भारत भारद्वाज

‘उपजहि अनत, अनत छवि लहहि’: फ़ादर डॉ- कामिल बुल्के (1909-1982)

पिछले दिनों मैं महामना मदन मोहन मालवीय के पौत्र डॉ- लक्ष्मीधर मालवीय, जिनका निधन जापान में 10 मई 2019 को हुआ, पर श्रद्धांजलि लेख लिख रहा था प्रकाशित ‘हंस’, जून-2019, अचानक प्रसंगवश मुझे फादर कामिल बुल्के याद आये। इन दोनाेंं में इस बात में ही समानता नहीं थी कि दोनों विदेश में मरे, बल्कि आजीवन हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध रहे। डॉ- मालवीय जापान प्रवास के दौरान जब तक भारत इलाहाबाद आते-जाते रहे लेकिन फादर बुल्के जो 1935 ई- में भारत आये, फिर लौटकर अपने स्वदेश बेल्जियम कभी नहीं गए। इसलिए भी उनका भारत और विशेषतः हिंदी समाज के लिए विशेष महत्व है। 
फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के फ्रलैंडर्सप्रांत के रक्सकपैले गांव में 1 सितंबर 1909 ई- को अदोल्फ और मारिया बुल्के की प्रथम संतान के रूप में हुआ। अपनी विनोदप्रियता के कारण प्रायः कहा करते थे कि जिस रामकथा संबंधी शोध के कारण लोग उन्हें जानते हैं, उस राम (रक्स) से भगवान ने उनका संबंध जन्म के समय से ही जोड़ दिया था।
बुल्के की आरंभिक धार्मिक शिक्षा नीदरलैंड के वाल्केनवर्ग कस्बे के जर्मन जेसुइल संस्थान में हुई। वहीं उन्होंने ईसाई धर्मदर्शन का उच्चतर ज्ञान प्राप्त किया, लैटिन और ग्रीक के अतिरिक्त जर्मन में दक्षता प्राप्त की और ग्रिगोरियन विश्वविद्यालय रोम से एम-ए- (दर्शनशास्त्र) की परीक्षा नब्वे प्रतिशत अंकाें से उत्तीर्ण की। वही उनके भीतर के साहित्यकार को विकास का पहला अवसर मिला।
बाल्केनवर्ग की शिक्षा समाप्त होने पर कामिल बुल्के ब्रदर बन गये और 1934 ई- में लूबेन की सेमिनरी आ गये। यहां उनके सामने यह विकल्प रखा गया कि वे या तो स्वदेश में रहकर धर्मसेवा करें या विदेश में। उन्होंने दूसरे विकल्प का चुनाव करते हुए भारत में धर्मकार्य करने की इच्छा प्रकट की। 1935 ई- में धर्मसंघ के अधिकारियों ने उन्हें सूचना दी कि वे अक्टूबर में भारत के लिए प्रस्थान कर सकेंगे। उस समय धर्मसंघ का यह नियम था कि धर्मसेवा के लिए विदेश जाने वाले संयासी कभी स्वदेश नहीं लौट सकता। इसलिए सब लोग यही सोचकर उन्हें विदा दे रहे थे कि अब उनसे फिर भेंट नहीं होगी। 
सबसे अधिक विचलित उनके परिवार के लोग थे, विशेषत उनकी मां, जो 20 अक्टूबर को उन्हें विदा करने के बाद बेहोश हो गई थी। पानी के जहाज से कामिल बुल्के नवंबर में मुम्बई पहुंचे और वहां से येसु सन्धियों के मठ मनरे सी हाउस, रांची आ गये। उन्हें जनवरी, 1936 ई- में भौतिकी और रसायन विज्ञान के अध्यापक के रूप में संत जोसेफ कॉलेज, दार्जिलिंग भेजा गया, लेकिन वहां के प्रतिकूल मौसम के कारण बीमार होकर वे जून में रॉची लौट आये। 