सुधीश पचौरी

कुछ छूटी हुई बहसें और कुछ बातें

जिस तरह ‘आपातकाल’ (1975-76) भारतीय इतिहास, राजनीति और सामाजिक जीवन के लिए एक निर्णायक काल रहा उसी तरह वह हिंदी साहित्य के लिए भी एक निर्णायक काल रहा। भाषा और अभिव्यक्ति दोनों में बड़ा बदलाव आया। कौन उस काल की निरंकुश सत्ता के साथ रहा, कौन उसका विरोधी रहा और कौन तटस्थ रहा, ये सवाल आपातकाल के बाद बहुत दिन बाद तक तक चर्चा में रहे। यह वह समय था जब पहली बार साहित्य और राजनीति इतने आमने-सामने आए और साहित्य का मूल मुहावरा सीधे राजनीतिक हो गया।

आपातकाल हमारी ‘अभिव्यक्ति क्षमता’ की परीक्षा की तरह पेश आया। जिसका सीधा असर पत्रकारिता और साहित्य के रूपों पर हुआ। अब तक कलात्मक अभिव्यक्ति के जो कलात्मक तौर तरीके अपनाए जा रहे थे वे बदले और कहीं वे सीधे और दो टूक, कहीं वे सांकेतिक, प्रतीकात्मक तथा अन्योक्ति हुए। जिन दिनों हर अखबार के दफ्रतर में संपादक से ऊपर ‘सेंसर’ बैठा दिया गया हो वहां आप पुराने ढंग की खबरनवीसी की भाषा में बहुत कुछ नहीं कह सकते। उसके लिए नई भाषा जरूरी रही। वहीं गढी गई, साहित्य ने भी उसे गढ़ा, कविता कहानी की बदली हुई शैली में बदलाव नजर आया, कविता में सांकेतिकता आई, कहानियों में प्रतीकात्मकता से काम लिया जाने लगा।इसी दौर में स्पेन, इटली, जर्मनी की फासिस्टिक सत्ताओं को नजदीक से जाना जाने लगा, हिटलर और उसके फासिज्म को अधिक स्पष्टता से पढ़ा और समझा गया। जदानोव की फासिज्म विरोधी पीपल्स फ्रंट के सूत्रें को समझा गया।

हिंदी में फैज अहमद फैज की शायरी आपातकालीन अनुभवों को कहती लगीं। जर्मन नाटककार और कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की अनेक कविताएं यहां की बात कहती लगीं। हिंदी के काव्य पर ब्रेख्त की काव्य शैली का असर हुआ जो सबसे अधिक रघुवीर सहाय की कविता में दिखा। वह उनके काव्य संकलन ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से लेकर ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’ में दिखा।यों तो ‘अकविता’ ने ‘नई कविता’ के ‘अति भद्रत्व’ का अंत कर दिया था, बाकी कसर आपातकाल ने पूरी कर दी।इसी श्रृंखला में हमने पहले भी कहा है कि साही और नामवर ने बताया कि नई कविता के ‘केंद्र’ में नेहरू थे। इसका मतलब यह नहीं कि नये कवि नेहरू की राजनीति के भौंपू थे या कोरे प्रचारक थे। दरअसल वे नेहरू के विकास मूलक भाव की ‘अभिव्यक्ति’ थे। अच्छे भविष्य की उम्मीद और आदमी का इस बदलाव से निपटने का भरोसा, नई कविता का संदेश रहा, भले ही उसमें आपस में टकराते कई तरह के स्कूल भी रहे।कई कवि तो नेहरू के सीधे विरोधी भी रहे जैसे नागार्जुन लेकिन यह विरोध भी नेहरू से उम्मीद रखने और उनके पूरा न होने की निराशा से उपजा था। नेहरू के ऐसे आलोचक भी नेहरू के भाव क्षेत्र (इमोशनल स्फीयर) से बाहर नहीं पड़ते थे। एक नजर से देखें तो नागार्जुन की कविता की नेहरू से ‘शिकायतें’ नेहरू को ‘अपना’ मानने का ही परिणाम थीं।

नेहरू के विदा होने के बाद राजनीतिक स्पेस को यद्यपि कुछ दिन लालबहादुर शास्त्री ने भरा। पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय और ‘जय जवान जय किसान’ का उनका दिया नारा उस दौर के विकास की चुनौतियों को दर्शाने वाला रहा लेकिन कुछ ही समय में उनकी अकाल-मृत्यु ने उनके रिक्त किए राजनीतिक स्पेस को इंदिरा गांधी ने भरा। इंदिरा का दौर हर हाल में एक बड़ा ही निर्णायक दौर रहा।

इंदिरा भी साहित्य का केंद्र बनी। साहित्य में व्यक्त होने वाली बहुत-सी आलोचनाए और बहुत सी रिक्तताएं प्रकारांतर से इंदिरा को ही केंद्रीय शक्ति मानकर हुईं। इस दौर के साहित्य की नाराजगी उसका नाराज मुहावरा इंदिरा को ही समर्पित रहा। लेकिन इस दौर को इस तरह न पढ़ा गया जबकि उसे इस तरह भी पढ़ा जाना चाहिए था। जब नेहरू अपने वक्त के साहित्य के केंद्र में हो सकते हैं तो इंदिरा क्यों नहीं हो सकतीं?

इंदिरा गांधी का समय और साहित्य बहुतों को यह  उपशीर्षक अजीब लग सकता है। लोग कह सकते हैं कि  किसी समय के साहित्य को परिभाषित करने के लिए क्या उसके केंद्र में किसी राजनेता का होना जरूरी है? और उसमें भी इंदिरा गांधी जैसी कम पढ़ी-लिखी नेता को साहित्य कला के केंद्र में रखना क्या ठीक है?

