अपूर्व जोशी

नशे की गर्त में देश

 

I use emotion for the many and reserve reason for the few 

By the skillful and sustained use of propaganda, one 
can make a people see even heaven as hell or an 
extremely wretched life as paradise.

 

                                                                                                                                              Adolf Hitler

 

धर्म और राष्ट्रवाद इन दिनों सबसे ज्यादा पसंदीदा नशा बन चुका है। नशा चाहे कोई भी क्यों न हो, नुकसानदेह ही है। अमीर बनने का नशा आदमी को अमानुष बना देता है, उसे हर वह काम करने का हौसला देता है जो कानून की नजर में अपराध कहलाता है। सेक्स का नशा अच्छे-अच्छे को पगला देता है। इतना संवेदनहीन कर देता है कि भगवान का दर्जा पाया भी, इसकी चाह चलते शैतान में बदल जाता है। सफलता का नशा, चाहे वह किसी भी विधा में सफलता की चाह लिए हो, उसे पाने की लालसा हर प्रकार के समझौते, मौकापरस्ती, लंपटई, दगाबाजी आदि का कारण बन जाता है। ड्रग्स का नशा, तबांकूू का नशा, शराब का नशा स्वास्थ्य के लिए जहर होने के बावजूद जमकर सेवन किया जाता है। नाना प्रकार के नशों में, मैं समझता हूं धर्म नंबर वन तो राष्ट्रवाद नंबर दो पर है। इन दिनों ‘नशा गीतमाला’ में यही दो पहले पायदान पर हैं। पूरा मुल्क इनकी चपेट में आकर मदहोश है। इतना मदहोश कि गर्त में जा रहे देश की दशा और दिशा पर कुछ सार्थक बहस, कोई जनआंदोलन, कुछ प्रतिरोध आदि तो दूर, उस पर विरोधी स्वर सुनना तक गवारा नहीं। जो मुट्ठी भर ऐसा करने का दुस्साहस कर भी रहे हैं, उन्हें देशद्रोही, हिंदूद्रोही आदि अलंकरणों से नवाज, उनकी बोलती बंद कर दी जा रही है। इन दोनों नशों का व्यापक, विस्तार, प्रचार और प्रसार बहुत सुनियोजित तरीके से किया गया शुरुआत आजादी के बाद या फिर कह सकते हैं, आजादी पूर्व ही हो चुकी थी, परवान लेकिन नब्बे के दशक में चढ़नी शुरू हुई। मुजफ्फर रजमी साहब का एक शेर है-

‘‘ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने 

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई’’

 

