सुबह ऐसे आती है

 

कुछ लोगों के लिए कॉफी का एक मग सिर्फ कॉफी मग नहीं होता। आपका स्ट्रैस बस्टर ही नहीं हमराज भी हो सकता है कॉफी मग। खासतौर पर जब आप भरे-पूरे घर में अकेले हों तो इसी कॉफी के मग से बतियाया जा सकता है, शिकायतें की जा सकती हैं, गिले-शिकवे किए जा सकते हैं, दुलराया जा सकता है। और तो और मन हो तो एक-एक सिप के साथ गुलाम अली को ‘रंजिश ही सही.... ’ गाते सुनते हुए नॉस्टैल्जिया के स्विमिंग पुल में बैक क्रॉल किया जा सकता है।

सुकृता का रूटीन था। हर सुबह जल्दी उठकर अपने कॉफी मग के साथ कुछ पल बालकनी में बिताना। ये कुछ पल पूरे दिन के लिए ऊर्जा से भर देते थे सुकृता को। ये महज आज ही की बात नहीं थी, कुछ दिनों से एक अजीब-सा अनमनापन हावी था सुकृता के दिलोदिमाग पर। कैसी उलझनों से जकड़े रहे ये बीते हुए कुछ दिन।  रीत-सी गई थी खुद ही से लड़ते हुए वह। हां खुद से ही लड़ना और जैसे खुद को जबरन 

घसीटते हुए, अपना ही बोझ खुद उठाना।  सही और गलत के बीच की ऊहापोह भर नहीं थी यह पर जो घटा उसके घटित होने को लेकर अभी तक मन को तैयार नहीं कर पाई थी वह और यह द्वंद्व था मथ डालता था उसे कुछ इस तरह कि थमता ही नजर नहीं आता था। इधर कॉलेज में एग्जाम सिर पर थे तो मन की उलझनें सुलझने की बजाय ‘होल्ड’ रखे जाने के मोड पर आ गई थीं। पिछले दो-तीन दिन की अति व्यस्तता ने मन के अंतर्द्वंद्व को कुछ हद तक साइड पर रख दिया था तो जीवन कुछ सामान्य होने लगा था। लगा जैसे उसका सारा अंतर्द्वंद्व किसी सुशुप्त ज्वालामुखी की भांति कहीं सिर छिपाए सो गया हो। लेकिन आज कुछ अलग था सब।  दैहिक आलस्य से भरी कैसी विचित्र सुबह थी यह। उठने का मन ही नहीं हो रहा था। मानों भारी तन लिए, बिस्तर से उठते हुए अचानक तेज उबकाई आई और वह बाथरूम की ओर भागी। क्या हुआ है उसे? सुजय बाहर रहते हैं तो अपने खाने को लेकर खासी लापरवाही बरतती है सुकृता क्योंकि अक्सर कुक को भी छुट्टी दे देती है। दो लोग हैं घर में उसमें से एक न हो तो कुछ सूझता ही नहीं। ऐसा नहीं कि दोनों साथ ही खाते हैं पर मन में एक अहसास तो बना रहता है कि कोई और भी है जिसके खाने का प्रबंध होना है। कल रात ऐसा कुछ तो खाया भी नहीं तो फिर--- तौलिये से मुंह 

पोछते हुए अनायास ही जब नजर कैलंडर पर गयी तो एक ख्याल बिजली की तरह कौंध और उसका दिमाग सुन्न हो गया, कनपटियां जैसे आग उगलने लगी। ओह माय गॉड--- लगा, पांव के नीचे जमीन ही नहीं है। 

परकटे पंछी की तरह वह धम्म से बिस्तर पर ढह गयी। छत से लगे पंखे के साथ मानों सारी दुनिया घूम रही थी। और घूमते हुए जाने कितने ही लम्हें उसके इर्द-गिर्द भयावह आकृतियों में घूमते जा रहे थे। ये कैसे हो सकता है? उन पलों को जिन्हें अतीत में दफन करने के सारे यत्न कर चुकी थी सुकृता। और तकरीबन जब कामयाब होने का पूरा मन बना चुकी थी तो वे लम्हें फिनिक्स की तरह चिता की राख झाड़कर उसके सामने आ खड़े होंगे उसने कभी नहीं सोचा था, कभी भी नहीं। अतीत बीतता कहां है? वह तो परछाई की मानिंद हर पल साथ चला करता है, सुकृता सोच जरूर रही थी पर उसका दिमाग काम करने से इन्कार कर रहा था। तो क्या सचमुच वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुकी जहां से बाहर निकलने का रास्ता वह नहीं जानती।

