नवनीत मिश्र

मेरी जैसियां

 

जब से यहां लाई गई हूं तब से यही एक लाइन मन में चल रही है। वैसे काम तो मैेंने फांसी पाने लायक ही किया था। पुराना समय होता तो अब तक इस धरती से मेरा नामोनिशां मिट चुका होता लेकिन फांसी अब दी ही कहां जाती है, लिहाजा उम्रकैद ही अब मेरा नसीब है। वैसे ये बात मैंने कोर्ट में जज साहब से भी कही थी और किसी के भी सामने कह सकती हूं कि मुझे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। जब बच निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं तब छोटी और निरीह-सी दीख पड़ती बिल्ली भी बहुत खूंखावार हो जाती है। रास्ता रोकने वाले का सीधे गला पकड़ लेती है। यों मेरे सारे रास्ते एक बार पहले भी बंद किए गए थे, लेकिन तब एक खुला रास्ता दीख गया-सा लगा था लेकिन इस बार तो सब तरफ से घिर जाने के बाद मेरे सामने और कोई उपाय ही नहीं रह गया था। 

अब तो लगता है कि बाहर के कैदखाने से यह कैदखाना तमाम दिक्कतों के बावजूद कहीं ज्यादा सुकून देने वाला है। अब हुआ करे बाहर की चलती-फिरती, भागती-दौड़ती उल्लास मनाती जिंदगी मुझे उससे क्या, यहां तो जिंदगी दस बाई दस के कमरे में सिमट गई है जो जैसी भी है ठीक ही है। जो बाहर आजाद घूम सकता है वह जान ही नहीं सकता कि बाहर जाने पर लगी बंदिश कितनी बड़ी और अंदर तक तोड़ देने वाली होती है। अपने मन से कोई कहीं भी अकेला बैठा रहे, दिनोंदिन बाहर न निकले लेकिन वहीं जब बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी जाती है तब उस अकेले होने के मायने ही बदल जाते हैं। वही एक छत और वही चार दीवारें जिनसे चाहे बातें कर लो या टकराकर अपना सिर फोड़ लो--- बेटी की बहुत याद आती है। कोई किसी को हर पल कैसे याद कर सकता है यह बात उससे अलग होने के बाद समझ में आई। जिस दिन सजा सुनाई जानी थी मेरी प्रार्थना पर उसे कोर्ट-रूम में लाया गया था, तभी आखिरी बार उसे देखा था। यहां मुझसे मिलवाने उसे कौन लाएगा। छह साल की बच्ची काफी कुछ समझने लगती है। लड़कियां तो वैसे भी बहुत जल्दी सब कुछ समझने लगती हैं। मुझे ले जाए जाते समय वह मुझसे लिपट गई। मुझे जाने से रोक लेने की कोशिश करती उसकी बाहों का कसाव मुझे अपनी कमर पर अब भी महसूस होता रहता हैं। उसका हिचकियां ले-लेकर रोना नहीं भूलता। पता नहीं क्या सोचती होगी मेरे बारे में? मैं उसको बताना चाहती थी कि मैं औरत होने की सजा भोगने जा रही हूं। अभी वह बच्ची क्या जानती होगी कि औरत होना क्या होता है। मेरी जैसी औरतों के बच्चों की देख-भाल का इंतजाम सरकार करती है लेकिन सरकार थपकी देती मां की हथेली तो नहीं बन सकती। मन में विचार घूमता रहता है कि पता नहीं कहां होगी, क्या कर रही होगी। कभी-कभी इस अकेलेपन से घबरा जाती हूं तो बेटी का ख्याल, उस घबराहट को मथ डालने वाली छटपटाहट में बदल देता है। सोचती हूं कि बाहर खुले घूम रहे बाघों की दुनिया में अकेली छूट गई अपनी हिरनी-सी बेटी की चिंता में अब तक तो मुझे पागल हो जाना चाहिए था लेकिन बहुत सारी चीजों की तरह पागल हो जाना भी अपने हाथ में कहां होता है। 

---मुझसे यहां इस परदेस में मिलने भला कौन आएगा? हां, कभी-कभी ऐसा जरूर होता है दूसरी सेलों में बंद औरतें अपनी मिलनी के बाद लौटते हुए मेरे सेल के सामने ठिठक-सी जाती हैं। मुझे देखकर उनके चेहरों पर हैरानी-सी आ जाती हैं। उनमें से एक ने तो एक दिन अपनी टूटी-फूटी भाषा में चलते-चलते पूछ भी लिया, ‘आप जैसी औरत यहां कैसे?’ मैं कुछ जवाब देती तब तक वार्डन उसे लेकर आगे बढ़ चुकी थी। मेरी जैसी? उसे ‘मेरी जैसी’ को लेकर इतना आश्चर्य क्यों हुआ? ‘मेरी जैसियां’ ही तो यहां लाई जाती हैं। पूछने वाली की आंखों में उतरी चमक से मैंने अनुमान लगाया कि मेरी जैसी से उसका मतलब शायद रहा होगा, मेरी जैसी सुंदर औरत। उसे क्या बताती कि औरत, सुंदर या कुरूप होने से भी पहले सिर्फ एक देह होती है, सुंदर होना उसकी देह के होने को और बड़ा भर कर देता है, बस। 

मुझे अपनी कहानी सुनाने में अब कोई शर्म नहीं है। तन-मन सब कुछ, अब तो याद भी नहीं जाने कितनी बार कितनों के सामने उघारा हो चुका है। अब छिपाने को मेरे पास कुछ बचा ही कहां है। मैंने अट्ठाईस बरस की उम्र में इतनी तरह से और इतनी सारी दुनिया देख ली है कि अब मुझमें झिझक जैसी कोई चीज बाकी ही नहीं रह गई है। अब तो बनावटी शर्म मेरा दमकता हुआ जेवर है और मौका पड़ने पर मुंहफट होना मेरा सबसे कारगर हथियार। ये सच है, मैं वाकई असाधारण रूप से सुंदर हूं। मैं अगर निर्लज्ज न बना दी गई होती तो यह सुंदरता कई गुना ज्यादा मोहने वाली बन जाती या रहा भी होगा तो बहुत अन्दर कहीं सोता हुआ-सा रहा होगा लेकिन जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई मुझे अपने ही ऊपर रीझे रहने की आदत-सी होती गई।  

 मैं खूब जानती हूं कि आमंत्रण-सा देती मेरे शरीर की सुगठित और सुडौल उठान, बित्ते भर की कमर, पानी की लकीरों वाली मेरी फांकदार आंखें, रसभरे होठ, गालों को बराबर दिक करती रहती घूंघर वाली लटें और इन सबसे ऊपर, ऊपरी होठ की दाहिनी ओर बैठा छोटा-सा तिल मर्दों को पागल बना देता है। एक औरत अपने रूप का बखान इस तरह से करे तो आपको अजीब-सा लगता होगा, है न? अब लगे तो लगे, मुझे तो कुछ अजीब नहीं लगता क्योंकि पिछले तीन-चार साल से यह सुंदरता ही तो मेरी पूंजी रही है। एक बात आपको और बताऊं, सुंदर औरत खूब जानती है कि वह सुंदर है बस, वह अपने मुंह से कहती नहीं है क्याेंकि उसे यह बात दूसरों से सुनने का हर समय इंतजार रहता है। हर सुंदर औरत के मन में अपने सुंदर होने का गुरूर भी कम नहीं होता। जो कहती हैं कि उन्हें अपनी सुंदरता का कोई गुमान नहीं है वो सब पहले दर्जे की झुट्ठी हैं। जब आप मेरी कहानी सुनेंगे तो जान जाएंगे कि ‘मेरी जैसियों’ के लिए अपनी सुंदरता का बखान करना ऐसा ही है जैसे कोई दूकानदार, बेचने के लिए ग्राहक के सामने अपने माल की खूबियां गिनाए। मर्दों के सामने मेरी सुंदरता का बखान बगैर मेरे एक भी शब्द बोले, खुद मेरी देह और मेरे हाव-भाव बखूबी करते रहे हैं। 

खैर! छोडि़ए--- आपको शुरू से बताती हूं। मेरी शादी जब बालेश्वर से हुई तो मां ने घर से विदा करते समय कहा था, ‘इतना भरा-पूरा परिवार बड़े भाग्य से मिलता है। ससुर, उनके तीन छोटे भाई, पांच जेठ, और एक देवर। सुना है सबका खाना एक ही रसोई में बनता है और सब लोग एक साथ बैठकर खाते हैं--- देखो, सबको साथ लेकर चलना, मिल-जुलकर रहना, कोई ऐसा काम मत करना कि कल को मुझे और तुम्हारे बापू को सुनना पड़े कि गरीब घर की लड़की लाने का यही अंजाम होता है।’ मैंने भी मां की बात अपनी नई निकोर साड़ी के पल्लू में गठिया ली और विदा होकर उस कस्बे से इस शहर में आ गई।

मैं जिस घर में ब्याह कर आई वह भयावह रूप से सिर्फ पुरुषों का परिवार था। औरतें घर की मालकिन बुलाई जाती थीं लेकिन उनकी मिल्कियत सिर्फ चौके और बिस्तर तक सीमित थी। उनको पुरुषों के किसी भी मामले में बोलने का कोई अधिकार नहीं था। टूटी हुई चप्पल जुड़वाने जैसे कामों के लिए भी औरतों को अपने पति के सामने किसी भीख मांगे की तरह दांत चियारकर पैसा मांगना पड़ता था। मैं अपने आस-पास उन औरतों को देखती तो मेरा दम घुटता। पैसे की कमी तो मैंने भी बहुत देखी थी, मेरे पिता तो उस घर के लोगों की तुलना में गरीब ही कहे जाएंगे लेकिन ऐसा घर या ऐसा वातावरण कभी देखा नहीं था। दाल में जरा सा नमक ज्यादा हो जाने पर पूरी की पूरी भरी थाली फेंक देने का तेहा दिखाने वाले पुरुषों के बीच मेरे पति किसी अलग ही संसार के आदमी लगते। एकदम शांत, बहुत कम-कम बोलने वाले और मेरे होने का पूरा सम्मान करने वाले। मैंने और उन्होंने तय किया था कि वह उस परिवार, उस वातावरण और उस शहर से कहीं दूर बाहर नौकरी खोजेंगे। उन्होंने इसके लिए कोशिशें भी शुरू कर दी थी, लेकिन--- मेरे पिता एक प्रावेट कंपनी में मामूली क्लर्क थे। मैं अपनी चार बहनों में सबसे छोटी थी। मेरे पिता की एक लड़का पाने की लालसा पूरी तो जरूर हुई लेकिन एक के बाद एक चार-चार लड़कियों के हर साल गिरते मलवे के नीचे दब चुकने के बाद। लड़कियों को तो दूसरे घर जाना है के परायेपन के भाव के साथ हम बहनें पलती रहीं। सब तरफ से खुरच-खुरचकर जो पैसा जुड़ पाता वह सब भाई की पढ़ाई में ही खर्च हो जाता। मेरे पिता का सांस लेना मुहाल हो गया था लेकिन इस सन्तोष की प्राण-वायु उन्हें जिलाए रखती कि उन्होंने अपने बेटे को ठीक-ठाक शिक्षा दे दी है। हममें से तीन बहनाेें की पढ़ाई आठवें-नौवें दर्जे से ज्यादा नहीं हो पाई क्योंकि भाई की पढ़ाई शुरू हो जाने के बाद चारों बहनों की पढ़ाई बंद कर दी गई। मेरी अपनी पढ़ाई सामान्य अक्षर-ज्ञान से ज्यादा नहीं हो पाई। वह तो बाद में ससुराल आने पर बालेश्वर ने मुझे थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना, अपना दस्तखत बनाना सिखाया। रिश्ते के एक मामा थे जिन्होंने लड़के वालों के पास मेरे रूप का बखान किया था। मेरे पिता के आय के सारे सोते सूख चुके थे। भाई ने शादी के बाद दूसरे शहर में तबादला करवाकर अपनी बीवी के साथ सालियों और सरहजों के मनभावन संसार में अपनी सुखों से भरी दुनिया बसा ली थी। मैं कहूं तो आप मानेगे नहीं लेकिन सच है कि विवाह की कठिन परीक्षा मैंने अपने रूप-रंग की बदौलत ही पास की थी। जो मुझे अपने साथ ले जाने वाले थे वही परीक्षक थे, मुझे तो पास होना ही था। अपने ब्याह के बाद मैं इस बात को मान गई कि जोडि़यां सचमुच आसमान में ही बनती हैं। 

