अजित राय

कुछ कला जगत से

यह घटना एक सितंबर 2002 की है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर की पहल पर सम्मुख सभागार में हबीब तनवीर का 80वां जन्मदिन मनाया जा रहा था। तभी बंगलुरू से खबर आई कि हम सबके प्रिय रंगकर्मी बी-वी- कारंत नहीं रहे। एक दिग्गज रंगकर्मी के जन्मदिन पर दूसरे दिग्गज रंगकर्मी ने महाप्रस्थान किया था। यह वह दौर था जब हिंदी रंगमंच में बड़ी हलचल थी। हबीब तनवीर और कारंत के जाने के बाद इस समय रंगमंच में कोई बड़ी उपस्थिति नहीं है। गतिविधियों की भरमार है, पर उनसे कोई बड़ी बात बनती नहीं दिखती। ऐसा इसलिए भी हो रहा है 1861 में किरलोसकर द्वारा भारत की पहली आधुनिक रंगमंडली बनाने से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक पिछले 160 सालों में लोक शास्त्रीय क्लासिकल संस्कृत पारंपरिक राजनैतिक, सामाजिक नुक्कड़ स्त्रीवादी, संगीत प्रधान, दलित, आदिवासी जनजातीय आदि-आदि सारे दौर सारे प्रयोग बीत चुके हैं।

सत्तर के दशक में रंगमंच में भारतीयता का नारा दिया गया और मोहन राकेश, गिरीश करनाड, शम्भू मित्र और विजय तेंदुलकर उभरकर सामने आए। हबीब तनवीर, श्यामानंद जालान, पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे, जब्बार पटेल, विजया मेहता, कावलम नारायण पणिक्कर, इब्राहीम अलकाजी, बी-वी, कारंत कन्हैया लाल, रतन थियम आदि जिस भारतीय कहे गए रंगमंच की बुनियाद रखी वह अब नेपथ्य में जाने की तैयारी में है। रंजीत कपूर, एम-के- रैना, बंसी कौल, प्रसन्ना भानु भारती, देवेंद्र राज, अंकुर, राम गोपाल बजाज आदि का रंगकर्म भी अब थकने लगा है। जिस इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) का कभी ऐतिहासिक योगदान माना जाता था उसके पास भी कोई एक ऐसा नाटक नहीं है जिसे देखकर खुश हुआ जा सके। हम कभी विजया मेहता, नीलम मान सिंह चौधरी उषा गांगुली, अनुराधा कपूर त्रिपुरारी शर्मा अमाल अल्लाना नादिरा जहीर बब्बर, बी जयश्री आदि के नाम गिनाते थकते नहीं थे उनकी विरासत संभालने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता। सुरेखा सीकरी और उत्तरा बावरकर के बाद किसी अभिनेत्री का नाम लेना पड़े तो दिमाग पर जोर डालना पड़ता है।

