उर्मिला शुक्ल

प्रेम धार तलवार की

प्रेम जीवन का शाश्वत सत्य है। सृष्टि का आधार ही प्रेम रहा है और साहित्य का भी। तभी तो विश्व की हर भाषा में प्रेम कहानियां लिखी गयीं हैं। भारतीय साहित्य भी इससे अछूता नहीं है और हमारे लोक में भी तो नल -दमयंती, रानी सारंगा और सदाव्रत, हीर-रांझा, शशि -पुन्नू जैसी कई-कई प्रेम कथाएं मिलती हैं। प्राचीन काल के  इन रूहानी प्रेम के किस्सों से लेकर आधुनिक कथा साहित्य तक, प्रेम के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। यहां  तक के सफर में प्रेम का रूप बदला और उसने रूह से देह तक का सफर तय किया। बीसवीं सदी तक आते-आते जीवन से रूहानी प्रेम ने विदा ली तो कहानी से भी रूहानी प्रेम  नदारद हुआ और उसके स्थान पर यथार्थ पोषित प्रेम आयाय जिसमें त्याग और बलिदान जैसी भावना रह ही नहीं गयी। अब प्रेम पाने और सिर्फ पाने का नाम बनकर रह गया था। वैसे प्रेम की राह  आसान तो कभी नहीं थी। तभी तो इसे तलवार की धार पर चलने जैसा दुरूह माना गया। मगर इस पाने के गणित ने प्रेम की राह को और भी दुरूह कर दिया था। अब इसमें छल, प्रपंच और स्वार्थपरता गहरे तक समा चुकी थी। इसीलिए दुनिया की हर प्रेम कथा मुश्किलों से भर उठी। 
फिर भारत में? भारतीय समाज में तो प्रेम की परिभाषा ही अलग रही है। यहां प्रेम और परिवार को दो अलग धरातल माना जाता है, इसीलिए यहां दाम्पत्य प्रेम ही स्वीकृत होता रहा है। ऐसा नहीं है की यहां परकीया यानी दाम्पत्य से इतर प्रेम घटित ही नहीं होता। वह घटित तो होता है, मगर परिवार और समाज के विरोध में जल्दी ही दम भी तोड़ देता है। हमारा समाज चाहता है कि व्यक्ति दांपत्य से इतर प्रेम में पड़े ही न। इसीलिए समाज अपनी बाड़े और सघन और ऊंची करता जाता है। मगर बाड़े जितनी सघन और ऊंची होती हैं, प्रेम का हौसला भी उतना ही बुलंद होता जाता है। तभी तो समाज में नित नये प्रेम के किस्से प्रस्फुटित होते रहते हैं और उनसे जन्म लेती हैं प्रेम कहानियां।
ऐसी ही प्रेम कहानियां  सुषमा मुनींद्र के इस संग्रह में संकलित हैं जिसका शीर्षक है ‘प्रेम संबंधों की कहानियां।’ इस संग्रह में बारह कहानियां हैं जो अलग-अलग परिवेश धरातल पर उपजे प्रेम को प्रस्तुत करती हैं। इन प्रेम कहानियों में अधिकांश युवा मन में उपजे प्रेम की दास्तान हैं, जहां सारी दुनिया से टकराकर अपने प्रेम को हासिल कर लेने का साहस है, शायद इसीलिए इन प्रेम कहानियों की परिणति विवाह है। ‘योग क्षेम’, ‘कसरत वाली’, हमरी न मानो बधाई से पूछो, ‘शो फ्रलॉप’, इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं, ऐसी ही कहानियां हैं, जहां प्रेम तो अलग-अलग परिवेश और परिस्थियों में होता है, मगर विवाह के बाद की 