मेरे पति एक बहुत बड़ी फैक्ट्री में इंजीनियर थे। शादी के चार बरस किस तरफ उड़ गए ठीक से देख ही नहीं पाई। मैं अपने पति को बूंद-बूंद सींचकर तृप्त रखती थी इसलिए वह बहुत खुश रहते थे और उनका अपने काम में बहुत जी लगता था। उन पर काम करने की तो जैसे धुन सवार रहती था। रात का कोई भी समय हो कभी किसी मशीन में कोई खराबी आ जाती तो सूचना मिलते ही वह सब कुछ छोड़-छाड़कर तुरन्त फैक्ट्री रवाना हो जाते। उस समय उनको कोई नहीं रोक सकता था, मैं भी नहीं। कभी-कभी तो सारी-सारी रात मशीन ठीक करने में ही जूझे रहते। मैं समझती हूं कि जब तक मशीन ठीक नहीं हो जाती होगी उन्हें घर आने का ख्याल भी नहीं आता होगा। रातभर की जागी लाल-लाल डोरों वाली आंखें लिए बालेश्वर जब सवेरे घर लौटते तो मैं उमग उठती क्योंकि उनके लिए नींद की गोली बनने और उन्हें अपने सीने में भींचकर सुलाते हुए उनकी थकान हरने में मुझे बहुत सुख मिलता। टिकुली पैदा हो चुकी थी जो दो बरस की थी। एक रात बालेश्वर को घर लौटने में बहुत देर हो रही थी। काफी देर इंतजार करने के बाद मैंने बुदबुदाते हुए अपने आप से कहा, ‘‘फंस गए होंगे किसी मशीन में।’’ जब भी उस रात का अपना कहा याद करती हूं तो अपने आप को कोसती हूं। कैसी काली जबान थी मेरी कि--- हुआ यह था कि एक मशीन में कुछ ऐसी दिक्कत पैदा हो गई थी जो सामान्य टेक्नीशियन के बस की नहीं थी। मशीन को ठीक करने के लिए उन्होंने ‘शट-डाउन’ लिया था। जब वह मशीन के बड़े से पहिये के भीतर घुसे हुए मरम्मत कर रहे थे तभी जाने कैसे, शायद किसी की गलती से या जो भी रहा हो, अचानक मशीन तेजी से चल पड़ी। पहिये के घूमना शुरू करते ही बालेश्वर ने कूद कर अपने को बचाने की कोशिश में बाहर की ओर छलांग लगाई लेकिन छलांग छोटी रह गई। मशीनों और बाहर की सुरक्षित जमीन के बीच का फासला बहुत ज्यादा था। चक्के पर तेजी से दौड़ना शुरू कर चुके चौड़े पट्टे ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया और बाहर निकलने ही नहीं दिया। मशीन जब तक रूके-रूके, सड़ाक! सड़ाक! की आवाज के साथ पट्टा जहां तक फेंक सकता था उसने उनके खून, मांस और हड्डियों के टुकड़े पूरे हॉल में बिखेर दिए। बालेश्वर का एक पैर ही समूचा बाहर निकल सका क्योंकि वह छलांग लगाते समय उनके शरीर से कटकर बाहर आ गिरा था। अगले दिन सवेरे एक पोटली में समेटकर उनका दाहिना पैर ही समूचा घर लौटा था जो इसलिए पहचान में आ रहा था क्योंकि ‘नाइक’ का सफेद जूता तब भी उस पर कसा हुआ था। बालेश्वर ने वह जूता एक हफ्रते पहले ही बड़े चाव से खरीदा था कि फैक्ट्री में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने के लिए तेज चलने में आसानी होती है। 

घर से खाली हाथ आने से मुझे घर में दोयम दर्जे का बना रखा था, लेकिन बालेश्वर मेरे सामने ढाल बनकर खड़े रहते थे। उस दुर्घटना से मेरी जिंदगी में एकाएक बिल्कुल अंधेरा छा गया। मेरे ऊपर डायन, मनहूस और पति को खा जाने वाली जैसी तमाम मुहरें छाप दी गईं। मेरा पक्ष लेकर जो मेरे साथ खड़ा होता वह जा चुका था। हर तरफ से मुझे बालेश्वर बोलते-से सुनाई देते। मुझे हर समय उनकी प्रतीक्षा रहती यह जानते हुए भी कि अब वह कभी नहीं आएंगे। पागलों की तरह मैं उनके कपड़ों को सूंघ-सूंघकर उनका अपने पास होना महसूस करने की कोशिश करती रहती। सबसे मुश्किल था टिकुली के सवालों का जवाब देना। अपने दुःख के रेगिस्तान में मुझे नंगे पैर अकेले ही चलना था। मुंहदिखाई के दिन की गई, ‘ऐसी सुंदर बहू पूरे खानदान में कभी किसी की नहीं आई’ जैसी टिप्पणियों ने उन जेठानियाें और देवरानियों के मन में मेरे लिए शत्रुता का-सा भाव भर दिया था जो मायके से अपने साथ न जाने क्या-क्या लेकर आईं थीं। सब तरफ मेरे रूप-रंग की होने वाली प्रशंसा से आहत घर की औरतों के जख्मों पर पहली बार मरहम तब जाकर लगा था जब मेरी बेटी पैदा हुई, ‘‘उहं! होंगी कहीं की अप्सरा, पैदा तो लड़की ही की है’’ जैसे बोल मुझे सुनाते हुए बोले जाने लगे। बालेश्वर के जाने के बाद धीरे-धीरे मुझे नौकरानी बना दिया गया। झाड़ू-

पोंछे वाली हटा दी गई, बर्तन मांजने वाली की भी छुट्टी कर दी गई, दोनों समय का नाश्ता-खाना बनाना भी मेरे ही जिम्मे आ गया था। बेटा पैदा करने वाली घर की बहुएं टांग पे टांग रखे अपने पलंग पर पसरी रहतीं और हुकुम चलाती रहतीं।

एक दिन टिकुली को बुखार था। दोपहर होने को आई थी और उसने कुछ नहीं खाया था। मैंने पोंछा लगाते हुए अपनी जेठानी से भीख-सी मांगी, ‘‘एक गिलसिया दूध टिकुली के लिए दे दीजिए।’’ जवाब दिया पास में कुर्सी पर बैठे ससुर जी ने ‘‘हां, हां, क्यों नहीं। इसके बाप ने जो भैंस बांधा दी थी मेरे दरवाजे पर उसी का दूध निकालकर दे दो इसकी लाडली को।’’ 

मेरे झाड़ू-पोंछा करते समय ससुरजी हाथ में अखबार पकड़े सारे घर में अपनी जगहें बदलते रहते, जैसे जाड़े की जाती हुई धूप की गर्मी लेने के लिए कोई ठिठुरता बूढ़ा आंगन में अपनी जगहें बदलता हो। जहां मैं झाड़ू-पोंछा कर रही होती वह वहीं बैठ जाते और ‘तन्मयता से’ अखबार पढ़ते रहते। झाड़ू लगाने के लिए या पोंछे के कपड़े को बाल्टी के पानी में भिगोने के लिए झुकती तो ससुर जी की निगाहों को एकटक अपनी गोलाइयों को घूरते हुए पाती। चार लड़कियों का ब्याह करते-करते मर गए अपने पिता के बारे में अपने लम्पट ससुर का कहा हुआ सुना तो पहले से ही घिनाई बैठी मैं गुस्से से तड़क उठीं, रोकते-रोकते भी मुंह से निकल गया, ‘उनकी भी दो नंबर की कमाई होती तो भैंस भी बांध देते।’ इतना सुनना इस घर के मर्दों को भला कब गवारा था। 

चकबंदी दफ्रतर में बड़े बाबू के पद से रिटायर हुए और अपनी ताकाझांकी पर मेरी ओर से कोई मनमाफिक जवाब न मिलने से दांत किटकिटाते रहने वाले ससुर जी झपटकर उठे। उन्होंने झापड़ मारने के लिए हाथ उठाया लेकिन जाने क्या सोच कर अपने को रोक ले गए। पोंछे वाली बाल्टी को जोरों से लात मारकर तेज कदमों से चले गए। सारा पानी बरांडे में फैल गया। बाल्टी उलटने की आवाज सुनकर घर की सारी औरतें और आदमी अपने-अपने कमरों से बाहर निकलकर एक बार झांकने के बाद वापस अंदर चले गए। शायद बहुत दिनों से कोई तूफान उठाने का बहाना खोजा जा रहा था जो उस दिन मैंने उनको दे दिया था। 

मेरे ससुर ने मुझको घर से बाहर निकाल बाहर करने का ऐलान कर दिया क्योंकि मेरे जैसी ‘जबानदराज’ को वह घर में और बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। घर की औरतें जानती थीं कि भड़भडि़या मर्द सिर्फ गुस्से से फनफनाना जानते हैं। उनके गुस्से से घर की बाकी औरतों के सामने कैसी परेशानी खड़ी हो जाएगी, जरा भी नहीं सोचते। घर का सारा काम करने वाली चली गई तो कौन संभालेगा चूल्हा-चौका? घर की सारी औरतों ने ससुरजी को समझाया कि मुझे और मेरी बेटी को घर से निकालकर बदनामी मोल लेने के बजाय दोनों को रहने के लिए घर के बाहर अहाते के कोने में बनी कोठरी में भेज दिया जाए। कौन जाने एक सुंदर और अकेली होे गई युवा विधावा घर की सुहागिनों को अपने लिए खतरा भी लगने लगी हो। ससुर जी ने अनुरोध को उदारतापूर्वक स्वीकार कर लिया। जब तक बालेश्वर जीवित थे मेरी चचिया सासें मुझे ‘बिलासपुर वाली’ कहकर बुलाया करती थीं, बाद में वे भी मुझे ‘कुठरिया वाली’ पुकारने लगीं। 

