शिरोमणि महतो

नदी

नदी
मेरी मां मेरे सर पर
हाथ रखती है
और एक नदी
छलछलाने लगती
-मेरे ऊपर

मेरी बहन कलाई में
राखी बांधती
और एक नदी
उडेल देती सारा जल
मुझ पर

मेरी पत्नी होठों पर
एक चुम्बन लेती
और एक नदी
हिलोरे मारने लगती
मेरे भीतर

मां बहन और पत्नी
एक स्त्री के कई रूप
और एक नदी के 
कई प्रतिरूप!
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जड़े
जड़े जमीन में जितने
गहरे धांसी होती हैं
उतना ही सीना तानकर
भुजाओ को उठाकर
पेड़ चुनौती देता है
आकाश को

जितनी मजबूती से जड़ें
जमीन को जकड़ी होती हैं
पेड़ उतना ही झंझावातों से
टकराने का हौसला रखता है

जड़ों से उखड़ पेड़
तिनकों के समान
नदी के बहाव संग बहते
इस छोर से उस छोर

सांझ झलते ही पक्षियों का जोड़ा
खदानों में खटने गये मजदूरों को रैला 
रोज मोर होते ही 
पश्चिम का डूबा सूरज
शायद इसीलिए लौट आता है

सबकुछ झाड़-पोंछकर
अपनी जड़ो को ओर!
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जूठे बर्त्तन
रात भर ऊंघते रहे
जूठे बर्त्तन
अपने लिजलिजेपन से

मुर्गे की बांग से
भोर होन की आस में
तारों को ताकते रहे
झरोखे की फांक से

सुबह होते ही
जूठे बर्त्तनों को
ममत्व भरे हाथों का
स्पर्श मिलता----

घर की औरतें
जूठे बर्त्तनों को
ऐेसे समेटती-सहेजती
मानो उनका स्वत्व
रातभर रखा हो
इन जूठे बर्त्तनों में!

चाहे ये जूठे बर्त्तन
किन्हीं के हाें
किसी भी जात-धर्म के
ऊंच-नीच/भेद-भाव
तनिक नहीं करतीं
घर की औरतें
इन जूठे बर्त्तनों से!
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