हमारा कहना होगा कि यह सच है कि यह कोई ‘नियम’ नहीं  कि साहित्य की दिशा को कोई राजनेता ही तय करता है लेकिन इतिहास में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब साहित्य और उसके समय की राजनीति एक-दूसरे की ऐसी तीखी समक्षता में आकर एक-दूसरे से ‘गुत्थमगुत्था’ हो जाती है। और जिस नेता या दल के हाथ में उस वक्त की कमान होती  है यानी कि जो ‘शाहेवक्त’ होता है वही उसके बहुत से मानी भी तय करता है। इसीलिए ऐसा व्यक्तित्व साहित्य का भी अनिवार्य संदर्भ बन उठता है क्योंकि साहित्य संस्कृति और कलाओं पर, भाषा और उसके रूपों पर उसका सीधा या तिरछा प्रभाव पड़ता है।

खासकर विकासशील समाजों में जहां समाज को गति देने की हर कमान राजनीतिक सत्ता और एक नेता के हाथ में हो, जो अपनी केंद्रीकृत सत्ता और नीतियों के जरिए हर आदमी की जुबान पर रोज का अनुभव बनकर बैठ जाता हो, वह उस समय के साहित्य सेे बाहर हरगिज नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि वह अपने नाम से वहां न मिले लेकिन उसके  निशान भाषा में पडे़ रह जाते हैं जिनको महसूस किया जा सकता है और पढ़ा भी जा सकता है। किसी भी स्थिति में साहित्य उसे अपनी विषय क्षेत्र से बाहर नहीं रख सकता। इसी मानी में साहित्य भी ‘राजनीति’ करता है।

साहित्य का इतिहास बताता है कि राजनीति और उसके नियंता साहित्य संस्कृति में प्रत्यक्ष रूप में न सही तो अप्रत्यक्ष रूप में रहते ही हैं। उनकी नीति और राजनीति के निशान रचनाओं में रहते ही हैं। इन निशानों से ही साहित्य अपने समय के इतिहास को अपने जरिए लिखा करता है। इस बात को आज का ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ अच्छी तरह समझाता है!

अकाल और उसके बाद/एक विखंडनउदाहरण के लिए, यदि नागार्जुन ‘अकाल’ पर कविता लिखते हैं तो हम मानकर चल सकते हैं कि कवि की नजर में कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई अकाल पड़ा है जिसका असर मानव जीवन पर हुआ है। अकाल के फलस्वरूप पैदा हुई भुखमरी के दृश्य कवि को परेशान करने वाले रहे हैं इसीलिए तो कवि ने अकाल को कविता में रचा ताकि हम भी उसके अनुभवों के जान सकें। ऐसी कविता अकाल की खबर तो देगी ही वह यह भी बताएगी कि अकाल पड़ा तो क्यों पड़ा? किन नीतियों के चलते अकाल पड़ा और उसके बाद क्या हुआ? ऐसे विषयों पर कविता एक रिपोर्ताज की तरह भी हो सकती है और सामान्य खबर की तरह भी हो सकती है और कटाक्ष भरी भी हो सकती है। यह सब कवि पर निर्भर है कि वह किस तरीके को चुने। हम नागार्जुन की ‘अकाल और उसके बाद’ की कविता को एक कम शब्दों में अल्पकालीन अकाल का सारा चित्र खींच देने वाले एक लघु रिपोर्ताज की तरह भी पढ़ सकते हैं और एक व्यंजनातंक खबर की तरह भी पढ सकते हैं। अगर हम इस कविता के साथ नागार्जुन की ‘दुखरन मास्टर’ कविता को भी पढे़ं तो दोनों कविताएं एक दूसरे की पूरक लगेंगी क्योंकि ‘दुखरन मास्टर’ वाली कविता में भी राशन के अभाव का जिक्र है यानी एक प्रकार के अभाव और अकाल का संकेत है। इसीलिए तो ‘दुखरन मास्टर’ दुखी है और अपना दुख को बच्चों को संटी से पीट-पीटकर पढ़ाने में व्यक्त करते हैं और कवि एक हमदर्दी भरे व्यंग्य से उनके रोष को कहता जाता है।

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लेकिन अकाल भी कई तरह का हो सकता है। किसी को फील हो सकता है किसी को फील नहीं भी हो सकता है। जिन दिनों नागार्जुन ‘अकाल’ बना रहे हैं। उन्हीं दिनों नई कविता के कई कवि ‘अभिव्यक्ति’ के नए तारीके तलाश रहे हैं वे यानी सही और परम ‘शब्दाभिव्यक्ति’ के अकाल से जुझ रहे हैं।

कहने का अर्थ यह कि हम किसी काल की कविता को, उसमें व्यक्त काल में लोकेट करके ही आगे बढ़ सकते हैं। यों हम चाहें तो ‘अकाल के बाद’ कविता को सिर्फ ‘संरचनावादी’ तरीके से भी पढ़ सकते हैं जिसमें उसके शब्दार्थ को पढ़ने के लिए कविता और उसकी भाषा से बाहर जाने की जरूरत नहीं। सब भाषा में ही मिल सकता है क्योंकि संरचनावाद मानता है कि अर्थ भाषा के बाहर नहीं होता वह संरचना के अंदर  ही होता है।

लेकिन जैसे ही हम उसकी संरचना का ‘विखंडन’ (डिकंस्ट्रक्शन) करते हैं तो हमें उसकी संरचना में कवि के छोडे़ हुए बहुत से सेंसर नजर आने लगते हैं जो कविता को बनाने के काम में लाए जाते हैं। ‘विखंडन’ का एक सूत्र कहता है कि हम जो नहीं लिखते वह हमारे लिखे में छिपा रहता है, उसके निशान दबे रहते हैं।‘डिकंस्ट्रक्शन’ इन्हीं दबेे निशानों या चिन्हों को टटोलता है और खोलता है। 

‘अकाल और उसके बाद’ कविता में अकाल पैदा करने वाले सिस्टम के बारे में एक शब्द नहीं नजर आता लेकिन फिर भी ‘दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद’ की लाइन में वह सिस्टिम सामने आ जाता है कि यह एक अल्पकालीन अकाल है और दाने आए यानी उनको किसी ने भेजा है। इससे हम जान जाते हैं कि यह एक प्रकार का ‘मनुष्य कृत’ अकाल है जिसे सिस्टम ने बनाया है, अधिकारियों ने बनाया है, शासन ने बनाया है। वह पहले अकाल बनाता है फिर कुछ देने भेज देता है और हम तुष्ट हो जाते हैं, उसके आदी हो जाते हैं। यह आदी होना ही कविता का दबा हुआ चिन्ह् है जिस पर कवि उंगली रखता है।

 ‘दाने आए’ तो साफ है कि वे ‘कहीं से आए हैं’ किसी ने भेजे हैं सवाल गूंजता है कि ‘जहां से आए’ वहां से वे ‘पहले क्यों न आए?’ यही कविता की व्यंजना शक्ति है। आप ‘दानों के आने’ के सुखांत पर मुग्धा न हों बल्कि उनको रोकने वालों को समझें। यही उसका ‘विखंडनात्मक पाठ’ है। इसे संस्कृत के काव्यशास्त्र में बताई गई ‘व्यंजना’ भी कह सकते हैं। 

