शिव कुमार यादव

हिंदी कविता के प्राइम टाइम कवि

‘पनसोखा है इंद्रधनुष’ सुविख्यात कवि मदन कश्यप का छठवां कविता संग्रह है जो हाल ही में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित है। यह संग्रह एक ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है जब हमारा समाज और देश एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जहां हर समस्याओं का एक ही समाधान है- हिंसा और हत्या। प्रश्न चाहे सामाजिक हो या राजनीतिक। आर्थिक हो या धार्मिक। सांस्कृतिक हो या न्यायगत, जो भी इससे टकराएगा- मारा जाएगा। ‘मारना’ इस युग की सबसे सस्ती क्रिया है और ‘झूठ’ इस सदी का सबसे स्वीकारात्मक शब्द। जो जितना चबा-चबाकर झूठ बोलता है उसे जनता उतने ही आसानी से पचा कर उसका सम्मान करती है। ‘बोलना’ इस युग की सबसे सम्मानित क्रिया है। बोलना वह भी क्या बोलना नहीं, बल्कि कैसे बोलना और कितने आत्मविश्वास के साथ बोलना-भले ही वह पूरा असत्य ही क्यों न हो। पर बोलते रहना चाहिए। एक समय था जब किसी रेखा को छोटी दिखाना होता था तो उसके समानांतर एक उससे भी बड़ी रेखा खींच दी जाती थी, पर आज उससे बड़ी रेखा खींचने की बजाए उस रेखा को ही मिटा देने का प्रचलन पूरे शोर के साथ आगे बढ़ रहा है। जब किसी भी समाज में हर समस्याओं का एक ही समाधान ‘हत्या’ हो जाय-चाहे विचारों की हत्या, मूल्यों की हत्या, मान्यताओं की हत्या अथवा मनुष्यता व मनुष्यों की हत्या तो यह सहज ही अनुमान लगा लेना चाहिए कि वह समाज समरसता के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता है। अकारण नहीं है कि तमाम अंर्तविरोधों के बावजूद पूरा भक्ति काव्य प्रेम की बुनियाद पर ही टिका हुआ है। वह जानता है कि प्रेम ही वह साधन है जो समाज को समरसता के साध्य तक पहुंचा सकता है। हत्या, हिंसा, छल, कपट, झूठ, सांप्रदायिकता और विभाजन की राजनीति नहीं।
मदन कश्यप प्रेम, प्रतिरोध और प्रतिक्रिया के कवि हैं। उनकी कविताएं प्रेम, प्रतिरोध और प्रतिक्रिया की ऐसी ज्वाला की निर्मित हैं, जो मानव जीवन की हर कालिमा को ध्वस्त करने की क्षमता रखती हैं। इनका ‘प्रेम’ मानव जीवन को उर्वर बनाता है तो ‘प्रतिरोध’ सत्ता की तानाशाही का निषेध और ‘प्रतिक्रिया’ मनुष्य के भीतर जीवन की तमाम बुराईयों को दूर करने की हलचल पैदा करती है। इनका प्रेम मनुष्य को संवेदनशील बनाता है। उसमें एक ऐसी जीवनी शक्ति है जो मरणासन्न व्यक्ति को भी संवेदना का अमृत पिला कर जिन्दा कर देती हैं। इनकी कविताएं प्यासी आत्मा की प्यास को बुझाकर राग (तृप्ति) का नया एहसास पैदा कर देती हैं। इनका प्रेम आज के बाजारवादी प्रेम की तरह हल्का, सतही और अर्थ के तराजू पर तौल कर अग्रसर नहीं होता, जिसमें न तो गंभीरता होती है न ही भारीपन। इसमें न तो ‘यूज एंड थ्रो’ की प्रवृत्ति का समावेश है, न ही छल-छद्म की अचूक कलाबाजी का प्रकाशन। इनका प्रेम त्याग, समर्पण और विश्वास की ऐसी मिशाल है जो बाजारवादी मृग मारीचिका के ‘मेक-अप’ को नेस्तनाबूद करके