भूमिका द्विवेदी ‘अश्क’

एक शक्तिशाली, साहसी, विद्वान, वयोवृद्ध वरिष्ठ अधिवक्ता का जाना

बात सत्तर के दशक की है। संभवतः सन् 1975 के आस-पास की, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक केस की सुनवाई चर्चा का विषय बना हुआ था। दिग्गज वकीलों की जिरह सुनने कोर्ट, परिसर में भीड़ जमा हो जाया करती थी। ये मामला देश की तत्कालीन सबसे बड़ी और शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ था।
इस तरह की चर्चित गतिविधियों से जुड़े विद्वत-जन भली प्रकार जानते होंगे कि कांग्रेस पार्टी का पुराना चुनाव चिन्ह् ‘गाय और बछड़ा’ था। 
कभी-कभार पार्टी की मुखिया भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी कोर्ट में बुलाई जाती थीं।
दरअसल, केस कांग्रेस पार्टी के चुनावी निशान को हटाने और बदलने की मांग को लेकर ही दाखिल किया गया था। संयोग से वादी मेरे (पिछले साल दिवंगत हुए) पितामह डॉ- रामशंकर द्विवेदी भी थे। वादियों की स्पष्ट दलील थी कि कांग्रेस पार्टी अपने तत्कालीन चुनाव-चिन्ह् के ‘गाय और बछड़े’ के चलते हिंदू मतदाताओं को धार्मिक रूप से प्रभावित करके चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कर रही है। फलस्वरूप उसे कोई तटस्थ चुनाव चिन्ह् चुनना चाहिए।
उन दिनों राम जेठमलानी और बाबा युवा प्रैक्टीशनर्स थे। लेकिन पूरे जोश-खरोश से मामले की पैरवी कर रहे थे। उनके कॅरियर बनाने के दिन थे, दोनों जी-जान से जुटे हुए थे।
मेरे बाबा (पितामह) चूंकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की संस्कृत दर्शन और व्याकरण जैसे दुरूह विषय की प्राध्यापकी छोड़कर वकालत पेशे में नये ही कूदे थे, अतः एक से बढ़कर एक धार्मिक, आध्यात्मिक और संस्कृत-सम्मत दृष्टांत उछाल रहे थे, प्रतिवादियों को धूल चटा रहे थे।
अंततः जीत वादी की हुई।
मुख्यधारा पार्टी को अपना चुनावी चिन्ह् बदलना पड़ा, जो आज तिरंगे पर ‘हाथ के पंजे के निशान’ के रूप में पहचाना जाता है।
उन दृष्टांतों, उन जिरहों और उस जीत से बाबा के सीनियर वकील स्वर्गीय श्री सतीश चंद्र खरे सहित जो शख्स अति प्रसन्न नजर आता था, वो युवक वकील राम जेठमलानी ही थे।
जीत के बाद नियमतः सभी संबंधित वकीलों ने एक-दूसरे को गले लगाया। बाबा के सीनियर खरे साहब ने अतिथि के सम्मान सहित जूनियर का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘दोनों रामों ने मिलकर सरकार को धूल चटा दी, ऐसा ही होना था। ये एक धर्म संगत युद्ध था, जो धर्म की आड़ में जीतने वालों के विरुद्ध था---’’
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी का 95 साल की उम्र में निधन, लंबे समय से बीमार थे यूं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट अनगिनत ऐतिहासिक लम्हों का साक्षी बनता रहा है। लेकिन वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी की ये आह्लादकारी मुस्कुराहटें केवल उसी दौर में कई मर्तबा देखी गईं।
गजब पढ़ाकू और अजब के जिद्दी राम जेठमलानी सर का साहित्यिक अवदान भी खासा समृद्ध है, जो ज्यादातर अंग्रेजी में है। 
‘मैवेरिक अनचेंज्ड, अनरिपेंटेंट’ 
‘बिग ईगोज, स्मॉल मेन’ 
‘मीडिया लॉज’ 
‘पार्लियामेंटरी प्रिविलेजेज-लॉज एंड प्रैक्टिस।’ 
