रक के नीचे आने का उसका मकसद दंगा फैलाना था। 

मतलब कमाल बात है वो मुसलमान ही है। इसकी क्या गारंटी है? हमारे भीतर पैदा की जा रही मुस्लिम घृणा ने क्या हमे एक बार इस तरफ सोचने दिया। फिर ये आदमी गाड़ी के नीचे दंगा फैलाने के लिए ही कूदा था। ये बात कहां से पुख्ता की गई। मुझे और आपको कैसे मालूम? बिना किसी प्रूफ के कैसे इसे सच की तरह इसे सैकंडों में एज्युम कर लिया गया और प्रचारित किया जा रहा है। 

चलो एक बार मान भी लें कि अगर ये सारी बातें इसमें होती भी तो क्या यह वीडियो सच्चा है? इसकी गारंटी बिना सोर्स के कैसे तय हो जाती। आजकल टेक्नोलॉजी की मदद से वीडियो से छेड़छाड़ या अपनी पसंद का वीडियो बनाना आसान बात है। 

आजकल राजनैतिक पार्टियां चालू हो गई हैं। उन्होंने झूठ और नफरत फैलाने के लिए ऐसे गुप्त सेंटर बना रखे हैं। जहां से उनके गुर्गे टेक्नोलॉजी की मदद से उनकी विचारधारा के मुताबिक घृणा और झूठ का प्रोपेगेंडा फैलाते हैं। उनका एक ही मकसद होता है समाज को बांटना और किसी भी कीमत पर वोट हासिल करना।

दोस्तों आपकी मान्यता ही ऐसे फेक न्यूज, फेक साहित्य और ठंक पिंजी को बढ़ावा देती है। आप इसे रिजेक्ट कर दीजिए। आगे बढ़ावा मत दीजिये। दोस्ती यारी में भी नहीं। फिर देखिये यह सारा फेक मैकेनिज्म अपने आप थम जाएगा। 

नमस्कार। जय हिंद। 

‘‘रूपेश! रूपेश!’’ 

‘‘अरे जबाब क्यों नहीं देते? न फ्रेश हुए न कुछ। बस आते ही वही हिंदू, मुस्लिम और देश। मेरी बात का  जबाब भी नहीं दिया और खुद को कमरे में बंद कर लिया। अब जल्दी आओ भी बाहर चाय ठंडी हुई जा रही है। कम्बख्त हमारा घर घर न हुआ राजनीति का अखाड़ा हो गया है। कल से हम लोग इन फालतू की बातों में नहीं पड़ेंगे।’’ 

‘‘सुनों इस इतवार हम लोग बाहर चलेंगे फिल्म देखने। अरे तुम कुछ जबाब क्यों नही देते?’’

 ‘‘रूपेश! रूपेश!’’

जोया की ये रोज की आदत है कि जब वह काम के लिए निकलती तो रास्ते में पड़ने वाली मस्जिद जरूर जाती। जोया की इस रोज मस्जिद जाने की आदत ने किसी का भला किया या न किया हो पर रमजान मियां का भला जरूर किया है। आप सोच रहे होंगे ये रमजान मियां कौन है? दरअसल रमजान मियां मस्जिद से दस कदम की दूरी पर एक छोटी सी दुकान से अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। दुकान क्या है? बस जुगाड़ है। रमजान मियां किसी से कबाड़े में कोई टूटी फूटी बड़ी गाड़ी का कबाड़ ले आये थे। अब पेशे से कबाड़ी ठहरे। रद्दी की कीमत भी जानते हैं। सो अपने कबाड़ची सोच और अपनी मेहनत से गाड़ी की ऐसी डेंटिंग-पेंटिंग की टीन टप्पर सा दिखने वाला गाड़ी का कंकाल अब भरा पूरा सांस लेता घर है और दुकान भी।

बची भले वाली बात तो हुआ ये कि बातों ही बातों में एक दिन जोया ने रमजान मियां को ऑफिस के लिए लाई बिरयानी चखा दी। फिर क्या साहब उंगलियां चाटते रह गए और उन्होंने मजाक मजाक में जोया को बिरयानी का धंधे करने पेशकश कर दी।

‘‘तुम ऐसी बिरयानी गर रोज ला सको तो बिरयानी का धंधा चल निकले।’’

जोया ने भी आव देखा न ताव और हामी भर दी ‘‘जी 

बिलकुल!’’ 

‘‘मगर धंधे में मेरी पार्टनशिप कितनी होगी?’’ 

और दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। तब से मियां  दुकान के आगे बिरयानी की रेहड़ी भी लगाते हैं। अब बिरयानी की हांडी पकने का अलग किस्सा है। उस पर फिर कभी बात करेंगे।

शाम घिर आयी है। जोया तो रोज इस वक्त तक घर लौट आती थी। ये सोच नाजिया को चिंता घेरे जा रही है। आखिर एक लड़की मां जो ठहरी। फिर उस पर भी मुसलमान लड़की की मां। ये दूसरी चिंता लड़की होने से कमतर ही रहती। मगर जब कभी भी  ‘पहचान’ के नाम पर समाज को बांटा जाने लगता तो यही कमतर चिंता सबसे पहली चिंता बन जाती।

मगर वो किससे मदद मांगे। घर में एक ही फोन था वो भी जोया के पास। जोया लाख कहती शायद (ऊपरी मन से) अम्मी तुम भी फोन ले लो। आजकल फोन पर इतना (झूठ, घृणा, नकली इतिहास जैसी चीजें हैं कि तुम्हारा मासूम दिल जाने कितने फांक हो जाए) मनोरंजन है कि तुम्हारा अच्छा टाईम पास हो जाएगा। मगर नाजिया को शायद वक्त के एक सलीका रहने का कुछ ज्यादा ही भरोसा था या शायद फालतू पैसे बर्बाद होने की चिंता कि उसने फोन नही लिया। 

अब इसी मनाहट के लिए खुद को कोस रही है। मगर कोसने से क्या होगा? उसने कभी सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी दिन कभी उसकी किस्मत में आ सकता है।  अचानक उन्हें अपने पड़ोसियों का ख्याल आया। इस उम्मीद ने जैसे उसे भरोसे की असीम ऊर्जा से भर दिया। वो तेजी से दरवाजे की तरफ लपकी और एकदम अचानक उसे मुस्लिम ईगो और हिंदू घृणा ने घेर लिया। मगर बेटी की चिंता और अपने फायदे के आगे कोई ईगो कोई घृणा नही 

टिकती। सो उनकी भी नहीं टिकी।

‘‘मनोरमा!’’

‘‘मनोरमा!’’

---ठक---ठक---ढक---

डढाक---चर्रर--

‘‘जी कहिये---’’, ‘‘वो मनोरमा---’’, ‘‘आईये पहले अंदर आ जाईये।’’

‘‘जोया अब तक घर नही लौटी’’ और ये कहते हुए उनकी आंखे ड़बड़बा गई।

‘‘अरे मन इतना कच्चा क्यों करती हैं? जोया बच्ची थोड़े ही है। बड़ी समझदारी लड़की है। किसी सहेली के साथ होगी। बस आती ही होगी।’’ 

यह कहते हुए मनोरमा के चेहरे का भाव ठीक नही है। उसके चेहरे पर नाजिया से मिलती जुलती-सी घबराहट की लकीरें हैं। शायद यह अपने मुस्लिम पड़ोसी से पीछा छुड़ाने का भाव हो।

‘‘नहीं नहीं मनोरमा। वो तो काम से छुट्टी होते ही सीधे पहले रेल की तरह घर पंहुचती है। उसके बाद कोई सहेली-वहेली, काम-फाम।’’

‘‘तुम्हारे पास फोन हो तो जरा नंबर मिला दो।’’ 

‘‘ठीक है। नंबर बोलिये।’’

‘‘नंबर तो फोन से लगाना होता है न। जिसको मिलाना हो।’’ 

‘‘अरे आंटी। जिसको नंबर लगाना है उसका नंबर फोन में पहले सेव होना चाहिए। ऐसे थोड़े ही कि फोन से जिसको सोचा नम्बर लगा दिया। फोन अल्लाह थोड़े ही है।’’

‘‘मनोरमा तंज करने से नही चूकी। नाजिया क्या कहती इक दरिद्र मुस्कराहट भर कर रह गई। उसका मन भीतर ही भीतर और बेचैन हो गया।’’ 

‘‘अब कुछ नहीं हो सकता।’’ 

‘‘कुछ नहीं हो सकता! कोई तो दूसरा रास्ता होगा?’’

‘‘दूसरा रास्ता! आप भी कमाल करती हैं? फोन कोई इंसान थोड़े ही है कि जरा हमारे आंसू देखे पिघल गया। जरा सा कोई गिड़गिड़ाया, बोला अरे अभी तुम्हारा नंबर मिलाता हूं। आप भी न।’’

‘‘मनोरमा क्या करूं--- एक बेटी की मां हूं न ---उस पर 

मुसलमान लड़की की मां---’’

जाने कैसे यह दूसरा वाक्य उसके मुंह से अपने आप निकल गया। एक पल के लिए कमरे ने चुप्पी साध ली। 

‘‘और जोया का ऑफिस?’’ (और यूं अचानक मनोरमा अपने होंठों से छूट गए इन वाक्यों के लिए खुद को कोसने लगी। क्या जरूरत थी इंटेलिजेंट बनने की?)

‘‘हां पास ही है। तुम चलोगी मेरे साथ?’’

‘‘वो---ये---वो--- रूपेश आते ही होंगे। घर पर कोई नही होगा तो उन्हें---’’, ‘‘मैं समझ सकती हूं। लेकिन मुझसे ये शहर की पहचान गुम सी हो गई है। कहां नुक्कड़, कोई-सी गली, क्या मोड़ जोया के अब्बा के जाने बाद मैं और ये शहर दोनों अजनबी हो गए हैं। तुम चलोगी तो मुझ बुढि़या को सहूलियत हो जायेगी। वक्त भी कम लगेगा। वरना कहां भटकती फिरूंगी?’’

‘‘बाकि तुम्हारी इच्छा! मनोरमा ने कोई रिएक्शन नही दिया। 

नाजिया ने मन ही मन सोचा ठीक ही है। आखिर नए लोगों में इतनी जल्दी भरोसा थोड़े ही घुलता है। अब तो अपने भी नही मरते एक दूसरे के लिए और वहां से चल दी।’’

‘‘रुकिए! मैं रूपेश को फोन कर देती हूं। फोन मिल गया शायद।’’

‘‘मनोरमा मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम घर से बाहर मत निकलना।’’

‘‘क्यों भई ऐसी क्या प्लानिंग है आज आपकी? और  तुम्हे कैसे पता मैं घर से---’’ रूपेश इतनी हड़बड़ी में है कि उसने कुछ सुना ही नहीं। ‘‘शहर में आग लग गई। तिकोना पार्क के पास वाली मस्जिद है न! वहां चाकूबाजी हुई है। किसी मुस्लमान को गाय के मीट के रखने के शक में कुछ आपराधिक तत्वों ने मारा पीटा है। पूरे इलाके में अशांति फैल गई है। अफवाह फैलाने वाले लोग सक्रिय हो गए हैं। इंटरनेट पर हिंसा भड़काने वाली अफवाहें और संदेश ट्रेंड कर रहे हैं। हिंदू मुस्लिम तनाव को उकसाया जा रहा है। हिंदू भी 

बेकाबू हो गए। किसी ने उसी मस्जिद के पास वाले मंदिर में मांस फेंक दिया है।’’

‘‘कुछ मुसलमानों के दुकानों में आग लगा दी गई है। वो जो अभी अभी मेट्रों मोड़ पर बड़ा-सा शोरूम खुला था न! उसमें जबरदस्त तोड़फोड़ हुई है। उसे लूट लिया गया है। रचना सिनेमा हॉल! उसे भी नहीं छोड़ा। चारो और दंगे भड़क गए हैं। कब कहां से कोई पत्थर, कोई गोली किसको आ लगे। कोई पता नहीं। फिलहाल हिंदू हो या मुस्लिम दोनों का धर्म मरना और मारना ही है।’’

‘‘सुनों कुछ दिन तक ये मंगलसूत्र पहनना और सिंदूर लगाना छोड़ दो। कोई भी वो पहचान जो यह साफ-साफ जाहिर न होने दे कि हम हिंदू हैं या मुस्लिम। तुम सुन भी रही हो। या मैं बस फालतू की बकबक किये जा रहा हूं।’’

‘‘सुन रही हूं।’’

‘‘तो बीच बीच में हूं --हूं--भी तो कर सकती हो।’’

‘‘हूं----- हूं---’’ 

‘‘अच्छा रखता हूं---’’

‘‘रूपेश मगर तुम कैसे आओगे---’’

‘‘अरे मेरी फिक्र मत करो। थोड़ी देर से आऊंगा। लेकिन आ जाऊंगा। मैं फोन पर तुम्हारे से कॉन्टेक्ट में रहूंगा। चलो ओके।’’

नाजिया को कंटी-छंटी आती आवाजों से पूरे माजरे का अंदाजा ही गया। इससे पहले की मनोरमा कुछ कहती नाजिया की आंखों के कोरों से झमाझम गंगा जमुना बहने लगी।

अरे बाबा! हम लोग चल रहे हैं। काहे टेसू बहा रही हैं। पर ज्यादा दूर तो नहीं है!