इस समय भारतीय रंगमंच में एक साथ पांच पीढि़यां सक्रिय है। करीब दो हजार रंग मंडलियां काम कर रही हैं। हम यदि जयपुर या भोपाल का ही उदाहरण लें तो वहां सालभर बारहों महीने रोज कोई न कोई नाटक होता है। जयपुर रंग महोत्सव के निर्देशक दीपक गेरा की बात पर गौर करें या भोपाल के वरिष्ठ रंग समीक्षक गिरिजा शंकर की सुनें तो यह आश्चर्यजनक है कि इन रंग गतिविधियां की कोई सामूहिक उपस्थिति क्यों नहीं है।  हमारे दैनिक अखबारों में रंग समीक्षा लगभग खत्म हो चुकी है पर उनमें रंगीन खबरों की भरमार है जिसे संजोकर प्रोजेक्ट बनाए जा सकते है। ऐसे माहौल में भी आजमगढ़ से जबलपुर और बनारस से गोवा, ग्वालियर से टोंक और भोपाल से चंडीगढ़ तक के भूगोल में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर रंगकर्म को समर्पित युवाओं की एक पूरी जमात है। इनमें से अधिकतर युवा रंगकर्मी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक नहीं है। उदाहरण के लिए इनमें से कुछ के नाम तो गिनाए ही जा सकते है  जैसे- अभिषेक पंडित (आजमगढ़), व्योमेश शुक्ल (वाराणसी), नीरज कुंदेर (सीधी), आशीष पाठक (जबलपुर),  सौरभ अनंत (भोपाल), राजकुमार रजक (टोंक, राजस्थान), मनीष जोशी (हिसार, हरियाणा), चक्रेश कुमार (चंडीगढ़), लकी जी गुप्ता (जम्मू), बिजयेंद्र टॉक (पटना), और पूर्वा नरेश (मुंबई)। अतुल सत्य कौशिक और विकास बाहरी (दिल्ली)। इनके साथ हमारे एन एस डी ग्रेजुएट रंगकर्मियों में टीकम जोशी, हैपी रंजीत साहू और दानिश इकबाल, गोविंद यादव, आसिफ अली, (दिल्ली), रणधीर कुमार (पटना), प्रवीण कुमार गुंजन (बेगूसराय), योगेंद्र चौबे (खैरागढ़), और अनघा देशपांडे (गोवा) ने भी रंगकर्म को समझने और कुछ नया करने की कोशिश की है। शारदा सिंह (पटना) सिगमा उपाध्याय (भिलाई) रुचि भार्गव (जयपुर) रमणजीत कौर (कोलकाता), प्रियंका शर्मा, साजिदा (दिल्ली) आदि अभिनेत्रियों नें भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है। ये तो महज कुछ ही नाम है, मुझे लगता है कि ऐसे दो सौ से ज्यादा नौजवान रंगमंच में अपनी भाषा की तलाश कर रहे हैं।

भोपाल की अग्रणी नाट्य संस्था विहान के निर्देशक सौरभ अनंत और उनके साथी श्वेता केतकर, सुदीप सोहनी और हेमंत देवलकर की रंग यात्र अविश्वसनीय अनुभवों से भरी हुई है। वे कहते हैं- ‘‘नाटक करना मेरी एक अंतहीन कामना है और यह कामना मेरे साथ लगातार हर क्षण बनी रहती है। एक निर्देशक के नाते जब मैं कोई नाटक बना रहा होता हूं या कोई नाटक देखने जाता हूं तो पाता हूं कि रंगमंच पर पर मुझे चमत्कृत कर रहा है, वह एक जादू है जो रहस्य बनाए रखता है। मैं हर बार उसे नये सिरे से जानने की उत्सुकता में वापस उसके पास जाता हूं और रंगमंच हर बार मुझे आश्चर्य चकित कर देता है।’’ विहान नौजवानों के लिए रोल मॉडल बन रहा है जिसके अधिकतर सदस्य भविष्य के रंगमंच के बारे में सोचते हैं। इस समूह की नई प्रस्तुति ‘रोमियो जूलियट’ चकित कर देने वाली है। हरियाणा के हिसार में मनीष जोशी के अनुभव तो चमत्कृत करने वाले हैं। वे कहते हैं- ‘बचपन से ही मुझे हकलाहट की बीमारी थी। जब भी मैं दोस्तों को बताता कि मैं नाटक करना चाहता हूं तो सब मेरा मजाक उड़ाते। एक दिन मैंने रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी ‘‘काबुली वाला’’ को याद किया और अपने दोस्तों के सामने खुद ही मंचित कर दिया। मित्रें के साथ मुझे खुद आश्चर्य हुआ कि मैं एक भी बार नहीं हकलाया। सच है, कला दर्शकों को बाद में आश्चर्यचकित करती है, पहले वह खुद को आश्चर्यचकित करती है। मनीष जोशी का नया नाटक ‘‘सतनाम वाहेगुरु’’ काफी चर्चित हो रहा है जो गुरु नानक देव जी के जीवन और शिक्षाओं पर आधारित है।