1937 ई- तक जब वे जुमला में गणित के अध्यापक थे, हिंदी के अध्यापन की घंटियों में अपने विद्यार्थी के साथ सब सबसे पिछली पंक्ति में बैठकर पढ़ने लगे। एक वर्ष के भीतर ने केवल खड़ी बोली सीख गये, बल्कि ब्रजभाषा और अवधी भी समझने लगे। तुलसी की रचनाओं से वे इस तरह प्रभावित हुए कि उन्होंने गहराई से उन्हें समझने के लिए हिंदी और संस्कृत का विशेष अध्ययन सीतागढ़ (हजारीबाग) में 1938 ई- में पं- बदरीनाथ शास्त्री के निर्देशन में किया। बाद में उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया और 1941 ई- में पुरोहिताभिषेक के बाद वे ब्रदर से फादर बन गये।
1943 ई- में तमिलनाडु में धर्म साधना पूरी करने के बाद उन्होंने रांची लौटने पर हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ- धीरेंद्र वर्मा को इलाहाबाद पत्र लिखा कि वे हिंदी में एम-ए- करना चाहते हैं। 
डॉ- वर्मा का कोई उत्तर नहीं मिला, तो उन्होंने स्वतंत्र छात्र के रूप में हिंदी और संस्कृत विषय लेकर 1945 ई- में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी-ए- किया और इलाहाबाद गए। डॉ- धीरेंद्र वर्मा ने उनकी शैक्षणिक योग्यता के विषय में पूछताछ की और उनके हिंदी ज्ञान की परीक्षा लेने के विचार से उन्हें विनय पत्रिका के दो पद दिए और उनकी व्याख्या लिखने को कहा। इसका उल्लेख करते हुए फा- बुल्के कहते है: ‘‘डॉ- धीरेंद्र मेरी व्याख्या को बहुत देर तक देखते रहे मानों वह कोई खिड़की हो, जिससे मीलों दूर तक का दृश्य देखा जा सकता है। उन्होंने मुझे प्रवेश की अनुमति दे दी। 
(आलोचना’ 75 पृष्ठ-9)
वे 1947 ई- में एम-ए- हो गये और उन्होंने डॉ- धीरेंद्र वर्मा की प्रेरणा से ‘रामभक्ति का विकास’ विषय पर डॉ- माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में शोध प्रारंभ किया। उनके शोध का प्रथम अध्याय था- रामकथा का विकास। 
इस अध्याय के लिए उन्होंने भारतीय और गैर भारतीय स्रोतों से इतनी अधिक सामग्री संकलित कर ली कि डॉ- धीरेंद्र वर्मा उसकी नवीनता और विपुलता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उनको केवल इसी विषय पर कार्य करने को कहा। 1949 ई- में डी-फिल् उपाधि के लिए स्वीकृत उनका ‘रामकथा उत्पत्ति और विकास’ शीर्षक शोध प्रबंध उनकी अक्षय कीर्ति और अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का आधार प्रमाणित हुआ। इसकी विशेषता यह भी है कि यह हिंदी माध्यम में प्रस्तुत हिंदी का प्रथम शोध प्रबंध है। उस समय तक भारत के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने का नियम था, जिसे उनके आग्रह पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ- अमरनाथ झा ने संशोधित कर उन्हें हिंदी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने की अनुमति दी थी। 