‘कन्साईंसेजेज ऑफ ए मैवेरिक’’ इत्यादि रचनाएं काफी मकबूल हुईं।
दिनांक 8 सितंबर, 2019 को जब लंबी बीमारी के बाद वयोवृद्ध राम जेठमलानी का 95 साल की उम्र में निधन के बारे में सुना तो उनकी वही उस दौर में गूंजती खिलखिलाहटें याद आई।
जिस दौर में भले ही मेरा जन्म नहीं हुआ था, लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नये प्रवेशी और सहपाठी मेरे माता-पिता खूब सुनाते हैं। वो दोनों उस सत्तर के दशक में मेरे बाबा की जोरदार जिरहें सुनने लुक-छिपकर हाईकोर्ट परिसर पहुंच जाया करते थे। उस समय मेरे माता-पिता न सिर्फ तार्किक जिरह सुनने बल्कि आम लोगों जैसे इंदिरा गांधी को और युवा राम जेठमलानी को देखने का लोभ-संवरण भी नहीं कर पाते थे। 
राम जेठमलानी ने जिन बेहद महत्वपूर्ण, मशहूर और विवादित केस को बहुत मजबूती से लड़े हैं, संयोग से सभी देशहित के विरुद्ध कहे जाते हैं।
इसमें स्व- श्रीमती इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस सबसे विवादित और अलोकप्रिय कहा जाता है।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और केहर सिंह के वकील के तौर पर पेश हुए थे। यही नहीं उन्होंने एम्स के डॉक्टर और इंदिरा गांधी के शव का पोस्टमार्टम करने वाले टी-डी- डोगरा द्वारा दिए गए मेडिकल प्रमाणों को भी चैलेंज किया था। हालांकि, उनके इस केस पर कई लोगों ने आपत्ति जताई थी।
डॉन हाजी मस्तान, केतन पारेख, जगमोहन रेड्डी और हर्षद मेहता जैसे केस हैं। 
राजीव गांधी और जैसिका लाल के हत्यारों के बचाव पक्ष के केस।
सोहराबुद्दीन हत्याकांड में अमित शाह का बचाव, सेबी मामले में सहारा के मालिक सुब्रत रॉय के पक्षकार, अवैध खनन में येदियुरप्पा के वकील बने।
धीरे-धीरे एक साहसी, परिश्रमी और जुझारू अध्येयता अधिवक्ता सत्ता, धनलोलुपता और शक्ति के चलते मेरे पितामह से दूर से बहुत दूर होता चला गया। कभी-कभार दूर इलाहाबाद में बैठे बाबा ने फोन पर कुछेक केस हाथ में न लेने को कहा, लेकिन जेठमलानी अपनी धुन में खोये रहे और लगातार कामयाबी के झंडे गाड़ते गए।
अब वे शुद्ध व्यवसायिक और बहुत प्रसिद्ध वकील बन चुके थे।
उनके एक ‘हियरिंग’ की कीमत लाखों में पहुंच चुकी थी। 
हवाला कांड में लालकृष्ण आडवाणी, जग्गी हत्या के मामले में अमित जोगी (अजीत जोगी के बेटे) के, आय से अधिक मामले में जयललिता, टूजी-स्पेक्ट्रम मामले में कनिमोझी, जोधपुर बलात्कार में आसाराम बापू, रामलीला मैदान मामले में रामदेव और चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव के साथ आ खड़े हुए।
17 साल की उम्र में उन्होंने एलएलबी की डिग्री ली और पाकिस्तान में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी। वह विशेष स्थिति में 18 साल की उम्र में वकील बने थे। जबकि वकील बनने की न्यूनतम उम्र 21 थी। उन्होंने बाद में बॉम्बे यूनिवर्सिटी से वकालत में मास्टर की। जेठमलानी ने अपना पहला केस 17 साल की उम्र में सिंध की कोर्ट में लड़ा था। उन्होंने वकील बनने की न्यूनतम उम्र के नियम को चुनौती दी थी। भारत में उन्होंने पहला केस बॉम्बे रेफ्रयूजी एक्ट के खिलाफ लड़ा था। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में यह केस लड़ा था बॉम्बे में एक शरणार्थी के तौर पर पहुंचे और फिर वहां नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू की और वहां से एक महत्वपूर्ण सफर तक पहुंचे। पहली बार वह चर्चा में नानावटी केस से आए और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
