कृष्ण बिहारी

आपबीती 

ताजमहल के सामने झोपड़ी का होना गुनाह नहीं है। अमीरी के आगे गरीबी का रोना गुनाह नहीं है। अमीरी और गरीबी का साथ चोली-दामन का है। हकीकत यही है कि एक का होना ही दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है। सौंदर्य का माप इसी पैमाने पर तय होता है कि वह अपनी कुरुपता को ढंकता कितना है! अनावृत्त होना क्षणिक सौंदर्य की कौंध भर है। स्थायी नग्नता में केवल प्रकृति सुंदर लगती है। वर्क  परमिट बन जाने के बाद अब मैं शहर में निकलने लगा था। शहर की वास्तविकता से मेरा परिचय अब एक साक्षात्कार था। परिवेश को देखना-सुनना और समझना अपनी फितरत के अनुसार होना था। दुनिया को समझने-जानने का नजरिया हर किसी का अपना होता है। अपने अनुभव दर्शन के आधार पर ही हर व्यक्ति के विचार बनते हैं। हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती मगर चमकने वाली चीज सोना भी होती है। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है तो, यह जो चकमक-चकमक और जगमग-जगमग करती दुनिया के अलावा एक सूखती-मुरझाती मरीचिका मेरे सामने थी उसके दोनों पहलू अब  स्पष्ट थे। अबू धाबी की दुनिया में इन दोनों का वर्चस्व था। एक दुनिया ऐसी थी जिसमें सबकुछ हरा-हरा था। ऐश्वर्य था। दुर्लभ भी उपलब्ध था। दूसरी दुनिया में दुर्लभ को देखती आंखें थीं। दोनों दुनियाओं की आंखों में सपने थे। सपना भी एक किस्म की वासना है। जिसके पास जो था वह उससे अधिक पाने के सपने देख रहा था। और, पाने के लिए संघर्ष था। 

एक मुल्क जो अभी अपनी किशोरावस्था में ही था वह दुनिया की नजरों में कारू का खजाना हो गया था। दुनिया उसकी ओर दौड़ पड़ी थी। क्या अमेरिका, क्या योरप और क्या एशिया, सभी पहुंच गए थे। हर किसी की स्थिति उसके अपने देश की हैसियत के अनुसार थी। मसलन, ताकतवर अमेरिका और योरप के नागरिकों की स्थिति हर तरह से बेहतर थी। गोरे रंग का जो कॉम्प्लेक्स आज भी है वह सदियों पुराना है। इसके बावजूद दिखने वाली दुनिया में यह असमानता हर जगह नहीं दिखती थी। कभी-कभी सुनने को मिलता था कि किसी मामले में किसी गोरे को कुछ नहीं हुआ जबकि वैसे ही मामले में किसी एशियन को सजा हो गई लेकिन ऐसे किस्से अपवाद थे। 

एक युवा देश में सब कुछ युवा था। मुझे वहां कोई बूढ़ा आदमी दिखता ही नहीं था। मेरी निगाहें खोजती थीं कि कोई बुजुर्ग मिले तो उससे बातें करूं मगर आंखें तलाश से खुद तक वापस आ जाती थीं। अगर कहीं कोई दिखता भी था तो वह या तो अरब होता या अरबी बोलने वाला। भाषा भी एक समस्या थी। सड़क पर अंग्रेजी, मलयालम और अरबी ही संपर्क भाषा थी। हिंदी का नामलेवा कोई नहीं था। भारतीय भी नहीं। 1986 से 2019 तक आते-आते अरब दुनिया हिंदुस्तान की बढ़ती हैसियत के आगे कितना बदल चुकी है वह इसी से जाना जा सकता है कि आज हिंदी अबू धाबी कोर्ट की मान्यता प्राप्त न केवल तीसरी भाषा है बल्कि बाजार की भाषा भी है। अरबी युवक-युवतियों में हिंदी सिनेमा बहुत लोकप्रिय है। कई अरबियों को मैंने गजल कहते भी सुना है। खैर, युवाओं के इस जमावड़े में देश के रेजीडेंट नागरिकों की अवस्था का औसत 32 से 35 वर्ष रहा होगा।

