सुधीश पचौरी

कुछ छूटी हुई बहसें और कुछ बातें

जिस तरह ‘आपातकाल’ (1975-76) भारतीय इतिहास, राजनीति और सामाजिक जीवन के लिए एक निर्णायक काल रहा उसी तरह वह हिंदी साहित्य के लिए भी एक निर्णायक काल रहा। भाषा और अभिव्यक्ति दोनों में बड़ा बदलाव आया। कौन उस काल की निरंकुश सत्ता के साथ रहा, कौन उसका विरोधी रहा और कौन तटस्थ रहा, ये सवाल आपातकाल के बाद बहुत दिन बाद तक तक चर्चा में रहे। यह वह समय था जब पहली बार साहित्य और राजनीति इतन....

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