पारिवारिक समस्याओं के चलते प्रेम दम तोड़ देता है और बाकी रह जाता है सिर्फ कलह जिसके चलते प्रेमी मन में अपने भूतपूर्व प्रेम पर पछतावा पनपने लगता है कि उसने प्रेम क्यों किया। ‘योग क्षेम’ कहानी में विवाह से पूर्व की स्थितियां ही चित्रित हैं, इसलिए यहां नायक की सारी जद्दोजहद नायिका को अपने प्रेम की गिरफ्रत में लेना ही है। वह कहानी की नायिका लघिमा जो संन्यासिनी बनने की राह पर है। उसे प्रेम और संसारिकता की और आकर्षित करने के लिए लगातार कोशिशें करता है और अंत में सफल हो जाता है। लघिमा उसके साथ के लिए अपनी धार्मिक संस्था का परित्याग कर देती है।  इस कहानी को छोड़कर युवावस्था के प्रेम को प्रस्तुत करती बाकी सभी कहानियों में प्रेम की परिणति विवाह है, जिसके बाद प्रेमी अपने  मरे हुए प्रेम को ढोते नजर आते हैं। चूंकि वे परिवार से विद्रोह करके प्रेम विवाह करते हैं, इसलिए परिवार भी उनका सहयोग नहीं करता और उनका प्रेम टूटन के कगार पर पहुंच कर पछतावा बन जाता है। ‘कसरत वाली’ कहानी की नायिका जाह्नवी को अपने विजातीय प्रेम विवाह पर पछतावा होता है। 
फिजियोथेरेपिस्ट नायिका सराफा की दुकान वाले विज्ञान से विवाह तो कर लेती है मगर उसके परिवार से सामंजस्य नहीं बिठा पाती। उधर प्रेम विवाह होने के कारण परिवार के लोग भी उसका सहयोग नहीं करते। परिणामतः अपने बच्चों, परिवार और क्लिनिक के बीच पिसती जाह्नवी सोचती है-
‘‘शाम्भवी ठीक कहती है, मेरा चुनाव गलत रहा। प्रेम में आकलन और विमर्श नहीं होता, जबकि मैंने एक आकलन और विमर्श को ध्यान में रख कर प्रेम किया। थ्रिल की तरह नहीं अनिवार्य शर्त की तरह प्रेम किया। फिर भी मेरा चुनाव गलत रहा।’’ पृष्ठ 169 विवाह के बाद अपने प्रेम पर पछतावा ‘प्रेम रंग, अफवाह और खुशबू’ कहानी में भी व्यक्त हुआ है। जहां रक्षा को लगता है कि उसका प्रेमी अब प्रेमी रहा ही नहीं। वह उन्नति से कहती है- ‘‘मैं उसे उसकी फैमली से कनेक्ट करके देखती हूं तो लगता है यह वह निहाल नहीं है जिसे मैं जानती थी। तब वह सिर्फ और सिर्फ मुझ पर केंद्रित रहता था। वही बात करता था जो मुझे अच्छी लगती थी। बड़ा मुंह फाड़ कर कहता था रक्षा तुम मिल जाओ फिर मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं मिल गयी तो कहता है मैंने माता पिता के खिलाफ जाकर तुमसे शादी की है। तुम उनका खास ख्याल रखो। निहाल की तीन छोटी बहनों को ब्याहने में मेरी कमाई लुट गयी।’’ (पृष्ठ-222) 
इस पछतावे का कारण है वह दृष्टि जिसके चलते उन्हें कुछ और नजर ही नहीं आता है। प्रेम में डूबे प्रेमी की दृष्टि केवल एक दूसरे पर ही टिकी रहती है। वे सिर्फ एक दूसरे को पा लेना चाहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि भारतीय प्रेम की सफलता विवाह में निहित है। यहां आज भी विवाह दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों का होता है। इसीलिए विवाह के बाद अक्सर ऐसी स्थितियां निर्मित होती हैं। ये एक समग्र प्रेमकहानी है। इस कहानी में प्रेम के सभी पक्ष मिलते हैं। यहां पारिवारिक आतंक के चलते उन्नति और संकर्षण का प्रेम भले ही विवाह तक नहीं पहुंच पाता। मगर उन्नति उसे भुला नहीं पाती और परिणामतः वह अपने पति के साथ रहते हुए भी उसके बच्चों को जन्म देने बाद भी पूरे मन से पति की नहीं हो पाती। मगर रक्षा की कहानी जान लेने के बाद उसे अहसास होता है कि अब तक वह भुलावे में थी और वह अपने प्रेम को अपने पति में केंद्रित करके देखती है, तो उसे लगता है यही प्रेम का सच्चा रूप है।  
