नीरज नीर

विस्थापन

मछलियां बेचैन हैं।  
जीवित रहने के लिए 
मछलियों को सीखना होगा 
उड़ना।  
उड़ना ऊंचा, उड़कर बैठना 
वृक्ष की सबसे ऊंची 
फुनगियों पर।   
करना तैयारी 
देशांतर गमन की।  
पोखरा, अहरा, तालाब 
नदी, नालों के किनारों से दूर 
पानी से बाहर निकलकर 
पंख फड़फड़ाना  
जीना नए परिवेश में
अपने रूप, रंग और गंध से हीन।  
अपनी आत्मा को 
पानी के भीतर मिट्टी में 
गहरे दफन करके निकलना बाहर 
और संवेदना से शून्य 
आकाश में विचरना 
गरम हवा में सांसे लेते हुए 
संघर्ष करना
जीवन के लिए आमरण। 
मछलियों को बगुलों से 
शिकायत नहीं है। 
वे सीख गयी हैं सहजीविता 
उनके साथ
मछलियों को खतरा है 
विशाल हाथियों से 
जो उतर आए हैं पानी में 
विकास और प्रगति के 
बड़े-बड़े बैनर लिए। 
मछलियां बेचैन है। 
उन्हें विकास में दिख रहा है 
विनाश। 
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राजा ने सपने दिखाए 

राजा ने सपने दिखाए
जब हम नींद में थे
रंग-बिरंगे 
हसीन, मनभावन, 
लुभावने सपने
अपूरित, दमित 
इच्छाओं ने गढ़ लिए 
सहज तादात्म्य 
चमकीले रैपर में 
सजे सपनों के साथ  
और जब हम जागे 
राजा ने सुनाया युद्धनाद 
सीमा पर गूंजने लगी 
गोलियों की आवाज 
निर्वात में होने लगे 
देशभक्ति के स्फुर्लिंग 
और हम चले गए गहरी नींद में 
राजा ने दिखाए सपने
बेटी की शिक्षा के 
बेटे को रोजगार के 
बिजली, पानी और सड़क के
ईमानदार सरकार के
सपने अच्छी पैदावार के 
स्वास्थ्य सुविधाओं के 
दूर होती बाधाओं के 
स्वच्छ व्यवहार के 
और जब हम जागे  
राजा ने हमारी टोपी उठायी 
और उसमें भर दिया भय  
धर्म के क्षय का 
अस्तित्व दिखने लगा संकट में 
अतडि़यों का स्फुरण 
जा पहुंचा भुजाओं में 
धमनियों में बढ़ने लगा
खून का दाब 
और हम चले गए 
गहरी नींद में 
राजा फिर से दिखाने लगा सपने 
नए हसीन सपने 
राजा चाहता है 
हमारी नींद बनी रहे 
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विस्थापन-2 

रातें उदास और ठहरी हुई हैं 
विषण्ण सुबह
सूरज उगता है 
आधा डूबा हुआ  
हवाएं शोक ग्रस्त हैं 
बलदेव बेसरा की थकी हुई 
आंखों में 
छाया है अंधेरा
दैत्याकार चिमनियों से निकलता  
विषैला काला धुआं 
जहर बनकर घुस रहा है 
नथुनों में 
पत्तियों पर फैली है 
काली धूल
वृक्ष हांफ रहे हैं
वह भर देना चाहता है     
उस बरगद के पेड़ में 
अपनी सांसे
जिसे लगाया था 
उसके पुरखों में से 
किसी एक ने 
पर वह खुद बेदम है
धान के खेतों में 
पसरी हुई है 
कोयले की छाई  
दावा है चारो तरफ 
बिजली की 
चमकदार रौशनी
फैलाने का
लग रहा है बिजली घर 
पर उसके जीवन में 
फैल रहा है 
अंधेरा 
बरगद की 
जड़े ताक रही हैं 
आसमान को
पंछी उड़ चुके हैं 
किसी दूर देश को 
नए ठौर की तलाश में 
पर तालाब की मछलियां 
नहीं ले पा रही हैं सांसे  
वे मर कर उपला गयी है 
पानी की सतह पर 
वह भी चाहता है 
पंछियों की तरह चले जाना 
लाल माटी से कहीं दूर 
जहां वह ले सके 
छाती भर कर सांस, 
जहां गीत गाते हुए 
उसकी औरते रोप सके धान, 
जहां मेड़ों पर घूमते हुए 
रोप सके 
अपनी आत्मा में
हरियाली की जड़ें  
पर मछलियों के पंख नहीं होते 
वह सांस भी नहीं ले पा रहा
उसकी आत्मा छटपटा रही है 
वह भी तालाब की 
मछलियों की तरह
मरकर उपला जाएगा
और विस्मृत हो जाएगा 
अस्तित्वहीन होकर
मछलियां पानी के बाहर 
पलायन नहीं कर सकती हैं 
अंधेरे में जूझती 
मछलियों का अंत 
निश्चित है 
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राजा
 
देश की छाती पर 
कील की तरह गड़ा है 
चापलूसों के मध्य 
वह अकेला खड़ा है 
राजा का कान  
उसकी दृष्टि से बड़ा है
उसे अपने आगे 
कुछ दिखाई नहीं देता 
वह उनको भी नहीं जानता 
जिनकी पीठ पर 
वो अड़ा है 
राजा के सामने
सब गौण हैं 
फिर भी न जाने क्यों 
साधो सब मौन हैं  
कल रात राजा ने
सपने में देखा 
भूख के मारे 
उसके सामने 
कोई चीखा 
आज उसने मंत्री से पूछा 
बताओं तो ये  कौन है
मंत्री ने बताया 
ऐसा आदमी 
नहीं पाया जाता है 
इस देश में--- 
मालूम पड़ता है
पड़ोसी मुल्क का जासूस है 
जो आ गया है  
इस भेश में--- 
ऐसे आदमी को शीघ्र 
फांसी पर लटकाया जाये 
और हम हैं कितने ताकतवर
पड़ोसी मुल्क को 
बतलाया जाये।
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चिडि़यां और शिकारी 

चिडि़यों के शोर से 
शिकारी नहीं मरता 
और न ही 
उसकी तरफदारी करने से 
छोड़ देता है 
शिकार करना
तोप से नहीं 
बरसेंगे फूल 
तोप के मुंह में  
घोसला बना लेने से 
तोप नहीं समझता है 
प्रेम की भाषा 
छूरियों की धार 
चिडि़यों के  
गर्दन के लिए है  
चिडि़यों को बचना है तो 
सीखना होगा ऊंचा उड़ना
और सतर्क रहना
शिकारी की चाल से 
तोप की असलियत को 
पहचानना होगा  
छूरियों को चोंच में दबाकर 
उड़ना होगा दूर बहुत दूर 
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