जेठमलानी भारतीय कानून जगत के ‘भीष्म पितामह’ कहे जाने लगे। दिग्गज वकील और राजनेता अपने बेबाक बयानों और दिलचस्प शख्सियत के कारण, कोर्ट ही नहीं, राजनीतिक गलियारों में भी खासे लोकप्रिय रहे। पूर्व केंद्रिय मानव संसाधन विकास मंत्री और मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अपने सीनियर रहे जेठमलानी को सोने के दिल वाले इंसान के तौर पर याद करते हैं।
14 सितंबर 1923 को तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी शिकारपुर, सिंध (अब पाकिस्तानी रियासत) में पैदा हुए जेठमलानी ने अपने 96वें जन्मदिन से महज छह दिन पहले ही आखिरी सांस ली।
उन्होंने खुद को हर तरह से एक अतिरिक्त प्रतिभाशाली और साहसी वकील साबित किया। उनकी बेहद तेज याददाश्त के चलते भी उन्होंने कई बड़ी कानूनी लड़ाइयां लड़ीं और जीतीं। वह साहित्य से प्रेम करनेवाले और राजनीति के लिए लालायित रहने वाले नेता थे। 
उनकी दैनिक दिनचर्या रोजाना शाम कुछ देर बैडमिंटन खेलना और उसके बाद मिलने आए खास दोस्तों के साथ ड्रिंक्स शामिल था। जिंदगी के प्रति उनका प्यार उनके दोस्तों के लिए हमेशा आकर्षण का कारण रहा।
उनमें यह साहस था कि वह बहुत अलोकप्रिय केस को भी हाथ में लेते थे। उन्होंने अफजल गुरु का बचाव किया, जबकि आम जन की भावना इसके खिलाफ थी। अपनी आलोचनाओं से बिल्कुल बेपरवाह रहते थे।
ये बहुप्रचलित दुनियावी दस्तूर है, उन्होंने जनता की भलाई से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम भी किए, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं, यदि जानते भी हैं तो उसकी कभी चर्चा नहीं करते। यद्यपि वे उच्चतम न्यायालय के सबसे महंगे वकील थे इसके बावजूद उन्होंने कई मामलों में निःशुल्क पैरवी की।
वे 6वीं और 7वीं लोकसभा में बीजेपी ने मुंबई से दो बार चुनाव जीते थे। बाद में, अटल जी की सरकार में केन्द्रीय कानून मंत्री व शहरी विकास मंत्री रहे थे। किसी विवादास्पद बयान के चलते उन्हें जब बीजेपी से निकाल दिया था तो उन्होंने वाजपेयी के ही खिलाफ लखनऊ लोकसभा सीट से 2004 का चुनाव लड़ा था किन्तु वे हार गए। 7 मई-2010 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया था। 2010 में उन्हें फिर से भाजपा ने पार्टी में शामिल कर लिया था और राजस्थान से राज्यसभा के सांसद बने। राम जेठमलानी उच्च प्रोफाइल से संबंधित मामलों के मुकदमे की पैरवी करने के कारण विवादास्पद रहे और उसके लिए उन्हें कई बार कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। 
राम जेठमलानी ने अपनी वकालत और प्रोफेसरी की शुरुआत देश के बंटवारे से पहले सिंध प्रांत में की थी। 
