जागृति सौरभ

संवेदना और बौद्धिकता के संतुलन से रची कहानियां


समकालीन कहानीकारों में दामोदर दत्त दीक्षित का नाम महत्वपूर्ण है। उनकी कहानियां समूचे भारतीय समाज की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है। असल में इनकी कहानियों से होकर गुजरना भारत के वास्तविक रंग को समझने की तरह है। भारतीय समाज की जटिलता, संकीर्णता, विसंगति और विषमता को बड़ी बरीकी से दामोदर दत्त दीक्षित उकरने का प्रयास करते हैं।
‘प्रभात प्रकाशन’ से उनकी लोकप्रिय कहानियां प्रकाशित हुई है। संग्रह में कुल 16 कहानियां हैं। प्रायः सभी कहनियां एक नये भाव-बोध के साथ लिखी गई है। कुछ कहानियां बेहद प्रभावशाली ढंग से भारतीय ग्रामीण समाज में फैले विषमता को उजागर करती है। वही कुछ कहानियों कस्बाई और शहरी भावबोध की है। संग्रह की पहली कहानी है ‘दरवाजे वाला खेत’। इस कहानी में कहानीकार ने दिखाया है कि किस तरह से सत्ता से मिलकर समाज के कुछ वर्चस्वशाली वर्ग गरीब किसानों से जमीन हड़पने के लिए तरह-तरह से प्रपंच करता है। विकास का झूठा दिलासा देकर जमीन कब्जा करने का खेल आज नया नहीं है। इस खेल को वर्षों से अंजाम दिया गया है। लेकिन वर्तमान दौर में इसे इतने बारीकी से अंजाम दिया जाता है कि साधारण वर्ग के लिए यह समझना अत्यंत जटिल हो जाता है। अपनी सीधे-सरल जीवन में उलझे आमजन किस तरह से अपनी बची खुची जमीन गंवा देते हैं, इसे कहानीकार नये अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।
इस तरह से संग्रह में एक कहानी है ‘धर्मचोर’। आज के दौर में एक कहानी एक जरूरी पाठ बनकर सामने आता है। इस देश में धर्म को लेकर बहुत कुछ ऐसी धारणा बनी है जिसके तले एक वर्ग की दुकानदारी चलती है। वास्तव में धर्म न होकर व्यवसाय के रूप में दिखाई पड़ता है। और इसका सीधे-सीधे शिकार बनते हैं भोली-भाली जनता।
दामोदर दत्त दीक्षित हाशिए के लोगों की संवेदना को प्रभावी तरीके से उकेरने का यत्न करते हैं। ‘दो बहिनिए’ कहानी अनदेखे अनछुए भिखारी वर्ग के जीवन पर केंद्रित है। एक प्रसंग में कहानीकार ने इनकी जिजीविषा पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘‘उन्होंने श्री श्री रविशंकर का नाम नहीं सुना, पर मुतमइन कि जीवन जीने की कला इसी विकल्पहीन मार्ग में अटकी है। इनकी इस कला के आगे बाकी कलाएं बौनी।’’ निःसंदेह भिखारी बनकर जीवन जीना किसी यातना से कम नहीं फिर भी इनका एक सामाजिक दायरा होता है। उन्हीं में कुछ अच्छे-बुरे लोग भी होते हैं। मुख्यधारा जीवन से कटे होने के बावजूद भिखारियों के जीवन में दुख-दर्द होते हैं तो हर्ष उल्लास के क्षण भी कम नहीं होते। इनके अपने समाज में भी छल-प्रपंच की कोई कमी नहीं। कहानीकार ने बेहद प्रभावी तरीके से अपनी इस कहानी में दिखाया है कि सुबह से शाम तक दूसरों की रहम पर जीने वाली एक उपेक्षित वर्ग जीवन का रहस्य क्या है? दीक्षित अपनी कहानी को नैरेट इतनी खूबसूरती के साथ करते हैं कि पाठक बड़ी सहजता से कथा के साथ अपनापन कायम कर लेता है।
संग्रह में ‘आधुनिक होते गांव की पुरानी कहानी’ शीर्षक से एक कहानी संकलित है। ऊपर-ऊपर से देखने पर लगता है कि गांव में आये बदलाव पर केंद्रित कहानी होगी। कहानी का नायक-खलनायक ‘मदारी’ है। मदारी अपने हुनर से सभी दर्शको को चौंकाता है। फिर खेल-खेल में अपनी बेटी का सिर धड़ से अलग कर देता है। लोगों को शुरू में लगता है कि मदारी अपने जादू के बल से यह किया है। लेकिन जब वह सिर को धड़ से जोड़ने से इंकार कर देता है तब भीड़ 