‘‘पता नही बेटी--- मगर जोया रोज छुट्टी के 15 मिनट बाद घर पर आ जाती थी।’’ 

‘बेटी’ व्यवहार में अचानक आये इस नए असाधारण शब्द को दोनों ने इस तरह सुन कर जाने दिया कि जैसे की अमूमन रोजमर्रा के सुने जा रहे शब्दों से हुए प्रभाव को जाने दिया जाता है। जैसे कोई जला खुद को  किसी लौ से आपके उंगलियों पर अधजले के स्पर्श से उभर आए जलन और अजनानेपन के उस मिश्रित भाव में रखे जिसमें अगली बार उस लौ से बचे रहने की चिंता भी हो और इस जले का मजा भी। 

‘‘सुनिए दो बुर्के ले लीजियेगा। बाहर बहुत खराब माहौल है। तुम भी कुछ हिंदू निशानियां माला, बिंदी, चूडि़यां ले लेना। कमबखत मारा! कौन मिल जाए। और दोनों की हंसी छूट गई।’’

 हंसने का मिजाज ऐसा है कि  हंसी में सारे रंज बह जाते हैं। वो ऐसे हंसे कि तन मन दोनों हल्के हो गए। दिल इतना सुर्ख सफेद निश्छल सा हो गया जैसे हंसी की डिटर्जेंट ने उनके भीतर का सारा मैल धोकर निकाल दिया हो। यह हंसी इक अविष्कार की तरह थी। यह बताती हुई कि हमे विरोधियों, शत्रुओं और विद्वेषियों के साथ हंसना सीखना चाहिए। सम्भवतः उनके भीतर का भी विद्वेष बह निकले। मन कोरे कागज-सा हो जाए जिस पर हम फि़र एक नई शुरुआत लिख सके।

दोनों इस असमंजस के बाद कि हिंदू बनकर निकले या मुस्लिम? अंततः अपनी वास्तविक पहचान के साथ ही घर से बाहर निकले। गली से मुख्य सड़क तक आते आते कुछ भी ऐसा नहीं दिखा कि गड़बड़ी की आशंका हो। दोनों खुश है कि शुक्र है अभी माहौल इतना खराब नही हुआ।

शायद अब भी उजाला इतना बचा हुआ था कि अंधेरा उस पर भारी न पड़े। लेकिन अगले रखे कदम पर अंधेरा उजाले को मात दे रहा है। अंधेरे का सन्नाटा, उसकी भयानकता, उसका तनाव सड़क पर ही नहीं उनके भीतर पसरने लगा है। 

सारे उद्दंडी, मवाली, हत्यारे गुंडे अंधेरे में ही क्यों निकलते हैं मनोरमा?

‘‘क्योंकि उनमें उजाले का सामना करने की हिम्मत नही होती। वो इतने कायर होते हैं कि उन्हें अपने मकसद के लिए अंधेरे की जरूरत होती है।’’

‘‘हां ठीक कहती हो। देखा जाए तो  हर शख्स के पास अपने अपने अंधेरे हैं। जिसकी छाया में वो अपनी कमजोरियां जीता है। वो ये कोशिश ही नहीं करता उस अंधेरे को छांट उन कमजोरियों को थोड़ी सी धूप लगाए। सच के उजाले की धूप जो शायद उसकी 

कमजोरी के मायने बदल दे।’’

‘‘जी बिलकुल। अंधेरे के पास भरम और गलतफहमियां ही होती है। लोग उजाले में देखें तो जाने कि हम जिसे बाघ समझ रहे थे। वो गीदड़ है। जिसे नेवला समझ रहे थे। वो दरअसल मरियल चूहा।’’ 

दोनों ने अगला कदम उठाया ही था कि सामने से आते ‘जय श्री राम’ के जोर-जोर से गूंजते नारे ने उन्हें चौकन्ना कर दिया। अंधेरे में कुछ दिखाई नही दे रहा था। मगर मालूम होता था उनसे सौ मीटर की दूरी पर कोई पचास साठ लोगों का रामभक्तों का समूह है। 

मनोरमा ने बड़ी निश्चिंतता में नाजिया से कहा घबराने कि जरूरत नही है रामभक्त हैं। मगर वो भूल गई उसका देखना अंधेरे का देखना था। जो रामभक्त दिखा वह रावणभक्त भी हो सकता है।

दोनों ने देखा कि अचानक वो मंडली सड़क पर रुक गई। उनके बगल से अभी-अभी गुजरी एक कार की डीपर की रौशनी में उन्होंने देखा कि उन भक्तों के हाथ में चिमटा, हारमोनियम, करताल या ढोलक नहीं है। बल्कि किसी के हाथ में हॉकी है। किसी के हाथ में तलवार, डंडे, लोहे की रॉड। पूरी की पूरी भीड़ सड़क के बीचो-बीच गाड़ी के सामने खड़ी हो गई। मजबूरन गाड़ी के ड्राईवर को गाड़ी रोकनी पड़ी। फिर एक के बाद एक गाडि़यों का जाम लग गया। 

भीड़ का कुछ हिस्सा गाडि़यों के अलग अलग जमघट के पास बंट गया। दोनों स्त्रियों का दिल जोर जोर से धड़कने लगा। जाने अब क्या हो? हवा में बेतहाशा गलाफाड़ ‘जय श्री राम’, ‘भारत माता की जय’ के नारे गूंज रहे थे। बीच-बीच में कुछ राष्ट्रभक्त गाडि़यों की बॉडी को यूं पीटते जैसे उन गाडि़यों को भी पी- पी- करने की जगह ‘जय श्री राम’ का आवाज निकालनी चाहिए। सम्भवतः ये गाडि़यां अपनी चुप्पी से देशद्रोही होने का परिचय दे रही थी। यही कारण रहा होगा कि भक्त लोग खिसिया कर उसे हिंदू संस्कृति की लाठी से हिंदुत्व का पाठ पढ़ा रहे हों। 

गाडि़यों की मरम्मत के बाद वे अंदर बैठे लोगों को पहले देखते और फिर यही नारा लगाने का विनम्र आग्रह करते। सम्भवतः उनकी लाठियां भी उतनी ही विनम्र थी। इसलिए कुछ विनम्रता की गुहार वो अपनी लाठियों से भी लगवा रहे थे। जैसे ही गाड़ी के भीतर से जय श्री राम का जयकारा लगता। गाड़ी को आगे जाने दिया जाता था। 

हो सकता है यह सड़क पर चलने का नया राष्ट्रीय चलन हो। जिसकी यहां प्रैक्टिस की जा रही हो। जिसके सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए पुलिस, प्रशासन, मंत्री सब ने छुट्टी ले ली हो। 

सारी प्रक्रिया किसी तीर्थ यात्र की तरह सुंदर तरीके से चल  ही रही थी कि सामने से आते एक लंबी दाढ़ी वाले बूढ़े को देख सारे भक्त उसकी ओर यूं लपक पड़े जैसे बूढे में उन्होंने अपने धर्म का कोई देव देख लिया हो। वो मां बहन की गालियों सरीखे सुनाई देते किसी अजाने मंत्र से बूढ़े को सम्मोहित करने की कोशिश कर रहे थे। इतने पवित भाषा  को गालियों की संज्ञा देने के लिए मैं भक्त लोगों का दोषी हूं। क्योंकि लेखक होने के नाते मुझे उस भाषा की ठीक जानकारी तो होनी ही चाहिए। जिसमें उदारता से वे बूढ़े के लिए वो मंत्रें और श्लोकों का जाप कर रहे थे। फिर भी आप गर मुझे थोड़ी सी बेशर्मी की इजाजत और दें तो मैं यह कह लेना चाहूंगा कि यह उच्चारण में  संस्कृत भाषा का ही कोई निकटतम तजुर्मा मालूम होती थी। 

खैर बूढ़े देवता पर सम्मोहन न होता देख भक्तों ने शीघ्र ही दूसरी विधियों का उपयोग करना शुरू कर दिया। इसे देखकर कोई मुर्ख भी बता सकता था कि ये पक्के आधुनिक भक्त थे जिन्हें कई नई किस्म की  पूजा विधियों, चढावों, उद्यापनों का पूर्व अनुभव था। 

चढ़ावे में एक नए दाएं गाल पर चांटे का चढ़ावा चढ़ाया। दूसरे ने बाएं गाल के जबड़े पर घूंसे का भोग। भूरे रंग की हॉफ निक्कर पहने मुखिया भक्त से दीखते शख्स ने बूढ़े के अंडों को लाल कर दिया। सारे भक्त इतनी श्रद्धा में थे कि कोई न कोई कुछ देना चाहता था। शायद इतनी श्रद्धा देख ही अंततः बूढ़ा भक्तप्रेम में बिलबिलाने लगा। वो देव भाषा रही होगी जिसमें वो हमारे उई--- आ--- आह--- जैसे मिलते स्वर में चिल्लाया। इसलिए अच्छा ही होगा कि इस भाषा के प्रारूप पर हम नादान ज्यादा बात न करें। 

मनोरमा ने देखा कि एक भक्त जो कुछ ज्यादा ही धार्मिक था। प्रभुप्रेम में कुछ ज्यादा ही बहक गया। उसने 

बूढ़े की दाढ़ी पकड़ खींचना शुरू कर दिया। वह बीच बीच में चिल्लाता--- ‘‘साले मुल्ले--- कटुए--- पाकिस्तानी गद्दार---’’

‘‘साले--- चल बोल जय श्री राम--- नहीं तो भाग पाकिस्तान।’’ 

‘‘ज---य---श्री---रा---म---’’

‘‘साले आवाज नहीं निकल रही--- जोर से बोल जय श्री राम’’ 

‘‘जय---श्री---राम---’’ 

और फिर उसने उस बूढ़े की दाढ़ी को जोर से घुमाना शुरू कर दिया। पैरों पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए और चिल्लाया चल भाग जा--- बूढ़े की पीठ और पैरों पर इतनी लाठियां बरसा दी कि बूढ़ा यकीनन कुछ दूर जाकर  अपने देवलोक में गिर पड़ा होगा। 

जाने क्यों मेरे लिखने और मनोरमा के देखने में मुझे फर्क महसूस हो रहा है। आप में से कई पके हुए किस्म के भारी बुद्धिजीवी, लिबरल, सेकुलर, फेकुलर टाईप के लोग जिन्हें हर चीज में विचारधारा और क्रांति को ढूंढने की खराब आदत है। इस कहानी की भी बाल की खाल निकालना शुरू कर देंगे कि साला 

दक्षिणपंथी कथा लेखक है। कितनी चालाकी से ऐसे दुर्दांत दृश्य को भी तीर्थ सरीखा वर्णित कर दिया है। 

तो भैया आप जैसे लोगों को मैं बता दूं हमें गोली खाकर 

बैकुंठ नहीं पहुंचना। आप लोगों का क्या आप तो मेरी मृत्यु पर कैंडलों, पोस्टरों का उत्सव मनाएंगे। साला हमारी लाश पर अपनी अपनी क्रांति का प्रोडक्ट बेचेंगे। हिरोनिज्म गढ़ेंगे और भूल जाएंगे। फिर हम क्यों मरे किसी के लिए। जिन्दा रहे तो बीस और कहानी लिखेंगे।  फिर अपन जहां बैठे हैं उधर इतना अंधेरा है कि अपने को ऐसा ही दीखता है। मेरा कहा मानिये आप भी अंधेरे में बैठ अंधेरे के इस पॉजिटिवटी का आनंद उठाइये। कम से कम एक दू ठौ पद्मश्री पद्मभूषण तो जीत लेने दो यार। कभी तो अपने फायदे के लिए जियो।

