नवीन पंछी

कर लो ऐसा
आती-जाती परछाइयों में से 
रोक लो या पकड़ लो किसी एक को 
लगा दो उस पर मनचाहा चेहरा
अपनी-सी लगती आंखें ऐसी
कोई मुस्कान
मिली नहीं आज तक जो
भर दो अपने से उनमें
जितना मन करे स्नेह रस
दो उसे सीख आत्मीयता-अपनेपन की 
सिखाओ उसे टूटकर गले मिलना भी
फिर देखो सामने से उसे
शायद निकल आए
इसी तरह उसमें से कोई
कहा जा सके जिसे
बेलाग अपना।
कुछ ऐसा किया ....
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