1950 ई- में डॉ- बुल्के की नियुक्ति रांची के संत जेवियर कॉलेज के हिंदी और संस्कृति विभागध्यक्ष के रूप में हुई। 1962 ई- में ‘रामकथाः उत्पति और विकास’ का दूसरा और 1973ई- में तीसरा संस्करण छपा और इसका आकार बढ़कर आठ सौ पृष्ठों से भी अधिक हो गया। उन्होंने इसके चौथे संस्करण की पांडुलिपि भी तैयार कर ली थी। तुलसी उनके सबसे प्रिय कवि थे, जिनकी भगवद् भक्ति और कवित्व से वे बहुत प्रभावित थे। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन (नागपुर) के अवसर पर पवनार आश्रम वर्धा में 14 जनवरी 1975 ई को तुलसी की प्रतिमा का अनावरण करते हुए उन्होंने ठीक ही कहा था, ‘‘तुलसी ने कहा है- सबहिं नचावत राम गोसाई, किन्तु मैं कहता हूं- ‘मोहि नचावत तुलसी गौसाई। प्रत्येक वर्ष तुलसी का संदेश सुनाने के लिए मैं बहुत दौरा करता हूं।’’ 
(डॉ- बुल्के स्मृति ग्रंथ, पृ--12)
अपने महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक शोध प्रबंध के अतिरिक्त डॉ- बुल्के ने दूसरा बड़ा उल्लेखनीय कार्य, यह किया कि उन्होंने अंग्रेजी हिंदी कोश (1968ई-) का निर्माण किया, जो सबसे पहले कॉथलिक प्रेस, रांची से 1968 में छपा था। बाद में एस-चंद एंड संस प्रा-लि-, रामनगर, नई दिल्ली से। इस कोश के प्रामाणिक होने का सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि अब तक इस कोश के सौ से अधिक संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं। भारत सरकार के कार्यालयों एवं अन्यत्र भी यही कोश सबसे प्रामाणिक माना जाता है। वे संस्कृत को भारतीय प्रज्ञा और परंपरा की कुंजी मानते थे और आवश्यक सीमा तक अंग्रेजी के ज्ञान को भी महत्व देते थे। उनका यह वाक्य प्रसिद्ध है- ‘संस्कृत  महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है।’’
डॉ- बुल्के 1950 से 1977 तक संत जेवियर कॉलेज, रांची के हिंदी-संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे। उनकी महत्वपूर्ण हिंदी और अंग्र्रेजी कृतियों में उल्लेख्य हैः रामकथा और तुलसीदास, मानस कौमुदी तथा ईसाई धार्मिक साहित्य और दर्शन पर केंद्रित ईसा जीवन और दर्शन, एक ईसाई की आस्था कई संस्थाओं साम्बद्ध एवं पद्मभूषण (वर्ष 1947) से सम्मानित फादर बुल्के एक आस्थावान और गहरी प्रार्थना में डूबे साहित्य-साधक थे।
वे मृत्यु के पूर्व तक बाइबिल के अनुवाद में संलग्न थे। जून, 1982 ई- में उनके दाहिने पैर की उंगली में गैंग्रीन हो गया। पहले रांची भांडार और फिर कुर्जी के मिशन अस्पताल में उनका इलाज हुआ। कुर्जी में ही गैंग्रीन उनके दाहिने पैर में इतनी तेजी से फैला कि मिशन के अधिकारी चिंतित हो उठे और उन्होंने उनको अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एस), दिल्ली में 8 अगस्त को भर्ती कर दिया। उन दिनों एक ही पीड़ा उन्हें साल रही थी वह यह कि बाइबिल का अनुवाद अधूरा ही रह गया है। लेकिन मृत्यु की सन्निकटता का बोध होने पर उन्होंने फादर प्रोविन्शियल पास्कल तोपना से कहा, ‘‘फादर प्रोविन्शियल, मैं ईश्वर की इच्छा संपूर्ण हृदय से ग्रहण करता हूं और उनके पास जाने को तैयार हूं। अब मुझे बाइबिल के अनुवाद पूरा करने की चिन्ता नहीं है। प्रभु बुलाते हैं, तो मैं प्रस्तुत हूं।’’ (स्मृति ग्रंथ, पृ- 25)
