विनोद अग्निहोत्री

कुरुक्षेत्र 

चीन की तरक्की पिछले करीब एक दशक से पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है। खासकर एशियाई देश तो उसे विकास का एक नया मॉडल मानने लगे हैं। भारत में भी चीन के विकास मॉडल के प्रशंसकों की कमी नहीं है। भारतीय उद्योगपति, व्यापारी, मध्यम वर्गीय पर्यटक, राजनेता जिसे भी चीन जाने का मौका मिला वह लौटकर वहां की विकास गाथा के किस्से सुनाता मिलता है।

हाल ही में भारतीय मीडिया के एक प्रतिनिधि मंडल ने चीन का दौरा किया, जिसमें मैं भी शामिल था। भारत और चीन के विकास की तुलना करते हुए ज्यादातर सदस्यों ने नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक रही सरकारों और खासकर कांग्रेस की सरकारों को चीन के मुकाबले भारत के पिछड़ने को लेकर जिम्मेदार ठहराते हुए कठघरे में खड़ा किया। मैंने कुछ देर तो चुपचाप उनको सुना फिर जब नहीं रहा गया तो मैंने कहा कि या तो मंदिर बना लीजिये या देश बना लीजिए। या तो इतिहास और अतीत के हिसाब चुकता कर लीजिये या फिर वर्तमान और भविष्य संवार लीजिये। हम इतिहास का हिसाब चुकता करने में अभी भी लगे हैं और चीनी अपना वर्तमान बनाकर भविष्य बनाने में जुटे हैं। मेरी इस बात का कुछ साथी सदस्यों ने प्रतिवाद भी किया। लेकिन वहां यह बहस आगे नहीं बढ़ सकी। लौटकर मैंने इस मुद्दे पर सोचा और इस बहस को आगे बढ़ा रहा हूं। 

जिस चीन को हम आज देख रहे हैं वो 1949 के बाद का नहीं 1980 के बाद का चीन है और बीजिंग व शंघाई जैसे शहरों में जो गगनचुंबी इमारतें, सर्पाकार फ्रलाईओवर, कई लेन वाली चौड़ी सड़कें, विशालकाय पुल, समुद्र का सीना चीर कर बनाया गया  शंघाई का अत्याधुनिक और पूरी तरह स्वचलित बंदरगाह और उसे मुख्यभूमि से जोड़ने वाला 32 किलोमीटर लंबा पुल, सड़कों पर बिजली से चलने वाली बसें, मेट्रो रेल नेटवर्क, मैग्ले ट्रेन, महंगी गाडि़यां आदि की चमकती विकास गाथा भी 1995 के बाद की है। चीन को संगठित करके आधुनिक देश का स्वरूप देने वाली कम्युनिस्ट क्रांति अक्टूबर 1949 में पूरी हुई जब पेइचिंग (अब बीजिंग) के थ्यानान मन चौक (अब तियनान मिन चौक) पर विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए चीनी क्रांति के महानायक माओ त्सेतुंग ने कहा चीन अब फिर कभी गुलाम नहीं होगा। चीन की जनता उठ खड़ी हुई है। उसके करीब दो साल से कुछ वक्त ज्यादा पहले 14 अगस्त 1947 को आधी रात बारह बजे भारत अंग्रेजी शासन से तब आजाद हुआ जब स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की स्वतंत्रता की घोषणा संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित समारोह में की। कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं था तब चीन और भारत के हालात में। भारत जहां करीब दो सौ साल की ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से जर्जर था, तो चीन लगातार चले गृह युद्ध और जापानी साम्राज्यवाद की उथल-पुथल से टूटा हुआ देश था।जहां भारत ने पश्चिमी मॉडल पर आधारित बहुदलीय लोकतंत्र और सरकारी और निजी क्षेत्र के सहविकास वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपना विकास पथ बनाया, तो चीन ने एक दलीय शासन वाली कम्युनिस्ट व्यवस्था को अपनाया, जिसका प्रयोग 1917 की क्रांति के बाद सोवियद संघ में हो चुका था। दोनों देश अपने अपने विकास मॉडल और राजनीतिक प्रणाली पर आगे बढ़ चले। भारत में जहां हर पांच साल बाद नए चुनाव होते रहे वहीं चीन में एक दलीय शासन की वजह से कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता की निरंतरता बनी रही। हालांकि शुरुआती तीस सालों में दोनों ही देशों ने सामाजिक राजनीतिक उथल-पुथल के भी दौर देखे। जहां भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ कुछ चार युद्ध लड़े। नेहरू की मृत्यु के बाद राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता संघर्ष का दौर शुरू हुआ। हालाकि इंदिरा गांधी ने जल्दी ही अपनी सत्ता स्थापित कर ली, लेकिन देश के विभिन्न भागों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर जन असंतोष बढ़ता गया और अनेक राज्यों में आंदोलन तेज हो गए। जहां प- बंगाल से शुरू हुआ सशस्त्र क्रांति का नक्सलवादी आंदोलन बिहार (मौजूदा झारखंड शामिल), आंध्रा प्रदेश (मौजूदा तेलंगाना शामिल), उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश (मौजूदा छत्तीसगढ़ शामिल) आदि राज्यों में फैल गया। वहां समाजवादी विचारधारा वाले दलों ने पिछड़ों और किसान जातियों को गोलबंद करके पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस के एकाधिकार को तोड़ दिया, जिससे कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी और 1974 तक आते-आते सर्वोदयी नेता जय प्रकाश नारायण की अगुआई में इतना जबर्दस्त आंदोलन हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल लगाना पड़ा। जिसकी परिणिति 1977 में केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार के गठन में हुई। 

