सलिल सुधाकर

सिने-संवाद

समय, मांग और खपत के मद्देनजर जिस तरीके से सिनेमा-संसार पिछले कुछ सालों से अपना रूप बदल रहा है, वह जितना आश्चर्यजनक है, उतना ही मीमांसा योग्य भी है। सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। इसीलिए मनोरंजन के मामले में भी इसकी दूर-दूर तक पहुंच निर्विवाद है। एक जमाने से इसी पहुंच को ध्यान में रख कर हमारे देश में समाज और पारिवारिकता के भारतीय मूल्यों को संभालने वाली फिल्मों या फिर टी-वी- धारावाहिकों के बनने बनाने का सिलसिला जारी रहा है। घर-घर पहुंचने वाले ये माध्यम कहीं कभी पारिवारिक मर्यादाओं की सीमा पार न करने लगें, इस लिहाज से उन पर निगरानी और अंकुश के लिए सेंसर बोर्ड को बिठाया गया है। लेकिन अभिव्यक्ति की सीमा क्या हो, इसे लेकर कई फिल्मकारों और सेंसर बोर्ड के बीच हमेशा से खींच-तान होती रही है। कई प्रयोगधर्मी फिल्मकार समाज के तयशुदा मूल्यों को तोड़ कर कुछ ज्यादा मुखर या ‘बोल्ड’ फिल्में बनाने के चक्कर में सेंसर बोर्ड के कायदे-कानून में लम्बे समय तक के लिए फंस जाते रहे हैं। लिहाजा उन्हें हमेशा ये शिकायत रही है कि जो वे कहना चाहते हैं, सेंसर उनकी इजाजत ही नहीं देता। 

कुछ समय पहले जब बॉलीवुड के मशहूर निर्माता पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष थे, तो उन पर कई फिल्मकारों को बड़ा गुस्सा आता था। उनकी नजर में पहलाज निहलानी पुराने दकियानूसी ख्यालातों के आदमी थे, इसलिए जाने कितनी माडर्न और ‘बोल्ड’ फिल्में लगातार इनकी संकीर्ण मानसिकता का शिकार हो रही थीं! उन निर्माता-निर्देशकों ने इसी मुद्दे को खूब हवा दी और निहलानी को वहां से हटाने के लिए लंबी मुहिम चलाई, जिसका नतीजा अंततः ये हुआ कि निहलानी को कुर्सी खाली करनी पड़ी। लेकिन सेंसर बोर्ड तो आखिर सेंसर बोर्ड है। कितना भी उदार व्यक्ति वहां पदासीन हो, उसे एक बार तो पूरे परिप्रेक्ष्य में सोचना ही पड़ता है। हर व्यक्ति अपने परिवार की सीमाओं और निहित उत्तरदायित्वों से वाकिफ न हो ऐसा कम ही मुमकिन होता है। इसलिए  कहीं न कहीं, कभी न कभी सेंसर की कैंची चलने की आशंका बनी ही रहती है। फिल्म उद्योग में चलने वाली यह एक निरंतर लड़ाई है। फिल्मों के अलावा टी-वी चैनलों के लिए भी सरकार के कई दिशा-निर्देश हैं, जिन्हें धारावाहिक निर्माताओं को आवश्यक रूप से पालन करना ही पड़ता है। जाहिर है ये बंदिशें हर किसी को रास आती नहीं रही हैं। वह भी विशेष कर तब जब सारे संसार में पोर्न साइट्स ने खुलापन की तमाम विकृतियों को सरेआम परोस कर रख दिया। प्रेम, लगाव और संबंधों की उष्मा के धागों पर चलते स्त्री-पुरुष संबंधों में विद्यमान आकर्षण और समर्पण के तमाम कोमल सौंदर्य को सिर्फ एक कामुक ज्वार और उसे शांत करने के बेहद आक्रामक आखेट के रूप में बदल दिया! गौर से देखा जाए तो यह दरअसल, हमारी संवेदनाओं का आखेट है और इसके संधान के लिए सिनेमा या छोटा पर्दा, से ज्यादा सुदूर मार करने वाला और कोई दूसरा माध्यम हो ही नहीं सकता। इसलिए पूंजी के खेल ने सिर्फ आर्थिक मुनाफे और सांस्कृतिक विध्वंस के लिए इन माध्यमों का भरपूर दोहन हमारे देश में भी करना शुरू कर दिया। सिनेमा के फॉर्मेट में या छोटे पर्दे पर सेंसर की लगाम से मुक्त होने की निरंतर छटपटाहट को पहचान कर उसे हवा और आस्मां देने का काम किया है वेब सिरीज की दुनिया ने, जिसकी पहुंच के सामने देश का सिनेमा या छोटा पर्दा वाकई बहुत छोटा पड़ रहा है--- और इसका भयानक लाभ उठाने के लिए कई देशी-विदेशी कंपनियों ने पूरी तरह से कमर कस ली है। इन निर्माताओं के हाथों वेब की जो लॉटरी लगी है, उसकी खासियत यही है कि वहां कोई सेंसरशिप नहीं है। बस भेडि़ये को क्या चाहिए? अपना शिकार। नतीजा, उनकी मंशा भारतीय वेब सीरीज के आकार लेते-लेते ही खुल कर सामने आ गयी।