आजमगढ़ के अभिषेक पंडित और ममता पंडित का संघर्ष अतुलनीय है। उनके पास अविश्वसनीय पर सच्ची कहानियों की भरमार है। हम जादुई यथार्थ से उनकी कल्पना तक नहीं कर सकते। पथरीली डगर पर चलते-चलते उन्होंने रंगमंच का अनोखा संसार रच दिया है। उनका नया नाटक ‘चक्षुदोष’, जिसे उन्होंने खुद लिखा भी है, उनके लिए नया प्रस्थान साबित हो सकता है।

सीधी (मध्य प्रदेश) के नीरज कुंदेर के यहां पहुंचना आसान नहीं है। आजादी के सत्तर साल बाद भी इस जिला मुख्यालय में एक ऐसा सभागार तक नहीं है जहां नाटक हो सके। भारत रंग महोत्सव में चार साल पहले हुए उनके नाटक ‘कर्णभारम’ की अब तक चर्चा है। पिछले थियेटर ओलंपिक में उन्होंने एकलव्य की जैसी प्रस्तुति की वह चकित करने वाली है। नरेंद्र सिंह, रौशनी मिश्रा और करुणा सिंह जैसे मित्रें के साथ नीरज कुंदेर का सीधी का रंगमंच सारे देश के रंगकर्मियों के लिए उम्मीदों की पनाहगाह है। उन्होंने मुख्यधारा के बरक्स ट्राइवल और लोक रंगमंच का ऐसा दृश्य रचा है जिसमें भारतीय नाट्य शास्त्र के नये आविष्कार हैं। अब वे बर्बरीक पर नए नाटक की तैयारी में लगे हैं। 

टोंक (राजस्थान) में सक्रिय राजकुमार रजक ने बिना किसी संस्थागत पूंजी के सहयोग से देश में सार्थक रंगकर्म का ऐसा लोक शास्त्र विकसित किया है जिसके बारे मे गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत रंग महोत्सवों में मंचित उनके तीनों नाटक, खासकर विजयदान देथा रचित ‘टेढ़ा दर्पण’ नया सौंदर्यशात्र रचती प्रस्तुतियां हैं।

चंडीगढ़ के चक्रेश कुमार और जबलपुर के आशीष पाठक ने वैचारिक प्रतिबद्धता का ऐसा रंगमंच विकसित किया है जो आज के कॉरपोरेट युग में असंभव जान पड़ता है। इनके लिए रंगमंच आज भी जनता के विचारों में राजनैतिक बदलाव का माध्यम है। आशीष पाठक का लिखा नया नाटक, ‘अगरबती’ अपने विजन में बेजोड़ है जहां बेहमई नरसंहार (फूलनदेवी) की पीडि़ता विधवाएं घृणा-प्रतिशोध से चलती हुई स्त्री संवेदना तक की यात्र करती है। 

वाराणसी के व्योमेश शुक्ल हिंदी कविता में सुपरिचित नाम है। वे अपने विलक्षण गद्य के लिए भी जाने जाते है। उन्होंने साहित्यिक कृतियों के मंचन में महारत हासिल की है जिसमें जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ और निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ काफी चर्चित रहे हैं। वे कहते हैं - ‘बनारस में रहना ही अनंत और सनातन का कीर्तन है और कोई भी कला इन दो तत्वों के बिना प्रबल नहीं बनती, निरी समकालीन बनकर रह जाती है, उसकी सांस बहुत छोटी हो जाती है और उसकी आवाज अतीत के गुंबदों से टकराती नहीं।’

मुंबई की पूर्वा नरेश ने ‘आज रंग है’ और दूसरी प्रस्तुतियों से नई उम्मीदें जगाई है। रंगमंच में उन्होंने अपने स्त्रीवादी एजेंडा को कभी नहीं छिपाया। उनके बारे में युवा पत्रकार दुष्यंत लिखते हैं- ‘एक सतत् बेचैनी का नाम है पूर्वा नरेश- एक गहरी बेचैनी जो थियेटर मे जुनून को परिभाषित करती है। कई कलाओं में एक साथ जीने का हूनर साधती है।’ 