आदमी मरता है तो मरने दो। समझ लेना दो चार बकरे मुर्गों की बलि दे दी। अरे सौ पचास लोग मरें तो क्या हजारों साल पुरानी संस्कृति बच गई ये कम है। भई हर चीज अपडेटेड हो गई है तो हमारी संस्कृति और उसके भक्त भी अपडेटेड हो गए हैं। यह आखिर स्नेह, सदभाव, वसुधैव कुटुम्बकम, सहिष्णुता जैसे पुराने अंतर्रभावों से कब तक चलती। इसे तो अब पीने के लिए परधर्म का रक्त चाहिए और भोगने के लिए बच्चियों, स्त्रियों का बलात्कार। यही हमारी नई संस्कृति है। नया देशभक्ति का रंग। जिसमें भूरे और इस खास किस्म के भगवा रंग ने देश को अपने रंग में कुछ ज्यादा ही रंग लिया है।  जिसका रंग तिरंगे से भी गाढ़ा गढ़ दिया गया है। मगर किस बात का अफसोस? यह नया नॉर्मल है। नया देश। आप लोगों को तो कुछ भी नया स्वीकार्य ही नहीं है। 

मनोरमा ने स्थिति को भांप लिया और नाजिया को बुरका उतार लेने के लिए कहा। नाजिया ने सड़क पर बन्द खड़ी पान की गुमटी की आड़ ली और बुरका उतार साथ लाए बैग में रख लिया। 

मनोरमा ने झटपट नाजिया के माथे पर बिंदी लगाई। साथ लाया मंगलसूत्र दिया और हाथों में कुछ चूडि़यां पहन लेने को कहा।

इसे मजबूरी ही समझिये कि नाजिया ने बिना हिचकिचाहट उन्हें पहन लिया। दोनों हिम्मत कर आगे बढ़ गई। जाने क्या हो? ‘जय श्री राम’ और सड़क और गाडि़यों पर बरसते डंडे यही प्रतिध्वनियां उनके कानों में पड़ रही थी। कोई उन्हें टोके इससे पहले ही वो जय श्री राम बुदबुदाने लगी। हो सकता इस घटना को देख कई मौलवियों ने नाजिया के नाम फतवे निकालने शुरू कर दिए हो। अपने धर्म से तड़ीपार कर दिया हो। मगर नाजिया के लिए यह आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति है। उसे यह बोलना ही था। इसलिए मैं उन फतवों और मौलवियों को नजर अंदाज कर रहा हूं जिन्हें इंसान से ज्यादा फतवों की फिक्र है।

वो दोनों भक्तों के घेरेबंदी के लगभग अंत तक पहुंच गई। मगर किसी ने उन्हें नोटिस नहीं किया। तभी सड़क की साईड से पैदल आती एक महिला को भक्तों के घेरे ने घेर लिया। महिला पहनावे से हिंदू मालूम पड़ती हैं। इसके बावजूद भक्तों के लाख धमकाने पर भी वह जय श्री राम नही बोल रही। वो बिना कुछ आगे बढ़ी जा रही है और इस बात ने भक्तों को हिंसक झुंझलाहट से भर दिया है। 

जाने कौन चिल्लाया ‘‘राम राम बोलती है तो ठीक वरना मार साली को।’’ मगर यार ये तो अपने धर्म से है। ‘‘हिंदू है। हिंदू है तो क्या? हम डिसाईड करेंगे साला कौन कितना हिंदू है? किसे कितना और कैसे हिंदू होना है? असली हिंदू तो हम हैं--- सच्चे राम भक्त जो हिंदू धर्म के प्रसार के लिए इतना कुछ करते हैं। राम राज ऐसे नहीं आएगा। साले हिंदुओं को भी सुधारना होगा और अपने जैसा हिंदू बनाना होगा। हमारी समझ जैसा, एक सोच वाला, कोई अलग बात नहीं। कोई अलग सोच नहीं। मुल्लों के लिए कोई रियायत नहीं।’’ 

इतने में एक शख्स ने उस महिला का हाथ पकड़ लिया और जय श्री राम बोलने के लिए कहा। महिला ने फिर कोई रिएक्शन नही दिया। बस फिर क्या था दूसरे ने उसे धक्का दे सड़क पर गिरा दिया और डंडे बरसाने शुरू कर दिया। वह लहूलुहान हो गई। मगर महिला ने फिर भी राम नाम नही बोला। 

‘‘अबे साली बोलती क्यों नहीं? गूंगी है क्या? इतनी मार के बाद तो भूत का बाप बोल उठता है।’’

तभी एक बोला इसे वो वाला सबक सिखाएं। ये सुनते ही सबकी आंखों में भेडि़ये की सी चमक तैर गई। वो उसे घसीटते हुए जाने कहां ले जाने लगे। ऐन तभी हार्न बजाती पुलिस की गाड़ी जाने कैसे वहां पहुंच गई। भक्त भाग खड़े हुए। संभवतः उनका धर्म भी। महिला की जान बच गई। 

मनोरमा ये सब देखकर स्तब्ध थी। उसके पवित्र हिंदुओं ने एक गूंगी हिंदू महिला को भी नही छोड़ा।  पुलिस न आती तो उसके साथ भी वो लोग वही करते जो अक्सर ऐसे वक्त में दूसरे धर्म की महिला के साथ होता है। इस घटना ने उसके भीतर के उस 

हिंदुत्वबोध को आहत किया। जिसमें उसका धर्म और उसके लोग कभी न मलिन होने वाली पवित्रता और देवत्व से अक्षुण्ण थे। उसे लगता था सारे पाप केवल मुस्लिम करते थे। पर आज उसने पहली बार अहसास किया कि कुछ पाप हिंदू भी करते हैं। जिसके लिए बराबर उनको भी सजा मिलनी चाहिए।

‘‘आप दोनों?’’ 

‘‘जी इनकी बेटी काम से अब तलक नहीं लौटी। इसी 

सिलसिले में उन्हें ढूंढने निकली हैं।’’ 

‘‘आप लोगों को शहर के हालात तो पता हैं न?’’

‘‘जी फिर भी!’’

‘‘ऐसे हालातों से अपनों के लिए प्यार तो कम नहीं हो जाता। नाजिया ने आगे बढ़कर जबाब दिया।’’

‘‘हा-- हा- हा---देख लीजिए इन अपनों का प्यार-- पूरा शहर फूंक देने पर आमादा हैं।’’

‘‘क्यों बे--- अखलाक-- बिलकुल मंगल--- और दोनों एक दूसरे को कोहनी लगाते हुए ठहाके मार हंसने लगे।’’

‘‘माफ कीजिये मगर--- शहर में आग लगी है और आप हंस--- हम भला इनके चूतिआपे पे क्यों उदास होने लगे? चूतिया हैं साले। कल फिर से एक दूसरे से नून, चीनी की उधारी लगायेगे। कोई किसी की झूठी प्याली में चाय पिएगा। किसी के बुलावे की सेवईयां तोड़ेगा। फिर कोई धर्म के नाम पर आग लगायेगा। फिर वही हाल--- हा--- हा--- हा---’’

‘‘खैर क्या नाम है आप की बेटी का---’’

‘‘जोया---’’

‘‘मगर आप तो हिंदू मालूम पड़ती हैं।’’

‘‘जी वो दंगे की वजह से इन्होंने हिंदू लिबास पहन रखा है।’’ 

‘‘और कोई मुस्लिम दंगाई मिल गया तो---’’

‘‘हमारे पास बुर्के भी हैं---’’

हा--- हा--- हा--- 

दोनों पुलिसियों की हंसी रोके नही रुकी। 

सही है। साला धर्म की औकात जिनके लिए कपड़े भर की है। संस्कृति नारे लगाने भर की गुंडई भर। उन चूतियों के लिए 

बिलकुल सही है। 

‘‘आप भी मुस्लिम हैं?’’

‘‘नहीं--- मैं हिंदू हूं। हा--- हा--- हा--- तो आप दोनों भी हमारी तरह सगे हैं---’’

‘‘दोनों इस हंसी के प्रत्युत्तर में बेमेल-सी दबी मुस्कराहट भर कर रह गईं।’’ चलिये आप हमारे साथ आईये। हम आप लोगों को आगे तक छोड़ देते हैं।

‘‘यार वो उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई हैं न तेरे मोबाईल में--- बहुत सारी है--- कौन सी वाली--- वो--- राग भैरवी में है न--- यार वो जो उस्ताद ने ईरान के मौलवी के शहनाई बजाने और संगीत के काम को शैतानी कहने पर पढ़ा था।’’ 

‘‘अच्छा अच्छा--- वाह तुम्हें तो खूब याद है--- उस्ताद लाजबाब थे। उस्ताद ने जब अल्लाह ही अल्लाह--- राग भैरवी में पढ़ा तो मौलवी साहब से कुछ कहते न बना। मानों अल्लाह राग भैरवी में याद किये जाने से और खूबसूरत हो गए हों।’’ 

‘‘मुझे तो लगता है यार अखलाक कि राग भैरवी अल्लाह की पुकार में और निखर गया।’’

‘‘मैं तो कहूंगा उस्ताद का जादू और उन पर अल्लाह की मेहर। उस्ताद जितना अच्छा बजाते थे उतना अच्छा गाते भी थे।’’

‘‘मुझे नहीं मालूम कि तुमने उस्ताद को राग भैरवीं में अजान पढ़ते सुना है कि नहीं? हर आलाप के बाद इतनी गहरी उतर कि जैसे अल्लाह का नूर भीतर उतर रहा हो। रोम-रोम अजान की ताकीद करता हुआ। इक नुमाया बस अल्लाह के ख्याल में शरीर से हल्का होता हुआ। जैसे अल्लाह और हम बचे हैं और अल्लाह हमें अपने गले से लगा रहे हैं। मालूम होता है जैसे घाव और जख़्म से भरे सीने पर में चांदी के वर्क से भरा कोई ठंडा मरहम लगा रहा हो।’’

‘‘बस ख्याल की खूबसूरती। ये ख़्याल नहीं कि ख्याल दुःखजदा है या सुखजदा।’’

यार ये तो मैने नही सुना। पर हां रघुपति राघव राजा राम उनकी शहनाई के आलाप में जरूर सुना है। बनारस के मंदिरों और घाटों और धार्मिक उत्सवों में उन्होंने इसे हजारों बार बजाया है। क्या कमाल बात है कि उस्ताद ने मंदिरों में हमारे देवताओं के प्रांगण में हमारे संतों, देवताओं और हमारे त्यौहारों के लिए अपना सुर लगाया पर न हमारे देवता मलिन हुए। न हमारे देव प्रांगण। न संत। न हमारे उत्सव। बल्कि सबने चटकारे ले ले इन्हें सुना। 

‘‘इसलिए तो हमारे देवताओं ने भी उन्हें इतनी दुआएं दी कि उनका इल्म और उसका जादू दोनों सुरीले दर सुरीले होते गए। उनका सम्मोहन बढ़ता ही गया। वो एक पल के लिए भी बेसुरे नही हुए। और उन्होंने डेढ़ शब्द के वाद्य यंत्र को दो शब्द के सुर मंत्र तक पहुंचा दिया।’’

‘‘वाह रे मंगल। यार ये दो शब्द वाली जानकारी तो मुझे भी पता नही थी। मान गए उस्ताद।’’

गाड़ी के भीतर राग भैरवी में उस्ताद की शहनाई की पाकीजा धुन बज रही है और बाहर बर्बरता के भयानक दृश्य। शहनाई के हर बदलते सुर के साथ बाहर क्रूरता और दरिंदगी का दृश्य बदल रहा है। दोनों स्त्रियां अपने अंतर्मन पर पड़ते इन परस्पर प्रतिरोधी भावनाओं के प्रभाव से जूझ रही हैं। एक दृश्य जो घृणा और रंजिशों के लिए उकसा रहा है और एक धुन जो प्रेम से सराबोर है।  जिसमें मजहबी भेद ही नही पता लगता। 

लगता है जैसे भीतर कोई उठापटक चल रही है। बाहर देखे जा रहे दुर्दांत दृश्य को देखकर जैसे ही दोनों के भीतर घृणा सर उठाने लगती है। उस्ताद की शहनाई उनके भीतर के कमजोर पड़ते प्रेम में इतनी जान फूंक देती है कि घृणा प्रेम के आगे अपने हथियार डाल देती है। वो जितनी बार बाहर फैले लहू में लिसड़ते हैं। हर बार शहनाई उन्हें अपनी धुन से धोकर साफ कर देती है। मगर इस संघर्ष में असफल ही रहती है कि उसकी सरगम बाहर के इस दृश्य को काश हमेशा के लिए बदल पाती।

 इधर-उधर रेहडि़यों खोमचों वालों की दुकानें, टूटी हुई पान की गुमटियां, जलती हुई गाडि़यां, सड़क पर बिखरा हुआ खून, फटे हुए कपड़ों के चीथड़े, लूटे हुए बाजार इस बात की तस्दीक करते हुए कि यहां मनुष्यता की हत्या हुई है। सड़के इतनी गूंगी कि जैसे जो देख लिया उसे देखने के बाद सन्न हैं। नाजिया और मनोरमा दो अलग अलग कोनों पर बैठी इस भयानक मंजर को देख रही हैं। हम उम्मीद कर सकते हैं हिंदू और मुस्लिम होने और अलग-अलग एंगल पर बैठे होने के बाद भी वो जो देख रही हों उसके प्रति उनका नजरिया एक हो। हर बार इस आग में इस कुरबत में गरीब ही क्यों मरता है? आग भड़काने और लगवाने वाला कोई मौलवी, बाबा नेता या रईस नहीं! ये बात जाने कोई गरीब क्यों नहीं सोचता? 

