साधना अग्रवाल

आलोचना के विभिन्न परिसर

विश्वविद्यालय के ही परिसर नहीं होते, परिसर साहित्य के भी होते हैं जिसमें विभिन्न विधायें-उपन्यास, कहानी, कविता और आलोचना-समीक्षा स्थित होती हैं। 

आलोचना-समीक्षा शब्द-युग्म तो नहीं है लेकिन आजकल लगभग एक-दूसरे के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। परिसर और परिवेश दोनों का संबंध जटिल है। वैसे तो आलोचना का जन्म समीक्षा से ही हुआ है लेकिन आलोचना की आज जो स्थिति है, वह इसलिए है कि आलोचना और समीक्षा का फर्क मिट गया है। 
आलोचना को साहित्य का विवेक कहा गया है बल्कि डॉ- काशीनाथ सिंह ने तो यहां तक कहा है कि आलोचना भी रचना है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि रचना की तरह ही आलोचना की प्रक्रिया भी जटिल और संश्लिष्ट होती है।
हिंदी के चर्चित आलोचक प्रो- गोपेश्वर सिंह की सद्य प्रकाशित पुस्तक है- ‘आलोचना के परिसर’ इस पुस्तक के बारे में भूमिका में उन्होंने संकेत दिया है कि रचना का कोई एक परिसर नहीं होता। रचना की तरह आलोचना भी बदलती रहती है। इस पुस्तक के तीन खंड हैं- कवि और कविताए हिंदी गद्य के विविध रंग और अंतिम आलोचना और समाज। इस पुस्तक का पहला लेख है- ‘महात्मा गांधी और भक्ति कविता’ जिसमें उन्होंने गांधी जी की भक्ति कविता पर प्रभाव दिखाया है।
अगला लेख है- ‘तार सप्तक’ और ‘अज्ञेय’। यह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण लेख है कि यह हिंदी का पहला संपादित काव्य-संकलन है, जिसके प्रकाशन की स्वर्ण जयंती हिंदी में मनाई गयी थी। अज्ञेय द्वारा संपादित और 1943 में 
प्रकाशित ‘तार सप्तक’ का महत्व ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि युगांतकारी भी है। गोपेश्वर सिंह लिखते हैं- तार सप्तक की सबसे बड़ी भूमिका छायावादी प्रभाव से कविता को मुक्त करने में है। छायावाद जैसे प्रतापी काव्यांदोलन का प्रभाव कविता पर तो था ही, गद्य पर भी था। इसके कारण साहित्य में, ख़ासकर कविता में, एक किस्म का ठहराव आने लगा था। इसे तोड़ने की कोशिश सबसे पहले बच्चन, दिनकर और अन्य उत्तर छायावादी कवियों ने की। ‘‘आगे उन्होंने फिर लिखा है’’ ‘तार सप्तक’ का ऐतिहासिक महत्व तब समझ में आता है, जब हम पाते हैं कि आगे की हिंदी कविता उस रास्ते चली जिसकी नींव इस संकलन के जरिए रखी गयी। 
‘यह अलग बात है कि हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ- रामविलास शर्मा ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन के महत्व को स्वीकार नहीं करते हैं जबकि वह खुद इसके एक कवि थे। वह कहते हैं कि ‘तार सप्तक’ के पहले ऐसी ही कविता लिखी जाती थी। लेकिन ‘तार सप्तक’ का महत्व इस दृष्टि से भी है कि इसमें संकलित कवियों में मुक्तिबोध भी थे जिन्हें समकालीन हिंदी कविता में निराला के बाद सबसे बड़ा कवि माना गया।
इस पुस्तक में शमशेर पर भी एक लेख है- ‘एक शमशेर भी हैं।’ शमशेर हिंदी के जटिल ही नहीं ऐंद्रिक कवि हैं। विजयदेव नारायण साही का प्रसिद्ध लेख है- ‘शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट।’ इस पुस्तक में नागार्जुन पर दो लेख हैं जिनका संबंध जेपी आंदोलन से है। गोपेश्वर जी ने नागार्जुन को जन आंदोलनों का कवि ठीक ही कहा है। जेपी आंदोलन के दौरान नागार्जुन जेल भी गए थे। जेल में लिखी उनकी ये काव्य-पंक्तियां बहुत प्रसिद्ध हैं- इन सलाखों पर टिका कर भालध देखता ही रहूंगा मैं चिरकाल। यह बात अलग है कि बाद में नागार्जुन का जेपी आंदोलन से मोहभंग हुआ। 
