आलोक मिश्र

नाविक


नाविक चलते रहो
जैसे चलती है नदी
नाविक बहते रहो
जैसे बहती है नदी
नाविक मत थको
जैसे नहीं थकती नदी
नाविक 
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भूल गये
हम भूल गए
अपनी धरती, आसमान
और भूगोल भी यही नहीं---
कहीं न कहीं 
भूल गए खुद को 
जब से चमचमाती सड़कों पर
चलने लगे
भूल गये सलीका
चलने का खेत की मेड़ो पर
---
इसलिए
हर बार चुप्पी
शान्त समझदारी
का ....

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