यह भी एक सच्चाई है कि धन की प्यास नहीं बुझती। जिसके पास जितना होता है वह उसे कम लगता है। गलत या सही एक कहावत है कि स्त्री को मिलने वाला सोने का हर गहना हल्का लगता है। कुछ वही बात धन के साथ कुछ और व्यापकता से जुड़ी है। प्यास है कि कम नहीं होती, बढ़ती जाती है। संयुक्त अरब इमारात रहा हो या फिर खाड़ी का कोई अन्य देश ओमान, कतर, कुवैत, शुरू के दिनों में जिसे हम सत्तर का दशक कह सकते हैं, नियम-कानून से गए प्रथम, द्वितीय श्रेणी के अप्रवासियों का वेतन और सुविधायें बहुत अच्छी थीं। जो लोग तेल कंपनियों में सीधे नियुक्त हुये या बैंकिंग सेक्टर अथवा टेली-कम्यूनिकेशन के कर्मचारी के रूप में जुड़े उन्हें अच्छा वेतन, टू-थ्री बेड-रूम का हर तरह से सुसज्जित आवास, परिवार का वीजा, साल में वतन-यात्र के एयर टिकट, मनोरंजन भत्ता , बच्चों की पढ़ाई की फीस के अलावा बोनस मिलता था। यह सुविधा प्रायः सबको उपलब्ध थी। इसके अलावा बहुत-सी कंपनियां अपने कर्मचारियों को जो फर्नीचर और इलेक्ट्रोनिक सामान देती थीं उसे हर तीन साल पर बदलने के लिए अलाउंस भी देतीं। पहले दिये गए सामान को वापस लेने की जहमत कोई भी कंपनी नहीं उठाती थी। कर्मचारी नया सामान लें, न लें, यह उन पर निर्भर था। नये सामान लेकर रसीद दिखाने की आवश्यकता भी नहीं थी। धूर्त और चालाक पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। अमेरिकन और योरोपियन प्रायः नए सामान लेते और पुराने को सेकेंड हैंड शॉप वालों को औने-पौने दामों पर बेच देते। उनके रहन-सहन में एक बेफिक्री हर वक्त नजर आती। वे अपनी मस्ती में जीते। यहां तक कि फार ईस्ट के वर्कर्स भी मौज-मस्ती का जीवन कुछ इस अंदाज में जीते कि अभी जिंदगी का ले लो मजा, कल क्या हो किसको पता लेकिन वहीं उसी माहौल में हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकन कुछ इस तरह की योजनाओं में व्यस्त होते कि या तो पूरा अलाउंस बचा लेते या फिर तीन साल पुराने सामान को अपने-अपने देश किसी न किसी जुगाड़ से भिजवाते और उन चीजों को तिगुने-चौगुने दामों पर बेचते। उन दिनों ओ जनरल का जापानी एसी अठारह सौ दिरहम में मिलता था जो कंपनी अपने कर्मचारियों के आवास में लगवाती थी। एक फ्रलैट में चार या पांच एसी होते थे। भारतीय मुद्रा में उन दिनों एक एसी का दाम लगभग आठ हजार रुपए था। भारतीय अपने एसी वतन लाते और एक-एक एसी अस्सी हजार रुपए में बेचते। यही दाम  नेशनल वी सी आर, सोनी टी वी और निकॉन कैमरे, ब्रांडेड घडि़यों तथा अन्य घरेलू सामान का भी था। लोगों मे विदेशी सामान का बहुत क्रेज था। लोग चीजों के प्रति लपककर बढ़ते और उन्हें खरीदकर एक अहम की संतुष्टि पाते। यद्यपि यह सब सुनते-देखते मुझे ग्लानि होती थी लेकिन उन सबके तो पौ-बारह थे जिनको ये सुविधाएं मिली थीं। यह भी सही है कि ऐसा करने वाले इस धारणा को अपना आधार बनाते थे कि पैसा कमाने आए हैं और जब कंपनी नहीं पूछती और यह अपराध भी नहीं है तो हम इसे क्यों छोड़ दें। उनका सोचना भी तार्किक रूप से कहीं से भी गलत नहीं था। इस कमाने के मामले में एक नई बात और थी। सरकारी कंपनियों की ओर से अपने