मुकेश कुमार

मीडिया वॉच

किसी भी व्यक्ति या संस्थान की पहचान संकट के समय होती है, चुनौती के समय होती है। अगर संकट के समय उसका आचरण अच्छा रहा और उसने उन आदर्शों तथा सिद्धांतों को अच्छी तरह निभाया जिनका दम भरता था तो समझ लीजिए कि वह पास हो गया। भारतीय लोकतंत्र के सभी स्तंभो के लिए पिछले कुछ महीने ऐसे ही संकट के रहे हैं। जम्मू-कश्मीर को धारा 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को खत्म करने, उसे दो हिस्सों में बाँटने और उसे राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले के बाद उपजी परिस्थितियों ने उनके सामने एक चुनौती उछाली थी। ये चुनौती यह साबित करने की थी कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने और उसके लिए लड़ाई लड़ने का साहस रखतें हैं या नहीं। अफसोस के साथ ये कहना और स्वीकार करना पड़ता है कि वे इस अग्निपरीक्षा में बुरी तरह से असफल सिद्ध हुए हैं। 

कश्मीर के मामले में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका के बारे में तो बात करना ही बेकार है क्योंकि वे तो असली खलनायक हैं। संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर हमला करने वालों में वे अग्रणी हैं। मगर उन संस्थाओं ने भी धोखा दिया जिनसे ये उम्मीद की जाती है कि जब भी कभी ऐसा होगा तो वे उनकी रक्षा में खड़े होंगे। सबसे ज्यादा निराश न्यायपालिका ने किया। उसने पहले तो ये कहते हुए याचिकाओं को सुनने से मना कर दिया कि सरकार को वक्त दिया जाना चाहिए, मौलिक अधिकारों के मामले में इस तरह की कोई दलील चलती नहीं। फिर सुनवाई को वह लगातार टालती रही। जाहिर है कि वह कुछ करना ही नहीं चाहती थी। उसने सरकार को मनमानी करने की पूरी छूट दे दी और सरकार ने उसका भरपूर फायदा उठाया। लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों के जन विरोधी व्यवहार के बाद मीडिया से ही उम्मीद बचती थी। वही था जो जनमत को जगाता और सत्ता पर दबाव बनाकर लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका का निर्वाह करता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

वास्तव में मीडिया ने दिखा दिया कि जिस अभिव्यक्ति की आजादी को वह सबसे कीमती समझता है और उसके दम पर जिस-तिस को कठघरे में खड़ा करता रहता है, उसकी रक्षा के लिए वह कुछ नहीं करना चाहता। ये मौका था अपनी साख को चमकाने का, अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाने का लेकिन उसने इसे गवां दिया। एक बार फिर से उसने साबित कर दिया है कि विश्व स्तर पर अगर उसकी कोई अच्छी पहचान और प्रतिष्ठा नहीं है तो क्यों नहीं है। उसे क्यों लिजलिजा, तुरंत घुटने टेक देने वाला माना जाता है और क्यों वह उस भूमिका को निभाने में नाकाम हो जाता है, जो कि किसी भी लोकतंत्र में मीडिया को निभाना चाहिए। हालांकि अतीत में भी उसकी कायरता एव बेअक्ली के उदाहरणों की भरमार रही है। इमर्जेंसी में अपनी घुटना टेकू भूमिका की वजह से उसकी अत्याधिक बदनामी हुई थी मगर लगता है कि उसको वह भूल गया या फिर उसका वास्तविक चरित्र ही यही है। इसीलिए उसने कश्मीर के संकट को न तो संकट की तरह देखा और न ही किसी चुनौती की तरह। शायद वह मानता रहा कि दाग अच्छे हैं, बल्कि जितने स्याह होंगे उतने अच्छे। वह कुछ साबित करने के फेरे में पड़ा ही नहीं। उसके लिए ये कोई अग्निपरीक्षा नहीं थी और अगर थी तो वह फेल होकर भी खुश था। 