उसका मन कब से दोफाड़ हो चुका था। कभी-कभी लगता है वह एक डोर में बंधी है जिसका एक सिरा संस्कारों के खूटे से बंधा है, वह बार-बार मर्यादा की दहलीज छूकर उस खूंटे तक लौट आती है। इस सफर में कितना टूटती है सुकृता, खुद को कितना विवश पाती है ये कोई और कैसे समझ सकता है। और जब वो डोर टूटी तो इस तरह कि वह डोर हाथ में थामे दहलीज को निहार रही है।

सुजय पिछले बीस दिन से टूर पर गए हुए थे। यह पहली बार नहीं है। अक्सर वे टूर पर जाते हैं। बल्कि सच यही है कि आजकल उनका ज्यादातर वक्त शहर से बाहर ही बीतता है और यहां अपनी तन्हाइयों के साथ अकेली और उदास सुकृता थी। पर जब वे रहते हैं तब भी क्या अकेली नहीं रहती सुकृता? उनके साथ में सान्निध्य का सुख तो कब का कपूर की मानिंद उड़ चुका है। अब वे साथ होकर भी साथ हैं या उनका रिश्ता क्या है ये सब बातें विचार करने का यही वक्त है? वह सोच रही थी। पर बीता समय उसके आंचल का सिरा छोड़ने को तैयार ही नहीं हुआ। क्यों सोच रही है वह ये सब...  जो हुआ उसका जस्टिफिकेशन तो नहीं ढूंढ़ रही सुकृता?

इन आठ वर्षों के वैवाहिक जीवन में मन से मन के जुड़ने के मधुर क्षण कितने थे, अगर बहुत सोचने पर भी स्मृतियां साथ न दे तो इसे क्या समझे सुकृता? कैसी विचित्र है न स्त्री की नियति। खूंटे से बंधी गाय को खूंटा खोलकर एक दिन किसी और खूंटे से बांध दिया गया और वह तो वही है न... बदला क्या... महज खूंटा।  लेकिन कैसे विडम्बना से भरी हैं न वे परिस्थितियां जो एक शिक्षित विचारवान स्त्री को खूंटे से बंधी गाय में तब्दील कर देती हैं। फिर सुकृता की परिस्थितियां भी कहां अलग रहीं।  

न तब किसी को परवाह थी कि उसके मन में क्या है और न आज। उस पर गजब की कंडिशनिंग कि चलो अब प्रेम में पड़ जाओ उसी खूंटे के, जिससे बलात बांध दिया गया है 

तुम्हें। पिंजरे के प्रेम में पड़ी मैना कभी नहीं छोड़ पाती पिंजरा। कोई सुने न सुने वह पिंजरे के प्रेम में गाती है, गुनगुनाती है पर बदले में प्रेम के प्रतिध्वनित होने की थोड़ी-सी प्रत्याशा नहीं छोड़ पाती। फिर दिक्कत कहां है? कि एक दिन वह जान जाती है कि यह घर नहीं पिंजरा है कि प्रेम महज एक छलावा है, कि उसकी सार्थकता केवल उस चारदीवारी को घर बनाने तक सीमित है, कि इससे अधिक की आकांक्षा उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की विषयवस्तु है। सुकृता ने भी जान लिया था। टूट गया था छन्न से घर परिवार के नाम का भ्रम। चारदीवारी में छिपी पिंजरे की गुप्त सलाखें अब प्रतिबिम्बित होने लगी थीं।   

मां पढ़ लेती हैं उसका मन। उसकी आंखों के खालीपन से कसकता है उनका मन। उसके मन के रीतेपन के अहसास से दरकता है कुछ उनके भीतर पर वे भी तो कंडिशंड हैं उसे सिखाने को, हर मां की तरह बताने को, विश्वास दिलाने को कि कुछ भी तो विचित्र नहीं। कुछ भी नहीं। ऐसा ही होता है विवाहित स्त्री का प्रेम कि मन की हर कामना को बंद कर दो सीली कालकोठरी में। उसे धूप दिखाने की कोशिश भी मत करो, मत सुनो उसकी पुकार, मत लगाओ आवाज कि अब समस्त इंद्रियों से तुम्हें पिंजरे के ही गीत गाने हैं। उसने भी कालकोठरी में बंद कर दी अपनी हर कामना लेकिन पेटजाई नहीं बता पाई अपनी ही जननी को कि उस कोठरी के अनगिनत सुराखों को बंद नहीं कर पाई वह। चाहकर भी नहीं कि उनसे गाहे बगाहे झांकने लगता है उसका अतीत। नहीं भुला पाई उस चेहरे को जिसे देखकर पहली बार अहसास हुआ था कि सचमुच प्रेम होता है। वही प्रेम जिसकी परिणिति विछोह में हुई।  जो छूट गया था कहीं पीछे क्योंकि उसमें साहस ही नहीं था उसे एक कदम बढ़ा कर पा लेने का। कितनी अवश और दुर्बल हो गई थी वो उन क्षणों में।

