प्रेमपाल शर्मा

खिड़की/अंग्रेजी पुस्तकों का संसार

बिहाइंड बार्स’ जानी-मानी टीवी एंकर सुनेत्र चौधरी की किताब है। वहीं सुनेत्र चौधरी जो एनडीटीवी 24ग्7 में रात 9 बजे अक्सर आपको दीन दुनिया की खबरें बताती हैं। समाचार, पत्रकारिता की लगभग चमकीली दुनिया के बीच उनकी नजर खबरों की खोजबीन में जेल की सलाखों के पीछे की दुनिया तक चली गई जहां अमर सिंह, पप्पू यादव, 2 जी के मशहूर ए राजा, सुब्रत सहारा,  प्रसिद्ध कवि श्रीकांत वर्मा के पुत्र अभिषेक वर्मा और उनकी पत्नी अंका वर्मा, पीटर मुखर्जी, नीतीश कटारा कत्ल के विकास, विशाल यादव, आदि-आदि रहे हैं। इन सब के कारनामे तो मीडिया अखबार में रोज आते हैं और उम्मीद है कि सब को पता भी होंगे लेकिन नई खबर, दुनिया को यह किताब दिखाती है कि जेलों में इनका जीवन कैसे बीता। व्यवस्था की बहुत सारी सलवटें, अंधेरे कोने किताब सामने लाती है। यह जानना हमारे लोकतंत्र, नौकरशाही, भ्रष्टाचार या पूरे देश को जानना है। यह एक बैरोमीटर भी है देश के लोकतंत्र का जहां पैसे के बूते, रुतबे के आधार पर कानून की खूब ऐसी तैसी होती है। और वह भी देश की राजधानी दिल्ली में।

पहला अध्याय जाने-माने राजनीतिज्ञ अमर सिंह पर। बहुत मुश्किल से तैयार हुए वह अपनी जेल के दिनों के बारे में बताने के लिए। वे भले ही सिर्फ 4 दिन रहे हो तिहाड़ जेल में लेकिन उनके जीवन के कुछ अब तक अज्ञात पक्ष यह किताब सामने लाती है। चौधरी उन मशहूर पत्रकारों में हैं जो पहले प्रिंट मीडिया में थी और उसके बाद टी-वी- पत्रकारिता में आई है इसलिए उनके भाषा और कहने का अंदाज इतना मोहक है कि आप एक अच्छी फिल्म की तरह पुस्तक उठाने के बाद छोड़ नहीं सकते। सलाखों के पीछे की दास्तां से पहले सुनेत्र चौधरी अमर सिंह के जीवन को भी टटोलती है कि कैसे एक हवाई यात्र के दौरान वर्ष 1995 में अचानक ही मुलायम सिंह से अमर सिंह की मुलाकात हुई थी। और फिर ऐसी गहरी दोस्ती कि केंद्र की सरकारों को बनाने बिगाड़ने तक में अमर सिंह की भूमिका पूरा देश जानता है। मुलायम सिंह को मुंबई के अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी और जयाप्रदा से अमर सिंह ने ही मिलवाया जिसे लेखिका मुंबई की सेक्सी दुनिया से मुलाकात का नाम देती है। जैसा कि अमर सिंह की विशेषता है वे हर व्यक्ति के बारे में बहुत साफ साफगोई से अपनी बात कहते हैं। बार-बार इस बात से दुखी होने के बावजूद इसके कि उनका उन्हीं दिनों लिवर सर्जरी  हुआ था उन्हें जबरजस्ती तिहाड़ भेजा गया। अपराध था वर्ष 2008 में 123 उर्फ इंडो यूएस न्यूक्लीयर एग्रीमेंट के समय करोड़ों की रिश्वत संसद सदस्यों को देने के मामले में। इस पूरे प्रसंग को जानना भी बहुत रोचक है। वाम पार्टियों ने फैसला कर लिया था कि वे इस समझौते को नहीं होने देंगे। मुलायम सिंह भी उन्हीं के साथ थे। आखिर सरकार बचाने के लिए क्या किया जाए। 2004 में मनमोहन सिंह सरकार आने के वक्त अमर सिंह बिना बुलाए ही वहां स्वागत समारोह में चले गए थे और सोनिया गांधी ने उन्हें लगभग अपमानित भी किया था। लेकिन बावजूद इसके मनमोहन, कांग्रेस की निगाहें अमर सिंह की तरफ गई और मामला सही रास्ते की तरफ बढ़ने लगा। अमर सिंह के माध्यम से मुलायम सिंह को पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब से मिलाया गया जिससे कि मुलायम सिंह इस बात से संतुष्ट हो सके कि यह समझौता क्यों राष्ट्रीय हित में हैं और कलाम के घर पर ही मीडिया को यह बताया गया। लेकिन अमर सिंह के शब्दों में ‘मेरे खिलाफ न कोई प्रमाण था न कोई फोटो, सिर्फ-सिर्फ उस सक्सेना से दोस्ती थी जो एक करोड़ नोटों के साथ पकड़ा गया था। सक्सेना के बेटे को अमर सिंह ने दयाल सिंह कॉलेज में दाखिला कराया था। इसका प्रमाण प्रिंसिपल को लिखी 1, 2 चिट्ठियां थी। अन्ना केजरीवाल आंदोलन 2012 में चरम पर था नेताओं के खिलाफ गुस्सा फिजा में था। और इसीलिए जज श्रीमती ढींगरा ने उन्हें हर हालत में जेल भिजवा दिया। बहुत लंबी दास्तान है और जेल में उनको एक बाल्टी और एक मग्गा मिला। उसी से उन्हें लैट्रिन जाना था और उसी से पानी, चाय पीनी थी। बार-बार इस बात को कहते हैं कि मेरी हालत को देखते हुए यह मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था। इसमें अप्रत्यक्ष रूप से उन दिनों के गृहमंत्री चिदंबरम की भूमिका बताते हैं और यह भी कि जब पार्लियामेंट में कोई भ्रष्टाचार करता है तो उस पर कभी कोई अपराध नहीं बनता लेकिन मेरे मामले में यह सब किया गया। अमिताभ बच्चन के प्रति भी वे अपनी नाराजगी जताते हैं कि 4 दिन के दौरान वे उन्हें देखने नहीं आए और जब जमानत पर छूट गए तो उन्होंने भी अमिताभ को कोई तवज्जो नहीं दी। लीवर की परेशानी की वजह से उन्हें ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में रहना पड़ा और वे बताते हैं कि जस्टिस धींगरा उनके डॉक्टर से पूछती थी कि उन्हें वापस जेल कब भेज रहे हैं। इस पर डॉक्टर ने कहा इसका फैसला उनके स्वास्थ्य पर  निर्भर रहेगा।