आजादी के दिनों में ही, हिन्दू और मुसलमान नाम की दो कौमों के बीच नफरत के बीज रोपने का काम, दोनों ही धर्मों के कुछ कथित ठेकेदारों ने शुरू कर दिया था। मैं आजादी की लड़ाई को अपना प्रस्थान बिंदु बना रहा हूं, हालांकि धर्म का बीज इससे खासा पहले बोया जा चुका था। आजादी चूंकि नए भारत के निर्माण की आस लिए थी, इसलिए दोनों कौमों के नुमाइंदेे एकजुट हो अंग्रेज हुकूमत से टकरा रहे थे। उन्हीं दिनों आज के हमारे हुक्मरानों के हीरो विनायक दामोदर सावरकर ने ‘टू नेशन थ्यौरी’ की नींव रखी। हालांकि सावरकर से पहले कांग्रेसी नेता लाला लाजपत राय भी 1924 के आस-पास पंजाब को दो टुकड़ों में बांटने, एक हिन्दू तो दूसरा मुस्लिम बाहुल्य बनाने की बात कह चुके थे। सावरकर ने इसे एक सिद्धांत के तौर पर पेश किया। बहरहाल, सावरकर ने पहले बोये जा चुके बीज को अच्छी खाद दी तो आगे चलकर जिन्ना ने उसे समय पर पानी देकर सींच डाला। बंटवारा हुआ। लाखों की जान गई, आबरू गई, जमीन-जायजाद गई, नहीं गया तो बंटवारे का बीज, वह ज्यादा मजबूती से अपनी जड़े जमाता चला गया। मानवता का क्षरण इसके विस्तार के साथ विकराल हो चला। आज जो कुछ हमारे देश में हो रहा है, उसके मूल में यही बीज है। देश विशाल है, जबरन बना, परिस्थितियों वश बना देश है, विविधता में इसलिए एकता कम, अनेकता ज्यादा है। इतिहास, सत्तर बरस का बहुत अधिक पुराना नहीं लेकिन इतना कम भी नहीं कि चंद लफ्रजों में समेट लिया जाये। कौमी दंगे, भाषा पर विवाद, गौवंश का विवाद, जाति का विवाद, इतना कुछ है कि पढ़ते, समझते माथा भन्ना जाए। हां लेकिन कुछेक को चिन्ह्ति कर अपनी बात आगे बढ़ाई जा सकती है। तो हिंदू-मुस्लिम दंगों की लंबी दास्तान, अलगाववाद, हिंदी विरोध के स्वर आदि को लांघते हुए सीधे पहुंचा जाए राजीव काल में जब लम्हों से ऐसी खता हुई कि आज धर्म और राष्ट्रवाद एक नशा बन बहुसंख्यक नस्ल की नसों में ऐसा दौड़ रहा है कि उनकी चपेट में वे भी शुमार हो गए हैं जिनसे अपेक्षा ज्ञान की, तर्क की, निष्पक्षता की और कुछ हद तक तठस्था होती राजीव गांधी एक तरफ तो देश को सूचना क्रांति के मार्ग में डाल रहे थे तो दूसरी तरफ अपनी पार्टी में मौजूद कुछ एय्यारो एय्यारो की एÕयारी में फंस शाहबानों प्रकरण में गलत फैसला ले बैठे। ऐतिहासिक भूल कर बैठे। नतीजा अयोध्या में राममंदिर के ताले खोले जाने की भूल, फिर 1992 में विवादित परिसर बाबरी मस्जिद् को तोड़ा जाना, हिंदुत्व का उभार आदि रहा जिसने 21वीं सदी के भारत को अपने पड़ोसी मुल्क चीन के सामने बौना बना डाला। इस अंक में अपने स्तंभ ‘कुरुक्षेत्र’ में विनोद अग्निहोत्री ने चीन की प्रगति और भारत की विफलता का बहुत सटीक विश्लेषण किया है, जो मेरी बात को बल देता है। 

बहरहाल, बात धर्म की, राष्ट्रवाद की कर रहा हूं। मेरी दृष्टि में ये सबसे भयंकर किस्म के नशे हैं। इसको समझने के लिए हम चाहे तो रामायण-महाभारत काल में जा सकते हैं या फिर नजदीकी इतिहास में जाकर। तो चलिये हिटलर की बात करें। हिटलर ने राष्ट्रवाद के नाम पर जो कुछ किया वह ताजा इतिहास है। हिटलर शब्द रूह कंपा देने के लिए पर्याप्त है। हिटलर शब्द से सीधे आ जुड़ती हैं अत्याचार की वह असंख्य कहानियां जिनको गढ़ कर हिटलर जर्मनी को विश्व का सिरमौर बनाना चाहता था। वह जब राष्ट्र की बात करता तो उसके मूल में ‘संस्कृति’ और ‘नस्ल’ मुख्य होती थी। उसका स्पष्ट मानना था कि जर्मनी की पवित्र नस्ल को बचाना ही राष्ट्रवाद है। अपनी आत्मकथा ‘मीन कैम्फ’ में हिटलर लिखता है।

"Even if all the outstanding and visible differences between the various peoples could be bridged over and finally wiped out by use of a common language, that would produce a bastardization which in this case would not signify germination but the annihilation the Germane element." 