डिकंस्ट्रक्शन की तरीका बहुत कुछ हमारी ‘व्यंजना शक्ति’ के काम करने के तरीके से मिलता-जुलता है।

इसका मतलब यह भी है कि किसी भी दौर में साहित्य और उसकी रची राजनीति और विचार एक दूसरे को काटते संवारते, बिगाड़ते, उजाड़ते और बनाते चलते हैं। उनके व्यंजक चिन्ह् और मानी लगातार चंचल और तरल रहते हैं, इसलिए समकालीन साहित्य को किसी ‘एक इतिहास’ में फिक्स करना एक बेहद असंभव काम है। 

इसीलिए नागार्जुन की इस कविता के उदाहरण से यह बताने की कोशिश की कि आधुनिक समाज में ‘अकाल’ मनुष्य-कृत ही होते हैं। कहना न होगा कि ‘अकाल मनुष्य-कृत होते हैं’ इस एक सूत्र तक आने में जिन अमर्त्यसेन या कई अन्य अर्थशास्त्रियों को काफी रिसर्च करनी पड़ी, उस सूत्र को नागार्जुन बहुत पहले अपनी इस एक कविता में बता चुके हैं।

हम मानते हैं कि हर शब्द, हर लाइन हर कविता-कहानी, आलोचना, हर एक मुहावरा, हर एक लाइन हर एक टिप्पणी हर एक पोस्टर, हर एक विज्ञापन, हर एक फिल्म हर एक गाना हर एक झगड़ा हर अनुष्ठान और सत्ता के नाना संजाल मिलकर अपने समय को जिस तरह बनाते मरोड़ते चलते हैं, उसका हिस्सा होकर भी साहित्य उनको बनाता है और उनका क्रिटीक पैदा करता है। इसी कारण ‘आलोचना’ संभव होती है।कहने की जरूरत नहीं कि नागार्जुन की यह कविता नेहरू और इंदिरा दोनों के वक्तोें का समेकित क्रिटीक है और इस काम में वे अकेले नहीं है।  

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इंदिरा इज इंडिया और श्रीकांत वर्मा

सन् 1970 से सन 1984 तक का समय ‘इंदिरा गांधी का समय’ है। हमारा मानना है कि जिस तरह इंदिरा साहित्य में ‘घटती’ है और उसी तरह ‘साहित्य’ इंदिरा में नहीं घटता है। इंदिरा साहित्य का विषय हो सकती हैं लेकिन इंदिरा के लिए साहित्य का बहुत अधिक मानी नहीं। वो नेहरू नहीं थी न हो सकती थीं, नेहरू अज्ञेय की कविताओं के अंग्रेजी संकलन की भूमिका लिख सकते थे। वे दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका भी लिख सकते थे लेकिन इंदिरा ऐसी विदुषी नहीं थी कि ऐसा कुछ करतीं।

लेकिन फिर भी कम-से-कम एक हिंदी कवि को उन्होंने अपने साथ अवश्य रखा जिसका नाम ‘श्रीकांत वर्मा’ था। शायद इसी कारण श्रीकांत वर्मा, इस दौर के हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी दुविधा की तरह नजर आते हैं। शायद इसीलिए हिंदी साहित्य के समकालीन इतिहास में श्रीकांत वर्मा एक ही वक्त में ‘अनिवार्य’ हैं और ‘भी हैं। वो कांग्रेस के सांसद हैं इसलिए बहुत से साहित्यकारों के लिए अनिवार्य हैं क्योंकि वे सत्ता के नजदीक हैं इसलिए उपयोगी हैं वे किसी का भी काम करा सकते हैं लेकिन उसी समय कइयों के लिए वे एक कठिनाई भी हैं क्योंकि उसी कांग्रेस के नेता हैं प्रवक्ता है जो बहुत-सी जन विरोधी नीतियों और अतिचारों के लिए जिम्मेदार नजर आती है वो इंदिरा के नजदीक हैं वो उनके भाषण लेखक कहे जाते हैं वे बहुत ताकतवर हैं हिंदी के नाना साहित्यकार उनके दरवाजे पर धोक लगाया करते हैं और उनकी बैठक में ‘बैठते’ भी हैं। बैठक बाजों के मन में इस संग-कुसंग को लेकर  न कोई ऊहापोह नजर आती है न किसी नैतिक किस्म की हिचक नजर आती है। श्रीकांत वर्मा का होना तब के हिंदी साहित्य के लिए एक ही वक्त में एक बड़ी सुविधा और उतनी ही बड़ी दुविधा भी हैं। शायद यही कारण है कि नई कविता के वृतांत में उनको एकाध जिक्र में निपटा दिया जाता है।

(इसी तरह हिंदी की नई कविता और बाद की कविता के एक बड़े सुविधा-दुविधा वाले कवि आलोचक हैं अशोक वाजपेई। वे आईएएस अफसर हैं। अपने कौशल से वो साहित्य में सक्रिय रहते हैं वो कवियों को बनाते हैं और बिगाड़ते भी हैं। उनके पास ताकत है भोपाल का भारत भवन है, नाना उपक्रम हैं, उनके पास वजीफे हैं, आश्रय-स्थल हैं, जिनमें वो बहुत से जरूरतमंद और बहुत गैर, जरूरतमंद साहित्यकारों को प्रश्रय देते हैं। लेकिन ने सर्वोपरि एक अलग तरीके के कवि हैं, लेकिन कविता के नए प्रतिमान’ में वे कहां हैं दूरबीन लेकर खोजना पडता है। बहरहाल, अशोक पर जब आगे चर्चा आएगी तब कुछ और बातें की जाएंगी।   

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श्रीकांत हम पर फिर लौटेंः

नेहरू से मोहभंग के दौर में विकसित अपने समय की स्थितियों का खासा क्रिटीक देने वाला एक निहायत ‘तेजाबी कवि’ और उस दौर का ‘अकवि’ नेहरू के बाद के वक्त में कांग्रेस का एक बड़ा नेता बन कर सामने आता है जबकि उधर कई साहित्यकार कांग्रेस के ‘विपक्ष’ भी बने रहते हैं और श्रीकांत के दरबारी भी बने रहते हैं।