स्त्री जाति की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि आंगन की तुलसी की तरह एक जगह से उखाड़कर रोंप दो नई मिट्टी में, वह वहां भी जड़ें जमाने में लग जाएगी।  शिकवों को पी जाएगी,  शिकायतों को उड़ा देगी फूंक में और मन की सलवटों को सहेजकर रख देगी किसी अंधेरी कोठरी में। उसने भी यही तो किया था। शुरुआती दो वर्ष में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। मन में बसी हर कामना को एक ही दिशा में मोड़ दिया था। सारे रास्ते बस सुजय तक पहुंचते थे। यूं शुरू में लगता था उसे कि उनके बीच प्रेम था किन्तु प्रेम का इकतरफा रंग सुकृता को समझ नहीं आता था। सुजय का अहम् उस पर इतना हावी था कि सुकृता के मन के द्वार तक कभी पहुंच ही नहीं पाया। उसकी एक दस्तक की प्रतीक्षा में सूखकर झर गये थे उसके मन की बगिया के पारिजात पर वह दस्तक उस तक कभी पहुंची ही नहीं।

उन्होंने प्रेम में केवल जीतना सीखा था और कोई सम्पत्ति या जीत की ट्रॉफी नहीं कि जीतकर सजा लिया जाए ड्राइंगरूम में इससे इत्तर स्त्री की जरूरत और प्रासंगिकता थी ही कहां सुजय के लिए। उनके प्यार में पड़ी सुकृता हर दिन उनके ही रंग में स्वयं को रंगती रही। शुरुआती प्रेम में बदलाव भी प्रेम का ही एक रूप होता है। और यह बदलाव स्त्री के पाले में कहीं अधिक जगह घेरता है। सुकृता के मामले में तो पूरा-पूरा उसी के हिस्से में आया। ये अनुकूलन वाला प्रेम है जहां न चाहने की कोई गुंजाइश है न प्रतिक्रिया की। विरोध की तो बिल्कुल भी नहीं अन्यथा पितृसत्ता की दो समानांतर सत्ताओं के मध्य पिस जाने के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि इसके लिए न वहां स्थान था और न यहां कभी होगा।

वो पहला भी साल था जब एक दिन मां की उपस्थिति में किसी बात पर जब वह क्रोधित हो उठे तो मां ने उसके हाथ को धीरे से दबा कर शांत रहने का इशारा किया और सुकृता चुप हो गयी। कभी-कभी वह उनके जिद्दी स्वाभाव से खीज उठती थी फिर भी कभी प्रतिकार से पहले कुछ था जो उसे रोक देता था। ऐसे क्षणों में अक्सर उसे अपने हाथ पर मां के हाथ का दबाव महसूस होता था और वह बुझे मन से समर्पण को चुन लेती, खामोशी की कोख में दुबककर ‘सुखद गृहस्थी’ के टैग को सहलाने लगती। प्रेम में मन से मन के बीच जुड़ने वाले सूक्ष्म तन्तु की तलाश सुकृता को अक्सर बेचैन करती। 

तीन बरस बीतते-बीतते मां की सवालिया निगाहें चिंतातुर होने लगीं। साल भर बीत चुका था जब गायनी के चक्कर लगाने के बाद मुश्किल से सुजय तैयार हुए थे इस टेस्ट के लिए। उनके वैवाहिक जीवन के चार बरस बीत चुके थे जब वो दिन आया जब दोनों शांत बैठे थे और सामने रखी थी लैब की रिपोर्ट जिस पर लिखे ‘निल’ शब्द ने जैसे सुकृता की सारी खुशियां सोंख ली थी। बच्चे की किलकारी अब उस घर में कभी नहीं गूंजेगी। 