17 अगस्त, 1982 ई- को सवेरे उनका निधन हो गया और दूसरे दिन, 18 अगस्त को, दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित निकॉलसन कब्रगाह में उनको दफन दिया गया। इस तरह धर्म और साहित्य का संधिविच्छेद करते हुए यह अप्रतिम योद्धा हमसे विदा हुआ।
अंत में, डॉ- बुल्के पर यह टिप्पणी लिखने के क्रम में मैंने साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के भारतीय साहित्य के निर्माता शंृंखला के निबंध (मोनोग्राफ), लेखक, डॉ- दिनेश्वर प्रसाद से भरपूर मदद ली है। इसके लिए मैं उनका हार्दिक कृतज्ञ हूं। यह प्रसन्नता की बात है उनकी सुपुत्री नीला प्रसाद की रुचि साहित्य में है और वह कहानी और समीक्षा लिखती हैं। 
पत्रिकाएं
1- नटरंग-105 (दिसंबर-2018), संपादक - अशोक वाजपेयी/रश्मि वाजपेयी, संपर्क: ‘ नटरंग, 706, सुमेरु अपार्टमेंट्स, ई-डी-एम- मॉल के पास, कौशाम्बी, गाजियाबाद, मूल्य: 50 रुपए।
हिंदी की यह पुरानी पत्रिका है, जिसका आरंभ जनवरी 1965 ई- में कवि आलोचक और रंगमं= विशेषज्ञ नेमिचंद्र जैन के संपादन में हुआ। भारतीय रंगमंच की यह त्रैमासिक पत्रिका नेमिजी के जीवनकाल में ही नहीं, अब भी अनियमित ही निकल रही है लेकिन इस पत्रिका की ऐसी प्रतिष्ठा है कि इसके पुराने अंक को भी ढूंढते नाट्यप्रेमी मिल जायेंगे। पत्रिका के प्रस्तुत अंक में प्रकाशित सामग्री की विविधता का पता बेशक अनुक्रम से चलता है लेकिन विविधता के क्षेत्रफल की गहराई का असली पता संयोजित सामग्री पढ़ने से चलता है। नाट्क, प्रलेखन, महिला रंगकर्मियों पर लेख, रंगमंच, हिंदी नाटक, रंगभाषा, हिंदी नाटक और रंगमंच के अतिरिक्त डॉ- नामवर सिंह का साक्षात्कार इस अंक को महत्वपूर्ण बनाते हैं। 
संयोगवंश नटरंग के संस्थापक-संपादक नेमिचंद्र जैन का यह जन्म शताब्दी वर्ष भी है। हिंदी में नेमि जी का साहित्यिक योगदान न केवल उल्लेखनीय है, बल्कि ऐतिहासिक है। ‘तारसप्तक’ (1943) के कवि तो वे थे ही, मुक्तिबोध रचनावली का संपादन करके और मुक्तिबोध के पत्रें का संकलन ‘पाया पत्र तुम्हारा’ 
प्रकाशित करके उन्होंने हिंदी पाठकों के सामने संपूर्णता में मुक्तिबोध को ला दिया। गंभीर उपन्यास समीक्षा की शुरुआत और रंगमंच के माध्यम से उन्होंने हिंदी नाटकों को एक व्यापक मंच प्रदान किया। इसलिए भी नेमि जी हमेशा याद किये जायेंगे। बस, अब नटरंग को नियमित करने की जरूरत है ताकि नई प्रतिभा को एक बड़ी चुनौती मिल सके।
---
2- साक्षात्कार (विष्णुखरे पर केंद्रित -जून-जुलाई-2019), अतिथि संपादक, नवल शुक्ल, संपर्क: निदेशक/संपादक, साहित्य अकादमी, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल, मूल्य: 50 रुपए। (यह अंक है)