स्पष्ट है हिटलर जर्मन राष्ट्रवाद को उभारने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था। आज हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है। ‘हिंदू श्रेष्ठ है’ को सुनियोजित तरीके से फैलाया जा चुका है। ‘हिंदू संस्कृति’ का महिमामड़न की चारों तरफ है। चारों तरफ एक अन्य किस्म का हाहाकार भी हैं जिसे नजरअंदाज करने, जिसको दबाने की नीयत से ‘श्रेष्ठता बोध’ को उभारा जा रहा है। यह हाहाकार नौकरियों के छीन जाने का, आर्थिक मंदी का, बेरोजगारी का, भूख का, भय का है, जिसे राष्ट्रवाद और धर्म के नाम पर रोका जा रहा है। कितनी बड़ी त्रासदी है कि इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर कहीं कोई सार्थक बहस होती नजर नहीं आ रही। कहीं किसी जनआंदोलन की सुगबुगाहट तक नहीं है। जम्मू कश्मीर में वर्तमान सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। फैसला कश्मीर की अवाम को भारत संग जोड़ने में सफल होगा या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है लेकिन वहां की जनता के मूलभूत, संविधान प्रदत्त अधिकार खतरें में हैं, वहां का संपर्क बाकी देश से टूट चुका है, संचार व्यवस्था ठप्प है, न्यायपालिका तक पहुंच मुमकिन नहीं है यानी इतना सबकुछ हो रहा है किंतु भारत मुग्ध है कि मोदी सरकार ने वह कर दिखाया जो 70 बरस में कोई न कर सका। बगैर इतिहास को पढ़े समझे जवाहरलाल नेहरू को कोसा जाना एक फैशन बन चुका है। जो थोड़ा बहुत बोलने का साहस करता भी है, उस पर राष्ट्रद्रोही होने का टैग तत्काल थोपने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। समझने की जरूरत है कि क्यों कर और कैसे हर छोटी-बड़ी घटना को राष्ट्रवाद या हिंदुत्व संग जोड़ा जा रहा है। चंद्रयान का उदाहरण ले लें। पूरे देश में इतना जश्न का माहौल था कि मानो इससे पहले कभी स्पेस रिसर्च के नाम पर कुछ हुआ ही न हो। 2009 में इसरो के चंद्रयान-1 ने चंद्रमा में पानी खोज निकाला था। इसकी पुष्टि अमेरिका स्पेस रिसर्च संस्था ‘नासा’ ने की थी। इसरो ने ही धरती की सतह से ऊपर स्ट्रेटोस्फीयर में बैक्टीरिया की तीन प्रजातियों को खोजा है। यह बैक्टीरिया अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन से भी समाप्त नहीं होते हैं। 

15 अगस्त, 1969 में बने इसरो के इतिहास में एक से बढ़ कर एक सफलताएं तो कुछ बड़ी असफलताएं भी दर्ज हैं। लेकिन माहौल ऐसा रचा जा रहा है कि मानो सब कुछ मोदी जी के सत्ता में आने के बाद हो रहा है। अमेरिका के टैक्सास राज्य के ह्नाूस्टन शहर में हुए ‘हाउडी मोदी’ के बाद तो भारत मानो विश्व शक्ति बन चुका हो, ऐसा बताया, समझाया जा रहा है। भारत की ताकत को समझने के लिए भारत की प्रधानमंत्री रही इंदिरा गांधी और अमेरिका राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की बाबत जानकारी जरूरी है। सबसे ताकतवर देश का राष्ट्रपति तीसरी दुनिया के एक देश की महिला प्रधानमंत्री से दबता था। 1971 में जब भारतीय सेना की मदद से बांग्लादेश का गठन हुआ और पाकिस्तान बंट गया तक क्रोधित निम्सन के शब्द थे। 

"She Suckered us, Suckered us" कुछ अर्सा पहले ही अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी पर राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तान के दो टुकड़े न होने देने की बात कही थी। इंदिरा गांधी ने ठीक इसका उलट कर दिखाया। आज का भारत लेकिन अज्ञानता के सागर में हिलोरे लेता यह मान रहा कि पहली बार भारत की शक्ति का विश्व में सम्मान हो रहा है। सब कुछ परसेप्शन से हवाले है। पूरा देश इस समय परसेेप्शन की चपेट में आ चुका है। राजकपूर को ‘ग्रेट शो मैन’ ऑफ बॉलीवुड कहा जाता था। मोदी को ‘ग्रेटस्ट शो मेन’ कहा जाना उचित रहेगा। वे अपनी वयोवृद्ध मां से सामान्य भेंट को भी इवेन्ट बनाने की कला में पारंगत हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे पहले के हमारे प्रधानमंत्री मानो अपनी मां का सम्मान ही नहीं करते थे। बहरहाल, बांग्लादेश बना, लाख के करीब पाक सैनिकों ने भारतीय फौज के आगे सरेडंर किया, हमारी सेना लाहौर के करीब तक जा पहुंची, इसरो, एम्स, आईआईटी, आईआईएम, हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति औद्योगिक क्रांति, सब कुछ सत्तर सालों में भले ही हुआ हो लेकिन राष्ट्रवाद का सिक्का ऐसा चला है कि सारा क्रेडिट मोदी का और डेबिट नेहरू-गांधी के खाते में। 