जिप्सी आखिर जोया की काम वाली जगह पर पहुंची। मगर दुकान पर ताला था। ये बात मैं और आप जानते हैं कि जोया अस्पताल में हैं और लगभग खतरे से बाहर है। मगर ये बात नाजिया नही जानती। इसलिए उसका चिंता में रो पड़ना लाजिम है। वो मछली सी यों छटपटा रही है जैसे उसका जल खो गया है। उससे सांस लेते नही बन रहा। गोया जैसे हवा उसका दम घोंट रही है। हर धड़कन उसके सीने में कांटे की तरह चुभ रही है। दर्द से उसकी आंखे डबडबा गई हैं। वो बच्चों की तरह पुलिस वालों के आगे मिन्नते कर रही है। मेरी बेटी को ढूंढ दीजिये। हाय अल्लाह! मैं कहीं की नहीं रही। मैं अकेली क्या करूंगी? मुझे भी उठा ले।

नाजिया को बदहवास होते देख मनोरमा का दिल भी रूपेश के लिए घबराने लगा। मगर उसने दिखावे भरी दृढ़ता से यूं नाजिया को यूं दिलासा दिया कि जैसे जोया का न मिलना कोई बड़ी बात नही है।

‘‘अरे किसी सहेली के यहां रुक गई होगी। काहे चिंता करती हैं। मोबाईल में कोई दिक्कत हो गई होगी। बस करती होगी फोन। हिम्मत रखिये। और कहीं वो घर पहुंच गई होगी तो वो भी आपके लिए कम परेशान नहीं होगी।’’

आमतौर पर पुलिस वालों का काम दिलासे देने का नहीं होता। मगर हम जिन वर्दी वालों को जानते हैं ये पुलिस वाले वैसे नही हैं। उन दोनों ने भी नाजिया को दिलासा देना शुरु कर दिया। घर वाली बात सुनकर बेसुध नाजिया ने भी खुद को संभालते हुए मनोरमा को जल्दी से घर चलने के लिए कहा। बात बनते देख पुलिस वालों ने (चाहते हुए समझ लीजिए या न चाहते हुए) उन्हें छोड़ने के लिए मना नहीं किया।

खैर आज सुबह जब जोया मस्जिद पहुंची तो बहुत शोरगुल मचा हुआ था। कुछ लड़के जिनके हाथ में हॉकी, लोहे की रॉड और चौन जैस हथियार थे। रमजान मियां की गिरेबां पकड़े हुए थे। जिस बेशर्मी से वो मियां के साथ खींचमतान और हाथापाई कर रहे थे। उससे मालूम पड़ता था कि उनके भीतर का इंसानियत मर चुकी थी। 

‘‘ये सुनते ही दोनों हमेशा की तरह ठहाके मार हंसने लगे। 

हम इस सिलसिले में नहीं आये। हम तो बस जोया से कुछ सवाल जवाब करने आए हैं।’’ 

जोया जब उन पुलिस वालों के सवाल जबाब दे रही थी। ऐन तभी किसी अनजान जगह से ये आवाजें मेरे कानों में रह रह कर पड़ रही थी। जब मैं फिर से अंधेरे में बैठा पुलिस वालों के सवाल और जोया के जबाब इस कहानी में आप 

लोगों के लिए दर्ज करने ही वाला था। उन सवालों और 

जबाबों को उन अंजान लोगों का शोर जाने कहां उड़ा ले गया। इन लोगों की पहचान कुछ ऐसी है जैसी कि अमूमन किसी दंगे में जिन्दा जलाये लोगों के कसूरवारों की होती है। जिसका पता अंत तक किसी आला दर्जे की जांच संस्थाओं को भी नहीं लगता। जिनके कुकर्मों से अदालतों की फाइलें, मुकदद्मे, थानों की कॉपिया भरी पड़ी हैं पर जो केवल अमूक और अज्ञात नाम से हमारी न्यायिक प्रक्रियाओं में दर्ज है। 

वो कुछ वैसे ही हैं जैसे पुराने युग के नरभक्षी दैत्य। जिन्हें अदृश्य और मायावी होने की शक्ति है। इसलिए आपसे मेरी विनती है कि आप इसे मेरी अयोग्यता न मानें और मुझे भी अपने  देश की प्रतिभाशाली न्यायिक संस्थाओं की तरह छूट दें।

वो आवाजें अपने घनत्व में बढ़ती जा रही हैं। उन्होंने मुझे इस कहानी से बाहर धकेल दिया है। इसलिए आप जो सुनें उसमे कृपया मेरे लिखे की कोई मिलावट न ढूंढे। यह खास अपील अपने डंडा मार देशभक्त भाईयों से है। जिनकी आहत होने की भावना देशभकित की भावना से एक औंस भी कमतर नहीं है।

‘‘तुम लोगों को मैं किस बात के पैसे देता हूं। दारू, पैसा-मुर्गा-लड़की जो बोलते हो, जब बोलते हो। बताओ कभी मना किया है।’’ तुम्हारे ये कहने के बावजूद जी हम तो संगठन के आदमी हैं। ‘‘आप से इसलिये जुड़े हैं कि आप हमारे धर्म के लिए कुछ कर रहे हैं। हमारी संस्कृति से जुड़े हैं। इसलिए हम भी आपसे जुड़ गए हैं। वरना तो हमे क्या लोभ! बताईये हम से हमारा धर्म जितनी उम्मीद करता है। उतनी हम आपसे उम्मीद करें तो क्या गलत है?’’

‘‘आप लोगों पर खर्च करने का हमारा मकसद बस इतना है कि आप वीरों में ऊर्जा बनी रहे। यह लम्बा धर्मयुद्ध है।’’

‘‘वो क्या हुआ मस्जिद के पास वाले बूढ़े मुल्ले का--- साला बच निकला।’’ 

‘‘जी आप किसकी बात कर रहे हैं?’’ वो जिसको हमने कांवडि़यों की गाड़ी के नीचे धक्का दिया था। या वो जिसके पैसे हमने जान बूझकर नही लौटाए और मोहल्ले में उसकी धमकी दिए जाने को ऐसे हवा दी कि जैसे एक अल्पसंख्यक मुसलमान एक बहुसंख्यक हिंदू को मारने की धमकी दे रहा है। हां नुक्कड़ वाले पानी की टूटी पर हमने खूब कोशिश कि पहले पानी भरने के बहाने उस दर्जी मुल्ले से किसी बहाने भीड़ जाएं। मगर साला गजब फट्टू था। हर बात पर कुरान की आयतों और अब्बा के सबक का हवाला देता और कहता पहले आप भर लीजिये। फिर वो अपने मोहल्ले के दो चार हिंदू भी हैं तो जो साले अपनी संस्कृति को भूलकर इंसानियत का रोना रोने लगते हैं। बोलने लगेंगे आप लोग इस मसले को हिंदू मुस्लिम के नजरिये से मत देखिये। ये सोचिये एक आवारा लड़के ने आपकी लड़की को छेड़ा है। पानी के लिए तो लाईन तोड़ असभ्यता दिखाते दो झगड़ालू व्यक्तियों की लड़ाई हुई है।’’

‘‘यह तुष्टिकरण नही है कमजोर को आगे बढ़ाने की कवायद है। तुष्टिकरण तो जब होती जब दो समान संख्या के समुदायों में से एक की तरफदारी की जाती। आखिर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे की हो तो फीस माफ की जाती है। शोषितों और पिछड़ों पर ही तो अधिक ध्यान दिया जाता है। यह ध्यान देना भी वैसे देखा जाये तो धनिक वर्ग से किंचित भी अधिकतम नही है। क्योंकि उनकी स्थितियां अलग हैं और दूसरे माध्यमों से उनसे कहीं ज्यादा सरकारी लाभ रहे हैं। फिर उनमें भी तो भरोसा जगता है कि हमारे बड़ों का बड़प्पन कम नही हुआ है।’’

‘‘अमीर आदमी गरीब आदमी का बड़ा भाई है। उसे चाहिए कि अपने छोटे को भी आगे बढाये। अगर आप लोग हिंदू मुस्लिम देखना चाहते हैं तो इस तरह भी समझ सकते हैं भारत माता के दो बच्चे हैं। हिंदू और मुस्लिम। हिंदू बड़ा भाई है और उसे अपने छोटे भाई का ख्याल रखना चाहिए।’’

‘‘बस हर बार हम यों ही चूक जाते हैं। हमें भी अपने छुपे हुए मकसद को जाहिर न होने देने और हमारे ऊपर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए उनकी हां में हां मिलाना पड़ता है।’’

‘‘कुछ न कर पाने के पचासों बहाने हैं। आप लोग यों मजबूर दिखेंगे तो कैसे होगा? वो आजकल जो चला हुआ है--- वो क्या कहते हैं यार उसे--- अरे वो जो साले पत्रकार लोग आजकल अपनी बहसों में खूब यूज करते हैं--- जो अमेरिका में ट्रंप सरकार के आने पर खूब छाया हुआ है यार--- बड़े अनाड़ी हो भाई आप लोग--- अरे यार जो झूठ का संस्कारी वर्जन है। जो झूठ की तरक्की और मालामाल होने की कहानी कहता है।’’

‘‘---प---पो---पोस्ट ट्रूथ!’’

‘‘अरे हां यही! हर खबर के पचास संस्करण बना दो। पचास ऐंगल जनरेट कर दो। अरे वो आजकल हमारे चमचे टाईप के पत्रकार पूछते हैं न। वो सवाल जो घटना के मुख्य बिंदुओं पर जरूरी सवाल करने की बजाए एकदम विपरीत आउट ऑफ बॉक्स सवाल करते हैं। जो घटना को मनचाहा रंग दे देते हैं और मजबूती से अपनी पैदा की गई कृत्रिमता को यथार्थ की तरह गढ़ देते हैं। फिर अपने संगठन, अपने आदमियों के बलबूते उसी बात की इतनी नकली स्वीकृतियां गढ़ देते हैं। जिससे जनता के मन में भी पीडि़त मुल्जिम से अधिक संदेह के घेरे में आ जाता है और जनता भी धीरे-धीरे इस विश्वास में यकीन करने लगती है।’’

‘‘यह किसी भी किस्म के प्रतिपक्ष को खत्म करने का नायाब तरीका है। अब खाली मजहबी रंग देने से काम नही चलेगा। हमे भी नकली घटनाओं को गढ़ने के साथ नकली सच को न केवल गढ़ना होगा। बल्कि उसे प्रचलन की हद तक प्रचारित करना होगा।’’

‘‘हमें प्रतीकों की लड़ाई लड़नी होगी। याद रखिए गाय, तिरंगा, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, सेना, देशभक्ति ये हमारे प्रतीक हैं। इनके सहारे प्रतीकीकरण कीजिये। इनसे जुड़ी किसी भी सफलता के साथ 

हिंदुत्व को सेलिब्रेट कीजिये। फिर कोई विरोध नहीं करेगा। जो करेगा वो अपने आप मारा जाएगा। वो दिन दूर नही जब हमारा हिंदू राष्ट्र का सपना सच होकर रहेगा।’’

वैसे हम आप लोगों से मस्जिद वाली घटना का जिक्र कर रहे थे। वो साला बुढ़ा रमजान बच गया है। मालूम पड़ता है उस पर हमला करते हुए आपकी नफरत कम पड़ गई थी शायद या फिर शायद हिंदू होने का स्वाभिमान।

‘‘फिर ये दंगा भी उस तरह नही भड़का जैसा हम लोग चाहते थे। बस कुछ एक जगह आगजनी, एक दो शख्स के हताहत और इक्का दुक्का जगह तोड़फाड़ होने की घटना है। न कफ्रर्यू लगा। न बन्द लगा। कम से कोई सड़क जाम होती। कोई सरकारी प्रोपर्टी को नुकसान पहुंचता। तभी तो बात बड़ी होती। बड़े स्तर पर हिंदुओं का ध्रुवीकरण होता। जितना बड़ा ध्रुवीकरण उतनी बड़ी संभावना दो फाड़ होने की। हिंदू अलग और मुस्लिम अलग।’’