इसी खंड में मुक्तिबोध पर भी एक लेख है- ‘अंधेरे में’ और हिंदी कविता के पचास वर्ष। ‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है। छठे दशक की कविता में अज्ञेय का वर्चस्व था लेकिन डॉ- नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के केंद्र में मुक्तिबोध को रखा। ‘अंधेरे में’ कविता को लेकर हिंदी के आलोचक एक मत नहीं हैं। नामवर जी ने मुक्तिबोध की इस कविता को ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ कहा था लेकिन वस्तुतः यह कविता फासिस्जम की आशंका की अभिव्यक्ति है। इसलिए इसे फैंटेसी बिम्बों में रचा जाना ही संभव था। गोपेश्वर जी कहते हैं। ‘अंधेरे में’ ‘नयी कविता’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह न सिर्फ ‘नई कविता’ की, बल्कि संपूर्ण छायावादोत्तर दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह ‘कामायनी’ और राम की शक्ति पूजा के बाद हिंदी की सबसे महान कविता है। यह अच्छी बात है कि अंधेरे में जैसी कविता को उसके प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे होने पर हिंदी समाज ने उसे याद किया।      
कवि वेणु गोपाल पर जो लेख है वह वस्तुतः संस्मरणात्मक है। गोपेश्वर जी ने उनसे भेंट के उल्लेख के साथ उनके दूसरे काव्य-संग्रह ‘हवाएं चुप नहीं रहतीं’ की ‘देखना और सुनना’ कविता की कुछ पंक्तियों को उद्धृत किया है। 
दूसरे खंड में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद पर तो लेख हैं ही, हिंदी के लगभग विस्मृत आलोचक प्रो- नलिन विलोचन शर्मा पर भी एक सुचिंतित आलेख है। नलिन जी में उच्च कोटि की आलोचकीय प्रतिभा थी लेकिन आकस्मिक और अल्पायु में निधन होने के कारण हिंदी समाज को उनके आलोचकीय व्यक्तित्व का ठीक से पता नहीं चल सका। 
फणीश्वरनाथ रेणु के पहले उपन्यास ‘मैला आंचल’ पर नलिन जी की समीक्षा ‘आलोचना’ पत्रिका में छपी थी, उस एक समीक्षा ने रेणु को इतनी प्रसिद्धि दिलाई कि प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास में उनका नाम लिया जाने लगा। रेणु को समझने में नामवर जी भी चूक गए जिसका उन्हें भारी अफसोस था। नलिन जी पर रूपवादी आलोचक होने का आरोप लगाया गया है। गोपेश्वर जी ठीक कहते हैं- ‘‘नलिन जी की आलोचना में ‘मुक्ति’ और ‘स्वच्छन्दता’ संबंधी धारणा के कारण एक तरह का खुलापन है। वह यह भी कहते हैं कि ‘‘प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल और निराला को नलिन विलोचन शर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य का शिखर मानते थे। नलिन जी आत्यांतिक रूप से नवीनता के आग्रही आलोचक थे। वे तात्कालिक यथार्थवाद और रूपवाद जैसे आलोचनात्मक प्रत्ययों से इत्तेफाक नहीं रखते।’’ कहना चाहिए कि गोपेश्वर जी ने नलिन विलोचन शर्मा को आलोचना के गहबर से ढूंढ कर निकाला है जिसका प्रमाण है साहित्य अकादेमी के लिए लिखित उनका मोनोग्राफ और नलिन विलोचन शर्मा संचयन। अपनी छोटी-सी जिन्दगी में नलिन जी ने जितना लिखाए उसका बहुत छोटा हिस्सा प्रकाशित हुआ है। विडम्बना की बात यह है कि अब तक किसी ने कोशिश नहीं की उस आलोचक की जिसने पहली बार ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ जैसी पुस्तक लिखी उनकी रचनावली प्रकाशित करता। वैसे इस पुस्तक में रेणु पर भी एक लेख है। 
इस पुस्तक में एक महत्वपूर्ण लेख है- ‘बदरीविशाल पित्ती’ और ‘कल्पना’ हम जानते हैं कि ‘कल्पना’ अपने समय में हिंदी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका थी। बदरीविशाल पित्ती समाजवादी थे और लोहिया के प्रबल समर्थक थे लेकिन ‘कल्पना’ ने रचनाओं की स्तरीयता से कभी समझौता नहीं किया। गोपेश्वर जी ने हैदराबाद केंद्रीय वि-वि- में अपनी नौकरी के दौरान हैदराबाद में अपनी उपस्थिति का एक बड़ा लाभ उठाया। उनकी पित्ती जी से तो मुलाकात हुई ही, उन्होंने स्वतंत्र रूप से एक पुस्तक संपादित की, ‘कल्पना का उर्वशी विवाद’ जो नयी पीढ़ी के लिए एक धारोहर की तरह है। दूधनाथ सिंह थे तो मूलतः कथाकार लेकिन जब-तब आलोचना में भी हाथ-पांव मारा करते थे। उनकी एक पुस्तक है- ‘निराला