कश्मीर घाटी में भारत सरकार ने जैसा दमनकारी शासन चला रखा है, वह अभूतपूर्व है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सिवाय इमर्जेंसी के कभी किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया कि एक इलाके की सैन्य बलों द्वारा घेरेबंदी करके हफ्रतों वहां रहने वाले लोगों के तमाम मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए हों। किसी भी लोकतंत्र में मिलने वाली तमाम आजादियां उनसे छीन ली गई। इंटरनेट, फोन, मोबाइल आदि के जरिए किए जाने वाले संचार के सभी विकल्पों से उन्हें वंचित कर दिया गया। मीडिया का गला दबा दिया गया जिससे कश्मीरियों को अपनी भावनाएं, अपने विचार व्यक्त करने का कोई जरिया ही नहीं बचा। उनकी आवाजाही पर रुकावटें खड़ी कर दी गईं और जब उनमें ढील भी दी गई तो आतंक की वजह से लोग निकलने से घबरा रहे थे। यहां तक कि चिकित्सा जैसी अत्यावश्क सेवाएं तक बाधित हो गईं। समूचे राजनीतिक नेतृत्व को नजरबंद कर दिया गया यानी राजनीति के दरवाजे भी बंद कर दिए गए। ऐसा निर्लज्ज और नंगा दमनकारी रूप स्वतंत्र भारत में शायद हमने कभी नहीं देखा। बेशक पूर्वोत्तर भारत और नक्सल प्रभावित इलाकों में भी इस तरह के हथकंडे़ आजमाए जाते रहे हैं, मगर चुपचाप। बाकायदा घोषणा करके ऐसा करने की हिमाकत किसी भी सरकार ने नहीं की। लेकिन मीडिया का रुख इसको लेकर क्या रहा? क्या उसने ऐसी परिस्थितियों में जिन लोकतांत्रिक दायित्वों का निर्वाह करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसे पूरा किया? क्या उसने कश्मीर के हालात देश के सामने रखे? क्या उसने सरकार के दमनकारी रवैये को उजागर करने में कोई भूमिका निभाई? 

भारतीय मीडिया ने ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया। बल्कि वह तो सरकार द्वारा उठाए गए दमनकारी कदमों को जायज ठहराने में जुट गया। उसने कश्मीर का वीभत्स सच दिखाने के बजाय उस पर राष्ट्रवाद का परदा डालने का अभियान चलाया। राष्ट्रहित के नाम पर उसने संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि चढ़ाने को अपना कर्तव्य मान लिया। सरकार के दबाव में उसने बकौल एक कश्मीरी पत्रकार सूचनाओं का ब्लैकहोल (शून्य) पैदा करने में भूमिका निभाई। उसकी जिम्मेदारी बनती थी कि वह कश्मीर के हालात को देश के सामने रखता, कश्मीरी अवाम पर जो गुजर रही है उसको बयान करता। मगर वह सरकारी धुन पर नाचता रहा। उसने झूठे सरकारी दावों को काटने या उन्हें चुनौती देने की एक भी कोशिश नहीं की। सरकार ने कहा कि लैंडलाइन काम करने लगी हैं तो उसने मान लिया कि वे काम कर रही हैं। सरकार ने कहा कि स्कूल खुल गए हैं तो उसने भी इसकी जांच करना जरुरी नहीं समझा। सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने कहा अमन चैन है तो मीडिया ने इसे सौ फीसदी सच मानते हुए कश्मीर में बिरियानी भकोसते डोवाल का प्रायोजित वीडियो दिखाया। न तो उसने कश्मीरियों के प्रदर्शन के बारे में बताया और न ही पैलेट गन से जख्मी लोगों के कोई दृश्य दिखाने की जरूरत समझी। उसने मान लिया कि सरकार कश्मीर के संबंध में जो भी कदम उठा रही है, सही हैं और उसे उसका साथ देना चाहिए। 

भारतीय मीडिया के विपरीत विदेशी मीडिया ने तमाम सीमाओं के बावजूद जोखिम उठाए और लगातार ऐसी रिपोर्टें प्रसारित की जो सरकारी दावों की पोल खोलती थीं। विदेशी मीडिया पर ये आरोप लगाए जा सकते हैं कि उनके अपने पूर्वाग्रह एवं स्वार्थ हैं और उनका असर उनकी रिपोर्टिंग पर भी पड़ना लाजिमी है। इनमें से कुछ सच भी हो सकते हैं, मगर इस आधार पर हम सच्चाई पर परदा नहीं डाल सकते क्योंकि अधिकांश विदेशी मीडिया संस्थानों का कवरेज भारतीय मीडिया के मुकाबले कई गुना बेहतर तथा प्रामाणिक दिखा। वे उन खबरों को दिखा-बता रहे थे, जो भारतीय मीडिया से नदारद थीं। यही वजह है कि भारतीय दर्शकों के एक बड़े वर्ग ने पश्चिमी मीडिया का रुख कर लिया। बीबीसी की लोकप्रियता तो अचानक एकदम से बढ़ गई। हालांकि भारत में उसका कोई टीवी चैनल नहीं है, मगर रेडियो और इंटरनेट के प्रसारण से ही उसने एक बार फिर से अपनी धाक जमा ली। सरकार ने एकाध बार उसके कवरेज पर उंगली उठाई, मगर अंत में पता चला कि सरकार नहीं बीबीसी ही सही था। कश्मीर के कवरेज से मिली लोकप्रियता एवं विश्वसनीयता का ही परिणाम था कि उसने अपने प्रसारण की अवधि बढ़ा दी। 