वास्तविक प्रेम की आभा को अभिव्यंजित करता है। एक ऐसा प्रेम जो मानव जीवन के प्रत्येक क्षण को ऐश्वर्यमयी बना देता है, उसके रोम-रोम को प्रफुल्लित कर देता है। यहां सयानेपन की तनिक भी छाया मौजूद नहीं है। जो भी है हृदय है, बुद्धि नहीं। आज मानव का जीवन तमाम भौतिक संसाधनों से भरा हुआ है, पर हृदय बिल्कुल खाली है। उसमें प्रेम के लिए कोई जगह नहीं बची है। बाजार ने उसे सब कुछ प्रदान किया है पर उससे जीवन और प्रेम को छीन लिया। बाहर से भर दिया पर भीतर से खाली कर दिया। मदन कश्यप की कविताएं एक तरफ इस खालीपन को भरने की पक्षधरता करती हैं तो दूसरी तरफ पूरी दुनिया को वास्तविक प्रेम के रंग में रंगने की जद्दोजहद करती हैं। ‘तब भी प्यार किया’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां देखिए- ‘मेरे बालों में रूसियां थीं/तब भी उसने मुझे प्यार किया/मेरी कांखों से आ रही थी पसीने की बू/तब भी उसने मुझे प्यार किया/मेरी सांसों में थी बस जीवन-गन्ध/तब भी उसने मुझे प्यार किया/हमारे पास खाने का चमकदार पैकेट नहीं था/हमने वहां सार्वजनिक नल से पानी पिया/और प्यार किया।
मदन कश्यप वर्तमान हिंदी कविता के प्राइम टाइम कवि हैं। ये उपयुक्त समय पर, उपयुक्त विसंगतियों पर, उपयुक्त कविताएं लिखकर सबसे उपयुक्त जगह पर चोट करने वाले कवि हैं। इनमें न तो फासीवादी ताकतों का डर है, न ही सही बात को ढकने का साहस। न तो समस्याओं को समझने में कमी है, न ही उसे अभिव्यक्त करने में संकोच। वर्तमान समय की सच्ची अनुभूतियों को पकड़ना हो तो मदन कश्यप की कविताएं अवश्य पढ़नी पड़ेंगी। क्योंकि इन्होंने सत्ता की प्रदूषित मानसिकता को जितना ‘कबीरी’ ढंग से प्रस्तुत किया है, वह अंयत्र दुर्लभ है। इनकी कविताएं फासीवादी ताकतों के उन नारों की अवश्य हिंसक मानसिकता का पर्दाफाश करती हैं जो जनता में शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प शक्ति व रोजगार की जगह जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग, वर्ण, हिंसा, हत्या, भय, भ्रम और विभाजन की कलह पैदा कर राजनेताओं के स्वार्थ सिद्धि में मदद करते हैं। इससे पाठक न केवल अपने समय को समझ लेता है अपितु मनुष्यता के मानचित्र पर आ रहे काले धब्बों को पहचान कर, उसके खिलाफ नेक मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। बहुत तीव्र गति से बदलते हुए यथार्थ को कविता के बदले अंदाज में अभिव्यक्त करना मदन कश्यप की काव्य कला की मुख्य विशेषता है। 
आज हमारी राजनीति इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि इसमें कोई भी मूल्य सुरक्षित, संरक्षित नहीं बचे हैं। एक समय था जब राजनीति जन सेवा और जन कल्याण के लिए की जाती थी, पर अब राजनीति अपने टुच्चे स्वार्थों और उपभोग के लिए की जा रही है। राजनीति का पूरा स्वरूप ही बदल गया है। राजनेताओं के चरित्र न केवल बदल गये हैं अपितु अबूझ पहेली बन गये हैं। आज जो जितना बड़ा हत्यारा होगा वह उतना ही बड़ा नेता होगा। यह हमारे समय का