कुछ इसी तरह चीन में एकदलीय कम्युनिस्ट व्यवस्था के बावजूद कई बार सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल होती रही। क्रांति के फौरन बाद चीन को कोरिया युद्ध में जूझना पड़ा और इसके बाद 1962 में भारत के साथ उसका युद्ध हुआ। इसके अलावा लंबी छलांग या ग्रेट लीप फारर्वड, सौ फूलों को एक साथ खिलने दो (लेट हंड्रेड फ्रलावर्स बूम) जैसे कई अभियान चीनी नेतृत्व ने चलाए जिन्हें लेकर जबर्दस्त राजनीतिक घमासान मचा। सबसे ज्यादा विवादित रही माओ के आहृवान पर 1967 में शुरु की गई सांस्कृतिक क्रांति। कहा जाता है कि इसे सरकार और पार्टी के शीर्ष स्तर पर लगे भ्रष्टाचार और पूंजीवादी रुझान के घुन को मिटाने के लिए माओ ने पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और छात्रें का आहवान किया कि वो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं में भ्रष्ट और पूंजीवादी रुझान वाले नेताओं को चिन्हित करके उनकी सार्वजनिक आलोचना करें। उनके खिलाफ पोस्टर लगाएं, जुलूस निकालें, घेराव करें और प्रदर्शन करके उन्हें पद छोड़ने को मजबूर करें। लेकिन जल्दी ही माओ की यह सांस्कृतिक क्रांति पार्टी में एक-दूसरे के खिलाफ आंतरिक संघर्ष का सबसे बड़ा अखाड़ा बन गई। एक दूसरे से जमकर हिसाब चुकता किया गया। कई वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक तौर पर अपमानित और लांछित किया गया। तंग शियाओ फंग समेत कई शीर्ष नेताओं को गांवों में किसानों के बीच मेहनत मजूरी करने के लिए मजबूर कर दिया गया। हालात यह हो गए कि 1970 तक आते आते खुद माओ को सांस्कृतिक क्रांति की विफलता का अहसास हुआ और उन्हें इसे वापस लेने का एलान करना पड़ा। इसी दौर में चीनी क्रांति के एक दूसरे बड़े नेता और पूर्व राष्ट्रपति ल्यू शाओ ची शीर्ष स्तर पर सत्ता संघर्ष के शिकार हुए और उन्हें गिरफ्रतार करके जेल में डाल दिया गया। माओ के बेहद करीब माने जाने वाले युवा नेता लिन पियाओ ने खुद को माओ का उत्तराधिकारी मान लिया और अचानक एक हवाई दुर्घटना में मारे गए। माओ की पत्नी चियांग चिंग और उनके तीन अन्य साथी सांस्कृतिक क्रांति के दौरान सत्ता का समानांतर केंद्र बन गए, जिन्हें चीनी राजनीति में ‘चंडाल चौकड़ी’ के नाम से पुकारा गया। यह सत्ता संघर्ष 1976 में माओ की मृत्यु के बाद और तेज हुआ जब मध्यमार्गी हुआ क्वा फंग ने पार्टी और सत्ता की कमान संभाली। लेकिन जल्दी ही हुआ को भी पद छोड़ना पड़ा और चीन की राजनीतिक सत्ता की कमान तंग श्याओ फंग गुट के हाथ में आ गई और माओ की पत्नी और उनके साथियों की गिरफ्रतारी और बाद में फांसी के बाद यह सत्ता संघर्ष समाप्त हुआ।