उन्होंने कराची में अपने मित्र एके ब्रोही के साथ मिलकर एक लॉ फर्म शुरू की। फरवरी 1948 में देश के बंटवारे के बाद कराची में दंगे भड़क गए थे। ऐसे में वह ब्रोही की सलाह पर भारत आ गए। उस समय वह जेब में सिर्फ एक पैसा डालकर भारत आए थे। इस पैसे के आधार पर वह कुछ दिनों तक यहां शरणार्थी शिविर में रहे थे। 1977 और 1980 में आम चुनाव में वह जनता पार्टी और बीजेपी की टिकट पर मुंबई नॉर्थ वेस्ट सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। 1985 में उन्हें यहां कांग्रेस के सुनील दत्त ने हराया।
1988 में वह राज्यसभा सदस्य बने। 1996 में वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कानून मंत्री बने। 1999 में वह फिर कानून मंत्री बने। 
1954 में वह मुंबई के सरकारी लॉ कॉलेज में पार्ट टाइम प्रोफेसर बने। वह कुल चार बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे।
7 मई, 2010 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का चेयरमैन नियुक्त किया गया। राम जेठमलानी सुप्रीम कोर्ट में सबसे ज्यादा फीस लेने वाले वकील थे। सबसे दागदार और घृणित केस जेठमलानी ने अपने कॅरियर में जोधपुर यौन शोषण मामले में आसाराम बापू के बचाव का केस भी लड़ा।
जेठमलानी साहब के कुछ आखिर केस भाकपा विधायक कृष्णा देसाई हत्याकांड में शिवसेना के बचाव का केस और अरुण जेटली द्वारा दायर मानहानि मामले में आम आदमी पार्टी सुप्रीमो व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बचाव का केस लड़े थे।
तमाम दुर्लभ उपलब्धियों के बावजूद, अपने चाहने वालों के लिए वह प्यार से लबालब भरे हुए थे, जबकि दुश्मनों और ऐसे लोग जिनके बारे में उन्हें यकीन था कि उनका नुकसान कर सकते हैं, के लिए वह बहुत खतरनाक थे। 1988 से ही वह राज्यसभा में सक्रिय थे और कानून की दुनिया की ही तरह राजनीति में भी वह सर्वकालिक बन गए। भले ही राजनीति में उनके पक्ष बदलते रहे, लेकिन वह लगातार सक्रिय रहे। कभी किसी ने नहीं सोचा था कि 2004 में वह अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। वह बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के काफी करीब थे, लेकिन अपनी मुंहफट पहचान के कारण 2013 में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। हालांकि, बाद में पार्टी ने उनका निष्कासन वापस ले लिया क्योंकि शायद बीजेपी को लगा कि राम नाम के वकील का दोस्त बने रहना ज्यादा बेहतर है बजाय कि उन्हें अपना दुश्मन बनाने के, जिस ‘राम’ नाम पर भाजपा सालों साल चुनाव लड़ती रही है।
इलाहाबाद के एक सुप्रसिद्ध दंत विशेषज्ञ की भीषण मिष्ठानप्रिय ब्राह्मणी होने के चलते मैं खुद मरीज रही, जहां कई नामी न्यायाधीशों, राजनीतिज्ञों इत्यादि को पंक्ति में देखा था।
विद्वान और हठी दिवंगत राम जेठमलानी सर की जिन्दगी देखकर, उन्हीं डॉक्टर रस्तोगी की क्लीनिक में एक कोटेशन सुंदर फ्रेम में मढ़ी हुई टंगी याद आती है। जिसमें कुछ यूं लिखा था, ‘‘ये एक विडंबना है, कि आपकी तकलीफ और मुसीबत ही मेरे आय का जरिया है। लेकिन मैं इस विडंबना को भी पूरी ईमानदारी, निष्ठा और श्रद्धा से निभाकर आपकी विपत्ति को दूर करने को कृतसंकल्प हूं---’’
एक साहसी, विद्वान, वयोवृद्ध वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राम भूलामल जेठमलानी को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि!

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