नीलोत्पल रमेश

सत्ता के लिए मुसीबत

दिशाएं 
अपने-आप पर 
हैं आश्चर्य चकित
कि यह सब कैसे हो गया!
कि ऐसा तो होना 
ही नहीं चाहिए था!
कि एक साथ इतनी 
लड़कियों पर जुल्म! 
बाप रे!
भारत-भाग्य-विधाता 
क्या सो गए हैं?
लड़कियां 
चुपचाप कर रही थीं प्रतिरोध 
कि डंडे बरस पड़े 
एकाएक आसमान से 
नहीं-नहीं 
दिशाओं के अपने हाथ हो गए हैं 
जिन्हें अदृश्य शक्तियां 
बरसा रही हैं 
फूल-सी कोमल 
सत्ता के लिए बनी मुसीबत 
लड़कियों पर
चीखने-चिल्लाने पर भी 
दैव-शक्ति प्राप्त प्रहरी 
दिखा रहे हैं पुरुषार्थ 
और भांजे रहे हैं लाठियां 
ऐंठ रहे हैं अपने बल पर 
और कर रहे हैं गुमान 
अपनी भुजाओं पर
फिर शुरू हुआ खेल 
राजनैतिक पार्टियों का 
जो अपना वोट-बैंक समझ 
इसे अपने-अपने पक्ष में 
ढालने का 
करने लगीं प्रयत्न
और देखते-देखते 
पूरा देश बदल गया 
एक आकार में 
और जो आकार रूपांतरित हुआ 
वह सत्ता के लिए मुसीबत बन 
उसे डाल दिया 
चिंतनीय मुद्रा में।
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पिता के साथ
बच्चे अभी चलना भी 
नहीं सीख पाए हैं ठीक से 
कि निकल पड़ते हैं 
पिता के साथ 
सूअर चराने, मूस मारने, 
मछली पकड़ने 
और-और बहुत सारे काम करने
सृष्टि की गतिशीलता के साथ ही 
इनकी भी होती है सुबह 
और इनके पैरों में 
लग जाते हैं पंख 
जो उड़ान भरने को 
हो जाते हैं बेताब
निरक्षर माता-पिता 
अपने बच्चों को 
तभी मान लेते हैं कामयाब 
जब बच्चा 
इनके कामों में 
बंटाने लगता है हाथ
इन बच्चों को 
भले ही काले-काले अक्षरों की 
पहचान न हो 
लेकिन दैनिक क्रियाओं में 
पिता के साथ 
हो जाते हैं गतिमान 
नित्य-प्रतिदिन
प्रकृति भी 
अपने साथ ले लेती हैं 
इन्हें और ये खेती के कामों में 
या अन्य कई कामों में 
जिससे हो सके 
कुछ उपार्जन 
और ये 
बचपन से ही 
लग जाते हैं -
परिवार के साथ 
परिवार के लिए।
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