पहले उस कुठरिया में माली रहा करता था। जब मुझे वहां रहने के लिए भेजा गया तब तक माली काम छोड़कर जा चुका था और फिलवक्त कोठरी का इस्तेमाल अनाज के बोरे रखे जाने के लिए होने लगा था। कोठरी में एक तख्त पड़ा था। गर्मी के मौसम में माली के लिए कभी लगवाए गए पंखे से मुझे काम चलाना था। अनाज की गर्मी से पूरी कुठरिया इतनी गरमाती थी कि पंखा भी बेअसर रहता। मैं जान गई कि अब मैं और मेरी बेटी घर के सदस्यों खासकर ससुर की दया पर थी। घर के सारे काम निपटाते सोचती रहती कि लड़की के लिए शादी करने से भी ज्यादा जरूरी है उसकी पढ़ाई-लिखाई। मुझे कुछ भी करके और सब कुछ सहकर अपनी बेटी को बड़ा करना है। उसे हर हाल में पढ़ाना-लिखाना है और अपने पैरों पर खड़ा करना है। लेकिन कैसे? मेरे लिए हताशा का वह चरम क्षण था जब मैंने पाया कि बाहरी दुनिया से मैं काटी जा चुकी हूं। मेरे मोबाइल का ‘सिम’ निकाल लिया गया था। मैं किसी से भी संपर्क नहीं कर सकती थी। मैं बड़े सुनियोजित ढंग से असहाय बना दी गई थी।  

काफी समय बीत चुका था। मुझे कोठरी में रहते हुए भी करीब सात-आठ महीने होने को थे। एक दिन झाड़ू-पोंछा और सबके कमरों में दौड़-दौड़कर नाश्ता पहुंचाने से छुटकारा पाने के बाद मैं जरा देर कमर सीधी करने के लिए अपनी कोठरी में आकर बैठी ही थी कि ससुरजी ने कोठरी की कुंडी खड़काई। उन्होंने बताया कि फैक्ट्री के मैनेजर मुझसे मिलने आए हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वह फैक्ट्री से किसी भुगतान का चेक देने आए हैं। मैं बुरी तरह थकी हुई थी। पिछली रात से ही तबीयत ठीक नहीं थी, उस समय कुछ हरारत-सी थी। मैंने कहा, ‘‘आप ही ले लीजिए।’’ उन्होंने बताया कि मैनेजर वह चेक मेरे ही हाथ में देना चाहता है क्योेंकि मृतक की विधवा होने के नाते मैं ही उसकी हकदार हूं। मैं घूंघट में अपना चेहरा छिपाए ससुर जी के पैर देखते हुए उनके पीछे-पीछे चल दी। 

‘‘बालेश्वर जी हमारी फैक्ट्री के बहुत ही सिंसियर इंजीनियर थे। उनकी कमी हम बराबर महसूस करेंगे। कंपनी कितना भी कुछ कर दे, उन्होंने फैक्ट्री को आगे बढ़ाने के लिए जो किया उसका मूल्य नहीं चुका सकती। ये दो चेक हैं, प्लीज! इन्हें रिसीव कर लीजिए। आप जरा अपना घूंघट उठाएंगी?’’ मैनेजर ने मेरे बैठने के बाद अपने ब्रीफकेस से एक कागज निकाला और उसे सीधा करते हुए धीमे सुर में रुक-रुक कर कहा। 

‘‘ये क्या बेहूदगी है? किसी शरीफ खानदान की औरत किसी गैरमर्द के सामने मुंह नहीं खोलती। आपको इतनी भी तमीज नहीं है?’’ ससुरजी गुस्से से दहकते हुए लाल होकर उठ खड़े हुए। उनका पारा अचानक सातवें आसमान से जा लगा। वह कांपने लगे।

‘‘देखिए, मैं यह फार्म फैक्ट्री के ऑफिस से लेकर आया हूं। मृतक की विधवा की शक्ल की मिलान इस फार्म पर लगी उनकी फोटो से किए बगैर मैं ये चेक इन्हें नहीं दे सकता। इतनी बड़ी रकम है, मैं जांचे बिना कैसे दे सकता हूं? मैं कैसे जानूंगा कि मैंने चेक सही महिला को दिए या नहीं।’’ मैनेजर ने एकदम शांत रहते हुए अपनी मजबूरी बताई।

‘‘कितने का चेक है?’’ 

‘‘इतनी बड़ी रकम’’, ने गुस्से से लाल हो रहे ससुर जी के पांव जैसे पानी से भरे किसी टब की ओर खींचने शुरू कर दिए।  

‘‘दुर्घटना के मुआवजे के बीस लाख का एक है और पी-एफ- के बाईस लाख का दूसरा।’’  

‘‘दिखा दे बहूरानी, चेहरा दिखा दे।’’ ससुर जी की गुस्से से लाल हो आई आवाज जैसे एक ‘छन्न’ की आवाज के साथ चुप हो रही।

मैनेजर ने एक बार मेरा चेहरा देखा तो वापस फार्म पर लगी फोटो से मिलान करना जैसे भूल ही गया। उसका मुंह जरा देर को खुला रह गया।

‘‘ठीक है, ये लीजिए चेक।’’ कहते हुए मैनेजर के गले में जैसे कुछ अटक-सा गया।

‘‘एक बात आपसे कहूं भाभी जी’’ एक कागज पर मेरे कांपते हाथों के ठेढ़े-मेढ़े दस्तखत लेने के बाद वह मेरे चेहरे की ओर देखते हुए बोला।

मैं मौन ही रही। मैं सुन रही हूं यह बताने के लिए मैंने मैनेजर साहब की ओर आंख उठाकर देखा। मैनेजर साहब कुछ क्षण को भूल गए कि उन्हें क्या कहना था।

‘‘तो... मैं ये कहना चाह रहा था भाभी जी, कि जब भी आपका दिल करे आप भाई साहब की जगह फैक्ट्री में- नहीं, मेरा मतलब है किसी भी पोस्ट पर’ ‘‘मैनेजर साहब, मैं अभी मरा नहीं हूं और इतना गया गुजरा भी नहीं हूं कि अपनी विधवा बहू को खाना-कपड़ा न दे सकूं। आप चाहते हैं एक इज्जतदार घराने की बहू मुंह खोले मर्दों के साथ काम करे, ये आपने सोच भी कैसे लिया?’’ ससुर जी ने बात पूरी होने से पहले ही सीना तानकर मैनेजर से कहा और अगले ही क्षण सहलाती-सी आवाज में मुझे आदेश दिया, ‘‘जाओ बहूरानी, तुम अन्दर जाओ।’’

अभी मैनेजर साहब शायद वापस अपनी फैक्ट्री तक भी नहीं पहुंचे होंगे कि ससुर जी ने फिर कोठरी की कुंडी खड़काई।

‘‘चलो बहू तैयार हो जाओ।’’

‘‘कहां चलना है बाबूजी?’’

‘‘बैंक चलना है। अपने साथ तुम्हारा ज्वायंट एकाउंट खुलवा देता हूं, उसमें दोनों चेक जमा कर देंगे।’’

‘‘जी, जैसा आप ठीक समझें, वैसे उन्होंने मेरे साथ एक खाता पहले खुलवाया था--- आप कहें तो उसी खाते में।’’

‘‘बैंक के काम के लिए आए दिन होने वाली भाग-दौड़ कर पाओगी तुम? मैंने तो तुमको आराम देने के लिए कहा था। लेकिन देख रहा हूं कि तुम्हारे मन में शायद कुछ और ही चल रहा है। बलेसर को गए अभी दिन ही कितने हुए हैं और तुमने अपना-पराया शुरू कर दिया? मुझे बहुत दुख पहुंचा है इससे। यही संस्कार लेकर आई हो अपने घर से?’’ ससुर जी पहले तड़पे, जरा सा पिघले और फिर अचानक भड़क उठे।   

‘‘नहीं-नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं क्षमा मांगती हूं, मेरा वह मतलब बिल्कुल नहीं था।’’ मेरे मन में सचमुच ऐसी कोई बात नहीं थी। ससुर जी को मनाने में मेरे पसीने छूट गए। बड़ी मुश्किल से किसी तरह से वह माने और हमने जाकर अपने दोनों के नाम से बैंक में संयुक्त खाता खुलवाया और दोनों चेक उसमें जमा कर दिये। ससुर जी ने एक हजार रुपए नकद जमा करके खाता खुलवाया था सो पास-बुक तो तुरन्त मिल गई लेकिन चेक-बुक डाक द्वारा आनी थी।

कुछ दिनों बाद ससुरजी उस दिन मिली पास-बुक और डाक से आई चेक-बुक लेकर मेरी कुठरिया में आए।     

‘‘लो इसे संभालकर रख लो’’ ससुरजी ने पास-बुक और चेक-बुक मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, बगैर यह सोचे कि संभालकर रखने के लिए मेरे पास जगह ही कौन सी रहने दी है उन्होंने।

‘‘आप ही रखिये’’ मैंने कहा।

‘‘नहीं भाई, ये सब बवाल है, तुम्हीं संभालो। मुझे इस जंजाल से दूर ही रखो।’’

मैंने दोनों चीजें ले लीं और कुठरिया में रखी अपनी बकसिया में बिछे अखबार के नीचे रख दीं। 

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एक रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे।

‘‘सो गईं क्या?’’ ससुर जी कोठरी के दरवाजे पर थे।

‘‘जी कहिए, मैं सुन रही हूं।’’ मैंने कोठरी के दरवाजे के पीछे से कहा और उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी।

‘‘मुझे जरा अनाज की बोरियां गिननी हैं।’’ उन्होंने कहा। 

‘‘इतनी रात में?’’ 

‘‘हां अभी। मुझे अभी गिननी हैं। दरवाजा खोलो।’’ उन्होंने हुक्म देने वाली मजबूत आवाज में कहा।

मैंने दरवाजा खोला और उनको अंदर आने का रास्ता देने के लिए सिमटकर एक किनारे खड़ी हो गई। 

ससुर जी ने टार्च की रोशनी डाल-डालकर आगे-पीछे की सारी बोरियों की गिनती की, साथ में लाए कागज पर कुछ नोट किया और तखत के एक कोने पर टिककर बैठ गए। 

‘‘मुझे तुमसे एक बात कहनी है, सर्वेश।’’ मुझे आश्चर्य हुआ। न बेटी, न बहू, न बहूरानी, न सर्वेश्वरी। ससुर जी पहली बार मेरा नाम ले रहे थे और वह भी इस तरह से जैसे---  

‘‘जी, कहिए!’’  