जाहिर है कि ये ही वे दिन हैं जब हिंदी के कई बड़े साहित्यकार अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से प्राप्त होने वाली नैतिक-दृष्टि को नरम करने में लगे हैं। यह वही दौर है जब नैतिकता साहित्य से विदा लेती है। 

कहने की जरूरत नहीं कि श्रीकांत वर्मा का केस राजनीति और कवि के संबंध को समझने-समझाने के लिए एक मॉडल केस है जो बताता है कि एक ही समय एक कवि संसद का सदस्य है कांग्रेस के नेता का भाषण लिखता है, चुनावों के नारे लिखता है और कुछ सटीक नारे गढ़ता है और वही ‘मगध’ जैसी व्यंजनात्मक कविताएं लिखता है।

श्रीकांत वर्मा हिंदी कविता की ‘अंदरूनी स्प्लिट’ यानी ‘आंतरिक विभक्ति’ के ऐसे उदाहरण है जिनके व्यक्तित्व में हमें एक नया किस्म का ‘कांशस स्प्लिट’ नजर आता है यह ‘स्कीजोफ्रेनिया’ नहीं है। एक ही वक्त में वे सत्ता के साथ होते हैं और कवि भी होते हैं और आखिरी दिनों में ‘अपने’ ही ‘मगध’ के प्रति क्रिटीकल नजर आते हैं कि ‘मगध’ में ‘विचारों की कमी’ है। जब तक ‘मगध’ में मलाई बनी तब तक सब ठीक-ठाक रहा और जब विदो बेला आई तो मगध में विचारों की की नजर आने लगी। मगध में वे अपनी ही भोगी हुई सत्ता के एक क्रिटिक की तरह उभरते हैं।  

लेकिन उनका यह ‘स्प्लिट’ हिंदी में अब तक अलक्षित ही रहा है और इस सवाल से तो हिंदी में अभी तक नहीं टकराया गया कि जब कोई कवि सत्ता का हो जाता है तो भी क्या वह पूरी तरह सत्ता का हो जाता है या उसका कुछ हिस्सा बचा रहता है जो सत्ता का पूरी तरह नहीं हो पाता। और देर-सबेर वह उससे अपने अकुलाहट भरे रिश्ता को कहता ही है। इसे कवि का अवसरवाद कहें या यह कहें कि जिस तरह कोई कवि वामपंथी विचार का हो सकता है, कोई कवि कांग्रेसी विचार का भी हो सकता है।

हिंदी की झाडू मार आलोचना, जो इंदिरा गांधी के दौर में खूब चलन में रही (यों वह आज भी उसी तरह से चलन में है) ने यह कभी सोचने नहीं दिया कि क्या राजनीति किसी कवि को जब अपना बनाती है यानी वह राजनीति को अपना बनाता है तो क्या वह उसे पूरी तरह से पचा जाती है। यानी क्या वह राजनीति का एक अभिन्न अंग हो जाता है और उसक सारे दुर्गुण भी कवि में आ जाते हैं या कि उनका वरण करते हुए भी उसका कुछ ‘स्वत्व’ बचा रहता है जिसके अंदर कुछ-न-कुछ अनबन बनी ही  रहती है, उकताहट बनी ही रहती है और एक हद के बाद वह फूट पड़ती है। यानी कि जरूरी नहंीं कि कवि किसी पतित राजनीति का हिस्सा होकर पूरा पतित हो जाए। उसका कुछ अपना बचा भी तो रहता हो सकता है जिसे उसकी कवित्वशक्ति ने बनाया-बचाया होता है और जो राजनीति के आगे कभी पूरी तरह सरेंडर नहीं करता।

यह विश्लेषण कहता है कि राजनीति के हिस्से हुए किसी भी कवि को संदेह का कुछ लाभ तो मिलना ही चाहिए लेकिन हिंदी की चलताऊ आलोचना में राजनीति और साहित्य के रिश्ते को किसी जटिल रिश्ते की जगह उसे सिर्फ भ्रष्ट रिश्ते की तरह ही माना जाता रहा है। इसके चलते राजनीति में जाने वाले साहित्यकार को अपेक्षित संदेह का लाभ कभी न दिया। यह अपने आप में आलोचना की ‘शठता’ है जिससे हमें सावधान रहना चाहिए। 

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इंदिरा, आपातकाल और आजादियों की खात्मा इंदिरा के दौर ने नेहरूवादी जनतंत्र की दरारों को खोल दिया। यों नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने और पाक से एक युद्ध भी हुआ लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की अकाल मृत्यु ने उनके समय का जल्द ही अंत कर दिया। उनका दिया ‘जय जवान जय किसान का नारा’ फिल्मों में भले लोकप्रिय हुआ, भद्र साहित्य में एकदम न घुस पाया। 

इंदिरा का दौर देश की एकता की रक्षा और जनतंत्र की परीक्षा का कठिन दौर रहा। कांग्रेस ही सत्ता में रही लेकिन उसकी कमान बदल गई। वह इंदिरा के हाथों में आ गई। कांग्रेस की छतरी में हमेशा से नरम और गरम गुट रहे। नेहरू की मिश्रित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था चरमराई-आर्थिक संकट गहराया। कृषि में उत्पाद का संकट बढ़ा। अनाज का संकट पैदा हुआ। अकाल की सी स्थिति पैदा हुई। इनसे निपटने की नीति अपनाने को लेकर कांग्रेस में मतभेद बढे़। इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का दामन पकड़ा और सामंतों और जमींदारों के प्रिवी पर्सों को खत्म कर साथ ही बैकों का राष्ट्रीयकरण कर अपने छवि को गरीब की हितैषी के रूप में बनाई और कांग्रेस के दक्षिणपंथी तबके को अलग-थलग कर दिया।

इंदिरा की एक नई छवि का निर्माण हुआ। ‘मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ’ (जिसके रचयिता शायद श्रीकांत वर्मा बताए जाते रहे) के नारे ने उनको जनता का प्रिय बना दिया। दक्षिणपंथी कांग्रेसी नेता हारे और इदिंरा चुनाव जीतीं और जल्द ही कांग्रेस ‘इंदिरा कांग्रेस’ हो गई। 