बिहार के बेगूसराय जैसे कस्बे में प्रवीण कुमार गुंजन ने असंभव को संभव कर दिखाया है। वे युवा रंगकर्मियों के लिए एक मिसाल है इस अर्थ में कि कभी कोई समझौता नहीं किया और लगातार सार्थक रंगमंच करते रहे। उनका नया नाटक ‘कथा’ आज के समय में नया आख्यान रचता है। पटना में रणधीर कुमार की सक्रियता देख कर विस्मय होता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकलने के बाद इन दोनों रंगकर्मियों ने थियेटर में ऐसा लगातार कुछ जोड़ा है कि हम कह सकते है कि विचार का रंगमंच आज के दौर में भी जिंदा है। ‘गुलाबबाई’ (डिप्लोमा प्रस्तुति) से लेकर ‘आउटकास्ट’ तक की यात्र में रणधीर कुमार ने लगातार रंगमंच में नये विमर्शों को आगे बढ़ाया है। दूसरी ओर खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) में रंग गुरु योगेंद्र चौबे रंग शिक्षण की समावेशी पद्धति के सतत् अनुसंधान में लगे हैं। गोवा में अनघा देशपांडे वहां की स्थानीयता से वैश्विक अभिव्यक्ति की ओर अग्रसर है। दानिश इकबाल एक बेहतर अभिनेता होने के साथ-साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में थियेटर विभाग चला रहे है। हैपी रंजीत साहू और टीकम जोशी पर रंगमंच गर्व कर सकता है, इनके बारे में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

यह बात भी चकित करने वाली है कि बीस साल पहले हम जिन दिग्गज रंगकर्मियों के नाम गिनाते रहे है, बीस साल बाद भी हम उन्हीं के नाम गिनाते है। इसका मतलब तो यह हुआ कि इन बीस सालों में हिंदी रंगमंच में कोई दूसरा नाम जुड़ा ही नहीं। फिर तो युवा रंगकर्मियों की चुनौती जटिल है। इस बीच हुआ यह कि रंगमंच के लिए गंभीर लेखन के अवसर खत्म होते चले गए।आज हम संचार के सघन समय में जी रहे है जहां कुछ भी छुपा हुआ नहीं है, ऐसा कहा जा रहा है। तो फिर ऐसा क्यों है कि संस्कृति की दुनिया की खुशनुमा खबरें हम तक नहीं पहुंच पाती। हमारी पत्रकारिता, हमारे अखबार, हमारे टेलिविजन चैनल की निगाहें उन सांस्कृतिक खबरों तक नहीं पहुंच रही है जो हमें जीने की ताकत देती है। रंगमंच भी उनमें से एक है। सत्तर अस्सी और नब्बे के दशक में रंगमंच के जो हमारे नायक थे, उनके नेपथ्य में जाते ही ऐसा लगा कि दूर-दूर तक कोई नहीं है। मीडिया के लिए भी ऐसा लगा कि रंगमंच में कोई सेलिब्रेटी नहीं बचा। ऐसा इसलिए हुआ कि हमने अपने लिए कुछ बडे़ नाम चुन लिए और उनकी चमक में भूल गए कि अगली पीढि़यां भी आगे बढ़ रही है। हिंदी के युवा रंगकर्मियों के रंगकर्म पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि रंगमंच की सारी चर्चाएं एक अदद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय या संगीत नाटक अकादमी तक सिमट कर रह गई है।

एक संवाद की जरूरत है, आवा-जाही की जरूरत है, एक दूसरे को सहयोग करने की जरूरत है। सरकारों की बजाय समाज की ओर देखने की जरूरत है वरना एक पूरी पीढ़ी ही निराशा और कुंठा की शिकार हो सकती है। खतरे हैं पर उम्मीदें भी भरपूर हैं। हिंदी रंगमंच का नया चेहरा धीरे-धीरे सामने आ रहा है।

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