‘शो फ्रलॉप’ एक ऐसी कहानी है जिसमें महत्वाकांक्षा का बरगद प्रेम को आच्छादित कर लेता है। हम इसे आज की स्त्रीवादी कहानी भी कह सकते हैं। कहानी की नायिका अपने कॅरियर के प्रति इतनी मोहग्रस्त रहती है कि वह विवाह के बाद भी उसी तरह बिंदास जीवन जीना चाहती है, जो संभव नहीं था, मगर वह पति पर लगातार अपनी ही मर्जी थोपती चलती है। उसे न तो पति का प्रेम बदल पाता है और न ही बच्चे का स्नेह। एकपक्षीय प्रेम कभी भी सामंजस्य नहीं बना पाता, इस कहानी में परिणाम वही होता है ,जो इन स्थितियों में होता आया है। अलगाव के बाद नायक समर्थ अकेले ही बच्चे को पालने की कोशिश करता है मगर नायिका योजना को अपनी गलती का अहसास तक नहीं होता। फिर बच्चा भी उसे नापसंद करने लगता है, वह उससे नफरत सी करने लगता है। इसलिए समर्थ बच्चे को लेकर दूसरे शहर चला जाता है और योजना अपने कॅरियर में व्यस्त हो जाती है। मगर एक दिन एक विख्यात हीरोइन की अकेले में हुई दर्द नाक मौत से उसका अंतस तक  हिल जाता है। हीरोइन की मौत की खबर मीडिया में दो लाइन की खबर बन कर रह जाती है, तो उसे लगता है कि एक दिन  इसी तरह अकेलेपन में उसका भी अंत हो जायेगा और वह भी मीडिया में बस दो लाइन की खबर बन कर रह जायेगी और उसे अपना सारा अर्जित व्यर्थ लगने लगता है। यह कहानी आज की स्त्रीवादी सोच का वीमस्त रूप प्रस्तुत करती है।
स्त्री के बदलते रूप और बदलते सामाजिक परिवेश को आधार बनाकर बुनी गई प्रेम कहानी है ‘हमरी न मानों बधाई से पूछो’ बधाई एक आधुनिक होता हुआ परंपरागत गांव है। जहां यह प्रेम धीरे-धीरे घटित होता है। सनम और अष्टमी साथ-साथ पढ़ते हुए एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं, मगर सजातीय होने बाद भी ग्रामीण समाज व्यवस्था के अनुसार उनका विवाह नहीं हो सकता है क्योंकि सनम निम्न स्तर का ब्राह्मण है और अष्टमी का कुल उच्च है। प्रेमी मन इसे कैसे मान लेता? जो झुक जाए वो प्रेम कैसा को चरितार्थ करते सनम और अष्टमी प्रेम सारी सीमाएं लांघ जाते हैं और विद्रोह स्वरूप भागकर कोर्ट मैरिज कर लेते हैं। फिर विवाह के बाद शुरू होती हैं सामाजिक और आर्थिक परेशानियां जिनके चलते अष्टमी को लगने लगता है कि उसने सनम से विवाह करके गलती की है। मगर वह अपनी-अपनी गलती सुधार सके इसका अवसर उसके पास है ही नहीं। तो उसे बस एक ही रास्ता नजर आता है कि वह यहां से दूर चली जाये। इसीलिये वह अपने माता पिता से नौकरी  पाने के लिए लगने वाली रिश्वत की मांग करती है। उसे लगता है माता-पिता से मनचाही रकम प्राप्त करना उसका हक है। उधर पुरातन सोच वाले पिता के लिये तो उसका कोई वजूद ही नहीं बचा था। मगर अष्टमी किसी भी तरह से अपना हक पाना चाहती है और कहानी उसके न्यायालय की ओर प्रस्थान के साथ समाप्त होती है। यह कहानी प्रेम कहानी के साथ-साथ नए और पुराने विचारों के संघर्ष की कहानी भी है। जहां युवावर्ग प्राचीन जर्जर मान्यताओं को तोड़कर आगे बढ़ जाता है। 