इस तरह अपनी आजादी और क्रांति के बाद भारत और चीन करीब तीस साल तक आंतरिक उथल पुथल के साथ कभी तेज तो कभी धीमे आगे बढ़ते रहे। इसी काल में चीन और भारत दोनों ने परमाणु परीक्षण किए। करीब दो दशक तक दुनिया के दोनों ध्रुवों अमेरिका और सोवियत संघ के साथ समान दूरी रखते हुए चीन अपना सामारिक महत्व बनाता रहा और गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अपनी विदेश नीति का सिद्धांत बनाकर भारत ने भी वैश्विक राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की चीन यात्र और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के प्रवेश ने विश्व बिरादरी में उसका दबदबा कायम किया तो 1971 में बांग्लादेश निर्माण में भारत की भूमिका और 1974 में सिक्किम के भारत में विलय से भारतीय कूटनीति का लोहा पूरी दुनिया ने माना। कुल मिलाकर शुरुआती तीस सालों में दोनों ही देश नई नई ऊचाइंयों को छूते रहे।

आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि इस दौर में भारत और चीन की विकास दर लगभग बराबर रही। दोनों देशों की मुद्राओं रुपए और युआन में भी कोई ज्यादा फर्क नहीं था। गरीबी, बेरोजगारी और कमजोर अवस्थापना सुविधाओं की चुनौती से दोनों ही देश जूझ रहे थे। बढ़ती आबादी दोनों ही देशों के लिए समस्या थी। अपने अपने पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद का मुद्दा भी दोनों ही देशों के सामने था। कुल मिलाकर शुरुआती तीस सालों में भारत और चीन अपने-अपने देश को बनाने की कवायद में लगभग एक साथ और एक गति से चल रहे थे। तब शायद दुनिया में विकासशील देशों की गति भी यही थी और दोनों ही देश विकासशील देश माने जाते थे। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद चीन के मौजूदा नेतृत्व के पितामह तंग श्याओ फंग की सत्ता आने में करीब तीन साल लगे और 1980 के बाद तंग श्याओ फंग ने सबसे पहले पार्टी के शीर्ष स्तर पर पुराने माओवादियों को हाशिए पर डाला और उन्हें आगे बढ़ाया जिन्हें सांस्कृतिक क्रांति के दौरान निकाल बाहर किया गया था। पार्टी में हर स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद तंग श्याओ फंग ने चीन के चार क्षेत्रें में आधुनिकीकरण का नारा देकर देश के कायाकल्प की योजना पेश की। ये क्षेत्र थे अर्थव्यवस्था, कृषि, विज्ञान एवं तकनीक और रक्षा। इसके बाद चीन ने अपने आधुनिकीकरण की जो विकास यात्र शुरू की वह अभी जारी है। इस लिहाज से चीन की यह विकास यात्र 1980 के दशक के मध्य से शुरू होती है।