‘‘लगता है सच जल्दी लोगों के सामने आ गया। लेकिन अभी तो पुलिस इंक्वायरी शुरू ही हुई है। इसका मतलब या तो आप लोग गाय का मांस उस बुढ्डे के पास रखना भूल गए या फिर लोगों के मन में आपसी प्रेम ने इस कदर घर बना लिया है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।’’

तभी एक गुर्गा यूं औचक चिल्लाया- ‘‘ये देखिये श्री मान, ये वीडियो अभी अभी चट्सऐप पर आया है---आपको सारे सवालों को जबाब मिल जाएगा।’’

‘‘दोस्तों मैं रुपे---’’, ‘‘इसकी आवाज बढाओ--- साईड वाला बटन को दबाइये---’’

---श। ‘‘कल से इस घटना ने अखबारों, पत्रिकाओं, खबरों और चर्चाओं में जगह घेर रखी है कि किसी मुस्लिम को गाय के मांस की बिरयानी बेचते किसी हिंदू संगठन के लोगों ने पकड़ लिया है। कमाल का हिंदू संगठन है मतलब हमारे देश की खुफिया एजेंसियों से भी तेज। इससे भी कमाल बात है कि इनकी नाक और जीभ को गाय के मांस का जायका क्या खूब पता है! जो यहां खिंचे चले आए। बिना जांच किये बता दिया कि गाय का मांस है। अरे इतने ही तेज और सतर्क थे तो वहां क्यों नही पहुंचे? जहां ये गाय कट रही थी।’’ 

दोस्तों यहीं इन नकली हिंदू और उनके संगठनों की कलई खोलती है कि आज तक वे एक भी घटना में वहां नहीं पहुंचे जहां गाय कट रही हो। इनसे गाय के आहार और उसकी जरूरतों के विषय में पूछ लीजिये। इनकी पोल खुल जाएगी। ये तो ये भी नहीं जानते होंगे कि गाय का दूध कैसे दुहा जाता है। बाकि आप लोग अपने आस पास यहां वहां भूखी प्यासी भटकती गायों को देख अंदाजा लगा सकते हैं कि गौ सेवा के लिए मारे जाने वाली गायों और उनके हत्यारों को ढूंढ़ने की जरूरत है। वे तो आपके आस-पास हैं बचाईये उन्हें। करिये सेवा कौन रोकता है।

‘‘यूं लोगों को मारे जाने का इनका मकसद कुछ और है। ये समाज में गाय के नाम पर घृणा फैला कर खुद स्थापित होना चाहते हैं। इनका हिंदुत्व और इनकी गौसेवा इतने भर की है। इससे अधिक गाय तो गौ आश्रमों में लापरवाही के कारण मर रही हैं। मारना ही है तो मारिये न उस लापरवाही को। पर भगवान के लिए इंसानों को मारना बंद कर दीजिए।’’

‘‘मैं तो ऐसे संगठन में हिंदू धर्म का आदर्श और नैतिकता ढूंढते अपने युवा साथियों से भी कहना चाहूंगा। हत्या किसी धर्म का आदर्श नही हो सकता। वो कैसी भी नैतिकता जो घृणा को अपने भीतर स्थान देती हो नैतिकता नही है। कौन मना करता है आपको अपने धर्म को प्यार करने से? उसका प्रचार प्रसार करने से? लेकिन दूसरे धर्म को कुचलकर क्यों? यह तो अपने धर्म से प्यार नही हुआ। प्यार जताने में तो पराये से भी हिंसा नहीं होती। गर ऐसा है तो आप अपने धर्म के नकली प्रेमी हैं।’’

‘‘दोस्तों उन्हें अपने धर्म का ठेकेदार मत बनाईये। इंतजार कीजिये घटना की पूरी जानकारी आने का। जल्दबाज मत बनिये। आपकी जल्दबाजी ही इन्हें कामयाब कर देती है। आखिर धर्म धैर्य और सहिष्णुता तो सिखाता ही है। गर आप मैं ये चीजें नही है तो माफ कीजिये धर्म पर अपना दावा करना छोड़ दीजिये।’’

‘‘आप लोगों के सामने आतंकवाद का एक उदाहरण तो है ही। जो जेहाद की गलत व्याख्याओं से युवाओं को अधर्म के अनैतिक नरसंहार में झौंक देते हैं। यह कैसे धर्मयुद्ध हो सकता है? यह तो बर्बरता है जिसमें धर्म के प्रचार के लिए निर्दोष की हत्या कर दी जाए। यह तो विपरीत उस धर्म के प्रति नवाचारों में संदेह और नफ़रत ही पैदा करेगा और कर भी रहा है। जबकि यही काम धर्म के नाम पर मनुष्यता की सेवा से किया जा सकता है। एक साधारण से 

संदेश, एक नन्हीं-सी किताब, एक कलम, एक सनकी कारतूस की बजाए एक नर्म मुलायम स्पर्श से। लोग अपने आप आपके धर्म के प्रति खिंचे चले आएंगे। बशर्ते आप सचमुच यही चाहते हों।’’

नमस्कार। जय हिंद।

‘‘ओह--- तो हम ऐसे फेल हो रहे हैं अपने मकसद में। जब आपको पता है कि कोई ऐसे हमारे मकसद में आड़े आ रहा है तो आप लोग कुछ करते क्यों नहीं?’’ 

‘‘महाशय! मुश्किल तो यही है हम लोग चाह के भी कुछ नहीं कर पाते। ये रूपेश हमारे मोहल्ले का ही है। अभी हम अपने 

मोहल्ले के जिन बिगड़ैल हिंदुओं का जिक्र कर रहे थे। ये उन्हीं में से है। हमे भी पता नहीं था कि ये अब वीडियो रिकार्ड करके भी हमारी मेहनत पर पानी फेर रहा है।’’

‘‘अब बाते मत बनाइये। सीखिये आप लोग इससे! इसे कहते हैं कमिटमेंट। प्रतिबद्धता। अपने विचारों के प्रति समर्पण। आप लोग क्या खाक अपने धर्म के प्रति समर्पित हैं। इसे कहते हैं सच्ची देशभक्ति--- ओह नहीं नहीं--- राष्ट्रनिष्ठा--- मैं भी क्या बके जा रहा हूं--- क्या कहना चाहता हूं और क्या चच्च--- ये मैं आप लोगों के लिए कहना चाहता हूं। इस देशद्रोही से ही कुछ सीख लीजिये। सिखाईये जरा इसे राष्ट्रवाद का सबक। हमने आप लोगों को जो देशद्रोहियों को देशभक्त बनाने की ट्रेनिंग दी है वो किस दिन काम आएगी।’’

रूपेश को ही पता ही नहीं उसकी देशभक्ति की ट्रेनिग क्लास शुरू होने वाली है। वरना वो फीस का इंतजाम कर लेता। आखिर कौन होगा जो अपने देश से प्रेम करने के तरीके सीखने और बेहतर प्रेमी होने के लिए कुछ भी और कितनी फीस का इंतजाम करने से नही चूकेगा। 

मगर वो नही जानते कि रूपेश रट्टूमल विद्यार्थी नहीं है कि अपने ट्यूटरों की हर बात आसानी से मान लेगा। वह तो उन विद्यार्थियों में से है जो हर सबक पर चर्चा करना पसंद करते हैं। फिर चाहे उसे गुरु दक्षिणा में अपने प्राण ही क्यों न देने पड़े। 

वो तो यह मानता है ज्ञान के लिए किसी के प्राण लेने की निकृष्टता से अच्छा है ज्ञान के लिए अपने प्राण दे देना। वो ज्ञान जो मनुष्यों को अज्ञानता और अंधभक्ति की तरफ न धकेले वही सही मायनों में ज्ञान है।

पुलिस वालों के सवाल नाजिया से पूर्व परिचय के बावजूद तल्ख और नुकीले है। जैसे आमतौर पर किसी कुख्यात अपराधी से होते हैं। पिछली रात जिन नम्र दिल पुलिस वालों से उसका परिचय हुआ था। वे दोनों ऐसे नही हैं। उसके पास सोचने का अपना खास दृष्टिकोण भी नही है। क्योंकि उनमें से एक मुसलमान है। आप लोग ये कैसे सवाल पूछ रहे हैं? उसके सर पर गहरी चोट है। कुछ तो ख्याल कीजिये!

‘‘आप चुप कर के वहां दूर बैठ जाईये। या बेहतर होगा दूसरे कमरे में चली जाएं।’’

‘‘हां तो बताईये---’’

‘‘ये गाय का मांस आप कहां से लाई थी?’’

‘‘जी? गाय का मांस?’’

‘‘वही जिसका धंधा तुम और रमजान मियां पिछले कई महीनों से बिरयानी की आड़ में चला रहे थे। ये तो होना ही था। शुक्र करो कि तुम बच गई! तुम्हें जरा भी शर्म है कि तुम जैसे लोगों के जायके और स्वाद के चक्कर में पूरा शहर जल रहा है। अगर कहीं साबित हो गया तो तुम और रमजान दोनों गये कम से कम चार पांच साल के लिए अंदर।’’

‘‘अच्छा तो बताओ तुम्हारा गैंग कैसे काम करता है? कहां से गायों को उठाते हो? कब उठाते हो? कितने लोग हैं तुम्हारे गैंग में? कहां है तुम्हारा गौ कत्लखाना? ऐ कुछ बोलती क्यों नहीं? गूंगी है क्या?’’

‘‘अरे रुक यार अखलाक! ऐसे सवाल पूछते हैं क्या किसी से? अरे लड़की हमारी बेटी की उम्र की है। मैं तो कहता हूं बेटी जैसी ही है। एक काम कर तू जा बाहर मेरा वेट कर। मैं सवाल जबाब कर अभी आया। और एक बात टेंशन मत लियो केस का हर क्रेडिट दोनों भाईयों के नाम पर ही रहेगा।’’

‘‘तू भी न मंगल--- तू बोल रहा है तो चल जा रहा हूं।’’

‘‘हां बेटी! जो जानती हो सब सच बोल दो।’’

‘‘सर यह सब बकवास है। हां रमजान चचा बिरयानी जरूर बेचते थे। पर उसमें कभी गाय के मांस का कोई एक टुकड़ा हो ही नही सकता’’ 

‘‘ये बात तो तुम इतने पक्के तौर पर कैसे कह सकती हो?’’

‘‘क्योंकि वो वेज बिरयानी बेचते थे। हां उस बिरयानी के पकवाने में मेरा भी रोल था। ये बात सच है। मगर इस बिरयानी के पकाने की सबसे जरूरी बात ये कि उसे एक हिंदू औरत पकाती थी।’’

‘‘कौन है वो हिंदू औरत? तुम उन्हें अभी सामने ला सकती हो? वो तुम्हारी गवाही देंगी। यही बात अदालत में कह सकेंगी?’’

‘‘मैं नही जानती! मगर हां उन्हें अभी बुला सकती हूं। अम्मा जरा मनोरमा भाभी को बुलाना!’’

‘‘नाजिया स्तब्ध आंखों से जोया को देख रही है।’’ 

‘‘ठहरिये--- आप न जाएं। मैं चाहता हूं मेरे भीतर कोई शक शुबह न रहे कि आप उन्हें ऐसा बोलने के लिए बोल देंगी। मुझे बताईये उनका घर?’’

‘‘वो हमारे सामने वाले फ्रलैट में रहती हैं।’’

‘‘ठीक है।’’

अगले ही पल मनोरमा के दरवाजे पर दस्तक देकर पुलिस वाला रूपेश के फ्रलैट के भीतर दाखिल हुआ। रूपेश इतनी सुबह पुलिस वाले को देख हैरान तो है मगर उतना नही है। वो जानता है उसकी प्रतिबद्धता एक न एक दिन जरूर संकट में डालेगी। शायद वो दिन आज आ गया है। 

‘‘जी मैं ही रूपेश हूं कहिये।’’ 

‘‘माफ कीजिये मगर मैं मनोरमा जी को--- शायद आपकी 

मिसेज--- से मिलने आया हूं। 

‘‘रूपेश अचरज में पड़ गया। ये क्या मुसीबत है?’’

‘‘उन्हें बुला देंगे? कुछ सवाल जबाब करने हैं।’’

‘‘सवाल-जबाब! मनोरमा!’’