आत्महंता आस्था’, जिसे हिंदी समाज ने स्वीकार नहीं किया। इस पुस्तक में दूधनाथ जी की ‘महादेवी’ पुस्तक पर एक लेख केंद्रित है जिसमें उन्होंने दूधनाथ सिंह के द्वारा महादेवी को एक नयी दृष्टि से देखने की कोशिश की है। इस खंड का अंतिम लेख है- ‘समीक्षा की साख’ लेख का आरंभ ही है- हिंदी में जिस विधा की सर्वाधिक दुर्गति हुई है, वह है पुस्तक-समीक्षा। फिलहाल पुस्तक-समीक्षा लिखने-लिखाने का जो आलम है, वह प्रायः जुगाड़ उद्योग-सा है। कहने की जरूरत नहीं कि समीक्षा की इस दुर्दशा के लिए हिंदी के केवल अध्यापक, आलोचक ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि संपादक की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। मुक्तिबोध अपनी पुस्तक ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखते हैं- ‘बातचीत के दौरान पता चला कि हिंदी का हर प्राध्यापक अपने को आलोचक समझता है।’
वैसे तो पुस्तक के अंतिम खंड में 10 लेख हैं लेकिन मैं यहां कुछ लेखों की चर्चा करना चाहूंगी। ‘स्वतंत्रता एक अधूरा शब्द है’ दरअसल दिवंगत पत्रकार लेखक राजकिशोर की टिप्पणी को ही इस लेख में पल्लवित-पुष्पित किया गया है क्योंकि भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद यहां की जनता का जो स्वप्न था, नेहरू से उसका मोहभंग हो गया। ‘हिंद स्वराज’ एक पुनर्विचार इसी खंड का एक सुविचारित लेख है जिसमें गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ के 100 वर्ष पूरे होने पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हुई थी जिसके बाद हिंद स्वराज पर गंभीरता से विचार होने लगा। दरअसल, भारत को स्वतंत्रता मिलने के संदर्भ में ‘हिंद स्वराज’ गांधी जी की प्रस्तावना थी स्वतंत्रता के बारे में। गोपेश्वर जी लिखते हैं। ‘1909 में हिंद स्वराज’ के प्रकाशन के पूर्व 1848 में कार्ल मार्क्स’ कम्युनिस्ट मेनिफस्टो लिख चुके थे। ये दोनों छोटी पुस्तकें हैं, मगर दुनिया को बदलने की, एक नयी सभ्यता रचने की आकांक्षा से लिखी गयी बड़ी पुस्तकें हैं। मार्क्स ने कहा था- दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। यह भी कहा कि अब तक दुनिया की व्याख्या दार्शनिकों ने अलग-अलग ढंग से की है, लेकिन जरूरत अब इस दुनिया को बदलने की है। गांधी ‘हिंद स्वराज’ में न केवल दुनिया को बदलने की बात करते हैं, बल्कि दुनिया की व्याख्या भी करते हैं।
पुस्तक का लगभग अंतिम लेख है- ‘लेखक संघों की हकीकत’ हम जानते हैं कि लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) का गठन हुआ लेकिन समय बीतने के साथ प्रगतिशील लेखक संघ का सांगठनिक ढांचा चरमराने लगा और वह भंग हो गया। क्योंकि संगठन में न केवल कम्युनिस्ट पार्टी का बढ़ता हस्तक्षेप था बल्कि संगठन में बढ़ती संकीर्णता भी थी। बाद में प्रलेस को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एजेंडे के अनुसार ‘जनवादी लेखक संघ’ बना और कम्युनिस्ट मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी की प्रतिबद्धता के कारण ‘जनसंस्कृति मंच’ बना। गोपश्वर जी लेखक संघों की हकीकत से उदास ही नहीं निराश भी हैं क्योंकि उनके अनुसार इन संगठनों की सत्ता में हिस्सेदारी उनका पहला एजेंडा है, लेखकों के अधिकारों के लिए संघर्ष करना नहीं। यही कारण हैं कि कॉपीराइट एक्ट को बदला नहीं गया और आज भी प्रकाशक लेखकों का उसी तरह शोषण करते हैं जिस तरह कभी निराला का किया था।
अंत में मुझे यही कहना है कि गोपश्वर सिंह की आलोचना की भाषा सहज और सरल ही नहीं, स्वच्छ और निर्मल भी है। यही नहीं अनावश्यक वाग्जाल से भी वह मुक्त हैं। वे अपनी बात जिस तरह कहना चाहते हैं, कह देते हैं और हिंदी के पाठकों को उनकी बात समझने में कोई दिक्कत नहीं होती, इसलिए भी यह पुस्तक पठनीय है।


***

पूछताछ करें