इसकी बड़ी शुरुआत पिछले वर्ष नेटफ्रिलक्स नामक चैनल ने अपने शो ‘सैक्रेड गेम्स’ वेब सिरीज के साथ की थी। नेटफ्रिलक्स के डिजिटल प्लेटफार्म पर ‘फैंटम फिल्मस’ के बैनर तले बने इस आठ एपिसोड के सिरीज को जितने बड़े पैमाने पर फिल्माया गया, उसे देख कर बड़े-बड़े फिल्म निर्माताओं की आंखें चुंधिया गयीं। विक्रम चंद्रा के 900 पृष्ठों की किताब पर आधारित यह सिरीज मूल विषय के अनुरूप ही मुंबई के तीन-चार दशकों के आपराधिक-राजनीतिक और महानगर की कई स्याह सच्चाइयों के इर्द-गिर्द घूमता हुआ एक स्वच्छंद अभिव्यक्ति वाले मनोरंजन का दावा लेकर सामने आया। इस सीरीज को बॉलीवुड के कथित प्रयोगधर्मी निर्देशक अनुराग कश्यप ने विक्रमादित्य मोटवानी के साथ मिलकर निर्देशित किया है। यहां ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि इस प्रोजेक्ट को दर्शकों की निगाह में लाने के लिए एकदम से बड़े सितारों सैफ अली खान, नवाजउद्दीन सिद्दिकी के साथ-साथ राधिका आप्टे आदि का सहारा लिया गया। जाहिर है प्रोजेक्ट को इससे मदद भी खूब मिली। लेकिन मसला यह है कि जिस सेंसर से मुक्ति की चाहत लिए वेब की शरण में ये फिल्मकार आये तो उन्होंने क्या अजूबा कर दिखाया? अब देखिये कि इस नए आकाश में उड़ने के लिए इन्होंने जिस विषय को चुना उसके मूल में वही अंडरवर्ल्ड है, जो मुम्बइया फिल्मों का प्रिय विषय रहा है। कारण, आपराधिक पृष्ठभूमि के कथानकों में रहस्य-रोमांच/सेक्स आदि का पुट डालना आसान होता है। उसकी जिज्ञासा और लिप्सा में दर्शकों को चालाकी से बांधा जा सकता है। एक अत्यंत काल्पनिक कथा, जो बिना किसी दस्तावेजी तथ्यों के आधार पर पूरी-पूरी सिनेमाई छूट लिए हुए बुनी गयी है, ताकि मनोरंजन के नाम पर जितना भी मसाला जिस हद तक जा कर डालना हो वो डाला जा सके। सभी जानते हैं कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। यहां तरह-तरह के कारोबार हैं, बड़े-बड़े उद्योग धंधे हैं। बड़े-बड़े पूंजीपति हैं, नेता हैं, अभिनेता हैं, अभिनेत्रियां हैं। पांच सितारा होटल्स ही नहीं, पांच सितारा संस्कृति भी है--- धार्मिकता भी है और धार्मिक आडंबर भी है--- जाहिर है इन ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं और उनके बीच फैले वैभव के इस साम्राज्य के नीचे एक ऐसी बड़ी दुनिया भी समान रूप से पलती है, जो अभाव, जिजीविषा, आर्थिक विषमता और कुचली हुई महत्वाकांक्षा की भट्ठी में दिन-रात सुलग रही होती है। इन्हीं भट्ठियों में तैयार हो जाते हैं अपराधी, जो मुंबई की झुग्गी-झोपडि़यों से लेकर सत्ता और पूंजी के शीर्ष पर बैठे धन-पिशाचों के लिए भी खतरा बन जाते हैं--- पैसे और अपराध की इस गलीज दुनिया के बीच ऐÕयाशी और औरत सिर्फ स्ट्रेस बस्टर या मनोरंजन का सामान बन कर रह जाते हैं--- ‘सैक्रेड गेम्स’ की कहानी इन्हीं तत्वों को लेकर बुनी गयी कथा है। 