लगभग यही वह समय था जब भारत में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में राजीव गांधी प्रचंड बहुमत लेकर सत्ता में आए। राजीव ने भी भारत को 21 वीं सदी में ले जाने का नारा दिया और संचार एवं सूचना तकनीक कंप्यूटरीकरण की क्रांति इसी दौर में शुरू हुई जो आगे चलकर भारत के आर्थिक विकास और रोजगार सृजन की बुनियाद बनी। लेकिन अपने कार्यकाल के तीन साल बाद ही राजीव बोफोर्स विवाद में फंस गए और अगले चुनाव में उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। 1990 तक आते-आते दुनिया में वैश्विकरण और आर्थिक उदारवाद की चर्चा शुरू हो चुकी थी। डंकल प्रस्तावों और गैट समझौते के जरिए आर्थिक उदारीकरण के दौर की नींव पड़ चुकी थी। 1991 में प्रधानमंत्री बने नरसिंह राव ने इस आहट को पहचान लिया और उन्होंने मशहूर अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाकर पूरी दुनिया में संदेश दिया कि भारत नई वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए तैयार है।लेकिन इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी कहें या विपक्षी दलों की अदूरदर्शिता कि जब राजीव कंप्यूटरीकरण और सूचना तकनीक से देश को लैस करने में जुटे थे, तब वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टियों से लेकर दक्षिण पंथी भाजपा और मध्य मार्गी समाजवादी लोकदलीय पृष्ठभूमि वाले सभी नेता और दल बेरोजगारी का डर दिखाकर सड़क से संसद तक उसका विरोध कर रहे थे। इसी तरह जब नरसिंह राव ने दुनिया की हवा के रुख को पहचान कर आर्थिक उदारीकरण की राह पकड़ी तो फिर संपूर्ण विपक्ष स्वदेशी का नारा देकर सड़क से संसद तक उनके खिलाफ खड़ा हो गया। यह नरसिंह राव की राजनीतिक चतुराई ही थी कि एक अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्होंने आर्थिक उदारीकरण की अपनी नीतियों से बिना पीछे हटे अपना कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद देश में साझा सरकारों का दौर शुरू हो गया। याद कीजिए यही वह दौर था जब भारत में मंदिर और मंडल की राजनीति शुरू हुई। 1983 में विश्व हिंदू परिषद के मुजफ्रफरनगर सम्मेलन में अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने की मांग शुरू हुई और देश में इसके समर्थन में संघ परिवार ने जगह-जगह कार्यक्रम शुरू कर दिए। 1986 में शाहबानों मुद्दे पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में राजीव गांधी को संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलना पड़ा, जिसने भाजपा और संघ परिवार को कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रचार करने का मौका दे दिया। इसी साल प़फ़ैज़ाबाद की स्थानीय अदालत के बाबरी मस्जिद का ताला खोलने के आदेश ने मंदिर आंदोलन को और तेज कर दिया। इसके बाद 1988 में भाजपा इस आंदोलन में कूद पड़ी। 1989 में भाजपा और वाम दलों के समर्थन की बैसाखी पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल की बगावत को बेअसर करने के लिए मंडल कार्ड खेल दिया। इसकी काट के लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्र निकाल दी। इसके बाद करीब 15 साल तक देश मंदिर और मंडल की राजनीति में उलझा रहा। विकास और सुशासन की जगह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बनाम जातीय गोलबंदी सरकारों और राजनीतिक दलों का मुख्य एजंडा बन गए। कहा जा सकता है कि जब हम मंदिर बनाने के लिए सड़कों पर थे तब चीनी देश बना रहे थे और जब हम सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय गोलबंदी कर रहे थे तब चीनी आर्थिक विकास के टापू बना रहे थे। हालाकि नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी दौर में उदारीकरण और विकास को आगे बढ़ाने की भी कोशिश की, लेकिन मंडल और मंदिर राजनीति का उबाल 2004 से कम होना शुरू हुआ और देश में विकास और सुशासन चर्चा तेज हुई। इसके बावजूद 2009 तक देश की राजनीति में मंडल मंदिर राजनीति का असर रहा। जबकि 1980 के बाद चीन में सबसे बड़ा जन उबाल 1988-89 में तब आया जब लाखों युवा और छात्र लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करते हुए राजधानी बीजिंग के त्येनान मन चौक पर जमा हो गए। लेकिन चीन की सरकार ने बेहद बर्बर तरीके से इस आंदोलन को टैंको से कुचल डाला। जबकि भारत में इसी समय मंडल विरोधी छात्र आंदोलन में कई छात्रें ने आत्मदाह करके पूरे देश और समाज को झकझोर दिया।