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान वो पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त देने वाली और बांग्लादेश को बनाने वाली बनीं। विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई ने उनको इसके लिए ‘दुर्गा का अवतार’ तक कहा। विचार की राजनीति की जगह पापूलिस्ट राजनीति की शुरुआत हुई।

इसके बाद सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता गया। सत्ता का अहंकार बढ़ता गया। निरंकुश ताकत का संचय होता गया। सत्ता स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगी। हम कुछ भी करके कानून की पकड़ से बच सकते हैं, ऐसा अहंकार बढ़ा।

इस सबकी प्रतिक्रिया में इंदिरा की सत्ता से असंतोष बढ़ने लगा। भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। छात्र असंतोष बढ़ने लगा। उधर कांग्रेस के पुराने और निष्कलंक छवि के नेता ‘जेपी’ राजनीति में कूद पडे़ और संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। सीपीआई को छोड़ बाकी लगभग सब दल कांग्रेस के विरोध में आंदोलन करने लगे। सत्ता का अहंकार और जनता का असंतोष लगभग समांतर चल रहा था।

इंदिरा गांधी पर लोकसभा चुनाव में ‘हेरा-फेरी’ करने के, गैर-कानूनी उपाय करके जीतने के आरोप लगे। विपक्ष के दुर्दमनीय समाजवादी राजनारायण ने इन्हें लेकर केस किया और अदालत ने उनको मान लिया और इंदिरा गांधी को सत्ता से हटने को कहा। कांग्रेस के भीतर के और बाहरी विरोध से घबराकर और अपनी कुर्सी जाने के डर से इंदिरा गांधी ने 25 जून, 1975 के आधी रात को ‘आपातकाल’ घोषित कर दिया और नेहरू के प्रिय तमाम मौलिक अधिकारों को और 

आजादियों को एक झटके से निरस्त कर दिया। कांग्रेस में इंदिरा विरोधी और बहुत से विपक्ष के सारे बडे़ और बहुत से मंझौले नेताओं को आधी रात पकड़कर जेल में डाल दिया गया। सारे देश को जेल बना दिया। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर अंकुश लग गया। नेहरूवादी जनतंत्र का खात्मा हो गया।

आपातकाल ने भारतीय समाज को तो गहरे तरीके से प्रभावित किया ही, साहित्य संस्कृति के और अभिव्यक्ति के क्षेत्र को सीधे और गहरे प्रभावित किया।

जीवन में पहली बार सत्ता की नग्न निरकुंशता रचनाकारों को ऐन सामने और प्रत्यक्ष दिखी। आपातकाल ने पुलिस और कानून के जरिए एक ऐसे सार्वजनिक ‘डर’ की स्थापना की जो सबको ‘फॉल इन लाइन’ होने के लिए कहता था। आपातकाल के नारे थे ‘पक्का इरादा, कड़ा अनुशासन।’ अनुशासन का पालन न करने वालों को दंडित किया जाता था। सत्ता को तनिक-सी भी आलोचना बर्दाशत नहीं थी। संविधान प्रदत्त बुनियादी अधिकार निरस्त कर दिए गए थे। विपक्ष के नेता देशद्रोह के ‘आरोपों’ में जेल में डाल दिए गए थे। ‘जेपी’ जैसे गांधीवादी नेता को, जो सरकार विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे, सबसे पहले जेल ले जाया गया। कांग्रेस के अपने अनेक नेता जो इंदिरा गाधी के खिलाफ जा सकते थे नजर बंद किए गए या जेल में डाल दिए गए। विपक्ष में समाजवादी के बडे़ नेता जेल ले जाए गए साथ भारतीय जनसंघ के और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई नेता भी जेल में डाल दिए गए। छात्रसंघ प्रतिबंधित कर दिए गए।

दूर-दृष्टि, पक्का इरादा, कड़ा अनुशासन आपातकाल के लगते ही दिल्ली के बाहर की दुनिया बहुत बदली न बदली लेकिन दिल्ली जैसे बडे़ शहरों की दुनिया एकदम बदली नजर आई। 

दिल्ली की जनता जो किसी चीज के लिए ‘क्यूं’ नहीं लगाती थी अब डीटीसी की बस में चढ़ने के लिए ‘क्यू’ लगाने लगी। लोग अचानक ‘शांत’, ‘सभ्य’ और ‘अनुशासित’ दिखने लगे। दमन को जरूरी समझने वाले मुखर हो गए, उनको आपातकाल पसंद आया क्योंकि उनकी नजर में बहुत आजादी देने से समाज बिगड़ जाता है, इंदिरा ने जो किया ठीक किया। कम-से-कम दिल्ली की पढ़ी-लिखी मिडिलमक्लास का मूड ‘प्रो’ का था। मुंबई कलकत्ता तक का यहीं हाल था। बिहार में भले कुछ नाराजी रही हो बाकी जगह आपातकाल के खिलाफ बहुत हलचल नहीं दिखी।

लोग कम बोलने लगे। शोर भरी बसों में शांति रहने लगी। पार्कों में ताश खेलने वाले वृद्धों की संख्या यथावत रही लेकिन रोज के हंगामे कम हो गए। आपसी झगड़े कम हो गए। नए नारे लिखे नजर आने लगे उनके विज्ञापन छपने लगे जो इस प्रकार रहे। इस सबने इंदिरा को अनुशासन प्रिय नेता बना दिया। साथ में रेडियो और टी-वी- तथा अखबारों के जरिए ‘बीस सूत्रीय कार्यक्रम’ प्रचारित किया जाने लगा जो अपने प्रकृति से तो सुधारात्मक था लेकिन जिसे डंडे़ के जोर पर लागू किया जा रहा था सत्ता सीधे जनता को सुधारना चाहती थी। जनसंख्या कम करना, नसबंदी पर जोर देना, दो से अधिक बच्चे न पैदा करना, एन्क्रोचमेंट हटाना, बाजारों को चौड़ा करना, उनके साइन बोर्ड्स को एक साइज का बनाना, दहेज का विरोध करना, झुग्गियों को हटाना, शहरों को साफ और सुंदर बनाना। ऐसे ही न जाने कितने आदेश उपदेश थे जो दिन-रात बजते रहते थे। बीस सूत्रीय कार्यक्रम के कुछ सूत्र सीधे स्कूलों कॉलेजों तक लागू किए गए। सब शपथ लेते और सरकार को भेजते कि हमने शपथ ले ली है कि दहेज न लेंगे न देंगे जो शपथ नहीं लेता निकाल दिया जाता। हर बाबू हर मास्टर, हर ब्लाक का चपरासी, एक न्यूनतम संख्या में लोगों की नसबंदी करवाए। एक संख्या तक नसबंदी करवाना जो न कराता उसे दंड स्वरूप जबाव देही से लेकर सस्पेंशन तक भुगतना पड़ता। जो न्यनूतम से अधिक नसबंदी के केस लाता उसे उन्नति दी जाती। उसको इनक्रीमेंट दिया जाता और जो अपनी नंसबदी कराता है उसे दो सौ रुपए और एक ट्रांजिस्टर दिया जाता। 