कोबाड गांधी का किस्सा। वे भी हमारी व्यवस्था के वैसे ही शिकार हुए। दर्जनों मामले उनके खिलाफ दर्ज किए गए और पहुंचा दिए गए तिहाड़ जेल। 70 वर्ष की उम्र में। उम्र के इस पड़ाव में उनकी एक नहीं सुनी गई जबकि मणिशंकर अÕयर, कमलनाथ जैसे कद काठी की नेता दून स्कूल में उनके सहपाठी रहे थे। माननीय न्यायाधीश के निर्णय भी बड़े विचित्र होते हैं। उपहार कांड के अंसल भाइयों को तो उम्र के आधार पर पैरोल पर छुट्टी मिल जाती है लगभग गांधी जी की तरह जीवन बिताने वाले कोबाड गांधी को नहीं। कोबाड गांधी ने विस्तार से अफजल गुरु के बारे में लेखिका को बताया है। वही अफजल गुरु जिन्हें संसद पर हमला करने के आरोप में फांसी दी गई थी। 2008 से लेकर उनकी फांसी होने तक नियमित रूप से उनके साथ सुबह की चाय होती थी। कोबाड गांधी का मामला अभी भी कई न्यायालयों में चल रहा है। जेल की सीखचों के अलावा दूसरे समकालीन राजनीतिक प्रश्नों पर भी यहां गहराई से विचार किया गया है। अफजल गुरु को कोबाड गांधी की नजरों में बहुत सूफी विचार का बताया है। खैर इस प्रश्न पर जेएनयू से लेकर कई मंचों पर अखाड़े बाजी हो चुकी है। 