क्या हो गया? आटा गूंदती वो जब बाहर आई तो दोनों के एक दूसरे के देखने ने जैसे रूपेश को स्तब्धता में उनके एक दूसरे से पूर्व परिचय होने का प्रमाण दिया। आप।

‘‘जी। आपसे एक दो सवाल करने हैं। सीधे-सीधे जबाब दीजियेगा।’’ 

‘‘पहले बैठिये तो सर। मैं चाय लेकर आती हूं। उस दिन का आपका बड़ा अहसान है हम पर।’’ 

‘‘वो तो मेरा फर्ज था। चाय फाय की फुर्सत नही है।’’ 

‘‘तो बताईये आप किसी रमजान मियां को जानती है नहीं।’’ 

(मंगल को भीतर गुस्सा आ रहा था कि कितनी सफाई और भोलेपन से मुल्लन अभी उससे झूठ बोल रही थी। फिर भी उसने सभी सवालों को पूछ लेना जरूरी समझा।)

‘‘आप कोई बिरयानी वगैरह किसी के लिए पकाया करती हैं?’’

‘‘इस बार मनोरमा ने रूपेश की तरह मासूमियत भरी निगाह से देखते हुए कहा हां, तो आप हिंदू होकर भी किसी मुस्लिम के लिए बिरयानी पकाती थी!’’

‘‘इसमें बुरा क्या है? व्यापार का धर्म से क्या संबंध। वो मुझे पैसे देती थी।’’ 

‘‘व्यापार का धर्म से संबंध है मैडम। क्योंकि आप हिंदू होकर व्यापार के लिए जिस बिरयानी में गाय का मांस डालती थी। वो 

गैरकानूनी है। इसके लिए आपको कानून सजा हो सकती है।’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हैं आप?’’

‘‘मैंने हमेशा शुद्ध शाकाहारी बिरयानी पकाई थी। हम हिंदू हैं। गाय हमारे लिए मां समान है। मैं सपने में भी कभी ऐसा सोच नहीं सकती।’’

जोया ने मुझसे झूठ बोला। मैं तो पहले से ही इन मुसलमानों पर भरोसा नहीं करती थी। बताओ कमीनी ने कहां फसा दिया मुझको। मेरे सगे संबंधियों को इस बारे गर पता लगेगा तो वो मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।

‘‘मनोरमा! चुप करो। बिना जाने किसी को कोसना बंद करो।’’ रूपेश भीतर से खुश है कि वाह आखिर हिंदू मुस्लिम घृणा के बीच वो प्रेम का पुल बन गया था। जिस पर उसके घर में इस चटपटी शुरुआत की बिरयानी पकाई जा रही थी। मगर वो हल्के अफसोस में भी है कि एक जरा से भरम ने दूसरे के लिये खड़े होने वाली स्थिति का यह पुल ढहा दिया। आखिरकर घृणा ने खुद को सुरक्षित करने और दूसरे पर हमला करने का स्वार्थ  ही चुना। फिर भी एक नई शुरुआत के लिए यह भी तसल्ली लायक है।

‘‘इंस्पेक्टर साहब! क्या माजरा है?’’

‘‘कुछ नहीं मुझे जबाब मिल गया है। और हां बाई दे वे--- आपकी मुसलमान पड़ोसी कमीनी नहीं है।’’ 

नाजिया और जोया जब कमरे में आईं तो कमरे में पुलिस वाले के चले जाने के बाद का सन्नाटा नाच रहा था। यह वैसा सन्नाटा नहीं था जैसा आमतौर पर होता है। यह उस निर्वात का स्थानापन्न नहीं था जो अक्सर अपने आस पास के किरदारों के अप्रत्याशित बर्ताव, चोरियों, हत्याओं, चुगलियों और बदतमीजियों को देखने के बाद मुर्दिल सा सहमा होता है। बल्कि उस निर्वात के जीवन्त होने का उत्सवी क्षण था। जो कमरे के मौन को ध्वनि की तरह मुखर बज रहा था। जिसे वही सुन सकते हैं जो इतनी ही जीवंतता से 

संचालित हो। मैं उम्मीद करता हूं कि आपको सन्नाटे की ये धुन और उसका थिरकना दोनों सुन दिख रहा होगा।

मनोरमा कुछ नही बोली। बस आगे बढ़ी और जोया को 

आलिंगन में भर लिया। उसके आंसुओं ने जोया के कंधाों को गीला कर दिया। नाजिया आगे बढ़ी और आलिंगन में एकरत होती 

मनोरमा की पीठ अपनी हथेलियों से सहलाने लगी। रूपेश धीमे से चुपचाप नीचे सोफे पर पसर गया और अपनी डबडबाती आंखों का सुख पीने लगा।

कमरे में इस गिरते जल के बाद भी अब भी शहर में इतने पत्थर बचे हुए थे कि वो इस कमरे में आकर गिर सकते थे। वो कभी भी किसी कोने से आते और इस घर की शान्ति का लहू पीने लगते। इसलिए वो पत्थर जिसे आना ही था आया और खिड़की के कांच को तोड़ दिया। सामने गली की तरफ का दरवाजा गर बंद न होता तो जाने कितने पत्थर इस घर में आ गिरते। दूसरा पत्थर शायद कम नफरत से भरा था इसलिए वह जंगले से टकराया और वापिस होकर उत्तमप्रदेश नाम की अनाम जगह के मुजफ्रफरनगर नाम के किसी अनाम कस्बे पर गिरा और वहां लहू पीने लगा। तीसरा पत्थर इतना भारी था कि फेंकने वाले ने जैसे उसे खिड़की पर नही हाशिमपुरा में फेंक दिया। चौथा पत्थर खिड़की से पार हो गया और रूपेश के माथे से खून की धारा बह निकली। रूपेश ने झटपट इस खून की धारा को दबा लिया कि यह खून कहीं और किसी शांति के कस्बे में न गिर पड़े।

अब पेट्रोल बंब की बारी थी। कांच की पेट्रोल भरी आग उगलती पहली बोतल हवा में इतनी ऊंची उछाली गई कि उसने खिड़की को अपने लपेटे में लिया ही साथ ही ये दावा करने लगी वो पहली दफा 1984 में पंजाब में थी। वो इतनी ताकतवर है कि उसने हजारों की संख्या में सिक्खों को लील लिया था। वो घृणा की आग है आम आग नही है वो न हिंदू की सगी है। न मुस्लिम की। वो किसी मजहब की सगी नही है। इसलिए रूपेश और उस जैसे लाखों हजारों लोगों को उससे डरना चाहिए। 

मगर वो नहीं जानती कि रूपेश आग का पोषक नहीं है। उसके घर की दीवारें भी उसकी तरह प्रेम के जल से सरंक्षित हैं। इसलिए वो इतनी क्रूर आग भी बुझ गई। आग का बुझना था कि एक दूसरे पेट्रोल बम्ब से निकली आग ये चिल्लाती आई कि मैं बहुसंख्यकों की पाली हुई आग हूं। जिसे वो अल्पंसंख्यकों से घृणा पैदा करते हुए अपने अंदर पैदा करते हैं। मगर जब वही बहुसंख्यक कश्मीर जैसी जगहों पर अल्पसंख्यक होते हैं। मैं उन्हें भी नहीं छोड़ती। मैने हजारों कश्मीरी पंडितों को बेघर कर दिया। कितनों को जिंदा जलाया। मेरी लगाई ये आग अब तक बुझी नहीं है। मैं पाला बदलने में जरा देर नही करती। मगर ये आग भी बुझ गई। 

रूपेश की स्वीकार्यता ने शायद उस आग के मंसूबे को ठंडा कर दिया। लेकिन फैंकने वालों के दिल ठंडे नही हुए थे। अबके इकट्ठी तीन चार बोतल फैंकी गई। शायद फैंकने वालों को ये 

भरोसा था कि ये आग जिसने वाराणसी जैसी गंगा जमुनी संस्कृति को अपनी लपट में झुलसा दिया। वो आग जिसने कई दिनों 

भागलपुर में रक्तपात मचाए रखा। वो आग जो मुंबई में मुसलमानों की मस्जिद का विध्वंस करा सकती है। वो आग जो कहीं भी पहुंच सकती है। वो आग जो गांधी के गुजरात में दौड़ती साबरमती एक्सप्रेस के भीतर खिलखिलाती गलबहियां करती भारतीय संस्कृतियों को एक क्षण में बंटवारे के भयावह रक्त कुंड में धकेल सकती है। वो आग जिसने अलीगढ़, देगंगा, असम में मनुष्यता की त्रसदी की सबसे शर्मनाक कहानी लिखी। उस घृणा की आग को तो रूपेश का घर फूंकना चाहिए।

मगर वो नही जानते रूपेश जैसे लोगों के सीने में भी आग बहती है। ये प्रेम की आग, सच्चाई का आग, मनुष्यता की आग, प्रतिबद्धता की आग है और इस की शर्म तो घृणा की आग भी करती है। इसलिए शर्म से वो सारी आग भी बुझ गई। ये देख घृणा के पिट्ठू और तिलमिला गए।

इस बार का उनके हाथ में पिस्तौलें लहरा रही थी। यह वही पिस्तौल थी जिससे कभी गांधी का कत्ल हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की फॉर्ड थियेटर में नाटक देखते हुए हत्या हुई थी। पॉप सिंगर जॉन लेनन को उनके घर पर गोली दाग मार दिया था। यही वही बंदूक है जिसकी कट्टरता ने हिंदुस्तानी कवि पाश को मार दिया।

 यह वही बंदूक है जिससे पेशावर में सैंकड़ों बच्चों का कत्ल हुआ। यह वही बंदूक है जिससे सीरिया, गाजा, जर्मनी इराक कितनी ही जगहों के बच्चे मारे जा रहे हैं। यह वही बंदूक है जो चाहती हैं अपनी कलमों से प्रेम और प्रतिरोध लिखने वाले लोग जीवित न रहें।

यही वो ‘घृणा की बंदूक’ है जिसे गर हमने नहीं रोका तो एक दिन हमारे भविष्य का कत्ल कर देगी। वो हमारे आस पास पनपता खूबसूरत भविष्य जो दुनिया को एक खूबसूरत गुलदस्ते की तरह गांठे हुए है।

शायद रूपेश और उसके परिवार की अंतिम घड़ी आ चुकी है। मैं कहानी का लेखक ही सही मगर उन्होंने गोली चलाई तो मैं चाहकर भी इसे रोक नही पाउंगा। मुझे भी आपकी तरह शोक और सहानुभूति से काम चलाना पड़ेगा। 

अल्लाह का खैर है कि शायद उनका मकसद कुछ और है। हवा में एक के बाद चार फायर हुए। बंदूक हत्यारों के लिए अंतिम प्रहार था शायद। अंतिम प्रहार जिसमें अक्सर प्राचीन समय में हिंदू देवी देवता ब्रह्मास्त्र से अपने प्रतिद्वंदी पर हमला कर अंततः उसे 

पराजित कर ही देते थे। जिसका वार कभी खाली नही जाता था।

तो हवा में ऊपर उठी ये गोलियां आखिरकर कैसे बिना खून पिए रह जाती। जबकि उन्हें अपने प्रतिद्वंदियों का पता हो। एक गोली गोया जिसको मालूम था कि एक 67 साल का नरेंद्र नाम का बूढ़ा जो कि महाराष्ट्र में 

अंधविश्वास और जातिवाद के खिलाफ लड़ने के लिए लोगों में एक नई अलख जगा रहा है। गर उसकी यह सोच लोगों के भीतर पुनर्जीवित हो गई तो वो लोग कहां से आएंगे जो उसके आकाओं के बनाए हिंदुत्व को आंख मूंद मान लेंगे। इसलिए वह उस बूढ़े से इतनी घबरा गई कि नकली हिंदुत्व की वह गोली उस हिंदू कॉमरेड की पीठ में विश्वासघात की तरह जा धंसी।

दूसरी गोली जो हिंसा और घृणा से इतनी कायर और कमजोर हो चुकी थी कि मुंबई में रहने वाले 81 साल के एक दूसरे बूढ़े 

गोविंद के विचारों का भय उसे सताने लगा। वो विचार इतना था कि ये कम्युनिस्ट बूढ़ा भी ‘ब्लैक मैजिक’ जैसी कई धार्मिक, गैर धार्मिक सामाजिक कुरूतियों के विरुद्ध काम कर रहा था। यह बूढ़ा और उसके विचार कारतूस से अधिक ताकतवर और बारूद से भी अधिक मारक थे। इसलिए उसका मरना तय कर दिया गया।