‘‘देखो, कभी मन में कोई इच्छा जगे तो संकोच न करना। जिसको जाना था वो तो चला गया, अब उसके कपड़े सूंघते रहने से तो बलेसर तुम्हें मिल नहीं जाएगा लेकिन मैं तो तुम्हारे पास हूं। मेरा मतलब है किसी इच्छा के लिए मन मत मारना। तुम बहुत सुंदर हो, और मैं जानता हूं कि सुंदर स्त्री के मन में पुरुष संसर्ग की बहुत इच्छा रहती है।’’ ससुर जी ने किसी स्त्री विशेषज्ञ की तरह कहा और अपनी धोती के फेंटे की एक पर्त ढीली की। वहां से उन्होंने दस रुपये का एक नोट निकाला और मेरी हथेली में ठूंस दिया। अब तक मेरी समझ की धुंध छंट चुकी थी लेकिन तभी अपनी चिकनी कमर पर मैंने उनकी खुरदुरी हथेली की रगड़ और बढ़े हुए नाखूनों वाली बकोटा-सी मारती पकड़ को महसूस किया। ‘‘नहीं, छोडि़ए मुझे। ये क्या बदतमीजी है। आपको शर्म आनी चाहिए। आपको मैं अपने पिता की जगह’’ मैं और आगे बढ़ने लगे, उनके हाथ को रोकने के लिए कसमसाने लगी। सासू जी को मरे कुछ साल बीत गए थे, लगता था कि मुझ अकेली हो गई को देखकर ससुर की भूख चमक उठी थी। मैंने पूरी ताकत लगाकर उनको जोर से धक्का दिया। भारी-भरकम ससुर दरवाजे से टकरा कर जमीन पर गिर पड़े। 

‘‘अभी तो घर से निकालकर कोठरी में पहुंचाया है, क्या चाहती हो तुम्हें और तुम्हारी बेटी को सड़क पर खड़ा कर दूं? कल को तुम्हारे साथ तुम्हारी बेटी को भी चौराहे पर खड़ा कर दूंगा तब किस-किस को मना करोगी?’’ ससुर ने तेज हो चुकी अपनी सांसों के बीच धमकी दी और फिर मेरी तरफ बढ़े। मैं अपनी बेटी के बारे में बस एक क्षण को सोचने लगी और उतनी ही देर में ससुर ने किमाम की गंध से पूरित, तेज तम्बाकू वाले अपने लाल होठों से मेरे होठ कस लिए। ससुर मेरे ऊपर लद गए। मेरी सांस रुकने-रुकने को हो आई। मैं एक छोटी-सी सांस पाने के लिए छटपटाने लगी और ससुर भैंसे जैसी तेज सांसें लेते हुए मेरे ऊपर पछाड़ें खाने लगे। 

‘‘मुझे मना करने की कभी सोचना भी मत’’ ससुर ने अपनी धोती की लांग को वापस पीछे कसते हुए अंतिम 

चेतावनी दोहराई और हरि ओम-हरि ओम की अघाई हुई लंबी डकारे लेते हुए 

कोठरी से निकल गए। जो तूफान मेरे ऊपर से आकर गुजर गया था उसको 

सोचकर तेज हो गई अपनी धड़कनें मैं खुद सुन पा रही थी। मेरी हड्डियों और मज्जा में कसैला धुआं-सा भर गया। मुझे अपने औरत होने और सुंदर होने पर पहली बार घिन छूटी--- चिपचिपाती हुई एक अजीब-सी मतली लाने वाली गंध सारी कोठरी में फैल गई। मेरे नथुनों से होती हुई वह गंध मेरे दिमाग में चढ़ गई और मैं किसी पागल की तरह वहां से निकली और सीधे थाने जाकर रुकी।  

थानेदार ने मुझे बैठने को कुर्सी दी, मुझे पानी पिलाया, और मेरी पूरी बात सुनने के बाद ससुर जी को थाने में तलब करके न्याय करने का आश्वासन देकर वापस भेज दिया।

कुछ दिनों बाद एक सिपाही कुठरिया के सामने खड़ा था, थानेदार ने बुलाया था।

मैं जैसे ही थानेदार के कमरे में गई उसने त्रिया चरित्र और पुरुष के भाग्य के बारे में एक श्लोक बोला फिर उसका मतलब बताया। उस रात को जो मुझसे आप-आप कहकर बात कर रहा था, वही थानेदार तुम और तू पर उतरा हुआ था।   

‘ऐसे देवता जैसे सज्जन पुरुष पर इतना घिनौना आरोप लगाते तुझे शर्म नहीं आई? वहीं जहां तू इस समय बैठी है, तेरे ससुर जी बैठ कर आंसुओं से रो रहे थे। जानती है वह क्या कह रहे थे? उन्होंने कहा कि ‘‘वह तो तलाश कर रहे हैं कि कोई ऐसा भला आदमी मिल जाए जो मेरी बहू को उसकी बेटी सहित 

स्वीकार करने को तैयार हो तो मैं उसकी शादी कर दूं और कन्या-दान का पुण्य कमा लूं’’ और तू देवता जैसे उस आदमी के ऊपर---छी-छी। अपना मेडिकल कराया था तूने, कि आधी रात में सीधे मेरे ही पास भागी चली आई? मैंने तेरे ससुर जी से पूछा कि उन्होंने अपनी बहू को 

कोठरी में क्यों डाल रखा है, जैसा कि तू उस रात रोने का ड्रामा करते हुए कह रही थी। उन्होंने कहा कि मेरी तो यह हालत है थानेदार साब कि ये जांघ खोलूं तो लाज और वो खोलूं तो लाज। उन्होंने तेरी असलियत बतायी कि ‘‘तूने ही लड़-झगड़ कर कोठरी में रहना शुरू कर दिया है क्योंकि तू रात-बिरात अपनी कोठरी में आदमियों को बुलाती है। एक बात कान खोलकर सुन ले तू बेहया औरत, अपने इलाके में मैं ये बदकारियां नहीं चलने दूंगा, नहीं, बिल्कुल नहीं। अब तेरी कोई शिकायत आई तो मैं तुझे इम्मारल ट्रैफिकिंग एक्ट में अंदर कर दूंगा। याद रखना, फिर मैं तेरे ससुरजी की मान-प्रतिष्ठा और उनकी भलमन साहत का भी ख्याल नहीं करूंगा। चल भाग जा यहां से।’’

 मेडिकल कराना क्या होता है यह बात तो मुझे बहुत बाद में पता चली। उस समय मेरा दिमाग थानेदार की बातें सुनकर एकदम सुन्न-सा पड़ गया था। उस समय तो नहीं सोचा था लेकिन आज इस बात पर ताज्जुब हो रहा है कि वह पहला मौका था जब सामने बैठे आदमी पर मेरे रूप का जादू नहीं चला। उस समय तो थानेदार के सिर पर किसी और ही चीज के जादू का असर रहा होगा,उसके सामने रूप का क्या है? और फिर, उसको तो पता ही था कि न औरत कहीं भागी जा रही है और न कुठरिया? ससुर ने इशारा कर ही दिया है। जिस किसी दिन मन करेगा, बयान लेने कुठरिया में चला ही आएगा।         

कोठरी का मजबूत बेलन न जाने कब ‘टूट’ गया। वह ससुर जो मुझे पुत्रवधू बनाकर लाया था, जेठ जिसने मुझे अनुजवधू के रूप में स्वीकार किया था और देवर जिसने मुझे कभी भाभी मां के रूप में मान दिया था उन सबमें से कोई न कोई रात के समय दस का एक नोट लेकर मेरी कोठरी में धड़धड़ाते हुए घुस आता। सबकी बीवियां बैठी थीं लेकिन वे सब डाल में लगे हुए फल की तरह फीकी लगने लगी थीं। कुठरिया में लूटकर मिलने वाला फल लगा था, जो मीठा मालूम देता था। मैं अब घर के सारे मर्दों के लिए सहज उपलब्धा हो गई थी। ‘बांझ’ बनाए रखने के लिए हर तीन महीने में मुझे न जाने कौन सा एक इन्जेक्शन लगाया जाता। एक नर्स आती थी इन्जेक्शन देने। मैं जिसे आसानी से इन्जेक्शन लगवा लेती, उससे नर्स चकित-सी होती। उसे कैसे बताती कि मेरी वह ‘आसानी’ कितनी मुश्किलों से भरी होती थी। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि उन सब ने एक-दूसरे को कैसे बताया होगा कि--- मेरा एक रात का रेट दस रुपिया तय किया गया है ---पता नहीं, लेकिन घर में एक खेल तो शुरू हो ही चुका था। 

बगल के बालों की उबकाई लाने वाली बदबू , पायरिया की सड़न भरी सांसें,कभी-कभी पाउडर, सेंट और पसीने की मिलीजुली गंध--- जो भी मेरी कोठरी में घुसता अपनी चप्पलें बाहर उतार देता। कोठरी में घुसने का जिसका दांव पहले बैठ जाता उसकी चप्पलें बाहर रखी दिखाई पड़ती। उन चप्पलों के हटने से पहले कोठरी के दरवाजे के बाहर कोई नयी चप्पल नहीं उतरती थी। 

मैं तो द्रौपदी से भी आगे निकल गई थी। 

एक रात मेरा देवर युद्ध की पूरी तैयारी के साथ आया। उसी देवर जिसने ‘भाभी मां’ के संबोधन के साथ पहली बार मेरे पांव छुए थे, उस रात मेरे सामने मर्द के रूप में खड़ा था। कोई सस्ता-सा परफ्रयूम छिड़का हुआ था, मुंह से किसी बहुत सुगंधित ‘माउथ फ्रेशनर’ की खुशबू आ रही थी,  बालों को अच्छी तरह से सेट कराया हुआ था। वह अपने रथ में जुते घोड़ों को तेज रफ्रतार से हांकते हुए ऐसे आया जैसे एक ही हमले में पूरा दुर्ग जीत लेगा और दुंदुभी बजाते हुए अपनी फतह का झंडा गाड़ देगा, लेकिन वह रणभूमि के पास तक भी न पहुंच पाया था कि उनके रथ की धुरी टूट गई और वह मुंह के बल भहराकर गिर पड़ा। तब तक मैं खासी बेहया हो चुकी थी, मेरे मुंह से हंसी निकल गई।

‘‘धंधे में ईमानदारी रहनी चाहिए। जब कुछ हुआ ही नहीं तो पैसे किस बात के?’’ मेरी हंसी से खिसियाए देवर ने मेरी उंगलियों में फंसा अपना दस का नोट वापस लेते हुए खुश्क गले से कहा और कोठरी से निकल गया।

