अर्पण कुमार

मासूमियत
मासूमियत
मेरी हो या तेरी
एक विश्वास है
हरी दूब में
स्निग्धता और कोमलता
के बचे रहने की 
नोक भर,
मासूमियत है
तभी कायम है
महताब की महताबी,
दीवाने की दीवानगी,
आंखों की नमी,
और मन की आवारगी
इसके होने से बचा है
हारिल की चोंच में
पड़ा तिनका,
दिल में जब तब
उठ पड़ती कौंध,
तेज चलते जिस्म से
विद्रोह कर
पीछे की ओर सहसा
मुड़ जाती गर्दन
मासूमियत है
तो मैं, मैं हूं
तुम, तुम्हो
किसी आडंबर
या पूर्वाग्रह से मुक्त
बावस्ता हैं हम
एक दूजे से
यह मासूमियत ही है
जो ढूंढ़ते हैं
दो महबूब
एक दूसरे से
प्रेम करते हुए,
दो कौम भी अगर
ढूंढ़ने चले इसे
तो बंद हो सकता है
घृणा और हिंसा का
पारस्परिक खेल
कितने बदनसीब हैं 
वे लोग
जिनके चेहरे से गायब है
मासूमियत
और कितने खूंखार हैं
वे लोग
जिन्होंने पहन रखे हैं 
मुखौटे
मासूमियत के
अपने आक्रामक चेहरों पर
बदनसीब हो न दुःखद है
मुखौटा धारी हो न घातक
मासूमियत सीखी
नहीं जाती है
किसी पाठशाला में
वह सहज होती है
खडि़या की सफेदी-सी
प्रार्थना की
मिठास सी
मासूमियत नहीं है
कोई हासिल,
हृदयवृत्ति है यह
हमारी मासूमियत
किसी कादिल
जीत सकती है
मगर जाने क्यों
हमने छोड़ दिया
मासूम रहना
हमने घुला लिए
अपने रक्त में
अवसरवादिता 
के विष
हम हो गए
घोर व्यावहारिक
हम इतराने लगे
अपनी
चालाकियों पर
हमने खूब रौंदा इसे
अपने अट्टहासों से
हमने खोटा कर दिया
मासूमियत की
रेजगारी को
आधुनिकता के
बाजार में
मासूम और मूर्ख
दिखते हैं कई बार
एक जैसे
मगर मासूम होना
मूर्ख होना नहीं है
फिर भी जो सुजान
समझते हैं ऐसा
वे कायल हैं मूर्खता के
और विरोधी
मासूमियत के,
सावधान!
खतरा है उनके
वाक्चातुर्य से
देश की सादगी को
दिख जाती है
मासूमियत
जब कभी
तेरे चेहरे में देखना,
आंखों का उत्सव
बन जाता है
उस दिन।
---
सह-अस्तित्व
 
मैं एक कवि हूं
तो क्या कविता करने भर तक
खुद को सीमित कर लूं
कविता के लिए तो
एक जीवन भी कम है
मगर क्या एक जीवन
सिर्फ कविता करके
बिताया जा सकता है
मैं एक कवि के साथ
और बहुत कुछ हूं
और मुझे लगता है कि
मेरी विविधता मेरे काव्यकर्म को
एक विपुलता ही प्रदान करती है
 