प्रेम में त्याग और बलिदान जैसी बातें अब बीते जमाने की बातें जरूर हो गयी हैं, मगर यदा कदा ऐसा प्रेम भी नजर आ ही जाता है। ऐसी ही कहानी है तुम खुश रहो हमारा ओ के है इस कहानी का प्रारंभ तो वैसे ही होता है जैसा इन स्थितियों में आम तौर पर होता है। एक स्त्री विहीन घर की नौकरानी के साथ अक्सर ये सब घटित होता ही जाता है। यहां भी हुआ। फर्क इतना रहा कि यहां यह फरेब प्रेम की चादर ओढ़कर आया तो लगा कि यह प्रेम है। कम से कम चिरौंजी को तो ऐसा ही लगा कि अपने अकेलेपन में सेठ जी उसका साथ चाहते हैं और वे हर हाल में उसका साथ निभायेंगे। मगर यह बात शीघ्र ही साबित हो गई कि एक नौकरानी और सेठ के बीच में प्रेम नहीं सिर्फ सौदा होता है। चिरौंजी के 
गर्भवती होते ही सेठ जी का असली चेहरा सामने आ गया और उन्होंने चिरौंजी से मुंह फेर लिया। ऐसी स्थिति में होना तो यह था कि चिरौंजी सेठ पर दबाव डालती उन पर केस करके और कुछ नहीं तो कुछ पैसे ही झटकती, मगर चिरौंजी ऐसा कुछ नहीं करती है और न ही अपने बेटे को करने देती है। वह सेठ जी के जीवन से बाहर हो जाती है। क्योंकि उसके मन में सेठ जी के लिए प्रेम पनप गया था और उसे विश्वास था कि सेठ जी उसे ऐसी हालत में अकेली नहीं छोड़ेंगे। यह कहानी विश्वासघात के धरातल पर भी विश्वास का आधार लेती है।  
प्रेम कहानियों की बात चले और उसमें छल या धोखा न हो ऐसा तो बहुत कम होता है प्रेम में परंपरागत छल की ही कहानी है ‘इस रुट की सभी लाइनें व्यस्त हैं’। इस कहानी की न तो विषय वस्तु नई है और न ही स्त्री के शोषण का रूप ही नया है। 
विवाहित पुरुष का किसी युवती के प्रति आकर्षित होकर उसे विवाह का प्रलोभन देना और विवाह के नाम पर मंदिर में विवाह करके उसे दूसरी पत्नी बनाकर समाज और परिवार के हाशिये पर डाल देने की घटनाओं को लेकर बहुत-सी कहानियां लिखी गयी हैं। इस कहानी में भी जीवनी अपने लेखन से ख्यात होने का सपना देखती है और अपने उस सपने को पूरा करने की फिराक में वह स्थानीय अख़बार के संपादक के प्रेम में पड़कर कर उसकी दूसरी पत्नी बन जाती है। यहीं से उसका त्रसद समय शुरू हो जाता है। विवाह के बाद उसे अपने घर से अलग एक मकान लेकर रख दिया जाता है। फिर अखबार से उसकी छुट्टी कर दी जाती है। तर्क वही स्त्री को लुभाने वाला कि लोग क्या कहेंगे। ‘खबर’ की मालकिन अपने ही अख़बार में नौकरी कर रही है? जीवनी इसके पीछे के गणित को समझ तो लेती है मगर खुलकर विरोध नहीं करती। फिर बच्चियों का जन्म होता है और जैसे-जैसे वे बड़ी होती जाती हैं समाज में उनका दोयम दर्जा उन्हें लहूलुहान करने लगता है। परिणाम बड़ी लड़की मनोहारी विद्रोह कर उनसे दूर चली जाती है और एक लड़के लिव इन में रहने लगती है। दूसरी लड़की जागृति अपनी मां का सपना पूरा करना चाहती है। वह अपने पिता के अख़बार में अपना हक़ लेने की कोशिश में शहर के एडीसन से जुड़ना चाहती है। मगर यह संभव नहीं था। सो उसे दूसरे शहर के एडिसन में भेज कर खाना पूर्ति की जाती है। जहां शीघ्र ही उसे आभास हो जाता है कि वह मालिक नहीं मात्र एक कर्मचारी है। और अख़बार के जलसे में तो यह बात पूरी तरह स्पष्ट ही हो जाती है। हमेशा अपमानित होने से हताश और दुःखी होकर जागृति भी शहर छोड़ कर जयपुर जाकर रहने की बात कहती है और जीवनी की आंखों में अपना और अपनी बेटियों का अपमान उभर आता है और वह अपने तथाकथित पति मेघ मिश्र को अपने जयपुर जाने का फैसला सुनाना चाहती है