डॉ- नामवर सिंह के बाद अब विष्णुखरे पर केंद्रित ‘साक्षात्कार’ का यह भव्य और दिव्य विशेषांक देखने पर पाठकों और लेखकों को न केवल सहसा अपनी ओर आकृष्ठ करता है, बल्कि कवि विष्णु खरे को जानने की दिलचस्पी भी पैदा करता है। आमुख कवि पंकजराग का है और संपादकीय नवल शुक्ल का। इन दोनों को पढ़ने से आधा विष्णु खरे आपको मिल जायेंगे, शेष विष्णु खरे भीतर के पृष्ठों पर बिखरे हैं, जिन्हें संभलकर ही नहीं, सावधानी से भी पढ़ने की जरूरत है क्योंकि विष्णु खरे मात्र कवि नहीं, सचमुच कवि थे। 
पत्रिका के आरंभ में उनकी कुछ कविताएं दी गई है और बाकी पृष्ठों पर उनके कवि-कर्म की पड़ताल है। कवि के रूप में विष्णुजी बेहद संवेदनशील थे लेकिन व्यक्ति के रूप में ‘अनप्रेडिक्टिेबल।’ उनको लेकर अनेक विवाद हुएं लेकिन उनके कवि होने की स्वीकार्यता निर्विवाद है। रघुवीर सहाय ने उनके पहले संग्रह ‘खुद अपनी आंख से’ की समीक्षा ‘दिनमान’ में की थी और अशोक वाजपेयी ने पहचान सीरीज में ‘विष्णुखरे की बीस कविताएं छापी थीं। 
मंगलेश डबराल ने विष्णुखरे की ‘सत्य का पीछा करती कविता’ की पड़ताल गहराई में डूब कर की है और उनकी कविता के संवेदनात्मक धरातल को पाठकों के सामने सही परिप्रेक्ष्य में रखा है। ख़ासकर उनकी चर्चित कविता ‘टेबल’ को। इस अंक के बारे में अच्छी बात यह है कि बिल्कुल नई पीढ़ी के कवियों लेखकों ने विष्णु खरे की कविता के बारे में लिखा है। ‘उद्भावना’ के बाद यह दूसरी पत्रिका है, जिसने विष्णुखरे पर एक भरा-पूरा अंक निकाला है। हैरानी की बात है कि ‘साक्षात्कार’ एक सरकारी पत्रिका है। 
3- दोआबा (जून-2019), सं- जाबिर हुसेन, संपर्क: 247, एम-आई-जी- लोहियानगर, पटना, मूल्य: 100 रुपए
‘साक्ष्य’ के बाद निरंतर ‘दोआबा’ निकालकर कथा शिल्पी जाबिर हुसेन ने प्रमाणित कर दिया है कि ‘समय से संगत’ वस्तुतः समकालीन रचनाशीलता में एक सार्थक हस्तक्षेप है। इस अंक में प्रकाशित रचनाओं में विविधता के अनेक आयाम हैं, कविता, उपन्यास, संस्मरण, विचार और संवाद। पल्लवी प्रसाद का उपन्यास ‘काठ का उल्लू’ बेहद रोचक और दिलचस्प है। उल्लू का असली स्वरूप और संरचना पर गौर करने की जरूरत है। कविताओं- राजी सेठ और लीलाधर मंडलोई, हरिराम मीणा का शोधपरक आलेख ‘आदिवासी अलगाव का इतिहास’ और रुचि भल्ला का दक्षिण भारत का आगरा: बीजापुर उल्लेखनीय है। 
4- चौपाल (जुलाई-दिसंबर-2019), संपादक कामश्ेवर प्रसाद सिंह, विशेषांक संपादक: दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, संपर्क: कोठी नं- 3, अरुणा नगर, एटा, मूल्य: 50 रुपये।
पत्रिका का प्रस्तुत अंक आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा पर केंद्रित है। हिंदी पाठक उनके नाम से अवश्य परिचित होंगे कि उनकी रनचाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्राय: प्रकाशित होती रही है। वैसे आज हिंदी साहित्य की दुनिया विस्तृत ही नहीं, कम व्यापक भी नहीं है। ऐसी स्थिति में बहुत कम लेखक अपनी पहचान बना पाते हैं। डॉ- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी द्वारा संपादित और अज्ञेय की जन्मशताबदी में प्रकाशित पुस्तक ‘अज्ञेय सहचर’ में प्रकाशित मोहनकृष्ण बोहरा का लेख ‘अज्ञेय और टी-एस- इलियट’ सचमुच विद्वतापूर्ण लेख है जिससे इलियट के साथ अज्ञेय को समझने में मदद मिलती है।    