यह कथा मुंबई के एक मराठी किरदार गायतोंडे नवाजउद्दीन सिद्दिकी से शुरू होती है, जिसे अपराध की दुनिया का सरगना बताया गया है। गायतोंडे एक लड़की की हत्या के बाद मुंबई के एक सिख पुलिस ऑफिसर सरताज सिंह को एक कॉल करके संकेत देता है कि अगले 25 दिनों में मुंबई विध्वंस का शिकार हो जायेगी। अगर पूरी जानकारी दे दी जाए तो सरताज सिंह की जिंदगी बदल जायेगी। स्पष्ट है कि सरताज सिंह गायतोंडे तक पहुंचने की कोशिश करता है। लेकिन उससे पहले ही गायतोंडे आत्महत्या कर लेता है। 

निराश सरताज कुछ सोच कर गायतोंडे का पुलिस-रिकॉर्ड चेक करता है जो पिछले 15 वर्षों से गायब था और इतने अंतराल के बाद अचानक प्रकट हुआ था। पुलिस रिकॉर्ड से कई सुराग और तथ्य मिलते हैं, जिनका संबंध गायतोंडे के अतीत अर्थात उसके फ्रलैश बैक से है। इस फ्रलैश बैक का संबंध मुंबई की उन स्याह सच्चाइयों और अंधेरों से है, जहां तक आम आदमी के सूचना तंत्र नहीं पहुंच पाते! जाहिर है कहानी का यह वो कम्फर्ट जोन हैं जहां पटकथा लेखक से लेकर संवाद लेखक और निर्देशक तक सेंसर की तलवार सर पर न लटकी होने की आश्वस्ति का भरपूर नाजायज फायदा उठा सकता है--- और सैक्रेड गेम्स में ये फायदा भरपूर उठाया गया है। किसी भी आम दर्शक को ये समझ में आ सकता है कि इस जोन में बार-बार डाले गए विकृत संभोग दृश्यों उस समय के संवादों की अश्लीलता को इस तरह प्रोजेक्ट करने की कोशिशों के पीछे क्या है! कुल आठ एपिसोड की इस आपराधिक दुनिया की जद में और भी कई पहलू छूने की कोशिश की गयी है, जिनका यथार्थ से कितना रिश्ता है, यह दर्शक आसानी से तय कर लेते हैं। कई बार यह भी समझ में नहीं आता कि दुनिया में दूसरे नंबर की दक्षता वाली मुंबई पुलिस में लेखकों (तीन लेखकों ने पटकथा लिखी।) और निर्देशकों को जांच अधिकारी के लिए एक सिख पुलिस ऑफिसर ही क्यों मिला? या कि गायतोंडे ने किसी मराठी पुलिस ऑफिसर को कॉल क्यों नहीं किया? इतना ही नहीं इतने बड़े मामले में सारा फोकस एक अकेले सिख ऑफिसर (सैफ अली खान) पर ही रखना कितना तर्क संगत है? ---ऐसे कई सवाल शो देखते हुए उठते हैं। कहानी की विश्वसनीयता बड़ी उलझी हुई-सी ठिठकी रहती है। बावजूद इसके अच्छे कलाकारों और भव्य/खर्चीले फिल्मांकन की आड़ में बहुत कुछ छुप जाता है। ऊपर जबरदस्त ठूंसे गए संभोग दृश्य और मां-बहन से लेकर तमाम तरह की विकृत गालियां पुरुष-स्त्री दोनों पात्रें से धड़ल्ले से उगलवाने की अनिवार्यता निश्चित रूप से ‘सेक्सुअली फ्रस्ट्रेटेड’ अधकचरे दर्शकों के लिए बड़ी उत्सुकता और मनोरंजक आश्चर्य पैदा करते हैं। जाहिर है बिना सेंसर के चैनेल की चाहत इसीलिए अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता के लिए थी और उसका भरपूर उपयोग कर इसकी सफलता का खूब जश्न मनाया गया। और अब चंद दिनों पहले ‘सैक्रेड गेम्स’ के दूसरे सीजन की शुरुआत हुई है, जो एक बार फिर उन्हीं कथा सूत्रें के इर्द-गिर्द है। 