अगले कई दिन घर में कब्रिस्तान जैसी खामोशी छाई रही। इस प्रकरण ने दोनों के बीच के तनाव को उन ऊंचाइयों पर ला छोड़ा था जहां केवल मूक समझौते की ही जगह बची थी। बच्चे की चाहत को सीने में छुपाये, सुकृता देखती रही सुजय की बढ़ती व्यस्तताएं और उससे दूरी। पास तो वे कभी थे ही नहीं और अब इतना दूर हो गये कि पति-पत्नी का सामान्य संबंध ही औपचारिकता बन गया।  

बच्चे के लिए उनकी उदासीनता, उनकी चुप्पी के आगे मूक समर्पण करती चली गई सुकृता कोई और चारा भी तो नहीं था, न तो वे बच्चे के लिए कोई और पहल करना चाहते थे और न ही बच्चा गोद लेने के पक्ष में थे। हद तो ये थी कि वे जरा से जिक्र मात्र से खीज उठते।  इस विषय पर बात तक नहीं करना चाहते थे। कहीं कोई ग्रंथि पाल बैठे थे कि ऐसा हर सवाल उन पर प्रश्नचिन्ह् है। कभी कहीं किसी कोने से ‘बांझ’ शब्द के बाण सुकृता पर बरसते तो सुजय आराम से किनारा कर लेते और उन बाणों के कटु विष को झेलते हुए वह बेहद अकेली पड़ जाती। कितनी अकेली पड़ती चली गई थी वह। 

सामाजिकता से कट कर रह गई थी। किसी से मिलने जुलने का मन नहीं होता था उसका। हर निगाह सवालिया लगने लगी थी, हर चेहरा जैसे इस तथ्य को आरोपित करता प्रतीत होता कि वह मां नहीं बन पाई।  

और सुजय... कितना बदल गये थे। उनकी प्रताड़ना, उनकी उपेक्षा, सुकृता को बार-बार नीचा दिखने की कुत्सित चाहत, क्या था वह सब। टूटकर रह गई थी सुकृता। उनकी हीनग्रन्थि का कारण क्या अकेले वही थी? वह प्रेम तो कहीं खो गया था जिसके सहारे वह यूं ही जीवन काट लेने का दम भरती थी। उनकी कड़वी बातों को, उनके तानों को भी पी लेती थी दवाई की तरह। एक दिन पाया, मुट्ठी भरी रहने का भ्रम था मात्र, रेत तो कहीं रिस गया था।  

जीवन में प्रगाढ़ प्रेम की उपस्थिति ही दाम्पत्य में मातृत्व के अभाव को भर सकती है। पर यहां तो ऐसा कुछ था ही नहीं। मातृत्व से वंचित रहने का अहसास उसे दिनोदिन खोखला बना रहा था। वह खुद को घर-नौकरी में व्यस्त रखने की भरसक कोशिश करती। पर कहीं कुछ कचोटता था। अपने अंश को अपनी गोद में देखने की कामना से मुक्त नहीं हो पा रही थी सुकृता। उसके लिए मातृत्व उसके स्त्रीत्व का विस्तार था जिसके अभाव में वह खुद को अधूरा महसूस करने लगी थी।  वह अपने अधूरेपन को कोई तर्क नहीं दे पाती थी और वह बेतरहा परेशान करता। उन रातों में भी जब वह बिस्तर पर करवटें बदलती रात काट देती।

ऐसे ही एक दिन अप्रत्याशित-सी मुलाकात हुई थी एक सेमिनार में पुरु से। मन के तार बरसों बाद उसकी एक झलक से झंकृत नहीं हो गए थे कैसे कहेगी सुकृता। बस अब वो पहले सी दबी, सकुचाई सुकृता नहीं है। विरोध की बयार जब-जब छूती है उसे कुछ और मुखर हो जाने को जी करता है उसका। मन का बंधन ही देह को बांधता है जो कहीं है ही नहीं। उसके कॉल आने शुरू हुए तो जैसे हरिया गए थे मन के सूखे 

पारिजात। उनकी ताजा महक से सुवासित हो गया था केवल मन ही नहीं, देह भी। अब फिर से कॉफी रोमांटिक लगने लगी थी। देर तक गुनगुनाने की आवाज आने लगी थी बाथरूम से। अपने लिये खूब खरीदारी करने लगी थी सुकृता कभी मन होता खूब सज संवरकर खड़ी हो जाए आइने के सामने। तब जैसे उसकी दृष्टि उसकी नहीं होती थी, किसी की नजरों से खुद को देखना कैसा सुखद अनुभव था। 