प्रियदर्शन का संस्मरण है तो छोटा लेकिन बोहरा जी के अंतरंग को कम, बहिरंग को जानने में मदद करता है। अंक ठीक-ठाक है। बस, लेखक की उम्र को उसकी साधना की उम्र नहीं होती। 
5- पुनर्नवा-2019, संपादक- संजय गुप्ता, सहयोगी संपादक, राजेंद्र राव, संपर्क: दैनिक जागरण, कानपूर, मूल्य: 30 रुपए
दैनिक जागरण की विशिष्ट प्रस्तुति: पुनर्नवा-2019 का यह पहला अंक है। इस अंक का आरंभ अनुवाद-विमर्श से होता है, जिसमें हिंदी के महत्वपूर्ण कवि लेखकों, जो अनुवादक भी हैं, की हिस्सेदारी है। अनुवाद की प्रक्रिया जटिल होती है। यह एक भाषा से दूसरी भाषा में शब्दशः या मात्र भावानुवाद नहीं होता, बल्कि कई बार अनुवादक को, खासकर कविता का अनुवाद, मूल कवि की संवेदनात्मक धरातल पर उतरना पड़ता है। इसीलिए कभी-कभी अनुवाद मूल रचना के समकक्ष पहुंच जाती है। कभी दिनकर ने कुछ महत्वपूर्ण विदेशी कवियों के अनुवाद किए थे, जिसे उनकी मूल कविता समझ ली गई। कृष्ण बिहारी की कहानी ‘डुबकी’, मनोज कुमार झा की कविता, उपन्यास अंश, उमाशंकर सिंह परमार का आलेख, समीक्षा और पत्रिका चर्चा पठनीय है। राजेंद्र राव ने इस अंक की सामग्री पाठकों की रुचि और दिलचस्पी को ध्यान में रखकर जुटाई है। कुल मिलाकर अंक ठीक-ठाक ही नहीं, सुंदर है। 
---
अन्य पत्रिकाआेंं में उल्लेखनीय
1- देह का गणित (कहानी), लेखिका- वंदना गुप्ता - ‘पाखी’ सितंबर-2019
2- साहब अलवरी (कहानी), ले- अनुज, ‘आजकल’ सितंबर-2019
3- तन्हाई भेजी (कहानी), ले- नूरजहीर - आजकल, सितंबर-2019 
4- कृष्णगोपाल वर्मा की याद (संस्मरण), ले- गिरधर राठी, ‘हंस’ सितंबर-2019
5- अपने-अपने घेरे (कहानी), ले- रजनी गुप्त, ‘हंस’ सितंबर-2019
6- आलोचना का अतिसरलीकरण (आलेख), ले- धनंजय वर्मा, ‘लहक’ अप्रैल-सितंबर-2019
7- आभिजात्ययौनिकता का स्थापत्य: नव स्त्रीवाद, ले- अनिल कुमार पांडेय, वही
8- आवरण (कहानी), ले-  अजय नावरिया, ‘कथादेश’ दलित साहित्य विशेषांक, सितंबर-2019
9- दलित साहित्य और भविष्य की आहट (परिचर्चा), वहीं
10- मोक्ष (कहानी), ले- टेकचंद - वहीं
11- कविता में प्रतिरोध (लेख) ले- दिनकर कुमार, समयातंर, अगस्त-2019 
12- 1947 और उर्दू शायर (लेख), ले- नरेश नदीम, वही
13- गुलेरीजी कवि के रूप में (आलेख), ले- प्रत्यूष गुलेरी, समकालीन भारतीय साहित्य, जुलाई-अगस्त-2019
14- यह वह देश तो नहीं (डायरी), ले- देवेंद्र चौबे, वहीं
15- धुंधलापन (डायरी), ले- पूर्वा भारद्वाज, बनासजन, जनवरी-मार्च-2019
---
पत्रिकाओं के नये अंक
1- समकालीन भारतीय साहित्य (साहित्य अकादेमी की 
द्वैमासिक पत्रिका) जुलाई-अगस्त-2019, संपर्क: अतिथि ब्रजेंद्र त्रिपाठी, साहित्य अकादेमी, रवींद्र भवन, नई दिल्ली, मूल्य: 50 मूल्य
2- बनासजन (जनवरी-मार्च), संपादक-पल्लव, संपर्क: 
शालीमार बाग, दिल्ली, मूल्य: 75 रुपए