इसी तरह एक्सेल इंटरटेंमेन्ट के द्वारा अमेजन प्राइम वीडियो के लिए बनायी गयी वेब सिरीज ‘मिर्जापुर’ की भी पूरी कहानी इसी तरह से अपराध और सेक्स को खुले आम भुनाने के प्रयासों का प्रतिफल है। उत्तर प्रदेश के कस्बाई माहौल में पलने और फलने-फूलने वाले अपराधों की दुनिया की सच्चाई से रु-ब-रु कराने के बहाने अनावश्यक हिंसा और अश्लीलता के बहाने दर्शकों के उस बड़े विस्तार को पकड़ना ही मुख्य उद्देश्य है यहां, जो अभी इन्हीं जिज्ञासाओं में फंसा इन क्रमों की नीयत समझने की परिपक्वता नहीं समझता। उसके लिए वेब की ये निजी दुनिया एक लॉटरी की तरह है, जो उसके व्यक्तिगत फोन पर उसे जब जी चाहे मनोरंजन देने को तैयार है। बड़ा निजी किस्म का मनोरंजन, जिसमें सीधे-सीधे किसी का दख्ल नहीं। इस तरह से वेब की इस बेहद खर्चीली, भव्य और स्वच्छंद दुनिया में सामाजिक मूल्यों की सारी वर्जनाओं को चुनौती देते हुए मनोरंजन का एक ऐसा साम्राज्य किया जा रहा है, जिसे दर्शकों तक पहुंचने से पहले फिल्टर करने वाला कोई नहीं है। अब तो कई वेब सिरीज इसी ढर्रे पर बॉलीवुड में बड़ी-बड़ी कंपनियां बना रही हैं। 

‘‘शीलता-अश्लीलता पर बहस करते हुए महेश भट्ट जैसे फिल्मकार ये अक्सर पूछते रहे हैं कि सेंसर कौन होता है हमारी चीजों को प्रमाणपत्र देने वाला? दर्शकों को फैसला करने दो। मगर उनकी ये दलीलें अनसुनी कर दी गयीं। फिर भी वे अपनी फिल्म में पोर्न एक्ट करने वाली सनी लियॉन को बतौर अभिनेत्री बना कर ले आये। ये उनका सेंसर जैसी संस्थाओं को ठेंगा दिखाना था...  कि क्या कर लोगे? पर वेब की दुनिया के सक्रिय होने के बाद निश्चित रूप से अब दर्शकों की ही खुद की जिम्मेदारी है कि वे किस तरह के विषय और ‘टेस्ट’ को अपना रहे हैं! जाहिर है हर दर्शक खुद में खुद के लिए सेंसर बोर्ड की भूमिका निभा सकेगा। पर वह कितना निभा पायेगा, ये समझना आसान नहीं। पर इतना जरूर है कि जैसी संस्कृति को हम प्रश्रय देंगे, वैसे ही उसके परिणाम भी आयेंगे! 

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