उसे लगा प्रेम कभी खत्म नहीं होता शायद कहीं किसी कोने में सुशुप्त होकर अपने पुनर्जीवित किए जाने की प्रतीक्षा करता है। उस पर नये का मुलम्मा न चढ़े तो जीवित हो भी उठता है। कुछ ऐसा ही हुआ सुकृता के साथ। मन के रिक्त स्थान में कहीं कोई जगह खाली ही रह गई थी शायद कि उसका सोया हुआ प्रेम सहज ही वहां आविष्ट हो स्थापित हो गया। सोचती है तो नैतिकता और सामाजिकता के दोहरे के दबाव से उसका दम घुटने लगता है।

इन बीते वर्षों का सफर इतना दुर्गम भी नहीं था कि तय न कर लिया जाए। उसे लगता हर वो काम करे जिसकी मनाही है। वह सब तो कभी नहीं किया। अब देर तक स्टडी में किताबें पढ़कर समय बिताती है। कभी मन हुआ तो छुट्टी के दिन देर तक सोती भी है।  कभी-कभी घड़ी की सुइयों पर से पांव हटा लेने का सुख अद्वितीय होता है। निषेध के साईनबोर्ड के ठीक आगे अनोखा थ्रिल है। अवर्चनीय सुख है। सुकृता से अधिक आज कौन जानता है। उसने जान लिया कि मन से इत्तर देह का भी एक मन होता है। कभी-कभी डरती है वह यह मन अपना हक मांग बैठा तो इन्कार कर पाएगी सुकृता? हर मुलाकात में समेटती है खुद को सुकृता और ये मन कैसा तो दुस्साहसी है, हठी है, निर्लज्ज है, ये सिर उठाता है, पुकारता है पर सुकृता अनसुना कर कुछ अधूरी-सी लौट आती है पर पूरा कहां लौट पाती है वह, कुछ है जो वहां छूट जाता है पुरु के पास और वह अधूरी-सी अपने पूरे होने की चाहत में प्रतीक्षा करती है अगली मुलाकात की।

आज जब से क्लिनिक से लौटी है यूं ही अनमनी सी लेटी है बिस्तर पर। डोरबेल बजी तो आहिस्ता से बिस्तर से उठी।  खुद का बोझ उठाये मुश्किल से दरवाजे तक पहुंची। धोबी प्रेस के कपड़े दे गया है। यूं बहुत बातूनी है वह पर सुकृता का उलझनों की सलवटों से बोझिल चेहरा, हावभाव और हुलिया देखकर कुछ सकपका गया था वह। कपड़े यूं ही टेबल पर रखकर वह 

सोफे पर आ बैठी। आज फिर सामने एक रिपोर्ट रखी थी जिस पर लिखे ‘पोजिटिव’ शब्द ने जड़ कर दिया है उसे। 

‘पोजिटिव’...हा दैव... इस एक शब्द को देखने के लिए सुकृता ने दिन-रात मन्नतें मांगी थी। कितने डॉक्टरों के बेतहाशा चक्कर लगाए थे। मां ने तो जाने कहां-कहां माथा टेका था और आज यही एक शब्द हथौड़े की भांति उसके मस्तिष्क में बज रहा था। उसके समूचे जिस्म को पत्ते की तरह हिल गया था वो तूफान जो आज पंद्रह दिन पहले आया था। 

सुजय इस बार तीन हफ्रते बाद लौटने वाले थे। फिर टूर एक्सटेंड हो गया। उस दिन कॉलेज में  देर हो गयी थी, उस पर निकलते ही एकाएक तेज आंधी तूफान घिर आया। मौसम का मिजाज बदलते देख सुकृता के कदम स्वतः ही पुरु के फ्लैट की ओर मुड गए। कॉलेज के नजदीक ही था उसका फ्रलैट। एक अपार्टमेंट की दूसरी मंजिल पर बना एक वन बेडरूम, हॉल-किचन सेट। 

पुरु घर पर ही था। कल बताया तो था उसने कि तबियत कुछ ठीक नहीं, आज भी दरवाजा खोला तो सुकृता को देखकर खुशी की एक आत्मीय लहर उसके चेहरे पर तैरने लगी पर उस लहर के साथ अपनी तबियत का अनमनापन छिपा नहीं पाया था वह। बाहर आंधी-तूफान थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। कुछ दूरी पर एक पेड़ उखड़ कर सड़क पर गिरने से रास्ता बंद था। बाहर अब भी तेज आंधी है।

‘‘कॉफी लोगी न सुकू?’’