मगर फोन पर बार-बार एक ही वाक्य सुनाई देता है कि इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं। जीवनी को लगता है जैसे यह वाक्य भी उसे जता रहा है कि मेघ मिश्र के जीवन में उसकी कोई जगह नहीं है। इस कहानी का सबसे कमजोर पक्ष है जीवनी जैसी लड़की का विरोध न करना। वह कोई साधारण लड़की नहीं थी। एक प्रखर चेता लेखिका थी। खबर की स्तंभकार थी, उसके जैसी लड़की दूसरी पत्नी बनकर हाशिये पर रहना मंजूर कर लेती है। इतना ही नहीं वह अपनी बेटियों के हक़ में भी खुलकर विरोध नहीं कर पाती बस उनके हक़ के लिये याचना ही करती रहती है। जीवनी अपना और अपनी बच्चियों का जीवन बनाने में समर्थ थी, मगर वह ऐसा नहीं करती और एक साधारण स्त्री की तरह अपने पति से याचना करती है कि वह उसकी बेटियों को उनका हक दे। जीवनी जैसी स्त्री यह स्थिति कहानी को कमजोर बनाती है। इस तरह यह कहानी संग्रह की सबसे कमजोर कहानी ठहरती है। 
इस संग्रह में दो कहानियां अलग स्तर की कहानियां है। इनमें से प्रेम रसायन बड़ी उम्र के प्रेम की कहानी है जहां दैहिक आकर्षण कम, किसी के मानसिक संबल की दरकार अधिक होती है। ‘प्रेम रसायन’ इसी विषय को उभारती है। दूसरी कहानी अपने वैवाहिक जीवन की एक रसता से ऊबी स्त्री के किसी पर पुरुष के प्रति आकर्षित होने की कहानी है। आज के समय में ऐसे प्रसंग बहुत घटित होते हैं। ऐसे ही प्रसंगों से विवाहोत्तर संबंध पनपते हैं, मगर डॉक्टर व्यास अपने को संहाल लेते हैं और यह कहानी विवाहोत्तर संबंधो की कहानी बनने से बच जाती है।    
प्रेम में अब तक धोखा पुरुष ही देता आया है। लड़के ही प्रेम का नाटक करके अभीष्ट सिद्ध हो जाने पर किसी और के साथ चल देते हैं (या फिर उसे दोयम दर्जा देकर अपनी रखैल या दूसरी पत्नी बना देते हैं।) मगर ‘डसो मगर प्यार से’ में यह धोखा लड़की के द्वारा दिया जाता है। लाड़ली अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए नवबोध को प्रेम का झांसा देकर उसका उपयोग करती है। उसे पसंद न करते हुए भी उससे प्रेम का नाटक करती है और बाद में पीएच डी करने के लिये निर्वाण नाम के लड़के संग हो लेती है। यहां छल का शिकार नवबोध होता है। लाडली जैसी लड़कियां पहले भी हुआ करती थीं (मगर अब इनकी संख्या बढ़ रही है। इतना ही नहीं इस संग्रह की प्रेम कहानियों की लड़कियां पहले की तरह प्रेम में अंधी होकर निर्णय नहीं लेतीं बल्कि सोच समझकर अपना भविष्य देखकर ही प्रेम विवाह का फैसला करती हैं। कसरत वाली की जाह्नवी, हमरी न मानो बधाई से पूछो की अष्टमी, शो फ्रलॉप की योजना, ऐसी ही लड़कियां हैं जो बहुत सोच विचार कर प्रेम विवाह करती हैं। 
इस तरह इस संग्रह की कहानियां प्रेम के विविध रूपों को लेकर बुनी गई हैं जिनमें प्रेम के हर रूप को चित्रित किया गया है। साथ ही प्रेम मार्ग आने वाली कठिनाइयों को भी उजागर किया गया है। सहज सरल भाषा, परिवेश की विविधता और प्रेम के हर रूप के सम्यक चित्रण के कारण यह संग्रह पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ा है। इसके लिए लेखिका सुषमा मुनींद्र बधाई की हकदार हैं।  

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