विदेशी मीडिया के बरक्स जब हम भारतीय चैनलों या अन्य मीडिया संस्थानों का कवरेज देखते हैं तो उन्हें बहुत बौना पाते हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय मीडिया बच्चों के हाथों में है और वे अभी जानते ही नहीं कि पत्रकारिता क्या होती है। साफ पता चलता है कि ऐसे मौकों पर किस तरह से रिपोर्टिंग करनी चाहिए इसका कोई प्रशिक्षण उन्हें नहीं मिला है, बल्कि इसके उलट वे वही सब कर रहे हैं जो पत्रकारिता में नहीं किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि वह अपनी ही बिरादरी के उन लोगों के खिलाफ खड़ा हो जाता है जो मीडिया की आजादी के लिए लड़ने के लिए आगे आ रहे हैं। कश्मीरी पत्रकार अनुराधा भसीन ने जब सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत याचिका दाखिल की कि मीडिया को अपना काम करने दिया जाए, तो उनका साथ देने के लिए बहुत कम लोग आए। 

विडंबना देखिए कि जिस भारतीय प्रेस परिषद से उम्मीद की जाती है कि वह ऐसे मौकों पर जब मीडिया पर किसी तरह का अंकुश लगे तो आवाज बुलंद करे, वह इस याचिका के विरुद्ध खड़ी हो जाती है। ये शर्मनाक है और इससे भी ज्यादा शर्मनाक है पत्रकारों का चुप रहना। उन्हें तो प्रेस परिषद के खिलाफ ही मोर्चा खोल देना चाहिए। एडिटर्स गिल्ड ने कश्मीर में मीडिया पर लगी पाबंदियों के खिलाफ एक बयान जारी किया मगर इससे अधिक कुछ नहीं।     

दरअसल, भारतीय मीडिया ने अपनी आंखों पर अंधराष्ट्रवाद का चश्मा पहन लिया है या आप कह सकते हैं कि उसे सरकार ने पहना दिया है। ये काम दोनों की आपसी रजामंदी से भी हो सकता है।  हुआ चाहे जैसे हो, मगर ये तो साफ है कि मीडिया कश्मीर का वही सच देख और दिखा रहा है जो उसे सरकार देखने और दिखाने के लिए कह रही है, विवश कर रही है। कोई अगर कश्मीर के कवरेज का गहराई से अध्ययन-विश्लेषण करेगा तो इसे बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिख जाएगा कि मीडिया ने क्या और कैसी भूमिका निभाई। इस भूमिका के तीन तत्वों को हम रेखांकित भी कर सकते हैं। पहला- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को महिमामंडित करके चापलूसी के नए कीर्तिमान बनाना। इन तीनों की किसी भी तरह से आलोचना करना मना था, बल्कि अगर कोई हिम्मत भी करता तो उसे चुप कराने के जितने भी हथकंडे़ आजमाए जा सकते हैं, आजमाए गए। दूसरा, पाकिस्तान को निशाना बनाया जाए ताकि तमाम विमर्श पाकिस्तान विरोध पर केंद्रित हो जाए, क्योंकि इससे मोदी एवं उनकी सरकार को राहत मिलती है, उसे उन सवालों के जवाब नहीं देने पड़ते जो देने चाहिए। तीसरा तत्व मुसलमानों से संबंधित है। पूरे देश में इस समय मुसलमान कठघरे में न केवल खड़े किए जा रहे हैं बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दंडित करने की मुहिम भी चल रही है। कहीं एनआरसी के नाम पर, कहीं तीन तलाक के नाम पर तो कहीं धारा 370 हटाकर। गौरक्षा, लव जिहाद आदि मुद्दे तो हैं ही। 