3- लहक (अप्रैल-सितंबर-2019),  संपादक, निर्भय देवयांश, कोलकात्ता, मूल्य: 40 रुपए
4- चौपाल (जुलाई-दिसंबर-2019), मोहनकृष्ण बोहश पर केंद्रित), संपादक - कामेश्वर प्रसाद सिंह, विशेषांक, संपादक, 
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, अरुणा नगर, मूल्य: 50 रुपए
5- कथादेश (सितंबर-2019), संपादक, हरिनारायण, संपर्क दिलशाद गार्डन, नई दिल्ली, मूल्य: 90 रुपए
6- हंस (सितंबर-2019), सं- संजय सहाय, अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य: 40 रुपए
7- समयांतर (सिंतबर-2019), पंकज विष्ट,  पंकज विष्ट, दिलशाद गार्डन, दिल्ली, मूल्य: 30 रुपए
8- नया ज्ञानोदय (सितंबर-2019), सं- मधुसूदन आनंद, 18, इंडस्ट्रियल एरिया, लोधी रोड, नई दिल्ली, मूल्य: 40 रुपए
9- पुस्तक-वार्ता (जन-अप्रैल) सं- अशोक मिश्र, म-ग-अ-हि- विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र, मूल्य: 20 रुपए।
10- रेवान्त (नामवर सिंह और कृष्णा सोबती पर केंद्रित विशेषांक), प्रधान सं- कौशल किशोर, सं- अनीता श्रीवास्तव, इंदिरा नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
11- सृजन मूल्यांकन-5 प्रकाशमनु पर केन्द्रित सं- अनामीशरण बबल, स्वामी शरण, अतिथि सं- श्याम सुशील, मयूर विहार, फेज-3, दिल्ली, मूल्य: 40 रुपए
12- निकट (मई-अगस्त-2019) अविस्मरणीय कथा विशेषांक-2), सं- कृष्ण बिहारी, कानपुर, मूल्य: 40 रुपए
---
नये प्रकाशन (चयन)
1- चन्ना (पहला उपन्यास), लेखक- कृष्णा सोबती, प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 350 पेपर बैक
2- आमने-सामने (साक्षात्कार), ले- नामवर सिंह, संकलन, 
सं- विजय प्रकाश सिंह, प्रकाशक वही, मूल्य: 695 रुपए
3- द्वाभा (व्याख्यान एवं आलेख), ले- वही, प्रका- वही, मूल्य: 695 रुपए
4- भीमराव आंबेडकर एक जीवनी, ले- क्रिस्तोफ जाफलो, अनुवाद, योगेन्द्रदत्त, प्रका- वही, मूल्य: 650 रुपये
5- अनासक्त आस्तिक (जैनेंद्र कुमार की जीवनी), लेखक ज्योति जोशी, प्रकाशक राजकमल प्रा-लि- नई दिल्ली, मूल्य: 299 पेपर बैक
6- महाबाजार के महानयक (सिनेमा), ले- प्रहलाद अग्रवाल, प्रका- वही, मूल्य: 150 रुपये
7- दास्तानगोई-2, ले- महमूद फारुकी, प्रका- वही, मूल्य: 399 पेपर बैक
8- आर्टिकल 15, ले-- अनुभव सिन्हा, गौरव सोलंकी, 
प्रका- वही, मूल्य: 199 पेपर बैक
9- कयास (उपन्यास), ले- उद्यन वाजपेयी, प्रका- वही, मूल्य: 199 पेपर बैक
10- कमल का मजदूर: प्रेमचंद (जीवनी - पुनर्प्रकाशन, 
ले- मदन गोपाल, प्रका- वही, मूल्य: 695 रुपये
11- तेलुगु की प्रतिनिधि कहानियां- चयन, संपादन एवं तेलुगू से अनुवाद- जे-एल-रेड्डी, प्रकाशक साहित्य अकादेमी, रवींद्र भवन, नई दिल्ली, मूल्य: 260 पेपर बैक
12- प्रार्थना समय (कहानी), लेखक प्रदीप जिलवाने, 
प्रका- सेतु प्रकाशन, 305, प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट, पटपड़गंज दिल्ली, मूल्य: 148 पेपर बैक 

 

***
 

 

पूछताछ करें