नसबंदी के अधिक से अधिक केस लाने के चक्कर में कुछ लोग बहुत से लोगों की नसबंदी जबरिया कराने लगे- अव्वल तो नसबंदी आदमी की निजी देह की दुनिया में हस्तक्षेप था फिर उसे जबर्दस्ती पकड़-धकड़ कर नसबंदी करवा देना आम चलन हो गया। इसके साथ झुग्गियों को हटाने बाजारों को चौड़ा करने की प्रशासन की मनमानी कार्रवाई से पैदा हुआ असंतोष भी गहराने लगा।

सत्ता की मनमानी की प्रतिक्रिया होने लगी और पहली बार प्रशासन और जनता कई जगह आमने-सामने आने लगी। अन्यथा नुशासनप्रिय जनता को नसबंदी अभियान अपनी निजी दुनिया में हस्तक्षेप नजर आया। लोग नाराज होने लगे। इस तरह नसबंदी करवाने वाले और जिनकी की जाती वे सब एक पेज पर आ गए और इंदिरा गांधी के शासन के प्रति एक गहरी नाराजी मन में बैठने लगी। पुलिस के डर से लोग बोलते नहीं थे लेकिन अंदर ही अंदर खुंदक खाए रहते थे।

आपातकाल के सफाई अभियान का दमनात्मक चेहरा दिल्ली के तुर्कमान गेट के एक बडे़ झुग्गी क्लस्टर को जबरिया साफ करने के दौरान प्रकट हुआ। यह ज्यादातर गरीब मुसलमान रहते थे। लोगों ने जब इस जबर्दस्ती का विरोध किया तो पुलिस ने उनका दमन किया रोड रोलर चलाए गए। अर्थ मूवर चढ़ाए गए जब जनता ने प्रतिरोध किया तो पुलिस ने डंडे़ बरसाए और कहते हैं कि गोलियां भी चलाई। इससे हाहाकर मच गया। लोग उजडे़ तो बाकी लोग हमदर्दी में उनके साथ आ गए। इसी सफाई अभियान के कर्ताधर्ता के रूप में संजय गांधी का नाम लोगों की जुबान पर आया। आपातकाल में सत्ता अपने को खुदा मानने लगी। कांग्रेस के एक नेता बरुआ ने तो कह ही दिया था ‘इंदिरा इज इंडिया’ एक व्यक्ति का पर्याय बन चली।  

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किशोर कुमार का प्रोटेस्ट

सरकार के डीएवीपी आदि विभाग विज्ञापनों के जरिए  बीस सूत्रीय कार्यक्रमों के प्रचार में जुटा दिए गए। सरकारी कला संस्कृति मंच, सरकार के ‘क्रांतिकारी’ कार्यक्रमों का प्रचार करने लगे। बॉलीवुड तक को इसके लिए जुटाया जाने लगा-हर जगह इंदिरा के बडे़ होर्डिंग लगे होते। इंदिरा गांधी भले ही पीएम थी लेकिन दैनिक कामकाज की असली और कमान उनके पुत्र संजय गांधी के हाथ में थी।

सत्ता किस तरह की निरंकुशता से काम ले रही थी इसका एक नमूना दिल्ली में एक सांस्कृतिक ईवेंट के अवसर पर दिखा।  

एक दिन सरकार यानी संजय गांधी ने चाहा कि तब के सबसे हिट फिल्मी गायक किशोर कुमार दिल्ली के अंबेडकर स्टेडियम में आकर सरकार के पक्ष में एक कार्यक्रम करें।

किशोर कुमार के बारे में जो जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि वे नितांत अराजनीतिक लेकिन पूरी तरह से एक 

प्रोफेशनल कलाकार थे। उनका किसी भी किस्म की दलीय राजनीति से कोई संबंध न था। वे इस कदर प्रोफेशनल थे कि हर  कार्यक्रम के लिए अच्छी फीस लिया करते थे। सत्तर के दशक के वे सर्वाधिक लोकप्रिय गायक थे। उन दिनों उनके गाने रेडियो पर दिनभर बजा करते। दस में से सात आठ गाने तक उन्हीं के होते। बाकी में दूसरे कलाकार होते। मुहम्मद रफी का एकाध गाना आता तो आता वरना वो भी न आता। लता आशा आदि के वे गाने ही आते जिनमें वो किशोर के साथ गातीं।

यह आरडी बर्मन लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और किशोर कुमार का दौर था। किशोर की मर्दानी सघोष करारी आवाज नई पीढ़ी को अच्छी लगती। किशोर का कंठ, आर डी बर्मन या लच्छो प्यारे की धुनें एक दूसरे के ‘कम्पलीट सिंक’ में थीं।

ऐसे में जब किशोर को दिल्ली में कार्यक्रम करने बुलाया गया तो उन्होंने सबसे पहले अपनी फीस की बात रखी कि इस कार्यक्रम के लिए उनको कितना पैसा दिया जाएगा। जब संपर्क करने वालों ने सरकार की दाब-धौंस का हवाला दिया तो डरने की जगह उन्होंने यही कहा  कि सरकार हो या कोई हो, बिना पेमेंट के वे नहीं आने वाले।

आपातकाल लगाने वाली निरंकुश सत्ता और उसके कर्णधार चाहते थे जो रिक्वेस्ट की गई उसे आदेश मानकर उसका चुपचाप पालन किया जाय। देश के हित में इतना काम किया जा रहा है तो कलाकारों की भी ड्यूटी है कि वह सत्ता के हित में काम करें उसका प्रचार-प्रसार करें। सरकार के आदेश पर जनता का मनोरंजन करें ताकि वह सरकार की छवि कला प्रेमी की बने।