‘‘हम्म--- पर तुम अभी लेटो बिस्तर पर। मैं बना लूंगी अपने लिए। तुम रेस्ट करो न।’’

‘‘अरे! इतना भी बीमार नहीं मैं। और अब तुम आ गई हो न। अब किसका जी चाहेगा बीमार पड़ने को। वैसे तुम जैसा तीमारदार हो तो सारी उम्र बीमार बने रह सकता हूं।’’ 

उसके मुंह पर हाथ रखते हुए, कृत्रिम क्रोध दिखाकर धीमे से मुस्कुराई सुकृता।

‘‘बस बस अब टिपिकल मजनूं वाली बातें न बनाओ। टेक रेस्ट। ओके!’’ 

पुरु को दो रोज से हाई बीपी था। मुंह हाथ धोकर सुकृता ने अपने लिए कॉफी बनाई साथ ही पुरु के लिए खिचड़ी बनाने रख दी। मूंग की दाल तो थी ही नहीं उसकी ‘बेचलर्स किचन’ में तो धुली दाल, चावल ही चढ़ा दिए कुकर में। उसका सामीप्य भाता है सुकृता को पर आज इस अप्रत्याशित एकांत में न जाने क्यों पर उसके सिरहाने बैठकर उसका माथा सहलाते हुए अजीब-सा डर समा रहा था उसके भीतर। पुरु की तबियत संभल चुकी थी पर कमरे के भीतर के अजीब से सन्नाटे में उस तूफानी रात का सन्नाटा घुल मिल गया था। रात जिदकर वह सामने सोफे पर ही लेट गयी थी। दिन भर की थकी, जागती आंखों में कब धीमे से नींद ने प्रवेश किया उसे ज्ञात नहीं। 

रात में आंख खुली तो उसे गला सूखता मालूम हुआ। उसने टेबल पर रखे जग से गिलास में पानी लिया और एक झटके में खाली कर दिया। उस एक गिलास पानी ने जैसे अपनी प्रकृति से विद्रोह कर दिया था। उसकी प्यास कम होने की बजाय बढ़ती महसूस हुई। रसोई में जाने से पहले वह सामने बेड पर सोये पुरु को चादर ओढ़ाने लगी।

‘‘सुकू मुझे जरूरत है तुम्हारी सुकू’’ आधी रात उसका हाथ थामकर आधी नींद, आधी जगाहट में बुदबुदाया था वह। उसकी अधमुंदी आंखों में झांका था सुकृता ने। उन आंखों में जाने कितने सवाल थे, कितने जवाब थे, कितना कुछ जो अनकहा रहा इन बरसों में जैसे उसकी ही इबारत पढ़ रही थी सुकृता। ये कैसी जरूरत थी जो पुरु ही नहीं सुकृता को भी खींचती थी। लौटना चाहती थी वह पर तूफान था कि बढ़ता ही जा रहा था। वह आहिस्ता से उसके माथे को सहलाने लगी। उसके स्पर्श ने पुरु को पूरी तरह जागृत कर दिया और उसे एक अजीब-सी बेचैनी से भर दिया था।

वह उसका हाथ थामे अब अधलेटा बैठा था। उसके बेहद करीब। उस छुअन में कुछ था जो पिघला रहा था सुकृता को। एक अनचीन्ही सी तपिश। कैसी तपिश कि घडे़ का पानी भी जिसके ताप के आगे बेअसर हो जाए। उसके मन को इस छुअन की पहचान थी पर उसकी देह उस तपिश के स्पर्श से अछूती थी। उस स्पर्श की आत्मीयता और आमंत्रण से तनिक घबरा गई थी। पर सच यही है कि उस आत्मीय प्रेमिल स्पर्श के लिए वह जन्म-जन्मान्तर से तड़प रही थी जिसकी पहुंच देह से ऊपर उसकी आत्मा तक थी। इन बीते आठ वर्षों में जाने कितनी बार उसकी देह ने संसर्ग का सुख भोगा था और आज उसने जाना उसका मन तो आज भी अक्षत, अक्षुण्ण और अछूता है। 

स्त्री के मन पर जिसका नाम लिखा हो उसकी देह उस स्पर्श को बहुत समय तक अजनबी नहीं मान पाती। नैतिकता के दबाव और प्रेम की पुकार के बीच झूल रही सुकृता पल-पल पिघलते हुए खुद पानी बन रही थी। जाने कब से उसके 