कर्मचारियों को बड़े-बड़े फ्रलैट दिये जाते और ये कर्मचारी बिल्डिंग के नातूर यानी चौकीदार से मिलकर, उसे हर महीने हजार-पांच सौ दिरहम देकर अपने फ्रलैट में किरायेदार रख लेते। खुद ड्राइंग रूम में रहते और शेष कमरे किराये पर उठा देते। एक थ्री बेड-रूम फ्रलैट में पांच फैमिली तक रहतीं। इस तरह उस फ्रलैट का टेनेन्सी कांट्रैक्ट होल्डर हर साल एक अच्छी-खासी रकम बचा लेता था। ये वे हालात थे जिनमें कोई अति सुविधा-संपन्न जहां अतिरिक्त पैसे बेईमानी से कमा रहा था वहीं वे लोग जो छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए मोहताज थे वे भेड़-बकरियों की तरह किसी फ्रलैट में बेड-स्पेस से ही गुजारा करते और कभी-कभी तो एक बेड शिफ्रट में किराये पर होता या उस पर एक समय में दो लोग होते। मजदूरों की इस समस्या पर विचार करने के लिए कोई नहीं था। मजदूरों की यह जमात उन फ्रलैट्स में रहती थी जिसे बैचलर बिल्डिंग कहा जाता था। ऐसी बिल्डिंग खस्ताहाल होती थी। इन बिल्डिंगों के अरबी मालिक किराएदारों से खाली करा लेते और बिल्डिंग को गिराकर नई इमारत खड़ी करने के बजाय उसे 4-5 साल के लिए किसी रीयल स्टेट का धंधा करने वालों को एक मुश्त रकम लेकर टेनेन्सी का हक दे देते। टेनेन्सी मालिक फिर बांग्लादेशी, पाकिस्तानी या फिर हिंदुस्तानी मुस्लिम होते जिनका काम अधिकाधिक पैसा कमाना होता। अरबी मालिक कभी दिखाई नहीं पड़ता था इसलिए नए बने मालिक नकली अरबी होने का अहंकार ओढ़े रहते। वे गतरा और कंदूरा पहने भी दिखते। हालात यह थी कि मजबूरी के मारे न जाने कितने लोग खटिया के नीचे किरायेदार होते। सिर्फ सोने के लिए ऐसे लोग ऐसी जगह कम से कम पैसों में पा जाते। सोते, बाथ-रूम के इस्तेमाल के बाद फ्रलैट से निकल जाते और फिर रात का खाना बाहर से खाकर सोने के लिए लौटते। इस तरह रहने में सबसे बड़ा संकट बाथ-रूम का होता था। सुबह साढ़े तीन से ही लोग एक दूसरे के पीछे लाइन में लग जाते। यह समस्या तो सबकी थी और सबको धैर्य का परिचय देना था अन्यथा आवास छूटने का खतरा था। इस तरह रहने वाले मासिक किराये पर रहते थे और अगर किसी बात पर झगड़ा हुआ तो तुरंत दूसरे  किसी फ्रलैट में शिफ्रट हो जाते। अगर कभी रात को फ्रलैट्स में लेबर, सी आई डी या पुलिस का छापा पड़ता तो पुलिस केवल उनको ही पकड़कर जेल ले जाती जिनके पास पताका नहीं होता था। पताका होने की स्थिति में पुलिस इस तरह रहने वालों के खिलाफ कोई कारवाई तभी करती थी जब ये कोई अपराध करते थे अन्यथा ऐसे लोग ‘मिसकीन’ कहे जाते थे। ‘मिसकीन’ का अर्थ कमजोर आय वर्ग से जुड़ना होता था। इस तरह का कोई आदमी जब किसी अरबी अधिकारी से अपना काम कराना चाहता तो कई बार कहता ‘अना मिसकीन’। यानी कि मैं बहुत असमर्थ हूं। कमाई के न जाने कितने तरीके थे जो एशियन वर्कर्स ने अपना रखे थे। यह जो धनिक बन जाने की लिप्सा उनमें थी, वह उनसे बड़े से बड़ा अनुचित काम भी कराती थी। एक ऐसे देश में जहां कानून इतने सख्त हों कि गलत काम पर लेने के देने पड़ जाएं, वहां भी ऐसे लोग गलत काम करने से हिचकिचाते नहीं थे। मामला बस यहीं आकर रुकता था कि अधिक से अधिक पैसे कमाने हैं! 