 उस कोठरी में उस समय तक जो कुछ चलता रहा था उसे तब तक कोई नाम नहीं मिल पाया था। हद से हद उसे बलात्कार, व्यभिचार, दुराचार या अत्याचार जैसा कोई नाम दिया जा सकता था लेकिन मेरे देवर ने उस रात मुझे धंधेवाली और उस हिसाब से कोठरी को कोठा बना दिया था। यह नाम तो उस दिन थानेदार भी नहीं दे सका था। 

मुझे हालात ने ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचा दिया था जहां मैं कुछ भी सोचने-समझने की ताकत खो चुकी थी। जैसे ही रात आने लगती मैं रसोईघर में काम करते-करते यह सोचकर कांप उठती कि यहां से जाने के बाद पता नहीं आज मेरी मुट्ठी में दस का नोट ठूंसने कौन आएगा? उस रात अचानक मुझे बोध हुआ कि बलात्कृत की पीड़ा इतनी गहरी होती है कि वह उसे कितना भी व्यक्त करना चाहे उसका सौवां हिस्सा भी व्यक्त नहीं कर सकती। मैं रो तक नहीं पा रही थी। बल्कि मैं रोना भूल ही गई थी। मेरी आंखों के सामने अंधेरा था। मैं जिस रास्ते पर चलकर छुटकारा पाने की सोचती उस पर घना काला अंधेरा पहले ही आकर मेरा रास्ता रोक लेता। मैं जानती थी कि जिस दिन इन सबका मन मुझसे भर जाएगा, उस दिन इन सबकी निगाह मेरी बेटी पर होगी। यह सोचकर मैं कांप उठती। मेरी पीठ से घबराहट, चिंता और डर की ठंडी लकीरें उठतीं और दिमाग तक चलती चली जाती। मेरे पेट में गोला जैसा कुछ उठने लगता, मेरे पैरों में खड़े रहने की ताकत भी नहीं बचती, मैं ऐसी हो जाती जैसे जाने कितने महीनों से बीमार हूं और खड़े होने की कोशिश करते ही गिर पड़ूंगी। मैं किसी भी तरह से, कुछ भी करके, कुछ भी सह के इस नरक से खुद भी निकलना चाहती थी और अपने बेटी को भी इस नरक में पड़ने से बचाना चाहती थी। मेरे पास रुपिया आ गया था मुझे बस किसी एक रास्ते की तलाश थी जिससे निकलकर मैं खुली हवा में सांस ले सकूं। 

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तभी एक दिन अचानक ही मुझे जोसेफ मिला।

रात के अंधेरे में दस रुपये में मेरे साथ हमबिस्तरी करने वाले परिवार में नौ मर्द थे लेकिन मेरी बीमार बेटी को अस्पताल तक ले आने के लिए एक भी नहीं था जो मेरे साथ अस्पताल आ जाता। पर्चा बनवाने के लिए मैं लाइन में लगी थी और चार साल की हो रही बेटी को गोद में उठाए-उठाए लंबी लाइन में लगे रहना बहुत मुश्किल हो रहा था। उसका बदन तेज बुखार से तप रहा था। तभी जोसेफ ने बेटी को मेरी गोद से अपनी गोद में ले लिया और पर्चा बनने तक लाइन में मेरे बगल होकर साथ-साथ चलता रहा। उसने बताया कि अस्पताल में उसका कोई काम नहीं था, वह मोहल्ले के किसी आदमी को दिखाने आया था। उसने बताया कि वह बेसहारा लोगोें की मदद के लिए अक्सर अस्पताल आया करता है। मुझे वह अपने परिवार के मर्दों के मुकाबले कहीं अच्छा इंसान लगा जो परोपकारी और मददगार है। मैं अपने आप को भीतर से एकदम अकेली और डूबता हुआ महसूस कर रही थी। मुझे जोसेफ में कहीं एक सहारा-सा दिखाई दिया। वह डॉक्टर को दिखाने और दवा लेने तक बराबर मेरे साथ बना रहा। बेटी को दिखाने के बाद हम दोनों ने अस्पताल की बेंच पर बैठकर कुछ देर बातें कीं। उसने बताया कि दुनिया में उसका कोई नहीं है। मैं भीतर से बुरी तरह टूट चुकी थी, मेरा मन उसके मुंह पर अपनी हथेली रखकर उसे ऐसा कहने से रोकने का हो आया। उसने मुझे बताया कि वह कोई अपना काम शुरू करना चाहता है। मैंने उससे दो दिन बाद उसी जगह फिर मिलने की बात कहकर विदा ली। मैंने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया था।

अगले दिन मैं टिकुली को दिखाने के बहाने बैंक के मैनेजर के पास गई जिसने उस दिन एकाउंट खुलवाया था। मैंने उसके सामने चेक-बुक रखी ताकि वह मेरा चेक भर दे। मैनेजर ने कंप्यूटर पर मेरा नाम टाइप किया। उसने निचले होठ पर मुड़ी हुई तर्जनी रखी, चेक-बुक को पुश्त की तरफ़ खींच कर देखा और कुछ क्षण सोचा। 

‘क्या इससे पहले भी आपने कोई चेक काटा है?’ मैनेजर ने पूछा। 

‘‘नहीं, मैं खाता खुलवाने के बाद पहली बार बैंक आई हूं।’’ मैंने कहा। 

मैनेजर ने कंप्यूटर के स्क्रीन को मेरी ओर मोड़ा। उसने अपना पेन उलट कर उसे प्वाइंटर-सा बनाते हुए वह चेक नंबर दिखाया जो इसी चेक-बुक से पहले काटा जा चुका था। मेरे ससुर ने मेरे चालीस लाख रुपए अकांउट खुलने के दस दिन बाद ही मेरे और अपने संयुक्त खाते से निकाल कर उसी बैंक के अपने दूसरे खाते में ट्रांसफर करवा लिए थे। मैनेजर ने चेक-बुक खोलकर दिखाई कि उसमें से एक ‘लीफ’ पहले फाड़ी जा चुकी है। सुनते ही मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई, कुर्सी पर बैठे हुए लगा कि कमरे की दीवारें घूमने लगी हैं, आंखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगा। 

‘‘आप इसमें मेरी कुछ मदद कर सकते हैं? मेरे साथ धोखा हुआ है।’’ मैंने रूआंसी आवाज में मैनेजर से पूछा। 

‘‘मैं इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता क्योंकि आइदर ऑर सर्वाइवर’’ एकांउट में कोई भी एक आदमी पैसा निकाल सकता है। उसने दो-टूक कहा। 

‘‘फिर? अब मैं क्या करूं?’’ मैंने निराश आवाज में पूछा। 

‘‘आपकी मदद पुलिस कर सकती है।’’ उसने मुझे सलाह दी। 

पुलिस का मतलब था वही थाना और वही थानेदार। वहां जाने की मेरी हिम्मत नहीं पड़ी। मेरे पंख पूरी तरह से नोच डाले गए थे। अब मेरी हालत उस गाय जैसी हो गई थी जिसके भागने पर लगाम लगाने के लिए गले में भारी-सा घंटोल डाल दिया गया हो। खाते में छोड़ दिए गए दो लाख रूपये मैंने निकाले और बेटी को गोद में उठाए किसी तरह लड़खड़ाती हुई वापस अपनी कोठरी में पहुंच पाई। अपने आप से मैंने कहा, ‘तुम मूर्ख हो तो इसमें चालाक आदमी का क्या दोष?’      

एक दिन बाद मैं उसी बेंच पर बैठी जोसेफ का इन्तजार कर रही थी। जब से खाते से रुपये निकल जाने की बात पता लगी तब से मैं जोसेफ के बारे में ही सोचती रही थी। अच्छा हुआ कि ससुर ने जाने क्या सोच कर दो लाख रुपये खाते में छोड़ दिए थे। अब मैं जोसेफ को अपना काम शुरू करने के लिए मदद कर सकूंगी। उस दिन जब उसने अपना कोई काम शुरू करने की बात कही थी तभी मैंने सोचा था कि मैं अपने खाते से निकाल कर उसे रुपये दूंगी। मैंने बेंच पर बैठे हुए अपने को उस दिन बहुत अकेला पाया। बैंक में चेक जमा करने वाले दिन से मन कितना निश्चिंत हो गया था कि इतना पैसा मेरे पास है कि मैं अपनी बेटी को जिला ले जाऊंगी। पति के जाने के बाद एक-एक पैसे की मोहताज होकर मैं जान गई थी कि जीने के लिए पैसे से बड़ी और कोई मजबूती नहीं होती। मुझे लगता था कि मेरे पास जो पैसा था उससे मैं नई जिंदगी शुरू कर सकूंगी। मुझे अब जोसेफ का इंतजार था क्योंकि अब मुझे उसी का सहारा था। मैं अपने आप से बातें करते हुए जोसेफ को लेकर बहुत दूर तक सोच जाती- ‘‘उंह, क्या होगा? बहुत होगा मुझसे अपना धर्म बदलने के लिए ही तो कहेगा? औरत की देह का तो वैसे भी कोई धर्म नहीं होता।’’

वह आया। उस दिन की मुलाकात में मैंने जोसेफ को सब कुछ बता दिया, बिना कुछ छिपाए-सब कुछ।

‘‘चलो, अब इस मुल्क में नहीं रहना’’ जोसेफ ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा।

‘‘फिर?’’