लेकिन किशोर-किशोर थे फिल्मी दुनिया में सब जानते थे कि वो बिना पैसा लिए अपने बाप के लिए न गाते-वे एकदम कट्टर प्रोफेशनल थे इसमें उनकी कोई राजनीति नहीं थी।

लेकिन वो अहंकारी निरंकुश सरकार किसी से ना सुनने की आदी नहीं थी इसलिए उसने वही किया जिसे वो कर सकती थी।

किशोर का मना करना था कि रेडियो उनके गाने तुरंत से ब्लैकलिस्ट कर दिए। रेडियो सुनने वाले किशोर के फैन जो दिन-रात उनकी आवाज सुना करते, अचानक उनकी आवाज के रेडियों से गायब हो जाने पर चौंक पडे़। रफी जिनको किशोर ने किनारे कर दिया था फिर वापस हुए और उनके गानों ने किशोर के गानों की जगह ले ली।

किसी भी राजनीति से दूर रहने वाले एक स्वतंत्र और मनमौजी कलाकार के साथ आपातकालीन निरंकुश सत्ता का ऐसा मनमाना आचरण बहुत कुछ कहता है।

देवानंद दूसरे कलाकार रहे जिन्होंने आपातकाल का खुल कर विरोध किया और शायद एक निजी दल भी बनाया। लेकिन बाकी बॉलीवुड हमेशा की तरह खामोश ही रहा। यहां तक कि कला फिल्मों वाले लोग तक खामोश रहे। 

यह थी ‘आपातकाल’ के ‘आतंक’ की एक मामूली-सी झलक। निरंकुश सत्ता का आतंक।

(और यह तो सिर्फ एक नमूना है बाकी बहुत-सी बातें आपातकाल के फौरन बाद आई बहुत-सी किताबों में दर्ज है जिनमें से कुलदीप नÕयर की किताबों से लेकर बहुत कैदियों के संस्मरण हैं, जेल यातनाओं के विवरण हैं जिनको कोई चाहे तो किसी पुरानी लाइब्रेरियों में देख सकता है।)

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प्रलेस, अशोक वाजपेई का भोपाल स्कूल और बांदा लेखक सम्मेलन पिछली किश्त में हमने आखिर में नार्गाजुन के जेल जाने और बीच में ही बाहर लौट जाने की बात की थी। यहां उस प्रसंग का कुछ विस्तार जरूरी है।

इसमें आपातकाल के ऐन पहले के वक्त की साहित्यिक हलचलों की एक झलक मिल सकती है जिसे देख हम आपातकाल के कुछ पहले और आपातकाल के दौरान पैदा हुए उस दमनकारी वातावरण को समझ सकते हैं जिसने साहित्य पर काफी विषम असर डाला। उसपर नए किस्म का दबाव बनाया। उसकी कलात्मक तरकीबों पर यानी उसकी भाषा और शैली पर असर डाला।

हिंदी की आलोचना में इस दौर की कुछ सूचनाएं यत्र-तत्र भले दर्ज हुई हों आपातकाल से कुछ पहले के समय से लेकर आपातकाल के दौरान किस तरह का वातावरण बन रहा था, उस वातावरण का ‘फील’ कैसा था, यह साहित्यालोचना की किसी किताब में या टिप्पणी में एकमुश्त दर्ज नहीं हुआ।बाद में इस काल की कविता, कहानी आदि की आलोचनाएं लिखी गई लेकिन इंदिरा के युग में खासकर सत्तर से चौरासी तक के राजनीतिक उपक्रमों का और दबावों का साहित्य पर क्या असर हुआ, इसे किसी आलोचक ने एकाग्र करके नहीं देखा।इस से भी सिद्ध है कि हिंदी साहित्यकारों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश का लगना कोई बड़ी बात नहीं थी। इसका कारण प्रगतिशील आंदोलन की राजनीति थी जिसकी पितृ-पार्टी सीपीआई कांग्रेस को सारी सीमाओं के बावजूद ‘प्रगतिशील’ नीतियों पर अमल करने वाला दल मानती थी और इंदिरा के विरोध में चलते जेपी आंदोलन को प्रतिक्रियावादी मानती थी और जिसके पीछे वह सीआईए का हाथ मानती थी। चूंकि हिंदी साहित्य का एक बड़ा धड़ा प्रगतिशील लेखक संघ के प्रभाव में था इसलिए भी आपातकाल के कांटे उनको फील न हुए और सिर्फ नागार्जुन को छोड़ उनके खिलाफ किसी ने स्टेंड न लिया!

(यह थी ‘अभिव्यक्ति की आजादी के लिए’ मरने वाले बहुत से प्रगतिशील और वरिष्ठ हिंदी लेखकों की भूमिका!)

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यह बात हमारी आलोचना में अब तक दबी ही रही है कि जिस आपातकाल को ‘आजादी की हत्यारा’ कहा गया, उसी की ‘खुली निरंकुशता’ से अनेक बड़े प्रगतिशील हिंदी लेखकों ने आखें मूंद लीं। यही नहीं ऐसे लेखकों और उनके संगठन ने इस ‘निरंकुशता’ तक को ‘उचित’ माना और इसे भी दो टूक शब्द न कहकर बहुत-से किंतु-परंतु लगाकर कहा।आज जो लोग ‘आजादी’ के लिए मरे जाते हैं उन दिनों वे और उनके चेले चांटी उसके लिए एकदम परेशान न थे।यही नहीं प्रगतिशील स्कूल को मानने वाले कमलेश्वर, आपातकाल के बाद अपनी आजादी की लड़ाई की एक अलग ही कहानी लेकर आए आपातकाल के दिनों में उन्होंने ‘सारिका’ के कई अंकों में, कई कॉलमों में काली स्याही पोतकर और वैसा छापकर यह दिखाने की कोशिश की कि उनकी पत्रिका पर भी आपातकालीन सेंसर का दबाव था जो उनके नियंत्रण से बाहर था। यह उन्होंने ‘झेला’ और इसके बावजूद सेंसर से प्रोटेस्ट करते हुए उन्होंने जगह-जगह काली स्याही पोतकर ‘सारिका’ निकाली जबकि ‘सारिका’ के अंदर की कहानी कुछ और ही थी। कमलेश्वर के नजर में जेपी आंदोलन उसी तरह अराजक और सीआइए समर्थित था जिस तरह कांग्रेसियों और सीपीआई वालों के लिए था।

कमलेश्वर की स्याही छाप अवसरवादिता पर उंगली रखने वाले रहे शरद जोशी जिन्होंने आपातकाल में अपनी बहादुरी की डींग मारने वाले कमलेश्वर के लेख ‘जो कायर है वे कायर ही रहेेंगे’ की पोल खोलते हुए जबाव में लिखा था ‘जो टायर हैं वे टायर ही रहेंगे’!