मैंने शुरू में ही कहा है कि विषय वासनाओं से लड़ती जिंदगी का एक ही मकसद था कि कमा लो, जितना कमा सकते हो। भोजपुरी में एक कहावत है और वह गीत के रूप में कई गायकों ने गाया भी है- कमा ल--- अ--- गोरी नकदे जब ले बा जवनिया। तो,  लोग कमा भी रहे थे और गवां भी रहे थे। लोग सूद पर पैसा बांट रहे थे और बैंक से दस गुना ज्यादा ब्याज ले रहे थे। लोग चकलाघर चला रहे थे और हर देश की औरत मुहैया करा रहे थे। लोग लौंडेबाजी कर रहे थे और करा रहे थे। लोग शराब और औरत होम डिलेवरी पर पहुंचा रहे थे और कमीशन काट रहे थे। इस तरह का धंधा जब खूब फल-फूल निकला तो अनेक स्त्री-पुरुषों ने इसे स्वतंत्र रूप से संभाल लिया और खूब चमके। असल में दैहिक वासना-पूर्ति तो हर व्यक्ति की समस्या है इसलिए यू ए ई की पुलिस भी संतुष्ट थी। उसे भी दुनिया के हर देश की औरत इन धंधेबाजों की वजह से सहज-सुलभ थी तो वह ऐसे खुशनुमा धंधे पर अंकुश क्यों लगाती? औरत मिले तो विश्वामित्र को भी इंकार नहीं था न। सब टूट जाता है। नियम-धर्म। व्रत-उपवास और प्रतिज्ञाएं। कसमें टूट जाती हैं। यही हाल औरतों का भी है। जिन्हें आप उनके हाल पर छोड़कर कई-कई साल के लिए विदेश चले जाते हैं, पापी बिछुआ उनको भी डंसता है और तब जब कि आप उनके डंसे जाने को जान जाते हैं तो आपका व्यवहार उस खूंखार अरबी की तरह हो जाता है जो अपनी बीवियों को छोड़कर रखैलों के लिंगरी में घुसा रहता है और बीवी के ऐसे किसी काम को जानने के बाद उस माली, खानसामा, धोबी, ड्राइवर और सहायक को रेगिस्तान में ले जाकर उसे तड़पा-तड़पाकर मार डालता है। न जाने कितने वीडियो लोगों ने देखे होंगे। यह बात तो अरबियों की थी और आज भी है इसके अलावा जो वहां हर देश की वर्क फोर्स थी, वह अपनी दैहिक वासना की पूर्ति के लिए भी छटपटाती थी। हर देश की औरत उपलब्ध थी और हर देश के पुरुष भी थे। बड़ा अजीब-सा समीकरण था। आश्चर्य की कोई बात नहीं कि कुछ पुरुष अपनी पत्नी, बहन, प्रेमिका को भी इस धंधे में लगाए थे। यहां तक भी सुनना और देखना सहनीय था मगर एक नौजवान लड़के को देखा जो अपनी मां और बीवी के लिए भी ग्राहक लाता था। ऐसे लोगों की संख्या भी गिनतियों के पार थी। ब्रांडेड कपड़ों, जूतों और घडि़यों को पहने हैंडसम और रिरियाते हुए अपनी औरतों के लिए ग्राहक खोजते ये सभी दलाल मिश्री, लेबनानी और फिलिस्तीनी थे जिनकी औरतें बहुत खूबसूरत थीं और अपनी गोरी चमड़ी और खूबसूरती के बल पर प्रायः अरबी बेगमें भी बन जाती थीं। खूबसूरती बला भी है! जो भी हो, मकसद ठगना ही होता था और लोग ठगे भी जाते थे। सब कुछ होते हुए और यह जानते हुए भी कि एक दिन इस दुनिया से खाली हाथ जाना है, कोई भी अपने भीतर संतोष धन जैसी बात को विश्वसनीय नहीं मानता था। भले ही तीसरी कसम फिल्म का यह गीत सुनने और गाने में बहुत कर्णप्रिय और हकीकत से जुड़ा हो- सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है किन्तु सच्चाई यह भी थी और शायद रहती दुनिया तक रहेगी कि भले ही वहां खाली हाथ जाना हो, यहां धरती पर खाली हाथ क्यों रहें? कुछ लोगों ने तो चार्वाक दर्शन भी अपना रखा था- ट्टण कृत्वा घृत यावज्जीवेत जीवेत सुख जीवेत। हालांकि, सच्चा सुख तो उनको भी नहीं पता जो मखमली और सुनहरे 

सिंहासनों पर बैठकर लाखों की भीड़ को माया-मोह से दूर रहने की सीख देते हैं और शाम तक अपने अकाउंट में करोड़ों जमा करवा लेते हैं। यही हकीकत है दुनिया की---

(अगले अंक में जारी: और सभी टीचर्स 

को स्कूल कैंपस से बाहर निकलना पड़ा---)

पूछताछ करें