संजय कुमार सिंह

एक बार बीसेक साल हुए

एक बार बीसेक साल हुए
मैं गांव गया था चाचा
थोड़ा बदला-बदला लगा
मेले में नहीं मिले शरीफ मियां
दुकानें तो बहुत थीं चूडियों की 
पर शरीफ मियां वहां नहीं थे
धफलचट्टी में कहीं नहीं थी 
मोदीना दी सेब-संतरा वाली 
बिजली बुआ भी नहीं दिखी
सब्जी में छिपाकर डिम्मा बेचने वाली
हकिमनी भी नहीं मिली जाने कहां से
लाती थीं ये औरते टोकड़ी में भर-भर
कर ये चीजे....

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