रेगिस्तान से तपते तन-मन के लिए जैसे कुछ भी निषिद्ध नहीं रह गया था उस पल। एक बारिश बाहर हो रही थी और एक उसके रेगिस्तान से सूखे तन-मन पर। एक पल को वह रुकी।  पुरु की बांहों से निकलकर वह बाहर जाना चाहती थी पर भीतर-बाहर तूफान बढ़ता ही गया और बढ़ते-बढ़ते सारे वेग टूट गये।  उसने हर बंधन तोड़ दिया। वह खुद भी टूटकर बिखर गई उस आलिंगन में। हर सीमा विलीन हो गई उस तूफान में। सही गलत की सीमा के परे उसे पता ही नहीं चला कब वह तूफान उस कमरे से होकर गुजर गया। 

सुबह पुरु के जागने से पहले ही सुकृता जा चुकी थी। ये कैसे हुआ, क्यों हो गया। उसे रास्ता बंद होने की भी परवाह नहीं थी। वह पैदल ही बदहवास दौड़ती चली गई। पूरे रास्ते उसे लग रहा था हर शख्स उसे सवालिया नजरों से घूर रहा है और तमाम आंखें जैसे चिपक रही थी उसके बदन पर यहां-वहां। काफी दूर चलने पर एक ऑटो दिखा तो उसने हाथ दिया और झट से सवार हो गई।  घर पहुंचकर, दौड़ती हुई वह बाथरूम में घुस गई और देर तक शावर के नीचे खड़ी रही। पानी शावर का था या अश्रुजल, पता लगाना मुश्किल था। कैसी विकट परिस्थिति थी। वह पुरु से प्रेम के रास्ते पर थी पर इस प्रकरण के लिए न मन से तैयार थी न देह से। आत्मग्लानि की पीड़ा उसे निगल रही थी। उसे पुरु से कोई शिकायत नहीं थी पर अपने पर अपने ही नियंत्रण के खोने की पीड़ा उसे पागल किये दे रही थी। पुरु के प्रेम पर उसका अधिकार था उसकी देह आज भी इसे अनाधिकार चेष्टा क्यों मान रही थी। दो दिन सुकृता तकिया भिगोती, बिना कुछ खाए-पिए बिस्तर पर पड़ी रही। पुरु का फोन भी नहीं उठाया। उसे आने से भी मना कर दिया कहकर कि उसे समय चाहिये।

तीसरे दिन कॉलेज से फोन आया तो उसे जाना पड़ा। खुद को घसीटते हुए किसी तरह कॉलेज पहुंची तो थोड़ी देर बाद सब भूल अपने काम में लग गयी और शाम को मां के पास जाने का मन हुआ पर उनसे नजर मिलाने की हिम्मत न हुई। इस बीच सुजय का फोन आया तो हां-हूं करके रख दिया। उसका मन पढ़ना सुजय ने कब सीखा था, वरना उसकी 

बेचैनी और आवाज की कम्पन क्या उनसे छुपी रहती।  

उस शाम जब बाहर निकली तो पुरु को कॉलेज के बाहर प्रतीक्षा करते पाया। दोनों चुपचाप चल रहे थे। कुछ देर साथ चले तो मन कुछ-कुछ सहज होने लगा था सुकृता का। यदि यह एक प्रकरण था तो इस समय तो इसे भूल जाना चाहती है सुकृता पर पुरु के लिए यह प्रकरण मात्र नहीं प्रेम की परिणिति है। इस प्रकरण और परिणिति के ठीक बीच उनका प्रेम है इसे नकार पाएगी सुकृता? किन्तु क्या सुकृता में है इतना साहस कि इस रास्ते पर पुरु के साथ आगे बढ़ सके? यदि यह प्रेम है इसके वैधता की ओर बढ़ने का साहस जुटाना होगा सुकृता को। 

मानसिक उलझनों ने इस कदर घेरा कि जब फौरी तौर पर कोई फैसला नहीं कर पाई तो उसे बॉय बोलकर घर लौट आई।

आज क्लिनिक से रिपोर्ट मिलने के बाद से सुकृता समझ नहीं पा रही थी कि क्या करें। पुरु को फोन करें? नहीं अभी नहीं। अभी उसे खुद तय करना है कि उसे क्या करना है। वैसे भी यह पुरु से अधिक उसकी समस्या है। तो सुजय को? नहीं उन्हें भी नहीं। उसे याद है वो दिन जब उसने बच्चा गोद लेने की बात की थी, सुजय ने न कह दिया था, दूसरी बार कहने पर जब न किया तो उनके भिंचे जबड़े देखकर सुकृता सहम-सी गयी थी। क्या सुजय को यह सब स्वीकार्य होगा, कभी नहीं। तो क्या इस विपत्ति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता वही है? 