कड़वा सत्य है। कहना न होगा कि ये हत्यारे एक ऐसी हत्यारी संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं जहां हर मनुष्य हिंसक, खूंखार और अमानवीय बनता चला जा रहा है। उसके लिए हर समस्या का समाधान एक है- ‘हत्या’। इतना ही नहीं जो भी उसे हत्यारा सिद्ध करने की कोशिश करेगा- वह हत्या का शिकार होगा। जनता में भय, भूख और हिंसा फैलाकर राजनीति तो पहले भी होती रही है पर अब हत्या के लिए ही राजनीति का होना हमारी सभ्यता के लिए बेहद खतरनाक संकेत हैं। हत्यारों का हमारी राजनीति में संरक्षण न केवल हमारी राजनीति को प्रदूषित कर रहा है अपितु अभिव्यक्ति की आजादी को भी नेस्तनाबूद कर रहा है। शायद इसी का परिणाम है कि हमारे समाज से वाद-विवाद और संवाद की संस्कृति लगभग गायब हो गयी और हमारा समाज संवादहीन और संवेदनहीन हो गया। आज के हत्यारे जेल की सलाखों के पीछे नहीं, कैमरे की चमक के साथ समाज में सीना फुलाकर आते हैं तथा अपनी महानता की धाक जमाते हुए कुछ संवेदनशील शब्द फेंकते हैं और जनता उसे समझने से पहले ही उनका चुनाव कर देती है। यही हमारी राजनीति का वस्तु सत्य है। ‘पिता का हत्यारा’ शीर्षक कविता एक तरफ राजनीतिक हत्यारों की हत्यारी मानसिकता का गहरा प्रतिकार करती है तो दूसरी तरफ़ राजनीति के प्रदूषित होते पर्यावरण को शुद्ध करने की पक्षधरता करती है। पिता के हत्यारे की यह हिंसक स्वीकारोक्ति कि- ‘तुम्हें साफ-साफ बता दूं/कि हत्या मेरी मजबूरी या जरूरत भर नहीं है/वे और हैं जो राजनीति के लिए हत्याएं करते हैं/मैं हत्या के लिए राजनीति करता हूं/हत्या को संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाकर/तमाम विवादों-बहसों को खत्म कर दूंगा एक साथ/और जाते-जाते तुम्हें साफ-साफ बता दूं/तुम्हारे पिता की हत्या ही हुई थी/क्योंकि वह मुझे हत्यारा सिद्ध करने की जिद नहीं छोड़ रहे थे/अब तुम ऐसी कोई जिद़ मत पालना।’’ न केवल हमारे जनतंत्र को प्रश्नांकित करती है अपितु जनता में भय का जहर घोल रही है। वह कवि बड़ा होता जो अपने समय की सत्ता से न केवल टकराता अपितु उसका जोरदार प्रतिकार भी करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने समय की जन-विरोधी सत्ता को पहचानना और उसका निषेध करना साहित्यकार का प्रमुख दायित्व होता है। वही कवि साहित्य की अविरल धारा में टिक सकता है जो अपने समय की सत्ता का कड़ा प्रतिपक्ष रचा हो। वे कवि जो इससे बचते हैं वे काल की धारा में कहां विलीन हो जाएंगे कहना मुश्किल है। मदन कश्यप की कविताएं न केवल अपने समय की सत्ता का ‘कबीरी’ प्रतिपक्ष रचती हैं अपितु उसके डीएनए में चल रही तानाशाही का पर्दाफाश कर, व्यवस्था परिवर्तन की मांग करती हैं। अकारण नहीं है कि ‘क्योंकि वह जुनैद था’ शीर्षक कविता में कवि कहता है, ‘‘सारी समस्याओं का रामबान समाधान था/जुनैद को मारोधज्ञान के सारे दरवाजों को बंद करने पर भी/जब मनुष्य का विवेक नहीं मरा/तो उन्होंने उन्माद के दरवाजे को और चौड़ा किया/जुनैद को मारो!’’
आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां हर काम बहुत सफाई से किया जा रहा है। इतनी सफाई से कि ‘सफाई ही सेवा’ बन गई है। एक ऐसी सफाई कि मारो और सबुत न छोड़ो। एक ऐसी सफाई की लोक की आवाज ही साफ हो जाय। एक की लोक का एक वृहत्तर समुदाय ही साफ हो जाये। एक ऐसी सफाई की जहां सफाई ही साफ हो जाय। सफाई के नाम पर वह सब कुछ साफ किया जा रहा है जो हमारी प्रकृति, सभ्यता और संस्कृति को बनाए रखने के लिए प्राण वायु की तरह आवश्यक है। मदन कश्यप सत्ता की ऐसी सफाई का गहरा निषेधकरते हुए कहते हैं कि ऐसी सफाई से प्रकृति और पर्यावरण की सफाई तो नहीं ही होगी, देश का सफाया भले ही हो जाय। ‘डपोरशंख’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां देखिए, ‘उसे सफाई बहुत प्रिय है/जैसे हाथ की सप़फ़ाई/पर सबसे ज्यादा जुबान की सफाई/वह नदियों को साफ करता है/सड़कों को साफ करता है/रिश्तोें को साफ करता है/मतभेदों को साप़फ़ करता है/संसद को साफ करता है/संविधान को साफ़ करता है/उसके बाद देश का सफाया तो हो ही जाना है।’’
इनकी कविताएं एक तरफ छद्म राष्ट्रवाद का चोला पहनी सांप्रदायिक शक्तियों का प्रतिकार करती हैं तो दूसरी तरफ डर का कारोबार करने वाले व्यापारियों पर जोरदार प्रहार। एक तरफ जनतंत्र के जंगलीपन को उद्घाटित करती हैं तो दूसरी तरफ तानाशाहों की लुटेरी प्रवृत्ति का पर्दाफाश। एक ओर प्रेम की पवित्रता को रेखांकित करती हैं तो दूसरी ओर मानव हिंसा की सोच का निषेध। इसमें एक तरप़फ़ दूषित होती सभ्यता के बिम्ब हैं तो दूसरी तरफ उसे सुंदर बनाने के सुनहले स्वप्न। एक तरफ मनुष्य के फुटपाथ पर सोने का दर्द है तो दूसरी तरफ बेरोजगार की बेटी की आह! एक तरफ भूख का कोरस है तो दूसरी तरफ डपोरशंख के कृत्यों का रेखांकन। कुल मिलाकर यह संग्रह अपने समय की शिला पर लिखा गया एक ऐसा शिलालेख है जिसकी गूंज बहुत दूर तक सुनाई पड़ती है। 
भाषा की दृष्टि से देखें तो यह संग्रह हिंदी भाषा की हर आचार संहिता पर खरा उतरता है। इसमें न तो शब्दों का अपव्यय है न ही भाषा की मर्यादित सीमा का उल्लंघन। शब्दों की मितव्ययिता इनकी काव्य भाषा की प्रमुख विशेषता है। दृश्य एवं श्रव्य बिम्बों से सराबोर भाषा साधारणीकरण में बहुत मदद करती है। इनकी कविताएं अपने कम, पाठक को अधिक बोलने का अवसर प्रदान करती हैं। राजनीति, समाज और मनुष्य की गिरती हुई भाषा की गहरी चिन्ता उनकी कविताओं में मौजूद है। असल में भाषा का गिरना मनुष्यता का गिरना है। भाषा में गिरावट न केवल मनुष्य को हिंसक बनाती है अपितु पूरे परिवेश को प्रदूषित कर देती है। इनकी कविताएं समाज में भाषिक शुद्धता का एक ऐसा पर्यावरण निर्मित करती हैं जिसमें हर मनुष्य ठीक से बोलते हुए अपनी बात रख सके।


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