तीसरी गोली जिसे भी और गोलियों कि तरह इन पागल बूढ़ों के अकल्पनीय पुरुषार्थ से डर लग रहा था। इस खास बूढ़े को ढूंढती हुई कर्नाटक में उसके घर पहुंच गई। यह खास और पागल बूढ़ा कलबुर्गी जो एक स्कॉलर भी था, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक और  किसी कन्नड़ विश्वविद्यालय का वीसी भी, जिसे 76 साल की बेचारगी वाली उम्र में राम नाम जपना चाहिए था।  अक्सर विचारों जैसी खराब चीजों के साथ रंगरलिया मनाते देखा जाता था। इस उम्र में भी उसे धार्मिक कट्टरवाद, लिंगायत समुदाय के 

सामाजिक और धार्मिक परिवेश पर अपने विचार रखने की बुरी और खराब लत थी। शायद इसलिए गोली के हिंदुत्व ने उसके अनुसार उसे मारकर यह पुण्य काम किया।

चौथी गोली इस बात से शर्मसार थी कि बेंगलुरु में रहने वाली एक 55 साल की औरत ने उनके आकाओं की नाम में दम कर दिया था। कैसे वह मात्र 15 पृष्ठों की एक छोटी-सी पत्रिका से करोड़ों अरबों के चमकदार विज्ञापनों से लदे सरकारी दावों और दिखावों की पोल खोल रही थी। कैसे लिंगायत समुदाय की एक औरत उस समुदाय के भीतर इस समझ को पैदा कर रही थी कि सताएं फेक न्यूज से आपके भीतर घृणा और उससे जुड़ा नकली धार्मिक उन्माद पैदा कर रही हैं। नक्सलवाद एक दोतरफा समस्या है। इसलिए यह गोली गौरी नाम के इस साहस से घबरा उसकी देह में जा छुपी।

लेकिन लिखने वालों की त्रसदी तो देखिये कि लेखकों, 

पत्रकारों, अखबारों ने इन लोगों को बेचारगी में ही अधिक लिखा। 

उन्होंने उन भटके हुए हत्यारों को और मुर्ख बनाया। जो पहले से किसी खास कट्टरता से मुर्ख बनाये गए थे। उन्होंने इन आला दर्जे के बुद्धिजीवियों के उस फौलादी अक्स के विषय में इस तरह लिखा ही नही कि वे गोलियां उनसे टकराकर ध्वस्त हो गईं। 

वो जो उनके विचारों की हत्या करने निकली थी असफ़ल ही रहीं। वो गोलियां मारी गईं जो उनकी हत्या करने निकली थी। ऐसे लोग देह भर नही होते। वो बहसतलब विचारों के गुलदस्ता होते हैं। उनकी शख्सियत खुशबु की मानिंद होती है। जिसे कोई गोली भेद नहीं सकती। जब जब ऐसे रंगसाजो पर कोई हमला करता है उनकी आजाद ख्याली का रंग और उड़ता है और इस फिजा को और गाढ़ा करता है।

ऐसे लोग समाज की नींव मजबूत करने के लिए खुद शहीद दर्जा होते हैं। उनसे लड़ने का भी मजा है। मगर इस लड़ाई का मजा लेने के लिए कलम, स्याही और विचार के रास्ते आना होगा। तब ऐसे लोग पाएंगे कि जिस कम पाने के लिए उन्होंने खुद को इतनी बड़ी मुसीबतों और अपराधों में धकेला। उसे कमतर मुसीबतों और कमतर खर्चे से अधिक लाभ के अनुपात में पाया जा सकता है। अब उनके पास कुछ नहीं था। वो बाहर जोर जोर से रूपेश का नाम लेकर उसे हिंदू होने का वास्ता दे देकर गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे। वो ये बता रहे थे वो राम के वंशज है, कृष्णवंशी। मगर शायद वो हिंदू या हिंदुत्व को एक शब्द या नारे भर तक जानते थे। क्योंकि वे जिस हिंदू या हिंदुत्व की दुहाई दे रहे थे उसके इन दैवीय अवतारों ने शत्रुओं के प्रति भी कैसा आचरण रखा जाए उसका ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया है कि वह इन नकली हिंदुत्ववादियों से तो कहीं से मेल नही खाता।

फिर ये कैसे रामवादी या कृष्णभक्त हो सकते हैं। उनका बर्ताव तो हिंदू धर्म में वेदों, उपनिष्ादों जहां तहां वर्णित कथाओं उपकथाओं के असुर और उनकी आसुरी प्रवृतियों से अधिक मेल खाता है।

तो क्या यह मान लेना अधिक उचित नही है कि वे अवश्य हिंदुत्व की शाखा के अपने दावे में सही हों। मगर यह शुक्राचार्य के शिष्यों की शाखा है। वो जिस हिंदुत्ववादी एजेंडे पर हैं। वह अवश्य हिंदुत्ववादी है। मगर वह आसुरी प्रवृतियों वाला हिंदुत्व एजेंडा है। भस्मासुरों का हिंदुत्व जो आपको तो भस्म करेगा ही, साथ ही एक दिन खुद के सिर पर हाथ रखेगा और खुद भी भस्म हो जाएगा। 

इसलिए रूपेश का हिंदुत्व जो ‘उदारवाद, बहुलता, सद्भाव, वसुधैव कुटुंबकम’ जैसी हिंदू धर्म की मुलभूत बुनियादों से पोषित था।  उसे उनके हिंदुत्व का हल्का भी भय नही हुआ। जिस भय से वो रूपेश को डराना चाहते थे। वो भय उनसे आ गले लगा। वो भाग खड़े हुए। 

भागते हुए मेरे पैर के नीचे जाने क्या आ गया था कि मैं 

फिसलकर गिर गया। उन्होंने मेरा एक पल भी इंतजार नही किया। गाड़ी में बैठे और भाग गए। मुझे अकेला छोड़ दिया। 

ऐसा नहीं था कि उन्होंने मुझे पकड़े जाने के भय से अकेला छोड़ दिया था। ऐसा बिल्कुल नही था। बल्कि मैंने गोली दागते हुए उनसे कुछ सवाल भी पूछ लिए थे। 

ऐसे सवाल जैसे प्रहृलाद ने हिरणाकश्यप से पूछे थे। कृष्ण ने कंस से। वो सवाल जिसके पूछने पर इंद्र का सिंहासन डोल उठता था। वो सवाल जो सावित्री ने यमराज से पूछे तो यमराज ने उसके प्राण नही हरे बल्कि उसे प्राणदान दिया। 

वो सवाल जिसने विभीषण के भीतर इतना अंतर्विरोध पैदा किया कि वो रामशरण गहे। वो सवाल जिनमें गोपियों के कृष्ण को उलाहना देने के बावजूद भी कृष्ण खीजते नहीं है। अपितु इन सवालों से उनके सौंदर्य में  विस्तार ही हुआ है। वो सवाल जिनके धर्म सम्मत होने के कारण युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते रहे हैं और सुयोधन दुर्योधन। वो सवाल जिन्हें गर पूछा न जाता तो राम राज्य में स्थापित होती निरंकुशता को कोई लव-कुश कैसे रोकते। वो सवाल जिसे सीता ने पूछा तो धरती को अपनी कोख पुनः उसके लिए खोलनी पड़ी।  

मैंने सवाल इसलिए पूछा क्योंकि मैं उन दिनों इन युवाओं के साथ जिस हिंदूवादी संस्था का शिष्य था। वहां मैने गुरु दीक्षा में भोर की प्रथम बेला से गोधूलि तक मनुष्यगत अनुशासन का अध्ययन तो किया। मगर उस दीक्षा का अनुगमन नही किया। मैने जिस शास्त्र ज्ञान को अर्जित किया। वह ज्ञान इस शस्त्र विद्या से बिलकुल भिन्न था।

यद्यपि मैं वीर था। शस्त्र उठाते हुए और शत्रुओं का विनाश करते हुए मेरे हाथ नहीं कांपते। शत्रु को रक्तरंजित देख मुझे अपने धर्म के लिए मुझे प्रसन्नता होती। मगर वह भीतर जो धर्म सम्मत ज्ञान था वो मेरे अंतर्मन पर उतने ही शस्त्र चलाता और मुझे क्षीण कर देता। मैं अपने धार्म और अपने देवताओं के पद चिन्ह्ों के विपरीत किसी अजाने मार्ग पर चल रहा था। जो न वेदोचित था न शास्त्र सम्मत। 

मैंने तो कभी उस ज्ञान का उपयोग किया ही नहीं। जिसका कि हमारे ‘मुनि-ट्टषि-देव’ आदियों ने जन-जन के बीच प्रसार कर, इस ज्ञानार्जन करने का असली आनन्द उठाया  या फिर वे  इस ज्ञान को और निखारने और निपुण होने के लिए वेदों और शास्त्रें से सम्बंधित वाद-विवाद की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर ज्ञान के असली आनंद का लुत्फ लेते रहे। 

मेरा दिल भी जाने क्यों इस बात के आनन्द में हिलोरे मारने लगता कि मैं अपने इन बताये गये शत्रुओं से कहता आओ चलो अपने अपने विचारों से तर्क वितर्क करते हैं। जो हारा उसे प्रतिरोधी के विचारों का स्वागत करना होगा। कहो? है स्वीकार्य!

मैं जब भी अपने शत्रुओं पर कभी भी कहीं भी हमला कर रहा होगा। मेरे भीतर यही विचार घूमते। हमला करते हुए मुझे कभी ध्यान नही रहता कि मैं क्या कर रहा हूं? बल्कि मैं तो इस बात को पूछने की रिहर्सल कर रहा होता।

आज जब हम इस हिंदू शख्स पर हमला कर रहे थे। मुझे मेरे धर्म ने आज कुछ अधिक ही आत्म ग्लानि से भर दिया कि जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो यह तो 

अधर्म का मार्ग है। तुम्हारे धर्म में तो यह लिखा है कि कोई निर्दोष तुम्हारा शत्रु नहीं है। निर्दोष और निहत्थे की हत्या तो कायरता है। बस मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उनसे सवाल पूछ लिए और वो भाग खड़े हुए। इसका अर्थ ये हुआ कि सवालों के आगे अधर्म नही टिकता। मगर वो सवालों से कब तक भागेंगे?

एक न एक दिन ये सवाल उन्हें घेर ही लेगा। आखिर भूरे कच्छे या पतलून पहन लेने से और भगवा झंडे के नीचे डंडे के साथ खड़े होने से हमारे भीतर धर्म का विकास तो नहीं होगा न। धर्म की आधुनिकता तो बृहत्तर होने में जैसे श्री राम अंत समय में भी लक्ष्मण से अर्धमृत पड़े रावण से ज्ञान अर्जित करने के लिए कहते हैं। कैसे राम और पांडव दूसरों के वचन सुख के लिए वनवास और अज्ञातवास जैसी निस्वार्थ आत्म स्थितियां जीते हैं। कैसे शबरी के झूठे बेर खाने पर राम को संकोच नहीं होता। क्यों कृष्ण सुदामा पैर पखारने में इतना संतोष महसूस करते हैं?