उत्तेजित और आक्रोशित हो उठती है। लोगों के बार-बार कहने पर सिर को धड़ अलग छोड़ मदारी निकलने के फिराक में होता है। लोगों के बार-बार पूछने पर वह दो टूक जवाब देता है- ‘लड़की मेरी ऐ! मेरी मरजी, न जोडूं।’’ उत्तेजित भीड़ के बीच से जब एक बुजुर्ग जोर देकर सवाल करता है- 
‘‘आखिर बात क्या रे?’’
‘‘बता ऐ?’’
‘‘तो बताते क्यू न?’’
हिंस्रभाव में निरंतर वृद्धि होती रही थी।
आखिर वह रहस्य का लौह-कपाट खोलने को तैयार हो गया। 
‘‘बताता ऊं, जरा धीरज रखिये।’’
‘‘ये मेरी लड़की ये, पर मेरी इज्जत से खेला ऐ।’’
‘‘कैस्से?’’ कोई बोला।
‘‘इसने गैर-बिरादरी के लड़के से टाका पसाया है ये। मेरी ई न, सारी बिरादरी की तौईन की ऐ।’’ चेहरे पर वीरोचित्त, प्रतिशोधदग्ध भाव।’’
कहानी पाठक को केवल चौंकाती ही नहीं बल्कि सचेत भी करती है। जिस मदारी को खलनायक मान भीड़ अब न तब हिंसक हो उठती, अचानक वही भीड़ उसी मदारी को नायक का दर्जा देने लगती है। भीड़ को लगता है कि मदारी ने जो किया बिरादरी की इज्जत बचाने के लिए किया। मदारी बड़ी चालाकी से अपनी बेटी की हत्या कर देता है, इसलिए कारण कि उसका किसी अन्य बिरादरी के लड़के से प्रेम प्रसंग चल रहा था। ऑनर किलिंग की घटना को कहानीकार ने एक अलग अंदाज में पेश किया है। साधारण खेल-तमाशे के बीच एक बीमार मानसिकता वाला बाप इतनी बड़ी घटना को अंजाम देता है और भीड़ उसके तरफ हो लेती है। इस तरह की मानसिकता कितने आवरणों में छिपी हो सकती है। यह इस कहानी में देखा जा सकता है।
इसी तरह समाज में हो रहे छल-प्रपंच, अन्याय, अत्याचार के बदले स्वरूप को अपनी कहानियों में कहानीकार में बौद्धिक तरीके से अभिव्यक्त करते हैं। भूमंडलीकरण के बाद बहुत सारी चीजें बदलती है। 
सोचने-समझने तक के ढंग में भी बदलाव आता है। पुरानी संस्कृतिक और परंपरागत रीति-रिवाजों का काया पलट हो जाता है। इस बीच फर्जी साधु-संतों की एक बड़ी फौज भी हमारे देश में अवतरित होती है। आए दिन इनके फर्जी बड़े के किस्से देखने-सुनने को मिल जाते है। संकलन में इसी विषय पर एक कहानी है ‘एलाबली’। किस तरह से एक साधारण व्यक्ति झूठ-फरेब का सहारा लेकर देवता बन अपना स्वार्थ सिद्ध करता है, इस कहानी में बड़ी स्पष्ट के साथ उजागर किया गया है। कुछ लोग इन ‘फ्रांड’ को भली भांति जानते-समझते है लेकिन लोगों की आस्था इस हद तक उस ‘फ्रांड’ से जुड़ चुकी होती है, उन गिने-चुने लोगों के पास इतनी साहस नहीं होती है कि इन फर्जी बाबाओं का विरोध कर सके।
संग्रह में ‘समय साम्राज्यवादी’, ‘छिपकली’, ‘कांक्रोच से डरने वाली हसीन लड़की’, ‘सातवां शील’, ‘मेरी बीड़ी कहां’,  ‘बहू-बेटी’, ‘पैतरे बाज’ बेहद प्रभावशाली कहानियां है। प्रायः सभी कहानियां पठनीय है। कहानीकार ने अपनी कहानियों में संवेदना और विचार को बड़ी खूबसूरती के साथ संतुलित किया है। कुछ प्रसंगों में बौद्धिक वाक्यांश इस तरह से गुंथे हुए हैं। कि पाठक को यह अहसास भी नहीं होता कि वे कहानी के साथ-साथ बौद्धिक रूप से भी समृद्ध होते चले जा रहे हैं दामोदर दत्त दीक्षित की कथा भाषा बेहद सधी हुई है। साधारण बोलचाल की भाषा में लिखी गई कहानियां गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल होती है। कहानी का शिल्प इतना सहज है कि हर तरह के पाठक अनायास ही इन कहानियों से सीधे जुड़ जाता है।

 

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