इस किताब के बहाने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमारी न्याय व्यवस्था पर उठता है। बतौर भूमिका सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर सुनेत्र पूछती हैं कि लगभग 6000 की क्षमता की तिहाड़ जेल में 14000 से ज्यादा कैदी कैसे समा सकते हैं? उन्होंने आंकड़े दिए हैं कि कैसे वर्ष 2014, 15, 16 में लगभग हर वर्ष 40 से अधिक लोग लोगों ने आत्महत्या की। यह कैसे संभव है? और दिल्ली में जहां कैमरे लगे हैं कि मोबाइल और दूसरी सुविधाएं भी पैसे वालों के पास आराम से पहुंच जाती हैं। नीतीश कटारा मामले के अभियुक्त विकास और विशाल यादव बीमारी के बहाने, अल्ट्रासाउंड करने के लिए, 80 से अधिक बार एम्स में भर्ती हो जाते हैं और ठाट बाट से हॉस्टल में रहते हैं विशेषकर नए वर्ष और हर त्योहार पर मीडिया में खबरें जाने के बावजूद भी। उनकी आजादी पर आंच नहीं आती लेकिन कोबाड गांधी और अमर सिंह के मामले में न्यायालय दूसरा रुख अपनाता है। हमारा न्याय रुतबा सापेक्ष है सत्य सापेक्ष नहीं है। वैसे ही जेसिका लाल की हत्या करने वाले मनु शर्मा के पिता ने अपने बेटे की खिदमत में लगे पुलिसकर्मियों की खातिर तिहाड़ जेल के नजदीक जनकपुरी में एक पिकाडल होटल ही बनवा दिया जहां आराम से पुलिस वाले या दूसरे मददगार आनंद उठा सकें।सिर्फ इन बड़े लोगों की ही कहानी नहीं है किताब में। मुंबई बम कांड के अभियुक्त वाहिद की कहानी और भी दर्दनाक है। सालों साल जेल में प्रताडि़त होने के बाद न्यायालय ने उसे अपराधी नहीं माना लेकिन क्या जेल में किए जाने वाले अत्याचारों को वाहिद भूल सकता है। सुनेत्र चौधरी ने रॉय और दूसरे पुलिस अफसरों से इन प्रश्नों के जवाब भी मांगे लेकिन पुलिस का जवाब हमारी व्यवस्था का जवाब है। अपनी भूमिका में लिखा है कि कैसे वे इस विषय पर पुस्तक लिखने की तरफ आगे बढ़ी। जाने-माने हिंदी कवि श्रीकांत वर्मा के बेटे अभिषेक वर्मा और उनकी विदेशी पत्नी सेंट्रल जेल में रहे थे। एक दिन उनकी पत्नी लेखिका से मिलती है और जेल की दास्तान बताती है। उसी पर आगे बढ़ते हुए लेखिका जेल की सलाखों के पीछे का सच दुनिया को बताना चाहती हैं। मशहूर हस्तियों को चुनने का कारण? क्योंकि उनके बारे में लोगों की उत्सुकता होती है। निश्चित रूप से लेखिका की सहानुभूति हर कुख्यात विख्यात के साथ है और  उनका आभार भी मानती हैं कि उस दर्द दुख के निजी पीड़ा को उन्होंने लेखिका के साथ बांटा। सुब्रत राय से सीधी बात नहीं हुई लेकिन उनके बारे में उनको मिली अनंत सुविधाओं के बारे में दूसरे कैदियों ने उन्हें बताया। कुछ लोगों ने बताने से इंकार भी किया। तमिलनाडु की संसद सदस्य और 2जी घोटाले में ए राजा के साथ जेल गई कनिमोझी ने मना कर दिया। जो भी कारण रहे हो लेखिका का मानना है कि वे उन दिनों को फिर से याद नहीं करना चाहती और वैसे भी वह बहुत अकेले रहने वाली शख्सियत हैं। शिवानी भटनागर हत्याकांड के अभियुक्त आर के शर्मा, अबू सलीम, मोनिका बेदी वे लोग हैं उन्होंने कहा कि वे खुद अपनी किताब लिखेंगे।

नई पीढ़ी के नौजवानों को ऐसी पुस्तकें जरूर पढ़नी चाहिए विशेषकर वे मेधावी नौजवान जो आईआईटी आईआईएम और दूसरे मशहूर संस्थानों में पढ़ हैं। कारण यह देश का सामाजिक राजनीतिक यथार्थ है जिसे सुधारने के लिए उसे पहले जानना उतना ही जरूरी है। अक्सर हमारे पाठ्यक्रमों में विदेशी केस स्टडी और उनकी समस्याएं ज्यादा होती हैं। भारतीय जमीनी अनुभव तो दूर-दूर तक नहीं। ऐसी पुस्तकें संसद प्रशासन नौकरशाही के संबंधों को समझने में बहुत मददगार साबित होंगी। काश इस पुस्तक से सबक लेते हुए हमारी जेलों में सुधार हो पाते। पहले भी यदा-कदा ऐसी किताबें आती रही हैं लेकिन इस अकेली किताब में कई बड़े नामों के बहाने तत्कालीन राजनीति और व्यवस्था पर बहुत रोचक ढंग से उंगली रखी है। एक सहानुभूति के साथ थी, कि माना उन्होंने अपराध किया है लेकिन उन्हें ऐसी अमानवीय स्थितियों में रखना, छल प्रपंच की ऐसी सुरंगों में, ऐसे भेदभाव के साथ धकेलना क्या कम बड़ा अपराध है? बधाई लेखिका को।

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