नीतीश मिश्र

जब भी जिंदगी पंतग की
मानिंद हवा में उड़ती है
मैं उदास होकर अपनी 
बौद्धिकता उतार कर फेंक देता हूं
और मृत्यु को धागे की 
तरह हाथ में लेकर 
जीवन को और सरल करता हूं
मृत्यु के बारे में सोचना 
उतना ही आसान है 
जितना कपास के 
फूल के बारे में सोचना
मैं अक्सर अंधेरे में 
तुम्हारा एक स्केच बनाता हूं
और उसमें उम्मीद का 
सप्तरंगी रंग भरता हूं
हवा में कुछ शब्द लिखता हूं 
और दीवार पर एक कविता की 
एक पंक्ति लिखता हूं
यह दिन बहुत आसान है
भले से पेट में भूख हो कई बार 
भूख रूई की तरह सफेद 
और पवित्र लगती है
और हम उसी के साये में 
जिंदगी की आयते बुनते रहते हैं
अभी यही सब सोचता रहता हूं 
कि सुराही उदास होकर 
मुझे घूरती है और मेरे होने का अर्थ 
मुझसे ही पूछती रहती है
इतने में पृथ्वी के घूमने की 
आहट महसूस करता हूं 
और कमरे में रखी हुई 
सारी चीजें एक बार पूरी तरह 
घूम कर एक नये अर्थ में 
मेरे सामने खड़ी हो जाती है
तभी मेरी नजर 
एक सफेद कागज पर पड़ती है
जहां कभी मैंने अपने नाम का 
हस्ताक्षर किया था 
मेरा सीधा सा नाम 
कागज में ऐसे दिखता है 
जैसे मैं जिंदगी के आईने में 
अपनी मौत को देखता रहता हूं 
इतने में तेज बारिश की आवाज 
कानों में सुनाई देती है
मैं सभी चीजों को 
बचाने के लिए सचेत होता हूं  
लेकिन इससे पहले ही 
बारिश खिड़कियों के आसरे से 
बिस्तर तक दस्तक देने लगती है
शायद बारिश की कुछ बूंदे 
अपने स्रोत से चलने के समय ही 
तय कर रखी हो कि हमें 
अमुक जगह थोड़ी 
देर के लिए जाना है 
और एक फूल की तरह वहां 
कुछ देर रहना है फिर गल जाना है
मैं बहुत ही इत्मीनान के साथ 
कुछ बारिश के बूंदों को देखता हूं
इतना कोमल 
जितना कोमल मेरी मृत्यु
लेकिन बारिश की बूंदे 
मेरे स्पर्श में आते ही 
मेरी ओर ऐसे देखती है 
जैसे मैं इनका कोई हत्यारा हूं
इतने में सामने इमली के पेड़ से 
एक आवाज सुनाई देती है
मैं आवाज की ओर भागता हूं 
पता चलता है कि इमली की 
एक डाली टूट गई
मुझे लगता है कि मेरे सामने 
एक हत्या हुई और 
मैं हत्यारे को पहचान नहीं सका
शायद ऐसे ही सभी हत्यारें 
आंखों से धूमिल हो जाते है
और न्याय धूल की तरह सड़क पर 
कहीं बहुत दूर पड़ी रहती है
किसी बारिश के इंतजार में।
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