‘ओह माय गॉड---!’   

अनायास ही सुकृता ने आहिस्ता से अपने उदर को छुआ तो एक अजीब से अहसास से भर गयी। उसके भीतर एक नया जीवन सांस लेगा कितना विचित्र है यह अहसास। हमेशा से वह यही तो चाहती थी और आज जब वो सपना सच हुआ तो मन कैसी ग्लानि से भर गया है। पुरु, उसका प्रेम, सुजय, उनका गुस्सा, भिंचा जबड़ा, मां की हथेली का दबाव, तूफानी रात, रिपोर्ट पर लिखा पॉजिटिव और टेबल पर रखी बच्चे की तस्वीर--- सब मानो आकृतियों की शक्ल ले उसके इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे--- तेज--- और तेज--- कमरे में आज फिर तूफान की आमद थी--- क्या ये तूफान उसकी जान लेकर ही शांत होगा। नहीं--- नहीं--- और सुकृता अचेत हो गयी। 

होश आया तो नजर के सामने टेबल पर रखी वही बच्चे की पेंटिंग थी जिसे देखकर ही सुकृता के दिन की शुरुआत होती थी। सुकृता का दिल आज कितने ही टुकड़ों में बंटा था और हर टुकड़े पर अंकित थे, उसका अधूरापन, लोगों के ताने, सुजय की अजनबी आखें, पुरु की प्रेमिल दृष्टि और पूर्णता का अनोखा-सा नयी दस्तक देता एक अहसास। अब सुकृता जीना चाहती थी, न सुजय के लिए, ना मां के लिए, न समाज के लिए, केवल अपने लिए और अपने उस नए अहसास के लिए।  इस अहसास के परे है हर ग्लानि--- परे है पाप और पुण्य की हर परिभाषा। वैध-अवैध के हर प्रश्न से परे यह अहसास कि उसका अंश उसके भीतर आकार ले रहा है। सब कुछ खोकर भी इसे पाने के रोमांचित अहसास से भरी है सुकृता।

रात की कालिमा ने सारे संसार को अपने आगोश में ले लिया था और 

पेंटिंग को सीने से लगाए जाने कब सुकृता भी नींद के आगोश में चली गयी पता ही नहीं चला। 

सुबह आंखें खुली तो सारी धुंध छट चुकी थी। कमरा सुबह के आलोक से जगमगा रहा था, धीमे  से उठकर पर्दा सरकाया तो सूरज हंसकर उसका स्वागत कर रहा था और अनगिनित रश्मियों ने उसे बांहों में समेटकर अपनी ऊष्मा से गरमा दिया। आज बहुत सारे काम करने थे...  मन-ही-मन सुकृता लिस्ट बना रही थी...  गायनो से अपॉइन्टमेंट, कैल्सियम, आयरन, फोलिक एसिड की टेबलेट्स, टॉनिक और...  उफ...  कितना कुछ करना था... । इन तमाम कामों के लिस्ट के पीछे उसकी  उलझन, उसकी ग्लानि और भविष्य के प्रति उसका शंकित मन सब एक एक कर कहीं पीछे छूट रहे थे। अकेले छूट जाने का डर भी। असीम शक्ति से भर उठी थी सुकृता। नहीं जानती थी वह कि इस तरह प्रेम के प्रमाण में बदलने पर पुरु की क्या प्रतिक्रिया होगी पर सुकृता को आज इसकी भी परवाह नहीं। जिस मां के लिए अनचाही गृहस्थी का बोझ ढोती आई है उनकी भी परवाह नहीं। सामने थी तो केवल और केवल उसकी अपनी खुशी जो उसकी प्रतीक्षा में थी और कानों में गूंज रहा थी ब्रह्मांड का सबसे मधुरतम स्वर में एक मीठी पुकार मां। इस एक पुकार के साथ वह पूरी दुनिया से टकराने का हौसला संजो चुकी थी। आज अपनी इस खुदगर्जी पर उसे तनिक भी ग्लानि नहीं। उसने फोन उठाकर एक पल सोचा और फिर पुरु का नंबर मिलाने लगी। 

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