नवीन पंछी

कर लो ऐसा
आती-जाती परछाइयों में से 
रोक लो या पकड़ लो किसी एक को 
लगा दो उस पर मनचाहा चेहरा
अपनी-सी लगती आंखें ऐसी
कोई मुस्कान
मिली नहीं आज तक जो
भर दो अपने से उनमें
जितना मन करे स्नेह रस
दो उसे सीख आत्मीयता-अपनेपन की 
सिखाओ उसे टूटकर गले मिलना भी
फिर देखो सामने से उसे
शायद निकल आए
इसी तरह उसमें से कोई
कहा जा सके जिसे
बेलाग अपना।
कुछ ऐसा किया तो जाय
अनजानी-अजनबी परछाइयों में से ही
कोई ढाला जा सके
अपना कहने के लिए अकेलेपन को 
अर्थहीन बनाने के लिए
---
तड़प
अपनी कोई उम्र नहीं होती तड़प की
फिर भी दिल की छलनी-छलनी हुई
दीवारों से चिपकी
धमनियों-शिराओं से
चूस-चूस कर खून
जी ही लेती है उम्र भरपूर
किसी की भी।
मरती है धड़कनों के रूकने के साथ
नजर नहीं आती कभी
बावजूद अपनी मौजूदगी का 
करवाती रहती है
हर पल ही अहसास
शब्दहीन है तड़प 
लेकिन बतियाती है
चीसों और टीसों में
जख्मी कलेजों से।
खास है इतनी कि 
छिपी ही रहती है निकल आये तो
हो जाय कब की नीलाम
सरेआम इज्जत की तरह।
जरूरी है इसीलिए
छिपे रहना उसका।
छिपी रहती है जी लेती है तभी
बेचेहरा यह तड़प।
मरती है तब पता चलता है 
चिता की चड़चड़
या 
कब्र में जम चुके नमक से कि 
नहीं रही तड़प अब।
लेकिन
देर बहुत हो चुकी होती है तब तक
चाट चुकी होती है वो
एक बेगुनाह जिंगदी।
तड़प 
चली आये आंखें भी
समंदर में 
और 
समंदर भी
छोड़ दे अगर
हदें अपनी
निकल आये सड़क पर
तो
बह ही जाय 
सब कुछ।
जानती है तड़प 
छोड़ती नहीं तभी
दिल की छलनी हुई
दीवार की पनाहगाह अपनी।
तय तड़प ही किया करती है
सांस के सफर की दूरियां।
नहीं जान सका
आज तक कोई कि 
आखिर किस दिशा-दशा से
चली आती है 
कब ये तड़प
---और क्यों?
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