इसके बाद भारत में मंडल राजनीति का दौर शुरू हो गया, जिसमें सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादी भावनाओं को जमकर उभारा गया और पूरी राजनीति जातीय समीकरणों और जातीय गोलबंदी में उलझ कर रह गई। इसके जवाब में दूसरी तरफ िहंदुत्व के नाम पर राम मंदिर आंदोलन और हिंदू ध्रुवीकरण की सियासत गरम की गई। उधर चीन बिना रुके बिना थके और तमाम बाहरी भीतरी दबावों के आगे बिना झुके अगले 20 साल के अपने चार आधुनिकीकरण कार्यक्रम को लागू करता रहा। ये चार क्षेत्र थे, सेना विज्ञान तकनीक, अर्थव्यस्था और कृषि। इन चारो क्षेत्रें में जरूरी ढांचागत सुधार, पूंजी निवेश और शोध अनुसंधान करते हुए आमूल-चूल आर्थिक सुधारों को लागू किया गया, जो कई मायनों में माओवादी नीतियों से एकदम उलट थे। जहां माओवादी नीतियों का जोर समतावादी समाज बनाने पर था, वहीं माओ के बाद के चीन का जोर समृद्धिवादी देश पर है। भारत में जहां नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों को कांग्रेस के भीतर नेहरूवादी गांधीवादी आग्रहों से जूझना पड़ा तो बाहर विपक्ष के स्वदेशी के नारों ने रास्ता रोकने की कोशिश की। चीन की एकदलीय शासन प्रणाली में विरोध की गुंजाइश न के बराबर रही, जबकि भारत में शुरू हुए गठबंधन सरकारों के दौर ने हर सरकार को झकझोरे रखा। चीन एक ऐसी सड़क पर दौड़ रहा था जो सीधी सपाट थी, जबकि भारत के विकास रथ को ऊबड़-खाबड़, टेढ़े-मेढ़े झाड झखाड़ वाले कच्चे रास्ते से आगे बढ़ना पड़ा। इसलिए भारत और चीन के विकास की दौड़ में अंतर का विश्लेषण करते वक्त हमें यह सब भी ध्यान में रखना चाहिए न कि अपने पूर्वजों को गुनहगार ठहराते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना चाहिए। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब हमारे नेताओं ने वही रास्ता अपनाया जो उस दौर की ऐतिहासिक जरूरत थी। उस रास्ते पर चलकर भारत ने बहुत कुछ हासिल किया जिसे नकारना नहीं बल्कि स्वीकारना चाहिए। माओ के बाद चीन ने बहुत विकास किया लेकिन लोकतंत्र की कीमत पर, भारत ने लोकतंत्र विकसित किया और अपनी लोकतांत्रिक राजनीति की सीमाओं और जटिलताओं के बीच जो हासिल किया, उसकी वजह से आज दुनिया भारत और भारतीयों दोनों का लोहा मान रही है।

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