स्मरण रहे पूरे 35 बरस जवाहरलाल इस मुल्क के हीरो रहे। परसेेप्शन के जरिए नहीं बल्कि अपने कठोर श्रम, देशभक्ति, स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान के चलते 19 साल अंग्रेजों की कैद में रहे व्यक्ति की देशभक्ति और उसके द्वारा लिए गए निर्णयों पर जो वर्तमान में अपनी राजनीतिक गोटियां खेल रहे हैं, उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि कंगाल खजाने के साथ सत्ता पाए नेहरू ने अपने दूरदर्शी सोच से एक मजबूत भारत की नींव रखी। ऐसी नींव जो तमाम प्रकार के झंझावतों का सामना कर पाने में सफल सिद्ध हुई। कश्मीर मुद्दे पर नेहरू को लताड़ने वाले भूल जाते हैं कि आज गोवा यदि भारत का अभिन्न हिस्सा है तो इसके पीछे नेहरू की सफल कूटनीति ही है। नेहरू की सबसे बड़ी सफलता उनके सत्ररह बरस के प्रधानमंत्री काल में देश में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अनेकता में एकता और सामाजिक समरसता का रहना है। निश्चित ही नेहरू ने बतौर प्रधानमंत्री कई गलतियां भी की। चीन को विश्वसनीय साथी मानना उनकी एक बड़ी भूल थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई समिति का सदस्य बनने का अमेरिकी प्रस्ताव स्वीकार न कर एक ऐसी भूल की जिसका खामियाजा आज तक भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा काउंसिल का स्थाई सदस्य न बन पाना है। 1962 के युद्ध में हार का सदमा नेहरू झेल न सके तो इसके पीछे बहुत संभव है कि उनका चीन पर भरोसा करने का पश्चाताप रहा हो। लेकिन यह सभी गलतियां पटेल से भी हो सकती थी, यदि वे प्रधानमंत्री बनते। जब निर्णय लिया जाएगा तभी गलत या सही की विवेचना हो सकती है। हर निर्णय सही ही हो ऐसा संभव नहीं।

सबसे ज्यादा त्रासद स्थिति हमारे मुल्क के बुद्धिजीवी वर्ग की है। जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे अंधेरे में मशाल का काम करेंगे, वे स्वयं इस राष्ट्रवाद और धर्म के नशे में डूबे नजर आ रहे हैं। आश्चर्य होता है मुझे उन वरिष्ठ साहित्यकारों की समझ पर जो मानवीय सरोकारों को तज कर इन दिनों घनघोर राष्ट्रवाद का प्रलाप करने जुटे हैं। बहरहाल धर्म और राष्ट्रवाद के नशे ने हमें कितना अमानुष बना डाला है, समझने के लिए फिल्म कलाकार जावेद जाफरी की एक कविता बहुत मौजूं है जो पूरी स्थिति को सरल शब्दों में बयां कर देती है-

‘‘नफरतों का असर देखो, जानवरों का बंटवारा हो गया

गाय हिंदू और बकरा मुसलमान हो गया 

ये पेड़ ये पत्ते ये शाखें भी परेशान हो जाएं 

अगर परिंदे भी हिंदू और मुसलमान हो जाएं

सूखे मेवे भी ये देखकर परेशान हो गए 

न जाने कब नारियल हिंदू और खजूर मुसलमान हो गए

जिस तरह से धर्म रंगों को भी बांटते जा रहे हैं 

कि हरा मुसलमान और लाल हिंदुओं का रंग है

तो वो दिन भी दूर नहीं जब सारी की सारी हरी सब्जियां 

मुसलमानों की हो जाएंगी 

और हिंदुओं के हिस्से बस गाजर और टमाटर ही आएगा

अब समझ नहीं आ रहा कि तरबूज किसके हिस्से जाएगा

ये तो बेचारा ऊपर से मुसलमान 

और अंदर से हिंदू रह जाएगा।’’ 

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