‘‘पहले हम शादी बनाएंगे। आज से तुम्हारा नाम जेनी और तुम्हारी बेटी का नया नाम होगा टीना और इन नये नामों के साथ शुरू होगी हमारी नयी जिंदगी।’’

उसने जिस ढंग से कहा उससे मेरी हंसी छूट गई। लगता था जैसे सदियां बीत गईं मेरे होठों को हंसे हुए। जोसेफ ने मुझे हंसा दिया था।

‘‘मगर हम जाएंगे कहां? तुम जानते हो मेरे पास सिर्फ दो लाख रुपये है।’’ मैंने रुपये की गड्डी जोसेफ को थमाते हुए कहा।

‘‘बहुत है जेनीे, मैं सब कुछ ठीक कर लूंगा। रुपये तुम अभी अपने पास ही रखो।’’

‘‘नहीं, वहां रुपये रखने की मेरे पास कोई जगह नहीं है।’’ मैंने रुपये वापस करने के लिए बढ़े उसके हाथ को रोकते हुए कहा। 

वह मुझे मेरे नये नाम से पुकारने भी लगा था। उसके पास बैठकर लगा जैसे सचमुच किसी नेक और साहसी मर्द ने मुझे अपनी सहारा देने वाली मजबूत बांहों के घेरे में ले लिया है। मेरा मन उसको चूम लेने का करने लगा।

बेंच से उठकर हम दोनों तीन दिन बाद मिलने की बात तय करके अपने-अपने घरों को लौट गए। 

और फिर एक दिन बाइबिल की शिक्षा, बपतिस्ता और होली कम्यूनियन की रस्म पूरी होने के बाद मैं जेनी और टिकुली टीना बनकर गिरजाघर से बाहर निकले।

उसके कुछ दिनों बाद हम दोनों चर्च में एक-दूसरे को मालाएं और अंगूठियां पहनाने, चुंबन लेने और रजिस्टर में दस्तखत करने के बाद पति-पत्नी बन गए। मेरी अंगुली में बालेश्वर की दी हुई एक अंगूठी पड़ी थी वह मैंने उतारकर जोसेफ को पहना दी। 

जोसेफ ने सिगरेट की पन्नी को गोल अंगूठी का आकार देकर मेरी अंगुली में डालते हुए कहा, मेरे पास सोना नहीं है जेनी, लेकिन प्यार भरपूर है। मैंने उसकी ‘अंगूठी’ को चूम लिया। जब तक जोसेफ कुछ तय नहीं करता तब तक मुझे धर्म परिवर्तन और अपनी शादी की बात छिपा कर रखनी थी। सर्वेश्वरी से जेनी बन जाने की बात अपने सीने में दबा कर रखनी थी।  

सर्वेश्वरी का पता तो वही पुराना वाला था लेिकन जेनी का पता अब वह हो गया था जो जोसेफ का था। जोसेफ ने अपने साथ मेरे और टिकुली के पासपोर्ट बनवा लिए। उसने मुझे बताया कि हिंदुस्तान में आपके पास अगर पैसे हैं तो आपके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं होता, फिर पुलिस वैरीफिकेशन कौन-सा पहाड़ उठाने का काम था। 

कुछ दिनों बाद जोसेफ, जेनी और टीना के नाम पर खरीदे गए हवाई टिकट हमें खाड़ी के एक देश लेकर पहुंचे।  

जोसेफ को बहुत जल्दी थी। अभी हवाई यात्र की कानों में दर्द पैदा करने वाली सनसनाहट भी दूर नहीं हुई थी कि एक दिन उसने मुझे हॉट पैंट और हॉल्सटर टॉप पहनने को दिया और कहा, ‘‘जरा पहन कर दिखाओ तो।’’ सफेद रंग के सामने से खुले जालीदार हॉल्सटर को देखकर मैं समझी कि यह प्रेम में पड़े हुए एक पति की फरमाइश है। मैं उसके दिए कपड़े पहन कर उसके सामने आकर खड़ी हो गई। ‘‘ओह किलर ब्यूटी---’’ उसके मुंह से निकला और उसने बढ़ कर मुझे अपनी बांहों में भर लिया। मैं शर्मा गई। ‘‘लेकिन हॉल्सटर टॉप के नीचे ब्रा नहीं पहनी जाती।’’ जोसेफ ने कहा तो मैंने उसके सीने पर मुक्के मारे और उसके सीने में सिर छिपा लिया। ‘‘जैसा मैंने कहा है वैसे ही पहन कर आओ, जल्दी करो। हमें बाहर निकलना है।’’ जोसेफ ने मुझे अपने से अलग करते हुए कहा तो मेरी समझ में नहीं आया कि इन कपड़ों में मैं बाहर कैसे जा सकूंगी। ‘‘मैं चेंज करके आती हूं।’’ मैंने कहा और मुड़कर जाने को हुई तभी जोसेफ की फैसला सुनाती आवाज सुनाई दी, ‘‘तुमको इन्हीं कपड़ों में चलना है। और अब रोज शाम तुमको इन्हीं कपड़ों में जाना है।’’, ‘इसको पहन कर तो मैं सबके सामने नंगी-सी हो जाऊंगी।’, ‘‘तो? तो क्या हुआ? आखिर वहां भी तो हर रात नंगी ही हुआ करती थीं। तुम्हारे लिए नंगी होना कौन सी नई बात है? बहुत नखरे मत करो, जाओ हॉल्सटर जैसे पहना जाता है वैसे पहन कर आओ।’’ उसके कहा और भीतर जाने के लिए धक्का-सा दिया। पहले मुझे लग रहा था कि जोसेफ अपनी पत्नी को आधुनिक औरत की तरह सजाना-संवारना चाहता है लेकिन ‘‘तुम्हारे लिए नंगी होना कौन सी नई बात है’’ ने मेरे सारे भरम तोड़ दिए।

जोसेफ मुझे उसी अधनंगी हालत में बाजार ले गया। वहां उसने मेरे लिए ऊंची प्लेटफार्म हील  वाले सैंडिल मंगवाए। काले रंग के उन सैंडिल के लेस फुल्लियों से निकल कर घुटने के नीचे तक गोलाई से पैर पर कसे जाने वाले थे। ऐसे सैंडिल पहनने की कौन कहे मैंने उससे पहले देखे तक नहीं थे। उन्हें पहन कर दो कदम चली तो पैर बार-बार मुड़ जाता था और लगता था कि अभी गिर पड़ूंगी या पैर में मोच आ जाएगी। जोसेफ मेरी हालत देखकर बराबर झिड़क रहा था, ‘‘गंवार औरत को साथ रखो तो यही होता है।’’ 

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जोसेफ दुकान से ही मुझे उस शाम जहां ले गया वह एक पब था जिसका नाम जॉकी था। शाम से पब में घोडि़यों और कुछ देर बाद उन पर सवारी करने वाले जाकियों का आना शुरू हो जाता। वह पब एक ऐसी जगह थी जहां घोषित तौर पर तो 

औरतें और आदमी मिलते थे और साथ बैठकर बीयर पीते थे। ये अलग बात है कि सौदा पट जाने पर कोई आदमी किसी औरत को लेकर कहीं जा भी सकता था। ये दो लोगों के बीच की बात थी इसपर किसी को एतराज करने का कोई अधिकार भी नहीं था। सरकार भी तमाम प्रतिबंधों के बावजूद इस मामले में कुछ नहीं कर सकती थी।

बहुत कम रोशनी वाला बड़ा-सा वह हॉल अधनंगी औरतों, बीयर की गंध और सिगरेट के धुएं से भरा हुआ था। उस धुंधलके में इधर-उधर डोलती हुई औरतों के गोरे जिस्म लोगों को अपनी ओर बुलाते-से जान पड़ते। मैं देख रही थी कि औरतें अपने गाल,जांघ,कमर और सीने पर हाथ रखने देकर नये आए आदमी को अपनी बानगी-सी पेश करतीं-एकदम मुफ्रत। आखिर आदमी जानवर खरीदता है तो उसे भी छूकर और थपथपाकर देखता ही है फिर वहां तो एक औरत का मामला होता जिसका सौदा करने से पहले ठीक से देख-परख लेना जरूरी होता है। ज्यादातर लोग बीयर के हलके नशे में औरतों को छू-छू कर मन बहलाते और समय बिताकर वापस लौट जाते। औरतें ऐसा करने से किसी को मना भी तो नहीं कर सकतीं थीं। मैं देख रही थी कि लोगों की निगाहें मुझ पर ही टिकी हुई थीं लेकिन मैं किसी भी आदमी को अपने पास फटकने नहीं दे रही थी। एक आदमी ने मुझे छू लिया तो मैं उस पर चिल्ला पड़ी। पब में झगड़ा होने पर पुलिस आ सकती थी, गिरफ्रतारी हो सकती थी यहां तक कि पब बंद किया जा सकता था। जिस आदमी पर मैं बिगड़ उठी थी उसने मुझसे पीछा छुड़ाया और पब से बाहर निकल गया। जोसेफ ने भी मुझे वहां से हटाया और घर लाकर मेरी पिटाई की। उसने मुझे धमकी दी कि टूरिस्ट वीजा पर आकर यहां धंधा कर रही हो, छोड़कर चला जाऊंगा तो जेल चली जाओगी, कोई पूछने नहीं आएगा। उसने मेरी ओर हिकारत से देखते हुए दुत्कार की आवाज में कहा ‘‘बहुत पायस बनने की कोशिश मत करो, पब में जैसे बाकी औरतें आती हैं और ग्राहकों के साथ बैठती हैं मुझे भी वैसा ही करना होगा।’’ 

करना मुझे वही था जिसके लिए जोसेफ मुझे वहां ले गया था। जोसेफ मुझे आए दिन पीटता, भूखा रखता और धंधा करने के अपराध के परिणामों का डर दिखा कर मुझे अपने इशारों पर चलने के लिए मजबूर करता रहता। आखिर तंग आकर धीरे-धीरे मैं भी उन्हीं घोडि़यों में शामिल हो गई जो सवारी के लिए किसी जॉकी को पटाने के लिए अपने सारे छिपे हुए हर्बे इस्तेमाल करती हैं। मैं ग्राहक के इंतजार में रात एक बजे तक पब में रुकती उसके बाद वापस लौट जाती। जितने समय मैं पब में रहती जोसेफ भी बीयर की चुस्कियां लेता वहीं बना रहता। अगर कोई सौदा पट जाता तो मैं ग्राहक के साथ टैक्सी में कमरे की ओर चलती। जोसेफ टैक्सी के पीछे मोटर साइकिल पर पीछे चलता रहता। टिकुली को हॉस्टल में डाल दिया गया था, ताकि---

जोसेफ ने अचानक मेरे पूरे संसार को हिला कर रख दिया था। यह वो जोसेफ नहीं था जो मुझे अस्पताल की बेंच पर मिला था। यह तो वो जोसेफ मेरे सामने आकर खड़ा हुआ था जो उस दिन अस्पताल की बेंच पर मेरी पूरी कहानी सुनने के बाद वह मन ही मन खुश हो गया होगा कि एक अच्छा शिकार खुद उसके पास चलकर आ गया है। कुठरिया में मेरे साथ जो कुछ हो रहा था उसको जान कर उसने यह फैसला तभी कर लिया होगा कि मैं कौन-सा काम बहुत महारत से कर सकती हूं। मैं उसको जितना प्यार करती थी अब हजार गुणा ज्यादा उससे नफरत करने लगी थी। मुझे अपनी उसी नफरत को साथ लिए जोसेफ की शर्तों पर उसी के साथ रहना था। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। मेरी हालत उस आदमी जैसी हो गई जिसकी जिंदगी में छटपटाहट के सिवाय और कुछ नहीं रह गया था। उस कोठरी में जिस काम के मुझे एक आदमी से दस रुपये मिलते थे, पहुंचा दिया था वहां मुझे एक बार के एक हजार दिरहम मिलने लगे। यही था वह ‘अपना काम’ जिसे जोसेफ शुरू करना चाहता था। मैं सदमे में आ गई थी लेकिन मशीन बन गई थी। इतने मासूम चेहरे के पीछे इतना बदसूरत, काइयां और क्रूर चेहरा देखकर मैं दहल गई। मुझे गहरा धक्का लगा। उसने मेरे साथ जो किया था उसके लिए धोखा शब्द बहुत छोटा था। मुझे विश्वासघात की गहरी गुम चोट लगी थी जिसका दर्द अब कुछ भी अच्छा घटित हो जाने से कम नहीं हो सकता था। मेरी भावनाओं के साथ उसने कितना घिनौना मजाक किया था। मैं उसे जिंदगी में कभी माफ नहीं कर सकती थी। यही था उसका वह भरपूर प्यार जिसका वादा उसने पन्नी की अंगूठी पहनाते समय मुझसे किया था? मैं उसको अपना क्या मानने लगी थी, आपको बता ही नहीं सकती। जिन्दगी में एक सबक और मिला कि अपना मन और अपना दुःख उलीचने से पहले देख लेना चाहिए कि आपकी कोमल तरल भावनाएं किसी कलश में जा रही है या किसी बजबजाते गंदे नाले में गिर रही हैं--- 