मैं एक पुरुष हूं दूर्वासा का सा क्रोध
और विश्वामित्र की सी विचलन
है मुझमें मगर संभव तो यह भी है
कि जनक का सा धैर्य 
और कृष्ण की सी निर्दोष
मुस्कुराहट भी हो मुझ में
मैं एक पुरुष की जिंदगी जी रहा हूं
लिपटे हैं जिससे दंभ के कई पहाड़
और उगी हैं जिनपर
वासना की अनगिनत झाडि़यां
मगर सच तो यह भी है कि
उसी पहाड़ के साथ कल-कल करती
हर काल को सींचती और पालती
एक नदी भी बह रही है
कोमलता और उदारता की
संगीत और तरलता की
सहजता और प्रसन्नता की
तो क्या मैं सिर्फ एक पुरुष भर हूं
या फिर स्त्री की युगों 
संचित भावनाएं भी
मुझमें चुपके से कहीं रहती हैं
मेरी पलकों पर आते-आते
रह जाते आंसुओं को
मेरा पुरुष रोक लेता है
मगर भीतर के भीतर कहीं
बनती और जमा होती
कृग धाराएं क्या मेरे ममत्व
की निशानी नहीं हैं 
मुझे पसंद है सुविधाएं और वैभव
जिनमें से कई विशुद्ध
भौतिक रूप लिए हुए हैं
मगर इन सब के साथ या
इन सबके ऊपर मैं रखता हूं
कुछ अभौतिक रूपाकारों को ही
आखिर मेरे लिए इससे बड़ी सुविधा
क्या हो सकती है कि मैं जो 
महसूस करूं उसे कह सकूं और
आप उसे सुनते हुए
मुझे महसूस सकें हू-ब-हू
मैं आप में विलीन हो जाऊं
और आप मुझमें
संचार के ऐसे अद्वैत से बड़ा
क्या हासिल हो सकता है
मेरे अद्वैत को
संसार में आखिर
इससे बड़ी भी कोई और सुविधा
क्या होती है भला!
अर्जित और संचित भंडारों से
दमकती मानव सभ्यताएँ
क्या एकांगी नहीं रह जाएंगी
अपनी संस्कृतियों के बगैर
फि़र वे कौन हैं
जो मार दे रहे हैं लोगों को
जिन्हें पसंद नही है बोली-बानी
जिन्हें स्वीकार नहीं हैं 
अलग-अलग रंग जो नहीं चाहते हैं
क्षितिज पर खिले कोई इंद्रधनुष
युद्धों और उन्मादों से
चोटिल, कराहती कई संस्कृतियां
दम तोड़ चुकी हैं और जो बची हैं
चौतरफे होते हमलों से
वे कब तक बची रहेंगी
मुझे एतराज नहीं है
सभ्यताओं के वैभव से
मगर मैं चाहता हूं
बचे रहें संस्कृतियों के
अपने-अपने ‘इग्लू’
अलग-अलग वक्रताओं को
आवाज देती भाषाओं 
हमें विशिष्ट बनाते
जुदा-जुदा हमारे वस्त्र सज्जाओं
हमारी आत्मा तक को तृप्त करते
हमारी रसना को दुलारती
स्वादों को संपोशित करती
हमारी पाक कलाओं से
बड़ा वैभव कैसे हो सकता है
मैं अपील करता हूं हथियारों के 
सौदागर अपने भाइयों और बहनों से
तुम इन्हें छोड़कर
कोई और व्यवसाय क्यों नहीं करते
 
मैं एक कवि हूं
मुझमें कई कई जिदगियां प्रविष्ट हैं
मानव और मानवेतर कई प्राणियों के
दुख दर्द को उजागर करना चाहता हूं
मैं एक पुरुष हूं इस वैश्विक 
सृष्टि को भरपूर जीना चाहता हूं
इसे अक्षय रखने के अपने संकल्प 
के साथ कि पौरुष यही है कि 
वह अंकुरित हो आशा और विश्वास
के छोटे-छोटे पौधों का रूप धरकर
कि पुरुषत्व कुचलना नहीं है
किसी उर्वरता को
कि पुरुष होना बंजर होना नहीं है
कि पुरुष होना कर्कश होना नहीं है
कि पुरुष का स्त्री के समर्थन 
और सहयोग में होना सृष्टि के नव
निर्माण की परंपरा में खड़ा होना है
 
मैं इस दुनिया में जीते हुए
स्थूल रूप से
महसूसता हूं कुछ ऐसी 
सूक्ष्मताओं को भी
जो हमें बचाए रखेंगी और जिनसे
मैं स्वयं भी बचा रह सकूंगा
मुझे लगता है परस्पर विरोधी 
दिखती कुछ चीजें
कुछ विचार रह सकते हैं
साथ-साथ
कि विरोध है
तो सहअस्तित्व की संकल्पना है
कि हमें किसी के
अस्तित्व को नष्ट करने
का कोई हक नहीं है
कि किसी और को मारकर
हम खुद को भी
बचाए नहीं रख सकते देर तक।
******

पूछताछ करें