अर्पण कुमार

मासूमियत
मासूमियत
मेरी हो या तेरी
एक विश्वास है
हरी दूब में
स्निग्धता और कोमलता
के बचे रहने की 
नोक भर,
मासूमियत है
तभी कायम है
महताब की महताबी,
दीवाने की दीवानगी,
आंखों की नमी,
और मन की आवारगी
इसके होने से बचा है
हारिल की चोंच में
पड़ा तिनका,
दिल में जब तब
उठ पड़ती कौंध,
तेज चलते जिस्म से
विद्रोह कर
पीछे की ओर सहसा
मुड़ जाती गर्....
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