 जोसेफ के साथ आकर मैं अपनी टिकुली को बचा सकी थी यही एक संतोष था जिसके सहारे मैं जोसेफ के सारे अत्याचार सह सकती थी। अब मुझे वैसे ही रहना था जैसा वह रखे। मेरा पासपोर्ट जोसेफ के पास था और रोज होने वाली कमाई भी उसी के पास रहती थी।

जोसेफ देख रहा था कि पब में आमदनी की कोई गारंटी नहीं थी। जोसेफ के पास काम करने का वीजा था लेकिन मेरे टूरिस्ट वीजा की मियाद खत्म हो रही थी। मेरे वीजा की मियाद खत्म होने से पहले ही वह मुझे और टिकुली को लेकर कहीं और जाने की योजना बना रहा था।  एक दिन उसने मुझे बताया कि वह अब हम दोनों को लेकर बैंकाक जाएगा जहां न तो कोई सरकारी रोक-टोक है और न ग्राहक मिलने में कोई दिक्कत। मुझे तो वैसा ही करना था जैसा वह कहता। मैं तो उसके हुक्म की गुलाम ही थी। उसके पीछे-पीछे चलना ही मेरी नियति बन चुकी थी। मुझे तो कमाई करनी थी क्योंकि मुझे टिकुली को पढ़ा-लिखा कर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना था। एक दिन वह, मैं और मेरी बेटी चल दिए उस नये देश की ओर। 

मैंने बैंकाक में आकर लड़कियों का बाजार देखा तो मेरा सिर घूम गया। एक पूरी सड़क थी जिसके दोनों ओर लिपी-पुती लड़कियों की मंडी लगी हुई थीं। वे इफरात में थीं और लोग खरीदने से पहले उन्हें आंखों ही आंखों तौलते हुए टहल रहे थे। लड़कियां इशारे करके और आवाजें लगा-लगाकर ग्राहकों को बुलातीं, अपने जिस्म पर हाथ फेरकर अपनी मांसलता और कामुकता का आभास करातीं। किसी ग्राहक के उपेक्षा से आगे बढ़ जाने पर वह पीछे आ रहे किसी और संभावित ग्राहक के लिए फिर वही सब दोहराने लगतीं और ऐसा करते हुए वे लड़कियां बेहद दयनीय लगतीं। पूरे शहर में सड़कों पर कहीं भी लड़कियां स्टैंड पर खड़े किए गए अपने स्कूटर पर पसरी दिखाई दे जातीं जो सीट पर बेफिक्री से अधलेटी मोबाइल से खेलती रहतीं ताकि ग्राहक उनको हर कोण से देखकर उनके जिस्म के बारे में अच्छी तरह से अंदाजा कर सके। ऐसी लड़कियां स्कूटर पर ही ग्राहक तय करतीं और सौदा तय होने पर स्कूटर के पीछे बैठाकर अपने साथ ले जातीं। 

मैं सोचने लगी कि कौन हैं ये लड़कियां? कहां से आई होंगी? क्या इनको भी इनका कोई जोसेफ ‘अपना कोई काम’ शुरू करने के लिए साथ लाया होगा और इस बाजार में उतार गया होगा? बाजार में बैठी सभी लड़कियों ने देर रात तक ग्राहक के आने के इंतजार में जागने की आदत कैसे डाली होगी? ग्राहकाें को रिझाने और पटाने की कला इन्होंने कहां से सीखी होगी? ये खुश तो नहीं होंगी फिर कैसे हर वक्त इतना हंसती और सड़क पर आपस में हंसी-ठिठोली करती रहती हैं? सभी लड़कियां हर समय कुछ न कुछ खाती दिखाई देती हैं। वो तादाद में इतनी ज्यादा थीं कि उनकी आमदनी की कोई गारंटी नहीं रहती। बहुत-सी लड़कियों को तो खाली हाथ लौटना पड़ता होगा यानी खाने में पैसा इनको अपनी जेब से खर्च करना पड़ता होगा। क्या इनका जोसेफ भी इनकी सारी कमाई अपने पास रख लेता होगा और खर्च के लिए उतना ही पैसा देता होगा जितना वह जरूरी समझता होगा? ये लड़कियां जागने के लिए बाजार में बैठ कर जो खाती हैं क्या इनका जोसेफ उसके पैसे काट लेता होगा? क्या इन लड़कियों के कोई नाते-रिश्तेदार भी रहे होंगे जिन्होंने इनको उस लफंगे ‘जोसेफ’ के साथ जाने से रोकने की भरसक कोशिश की होगी लेकिन ये नहीं मानी होंगी तब सारे रिश्तेदारों ने इनसे जीने-मरने के रिश्ते खत्म कर लिए होंगे। 

उसने इस नये मुल्क में भी टिकुली को स्कूल के हॉस्टल में रख दिया था ताकि--- मैं कैसे बताऊं कि पिछले चार-पांच बरस में मैंने कितनी तरह के मर्द देखे हैं। कई आदमी ऐसे मिले जो सिर्फ ‘कटलिंक’ के लिए मेरे पास आते थे। ऐसे लोगों को मुझसे सिर्फ इतना चाहिए होता था कि वो मेरी एक बांह का तकिया बनाकर लेटे और मुझे अपनी एक बांह के घेरे में लेकर आंखें बंद करके मेरा अपने पास होना महसूस करें। मैं भी ऐसे मर्दों की पलकों को चूम लेती और उनके बालों में उंगलियां फिराकर उन्हें अपने से चिपकाकर सुला लेती। हर औरत की तरह मैं भी आदमी की छुअन पहचानती हूं। कई मर्द ऐसे भी देखें हैं मैंने जो मुझसे सिर्फ बातें करना चाहते थे, वो बस इतना चाहते थे कि मैं उनकी झूठी-सच्ची बातें सुन लूं, और उनके प्रति सहानुभूति जताऊं, ऐसे मर्द अपनी बातें मुझे सुनाकर अपने मन का बोझ हल्का करना चाहते थे। जब-जब ऐसे मर्द मेरे पास आए जो पूरा भुगतान करके सिर्फ मुझसे बातें करना चाहते थे तब-तब मैंने अपने भीतर की मां को बहुत गहराई से महसूस किया है। किसी दुखी बच्चे को लोरी गाकर सुलाने या दुख पहुंचाने वाली बातों की तरफ़ से ध्यान हटाने के लिए बहलाने वाली बातें करने वाली मां। ऐसे हर मर्द के साथ समय बिताते हुए मेरा रोम-रोम मां बन जाता था। अपने भीतर मौजूद मां के उस विराट रूप में मैं अपने भीतर एक आश्वस्ति-सी देख पाती कि मेरे भीतर अभी सब कुछ खत्म नहीं हो गया है। लगातार रौंदी जाने के बाद भी यह बाजार मुझे अभी तक छू नहीं पाया है। मैं ऐसे मर्दों की बातें सुनकर उनके साथ कई बार फूट-फूटकर रो भी पड़ती थी। ईमानदारी से कहूं तो मेरे रो पड़ने के पीछे उनका दुःख नहीं टिकुली की याद होती थी जिससे मैं कई-कई दिनों तक मिल ही नहीं पाती थी।          

 उस दिन मैं सड़क पर ग्राहक की प्रतीक्षा में खड़ी थी। 

जोसेफ हमेशा की तरह कुछ दूरी पर खड़ा सिगरेट फूंक रहा था। एक आदमी मेरे पास आया। रेट पूछने के बाद उसने मुझे अपने होटल का नाम और कमरा नंबर बताया और अगले दिन शाम चार बजे होटल पर आने को कहा। हम दोनों ने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर लिए। वह अपने रास्ते चला गया। आदमी के चले जाने के बाद जोसेफ मेरे पास आया। मुझे उसे बताना ही था कि मेरी उस आदमी से क्या बात हुई है। जोसेफ ने मुझसे कहा कि होटल में बुलाने पर यहां पांच हजार भात का रेट है। मैंने उससे इस बारे में यानी बढ़े हुए पैसों के बारे में तो कोई बात ही नहीं की थी। मैंने उस आदमी को फोन मिलाया और पांच हजार भात लेने की बात बताई। वह राजी हो गया। 

अगले दिन मैंने होटल के बाहर पहुंचकर उस आदमी को फोन किया कि मैं पहुंच गई हूं। किसी ग्राहक के पास होटल में जाने का वह मेरा पहला मौका था। उसने मुझसे कहा कि वह होटल की दसवीं मंजिल पर है, मैं लिफ्रट से ऊपर पहुंचू वह मुझे लिफ्रट के सामने खड़ा मिलेगा। मैं होटल के अन्दर गई और जैसे ही लिफ्रट की ओर बढ़ने लगी तभी सिक्योरिटी गार्ड ने मुझे रोक लिया। यहां का नियम है कि अगर कोई आदमी किसी औरत को होटल के कमरे में ले जाता है तो आदमी को काउन्टर पर आकर एक फार्म भरना होता है और दो हजार भात बतौर फीस जमा करने होते हैं। मेरी जैसी हर औरत को यहां की सरकार ने आइडेंटिटी कार्ड दे रखा है। कमरे में जाने वाली औरत को अपना आइडेंटिटी कार्ड काउंटर पर जमा कराना होता है जो उसे होटल से जाते समय वापस किया जाता है। गार्ड से यह सुुन कर मैंने उस आदमी को फिर फोन मिलाया कि मुझे ले जाने के लिए उसे ही नीचे आना पड़ेगा। वह नीचे आया, उसने फार्म भरा। जब दो हजार भात जमा करने की बारी आई तो उसने पाया कि जल्दी में पर्स वह अपने कमरे में ही छोड़ आया है। उसने मुझसे पास में पड़े सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए कहा कि वह पर्स लेकर अभी आता है। जरा देर बाद काउंटर पर कुछ हलचल हुई। काउंटर पर लोगों की बातों से पता लगा कि होटल में दसवीं मंजिल पर रहने वाला कोई कस्टमर कमरे के इलेक्ट्रिानिक ताले की चाबी अंदर ही भूल गया है और उसने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया है। कस्टमर को अपने कमरे में जाने के लिए डुप्लीकेट चाबी की जरूरत है। मैं सोफे पर बैठी अनुमान लगा रही थी कि हो न हो यह वही आदमी है जो मुझे अपने कमरे में ले जाने वाला है और अभी-अभी ऊपर गया है। 