भारतीय मीडिया का ये रवैया जताता है कि वह एक प्रोपेगंडा मशीनरी में तब्दील हो गया है, क्योंकि सत्ताधारी दल जिस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल वह खेल रही है, मीडिया उसमें उसका सारथी बना हुआ है। वास्तव में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब मीडिया रहा ही नहीं, वह सरकार का प्रवक्ता बन गया है। उसका काम हो गया है सरकार की सुविधा के हिसाब से एजेंडा सेट करना। सरकार के विरोधियों एवं आलोचकों को चुप कराना और उन्हें बदनाम करना भी उसकी इस भूमिका का हिस्सा है। मीडिया के स्वामित्व की इसमें खास भूमिका है। उसका सत्ता के साथ गंठजोड़ हो गया है और उसने पत्रकारों के लिए कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं है। जाहिर है कि कश्मीर का मसला केवल कश्मीरियों का सवाल नहीं है, बल्कि समूचे लोकतंत्र पर मंडराते संकट का प्रश्न है। मौजूदा सरकार देश को निरंकुशता की ओर ढकेल रही है और मीडिया इसमें उसका सहयोगी बना हुआ है। और अंत में:विज्ञान संबंधी घटनाओं और खबरों की रिपोर्टिंग के मामले में भारतीय मीडिया का अंदाज हमेशा से मूर्खतापूर्ण और प्रतिगामी रहा है। वह न केवल अंधविश्वासों को पालता-पोसता रहा है बल्कि विज्ञान को अवैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत करने का भी आदी रहा है। चमत्कार, भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र आदि से जुड़ी मनगढ़ंत खबरें प्रस्तुत करने की पुरानी मगर अस्वस्थ परंपरा उसमें रही है। संविधान भले ही कहता हो कि हमें वैज्ञानिक चेतना का विकास करना है, मगर उसे इससे कोई मतलब नहीं रहा। इधर जब से केंद्र में ऐसी सरकार आई है जिसका दृष्टिकोण अवैज्ञानिक है और जो उसे प्रचारित करने से बाज नहीं आती भले ही कितनी भी जगहंसाई हो, मीडिया का रुख भी वैसा ही हो गया है। सरकार को खुश करने के लिए वह भी वैसी ही हरकतें करने लगा है। चंद्रयान-2 के कवरेज में इसे देखा जा सकता है। इस घटना का कवरेज बताता है कि भारतीय मीडिया कितना अनपढ़, पिछड़ा और बीमार है। इस वैज्ञानिक अभियान को उसने गणेश, हवन-पूजन, चंद्र देव आदि से जोड़कर भारतीयों को अंधविश्वासों के अंधकूप में ढकेलने की हर संभव कोशिशें कीं। 

लेकिन इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक और हास्यास्पद उसकी चाटुकारिता थी। उसने अव्वल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस घटना को तमाशा बनाने में सहयोग दिया जो कि जाहिर है कि छवि-निर्माण और वाहवाही लूटने की ओछी हरकत के सिवाय कुछ नहीं थी। मगर मीडिया यही नहीं रुका उसने चंद्रयान-2 अभियान को ऐसे प्रस्तुत किया मानो ये मोदी की वजह से हो रहा हो और अगर ये सफल हुआ तो वह मोदी की कामयाबी मानी जाएगी। उसने चांद पर होगा मोदी मोदी और मोदी की मुट्ठी में चांद जैसे कुछ बेवकूफाना सुर्खियां लगाईं। टीवी पर ऐंकरों में होड़ लगी हुई थी कि कैसे मोदी की चापलूसी में दूसरों से आगे निकलें। यहां तक कि जब लैंडर विक्रम के चांद पर सकुशल न उतरने के बाद भी मोदी का महिमामंडन जारी रहा। ये चापलूसी अभियान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा वैज्ञानिकों के दिलासा देने के बाद और भी उन्मादी हो गई, इतनी उन्मादी हो गई कि महाचापलूस भी शरमा जाएं। वास्तव में उसने चापलूसी का नया कीर्तिमान बना दिया है, लेकिन आप इसे अंतिम न मानें। ये कीर्तिमान जल्दी ही फिर टूटेगा, क्योंकि मीडिया जिस राह पर चल रहा है, उसमें ये अवश्यांभावी है।  

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