फिर ये कौन-सा धर्म है जिसका हम अनुपालन कर रहे हैं। जिसके लिए हम अकारण हत्याओं में लिप्त हैं। उस दिन मैंने यह निश्चय किया और अधर्म की इस शाखा से खुद को मुक्त कर लिया। 

मैं उनमें से ही एक हूं। जिसने उस रोज रमजान मियां के ऊपर मस्जिद में हमला किया था और अब रूपेश पर। दरअसल हमें हमारी शाखा वालों ने कहीं से वो गौ मांस लाकर ये कहकर दिया था कि ये मांस उन्होंने किसी गौ कत्लखाने पर छापे में पकड़ा था। जिसके साथ छुपे तौर पर रमजान मियां के संबंध थे। 

उस रोज मैं सवाल पूछ लेता तो जाने कितने अपराधों की सलिंप्तता से बच जाता। मगर अब भी देर नही हुई थी। खुद से सवाल पूछने पर मैने पाया कि रमजान मियां हमारे हिंदुओं जैसे ही हैं। बस नमाज उकड़ू बैठ कर करते हैं। लोगों से बात करते हुए बहुत मीठे से काम चलाते हैं। जुनैद ईद में हमारे कान्हा की तरह सुंदर लगता है। बिरयानी का धंधा जो उन्हे हमारी वजह से काफ़ी महंगा पड़ गया। दरअसल यह उन्होंने सरकार की घटिया कर प्रणाली के लागू किये जाने से कबाड़े के काम में घाटे बढ़ने के बाद शुरू किया था। 

उन दिनों सरकार की पवित्रता देवताओं से कम नही थी। उन पर सवाल करना ईश निंदा की तरह खतरनाक था। विज्ञापनों ने इस तिलिस्मी मायाजाल में इस तरह फांस लिया था कि जनता को सरकार की गढ़ी गई मजबूरियां और दुःख किसी गरीब की बेबसियों से भी अधिक द्रवित करते थे। सरकार की गैरजिम्मेदाराना गतिविधियों में भी उन्हें अच्छे दिनों की कोई छुपी हुई आशा दिखती थी। सरकार का हर कदम उन्हें राष्ट्रवादी लगता था और अपने ही बीच के 

लोगों की जरूरतें निहायती व्यक्तिगत। 

इसलिए रमजान मियां जैसे लोग जो सरकार के नए भारत और स्मार्ट और स्टार्ट अप योजनाओं में बस दिखावे भर के लिए होते थे। उन चमकीले भाषणों, रोड शो में पुकारे जाने वाले  एक इमोशनल स्लोगन, जो सिर्फ इतने भर जरूरी थे कि जनता को आंसू बहाने और मनुष्य दिखने की एक फैशनेबल दुनिया में बस घड़ी भर को छोड़ आए। बाकि का वो सारा समय अपने नेता के गढे जा रहे इस लीजेंडरी और आइकॉनिक इमेजनरी दुनिया में खोए रहें। वे रोड शों, दिवस पर्वों, रैलियों के उत्सव के बाद भुला दिए जाते थे। 

ऐसे वक्त में जब पॉपुलिरिज्म और प्रचारवाद ने नायकवाद को इतना बड़ा गढ लिया था कि लोकतंत्र के सवाल को छोटा कर दिया था। तब रमजान मियां के रोजगार और रोटी के सवालों की चिंता कौन करता। इसलिए जो लोकतंत्र के अपने हिस्से में पहले से ही अल्पसंख्यक था। उसके लिए बिरयानी पकाने का रास्ता सबसे सुविधाजनक रास्ता था।

आप सोच रहे होंगे मेरे भीतर इतनी घृणा पैदा किये जाने के बाद प्रेम ने कैसे घर बसा लिया। कैसे सवालरहित हृदय में कुछ भी ठीक से जानने की उत्कंठा ने जन्म ले लिया। दरअसल इसके पीछे जोया का ही हाथ है। मैंने उसे पहली दफ़ा बिरयानी खाते रमजान मियां की दुकान पर देखा था।

तब मैंने पहली बार जाना किसी से प्यार होने के लिए इंसान होना काफ़ी है। मुझे उसे देखते ही लव फव सा कुछ हो गया था। वो क्या कहते हैं? केमिकल रिएक्शन! हां वहीं सबसे स्ट्रांग बॉन्ड वाला। जिसकी आउटर शेल दिल के न्यूक्लियस के पास इतना करीब था कि कोई उम्मीद नहीं थी कि कोई भी इलेक्ट्रॉन किसी और से ब्रॉण्ड बनाने के लिए फ्री होता।

वो लड़की जादू थी। ऐसी लड़कियां जादू ही होती हैं। उनके भीतर के मन का सौंदर्य, उनका सदाचार उनके बाहर के व्यक्तित्व को इतना जादुई और सम्मोहन भरा बना देता है कि देखने वाला सारी दुनिया भूल जाए। सारे आडम्बर, सारे झमेले कि वह क्या है? किस मजहब का है? बस एक पहचान प्रेम और कुछ नहीं। सच कहूं उन दिनों उस अहसास के सिवा कुछ नहीं था। उन दिनों में शाखा में घृणा पढ़ता और बाहर प्रेम। तब तक नफरत ने इस कदर मेरे भीतर घर नही किया था। इसलिए बिरयानी का स्वाद, रमजान मियां, मस्जिद और जोया मुझे गैर मजहबी नही लगते। 

मैं अपने हिस्से के प्रेम और उसके न होने के होने जैसे बोध के साथ एकांत की ऐसी इंद्रधनुषी दुनिया में डूब जाता। जो शायद उसके सचमुच मेरे साथ होने से भी अधिक मादक, रंगीला और प्रेम की सच्ची अनुभूतियों से भरा था। जबकि मेरे पास उसके साथ होने का एक भी अनुभव नहीं है। मगर उसका न होना सच कहूं इतना प्रेम भरा था कि बस इससे अधिाक मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस वो मुझे यूं ही रोज दिख भर जाया करे। उसकी झलक जैसे खुशियों की बूटी थी। मुझे इतनी पॉजिटिव वाईव आती कि मैं जिस भी काम को करता वो बेहतर तरीके से होता। 

यही शायद प्रेम की खूबी है कि इस रास्ते जो चलता है उसे वह अपनी अनंत खूबियों से भर देता है। 

मैं प्रेम में इतना स्वार्थी नही होना चाहता था कि मेरे देखने का अहसास तक भी उसकी निजता, बेपरवाही और उसकी आजादी की दिनचर्या में हल्का भी भंग लगाता। मैं तो वैसे भी रोज प्रेम का जादू बटोर रहा था।

उस रोज जब रमजान मियां की दुकान पर मुझे पीने का पानी नही मिला तो मैं पहली बार मस्जिद के भीतर दाखिल हुआ था। ये तीसरे पहर की नमाज का वक्त था जिसे मुसलमां सूर्य के अस्त होने से कुछ देर पहले पढ़ते हैं। 

‘‘अम्मी तुम्हे बड़ी आज हिंदू की चिंता होने लगी?’’

‘‘आखिर हूं तो इंसान न बेटी! इतने दिनों उसके साथ रहते-रहते कमबख्त उसकी आदत सी हो गयी है!’’

‘‘अरे तू बेकार चिंता करती है अम्मी! वैसे भी उनके हसबैंड तो उनके साथ है न! देखना बस लौटते ही होंगे।’’

आज सुबह शहर के एक मशहूर शॉपिंग काम्प्लेक्स के मल्टीप्लेक्स सिनेमा की ऑडी संख्या-2 और 4 में जोरदार धमाका हुआ। बताया जाता है की इस घटना में 17 लोगों की जान गई है और 60 से अधिक लोग घायल हो गए हैं। इस घटना के पीछे  ‘जिहाद-ए-हिंद संगठन’ का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। लेकिन इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बताया जाता है विस्फोटक की क्षमता और बनावट पुणे की जर्मन बेकरी और बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में रखी आईईडी और दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों में प्रयुक्त विस्फोटक जैसे ही थी। मरने वालों और घायलों को शहर के सरकारी अस्पताल में रखा गया है।

फिर टेलीविजन के स्क्रीन पर मृतकों और घायलों की तस्वीर और उनका नाम फ्रलैश होने लगा।

‘‘अम्मी--- अम्मी---’’

‘‘जल्दी से इधर आओ!’’

‘‘ये देखो टेलीविजन पर न्यूज में---’’ 

‘‘या अल्लाह---’’ 

‘‘ये क्या किया तूने!’’

‘‘बेटी वो लोग कहां हैं!’’

‘‘सरकारी अस्पताल!’’ 

‘‘जल्दी चलो बेटी!’’

नाजिया और ज़ोया दोनों अस्पताल के जनरल वार्ड के कमरों  के चक्कर लगा रहे हैं। वीभत्स नजारा है। चाराें तरफ रक्त रक्त और रक्त ही पसरा पड़ा है। वार्डबॉय स्ट्रेचर पर लाशें ढोकर मुर्दाघरों में ले जा रहे हैं। मरने वालों की कोई उम्र नहीं है और न ही रोने वालों की उम्र है। बूढ़े, बच्चे और जवान मरने वाले भी है और रोने वाले भी। जीते जी धर्म की पहचान के साथ जीने वाले आज न हिंदू होकर मरे न मुसलमान होकर।

काश हिंदू मुसलमान के नाम पर आपस में लड़ने वाले ये जान पाते कि दहशतगर्दों को कोई ईमान नहीं होता। वो न हिंदू होते हैं मुसलमान। उनके धमाकों से हिंदू भी मरते और मुसलमान भी। फिर किस तरह वो मुसलमान हो जाते हैं। उनका कोई धर्म नहीं है।

वो मुसलमान नहीं है! वो कापि़फ़र हैं कापि़फ़र! क्योंकि सच्चा 

मुसलमान तो इंसानियत की तरक्की और अमनपरस्ती के लिए जीता है। अस्पताल का वीभत्स नज़ारा देख जोया अंदर ही अंदर उफनते सवालों और जबाबें की कश्मकश से जूझ रही है।

ज़ोया और नाजिया ने अस्पताल के नोटिस बोर्ड से घायलों और मृतकों का नाम पढ़ा। घायलों की सूची में उनके परिचय का  केवल एक ही नाम था- मनोरमा! दोनों कुछ सोचकर जैसे सहम गयी। वे भागकर उस वार्ड में पहुंची जहां मनोरमा को इलाज के लिए रखा गया था।

सामने बैड पर मनोरमा अचेत पड़ी थी। उसे कृत्रिम श्वास प्रणाली पर रखा गया है। जब तक उसे अस्पताल लाया जा सका उसका काप़फ़ी खून बह चुका था। भगवान का शुक्र है कि वो बच गयी। सिरहाने बैठा रुपेश तेज हांफती सांसों के साथ नाजिया और ज़ोया को अपनी आपबीती बता रहा है। 

थोड़ी देर में डॉक्टर साहब आये और रुपेश से दो टूक कह कर चले गए- देखिये इनका बहुत खून बह चुका है। इनका बचाना बहुत मुश्किल है। फिर भी मैं कोशिश करता हूं आप जल्दी से इस ब्लड ग्रुप के ब्लड का इंतजाम कीजिये। अस्पताल का ब्लड बैंक खाली हो चुका है। इसलिए जो करना है जल्दी कीजिये।

मैंने कहा था न आपसे नियति अपने पात्रें से कठपुतलियों की तरह काम लेती है। देखिये कुदरत का ये अजीब का करिश्मा कि एक हिन्दू का खून एक हिंदू से मैच नहीं हुआ लेकिन एक मुसलमान के खून से मैच कर गया है।  एक हिंदू के खून का ब्लड ग्रुप 

मुसलमान के खून का ब्लड ग्रुप जैसा हो सकता है। हैं न बिलकुल कमाल की बात! यकीन मानिए मैने जीवन में आज तक जितना पढ़ा लिखा सुना जाना या मुझे समझाया गया उससे मुझे इतना ही समझ आया था कि यार सचमुच हिंदू और मुसलमान का सब कुछ एक दूसरे के विपरीत होते है। उनकी सोच उनका धर्म उनके भगवान उनकी सूरत यहां तक की उनका खून भी! ओह कितना गलत था मैं! 

नाजिया का मुसलमान खून मनोरमा के हिंदू जिस्म में चढ़ाया जा रहा है। प़फ़र्ज करे की नाजिया का खून किस तरह मनोरमा के खून से मिल रहा होगा।

क्या उन्होंने एक दूसरे को हिंदू मुस्लिम होने का तंज कसा 

होगा---? 

उन्होंने कैसी गप्पे मारी होंगी---? 

वो कैसे पडोसी होंगे---?

क्या वहां भी एक दूसरे को सच्चे दिल से तोहफे देते होंगे और झूठी तसल्लियां देकर कहते होंगे- 

ओह कितना कमाल का तोहफा था तुम्हारा? 

क्या वो एक दूसरे से गले मिले होंगे?

या यहां भी एक दूसरे से करते होंगे तौबा---?

और कह रहे होंगे- 

या अल्लाह!

हे राम!

कहानी खत्म हो चुकी है। मगर उसके किरदार खत्म नहीं हुए हैं। उसके किरदार बाहर की दुनिया में घूम रहे हैं। वो घृणा की 

बंदूकों के साथ भी हैं और बंधुत्व के फूलों के साथ भी। इसलिए वो नई कहानियां रचेंगे। वो कहानियां जो मनुष्यता के संकट की भी हो सकती हैं और बर्बरता के अंत भी। इसलिए कहानी अपनी तरफ से आप लोगों से सीधे-सीधे कुछ कहना चाहती है। आप इसे कहानी की अंतर्ध्वनि, उसकी पुकार, पाठकीय सावधानी, लेखकीय क्षेपक या फुटनोट कुछ भी पढ़ सकते हैं। वो जिसका मूल यह भर है कि मेरा और मेरे किरदारों को दुबारा नजदीक से पढ़े। इतने नजदीक से कि इस दप़फ़े इस ‘हिंदू-मुस्लिम’ वाली अतिरिक्त पहचान उनके साथ न हो। हो सकता है आपको भी महसूस हो! कितने छोटे झगड़े? कितनी छोटी बातें? दो सामान्य से पड़ोसी, रोजी-रोटी की जद्दोजहद से जूझता एक गरीब बूढ़ा, एक शैक्षणिक गिरोह, गुम़नाम हत्यारे, दबा हुआ प्रेम और कितनी बेफिजूल की घृणा!

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