डुप्लीकेट चाबी से उसका कमरा खुलते-खुलते दस-पंद्रह मिनट का समय बीत गया। जब वह नीचे आया तभी उसने सामने से आते कुछ हुए कहीं और देखने लगा। मुझे उसका घबराना और शर्माना बहुत अच्छा लगा। बहुत दिनों बाद किसी मर्द को शर्माते हुए देख रही थी। मर्दों की बेशर्म दुनिया में वह एक अजूबा-सा लगा। वह मुझे पहचानना छोड़ अपने उन साथियों की ओर मुड़ गया। उसने मेरी ओर पीठ फेर ली जैसे मुझे पहचानता ही न हो। मैंने अनुमान लगाया कि वे लोग इसके साथी रहे होंगे और यह आदमी नहीं चाहता रहा होगा कि उसके साथी जानें कि वह अपने कमरे में ले जाने के लिए किराए की औरत लाया है। मैं पास में पड़े सोफे पर बैठी उसको देख रही थी। वे लोग काफी देर तक उस आदमी से लॉबी में खड़े होकर बातें करते रहे। उस आदमी को बताते रहे कि उन्होंने कौन-कौन सी जगहें देखी हैं जिन्हें इस आदमी ने उनके साथ न जाकर मिस कर दिया। बहुत देर बाद उस आदमी ने सबकी नजरें बचा कर मुझे चोर निगाहों से एक बार देखा। काफी समय बीत गया। जब उसके साथी अपने-अपने कमरों में जाने के लिए उसके पास से हटे तो वह आदमी मेरे पास आया और पांच सौ भात का एक नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला- ‘‘आई एम सॉरी, आप जाइये।’’ मैंने नोट उसके हाथ से ले लिया। मैं चल पड़ी। उसका ‘सॉरी’ और ‘आप जाइये’ मेरे साथ हो लिया जो बहुत दूर तक मेरे साथ चलता रहा जब तक कि होटल केे बाहर मंडरा रहा जोसेफ, मेरे पास नहीं आ गया। मैं मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर उसके साथ चल दी। मैंने मोटरसाइकिल की सीट पर बैठने के लिए जोसेफ के कंधे का सहारा नहीं लिया। उसके स्पर्श से अपने को भरसक बचाते हुए मैं होटल की लॉबी में ही विचर रही थी।

‘‘कैसा रहा?’’

मैं चुप रही। मैं किसी के शर्म से झुके सिर, घबराहट में इधर-उधर देखने और ‘‘आई एम सॉरी’’ में डूबी थी।

‘‘मैंने पूछा कैसा रहा वो आदमी?’’ जोसेफ ने गुर्राहट के साथ दोहराया।

‘‘तुम जरा देर चुप नहीं रह सकते?’’ मैंने उसे झिड़कते हुए जवाब दिया। 

फिर सारे रास्ते न जोसेफ ने कुछ पूछा और न मैं कुछ बोली। मेरा चुप रहने का मन हो रहा था। कानों में ‘आई एम सॉरी, आप जाइये’ ही बज रहा था। मेरी जैसी किराए की औरत से ‘सॉरी?’, ‘आप?’। अपने लिए इन शब्दों की तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मन करने लगा कि सोया की मनभावन सुगन्ध जैसे उस आदमी को फोन करूं और कहूं कि बस एक बार मुझसे मिल ले, मुझसे बातें कर ले और मुझे इस अहसास से भर दे कि बाजार में बैठी होने के बावजूद मैं बाजारू नहीं लगती हूं।

‘‘हां, अब बताओ। कैसा रहा?’’

पांच सौ भात का नोट देते हुए मैंने होटल में जो कुछ हुआ था उसे बताया। वह खामोशी से सुनता रहा फिर अचानक उसने उछलकर मेरे सीने पर भरपूर से लात मारी। मेरी सांस रुकने-रुकने को हो आई।

‘‘चुपचाप वो पांच हजार भात निकाल कर मुझे दे दे। ये कहानियां मत सुना।’’ उसने मेरे बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ कर मुझे बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया।   

जोसेफ मारपीट करता जरूर था लेकिन उस दिन तो वह मुझे जानवरों की तरह पीट रहा था। ये उसका बिल्कुल नया रूप था जिसके लिए मैं तैयार नहीं थी। उससे पहले पैसे को लेकर कोई ऐसी स्थिति भी तो पैदा नहीं हुई थी। हमेशा तो यह होता था कि जोसेफ के साथ घर लौटते ही मैं मिले हुए भात उसके सामने फेंक देती थी।

पैसा मुझे मिला होता तब तो मैं उसको देती। जो पांच सौ भात उसने दिए थे मैं उसको दे चुकी थी। मार-मारकर थक चुकने के बाद जोसेफ मुझे बालों से पकड़कर गोल-गोल घुमा रहा था। मैं कहती जा रही थी कि उसने बस इतने ही दिए हैं। सिर दीवार से टकरा दिए जाने के बावजूद मैंने ‘‘आयम सॉरी, और ‘आप जाइये’’ को अपने पास बचाए रखा। उन शब्दों को उसे बताकर गंदा नहीं होने दिया। 

‘‘रंडी--- साली कुतिया--- आखिरी बार कह रहा हूं वो पांच हजार तूने अपने जिस यार के पास रख छोड़े हो वहां से लाकर मुझे दे दे वरना पांच हजार भात के पचास हजार भात कैसे बनाए जाते हैं मुझे मालूम है। तेरी बेटी को कल ही रात पचास हजार भात की बोली पर चढ़ा दूंगा। अभी तो ‘स्प्राउटेड’ है, इतने तो आसानी से मिल जाएंगे। बोल देती है पांच हजार या।’’ 

स्प्राउटेड का मतलब मेरी समझ में तब आया जब जोसेफ ने अपने दाहिने हाथ की उंगलियों को गेंद के आकार में गोल-गोल घुमाया। जैसे किसी पके हुए फोड़े से बदबूदार मवाद बह निकला हो। वह मेरी टिकुली की बढ़ती उम्र के साथ उसके विकसित हो रहे अंग की बात कर रहा था। अचानक मेरा मन हो आया कि एक बार वह आदमी मिल जाए तो मैं उसके पैरों पर अपना सिर रखकर उसका शुक्रिया अदा करूं क्यों कि उसी की वजह से मैं जान पा रही थी कि जोसेफ की निगाह मेरी बेटी पर है। मेरा सिर घूमने लगा, दीवार से टकराए जाने के कारण नहीं, टिकुली के बारे में उसने जो कहा उसे सुनकर।  

प्रकृति ने औरत को बिगड़ी बात को संभाल ले जाने की अद्भुत क्षमता दी है। संकट जितना बड़ा होता है उसकी बुद्धि उतनी ही तेजी से काम करती है। हालात को काबू में करने के लिए जब वह कोई नाटक करती है तब उसे शायद खुद भी पता नहीं लगता कि वह नाटक कर रही है। 

उस रात मैंने अपने नाटक की शुरुआत जोसेफ को शराब पिलाने से की। पूरे नाज-नखरे और अदाओं के साथ साकी का स्वांग भरकर मैंने देर रात तक उसको शराब पिलाई। शुरू के दो-तीन पैग हल्के बनाए और उसके बाद बाकी पैग उसकी तरफ पीठ फेरकर आड़ में डबल बनाने शुरू कर दिए। पैग स्ट्रांग हैं इसकी तरफ वह ध्यान न दे पाए इसके लिए मैंने रो-रोकर उससे माफी मांगने का नाटक शुरू कर दिया- 

‘‘उस आदमी ने जो पांच हजार भात मुझे दिए थे वह मैंने होटल के काउंटर पर ही एक आदमी के पास छोड़ दिए हैं। मैंने सोचा था किसी दिन तुमसे छिपाकर ले आऊंगी और अपने पास रख लूंगी।’’ इसके बाद मैंने अपने मुंह पर सचमुच जोर-जोर से तमाचे मारते हुए अपनी आवाज में पश्चाताप का रूदन घोला, ‘‘मेरे मन में लालच आ गया था जोसेफ, तुमने मेरे लिए इतना किया और मैंने तुम्हारे जैसे नेक इंसान को धोखा देने की कोशिश की, मैं बहुत खराब हूं। देखो, मेरी यह पहली गलती है मुझे माफ कर दो, आइंदा ऐसा कभी नहीं होगा।’’ 

‘‘मुझसे बचकर कोई कहीं जा नहीं सकता मेरी जान। जाओ, मैंने तुम्हें माफ किया। आओ, आज इसी बात पर जश्न मनाते हैं।’’, ‘असली बात’ उगलवा लेने के घमंड और आठ डबल पैग के नशे में चूर जोसेफ ने कहा। उसने मुझे अपनी ओर खींचा और मैंने उसकी ओर एक और गिलास बढ़ाकर उसको रोका। वह जितनी बार मुझे अपनी ओर खींचता, मुझे याद आता, ‘आई एम सॉरी, आप जाइये।’

शराब पीते-पीते जोसेफ इतना बेदम हो चुका था कि वह अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं रह सकता था। उसकी टांगें केचुए जैसी हो गईं थीं जो उसके शरीर का बोझ नहीं उठा पा रही थीं। वह शायद बाथरूम जाने के लिए उठा और खड़े होने की कोशिश करते ही वापस बिस्तर पर गिर गया। उसने बिस्तर पर ही पेशाब कर दी थी और पेशाब के कुंड में पड़ा मुझे जश्न मनाने के लिए बुला रहा था।

‘‘आज सो जाओ मेरे प्यारे जोसेफ, जश्न हम दोनों कल रात मनाएंगे।’’ मैंने उसे पुचकारते हुए कहा। जरा देर में वह मरे जैसा हो गया।

एक रात मेरे ससुर ने मेरी बेटी को मेरे साथ सड़क पर खड़ा कर दिया था और उस रात जोसेफ ने मेरी बेटी को बाजार में उतारने की धमकी दे दी थी। आखिर मैं क्या करती। मेरे निकलने के सारे रास्ते आखिरी तौर पर बंद कर दिए गए थे। 

जोसेफ कुछ दिन पहले घर में कीमा बनाने के लिए एक बहुत तेज धार वाला बड़ा-सा चाकू लाया था। मुझमें भला इतनी हिम्मत कहां थी, लेकिन इतने दिनों से उसके लिए मन में जमा हो रही नफरत और बेटी टिकुली को बाजार में उतार दिए जाने की धमकी के पहाड़ों से घिर जाने कारण मेरे हाथों में न जाने कहां से कई गुना ताकत आ गई थी---

रात में ही मैं आला-ए-कत्ल के साथ पुलिस स्टेशन पहुंची, अपना गुनाह कुबूल किया और अपने आप को कानून के हवाले कर दिया। 

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