आपातकाल से पहले कमलेश्वर ने किन्हीं अनिल घई से ‘सारिका’ में ‘चिकनी सतहें बहते आंदोलन’ शीर्षक से ‘लघु पत्रिका आंदोलन’ पर किश्तवार तरीके से हमला कराया था।

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आपातकाल से पूर्व का और उसके दौरान का इतिहास गवाह है कि प्रगतिशील लेखक महासंघ का एक अखिल भारतीय सम्मेलन शायद एमपी में हुआ जिसमें इंदिरा गांधी की प्रगतिशील नीतियों की प्रशंसा की गई थी और जेपी आंदोलन की निंदा की गई थी। इस सम्मेलन में नामवर सिंह से लेकर भीष्म साहनी तक को संघ का बड़ा पदाधिकारी बनाया गया था। बहुत से बडे़-छोटे प्रगतिशील इसमें शामिल थे।

जब एक लेखक संघ ही कांग्रेस को प्रगतिशील मानता था और उसकी दमनकारी नीतियों की निरंकुशता का अनुभव न करता था तो उसके लेखक क्यों करते?

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इसी दौर में अशोक वाजेपई भी मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक साहित्यिक स्तर पर सक्रिय थे- अपनी प्रशासनिक कुशलता के जरिए वे अपने भोपाल स्कूल को सारी विरोध-बाधाओं के बावजूद जमा सके थे।

प्रगतिशीलों के एक धडे़ के लिए यह एक एलीटिस्ट और रूपवादी स्कूल था और हम जैसे नए मार्क्सवादियों, जनवादियों के लिए भी वह रूपवादी था और तब की सरल किस्म की मार्क्सवादी समझ के अनुसार, रूपवाद और प्रतिक्रियावाद एक ही हुआ करते थे।अशोक वाजपेई कांग्रेस के शासन में संस्कृति और कला का काम कर रहे थे। मार्क्सवादियों की नजर में कांग्रेस एक प्रतिक्रियावादी और दमनकारी शक्ति थी इसलिए अशोक को भी ‘प्रतिक्रियावादी’ होना था। और जो उनके साथ थे उन उनको भी वैसा माना जाता था।

इस दौर के अपने ऐसे कट्टरतावादी ‘वर्ग संघर्ष’ के बारे में  हम पहले भी बता चुके हैं।

(कांग्रेस या अशोक वाजपेई को लेकर तब की हमारी समझ क्या सही थी? क्या उसकी कुछ अपनी अतियां नहीं थीं? कांग्रेेस को लेकर हमारी आलोचना कहीं उस दौर में एक जेनेटिक किस्म की घृणा में तो नहीं बदल गई थी? विचारधारा के नाम पर हमारी आलोचना में कहीं कुछ पर्सनल किस्म की घृणा तो नहीं घुस गई थी?अगर कांग्रेस या उसके नेता अर्जुन सिंह या उनके साथ काम करने वाले अशोक वाजेपई इतने ही घृृण्य थे तब बहुत से कथित क्रांतिकारी लेखक भोपाल में उनकी पत्र-पत्रिकाओं में काम क्यों किया करते थे? (और आजकल भी क्यों उनको अपना नेता मानते हैं?)

कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदी में विचारधारा के नाम पर बहुत से निजी हिताहित, मित्रता, निजी स्वार्थ, बैठकबाजी, खान पान के संबंध, अपने इलाके के होने के संबंध अनकही अनबताई जाति के रिश्ते, ताकत के रिश्ते ही विचार और विचारधारा के नाम पर काम करते हैं। क्रांतिकारिता और मार्क्सवाद तो सिर्फ ऊपरी मेकअप होता है। उपर से लेखक क्रांतिकारी विचारों का दावा करता है लेकिन अंदर खाने वह बेहद अवसरवादी होता है और अपने हर अवसरवाद के लिए नए तर्क ले आता है। 

और अब जब कांग्रेस की चौतरफा ठुकाई हो चुकी है, बहुत कुछ अपनी करनी से और बहुत कुछ आलोचकों की ठुकाई से क्षत-विक्षत हो चुकी है तब भी हमारे कई क्रांतिकारी वामपंथी उसे आईसीयू से निकालकर ठीक करके अपने लिए फिर उसे छतरी की तरह तानना चाहते हैं। क्या यह फिर किसी विचार की जगह निजी हित अहित की बात नहीं हैं। जिसे हम आलोचना कहते हैं या कविता, कहानी कहते हैं, अगर वो हमारी निजी घृणा का वाहक बन जाती है तो क्या वह ‘कला’ रह जाती है या कि वह कुछ निजी हिसाब-किताब करने का चाकू बन जाती है? या कि इसमें भी ‘पर्सनल इज पॉलिटीकल’ जैसे सूत्र से ही काम चलाया जाना चाहिए? हम मानते हैं कि विचार और विचारधारा के क्षरण के साथ साहित्य का भी क्षरण हो रहा है। ऐसे क्षरण की साहित्य-सिद्धांतिकी (या सिद्धांतिकियां) क्या और कैसी हों? इस सवाल का एक जबाव उत्तर-आधुनिक सिद्धांतिकियां देती हैं जो कहती है कि साहित्य को कल्चरल थियरीज के साथ सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में देखने समझने की सिद्धांतिकियों के जरिए समझना चाहिए और उसे सिर्फ साहित्य की तरह न लेना चाहिए। निजता के दबाव से निपटने का एक तरीका ‘डिकंस्ट्रक्शन’ ही है तब क्या उसे स्वीकारा जाए और संस्कृत साहित्य शास्त्र से  मिलाकर उसका विस्तार किया जाना चाहिए?  

ये और ऐसे अनेक नए सवाल इसलिए किए जाने योग्य हैं क्योंकि किसी निजता से रहित और एकदम तटस्थ और एक आलोचनात्मक नजरिए और तरीके को तलाशना जरूरी है।  चूंकि हमारी बीमारियां अलग हैं इसलिए उसकी दवा भी हमारी ही होनी चाहिए!

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(क्रमशः)

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