प्रेम रंजन अनिमेष

पानी पर लिखी इबारतें

 

था किसी के लिए उस शहर में कहां पानी
जबकि गांवों के भी हिस्से का था वहां पानी
सारे ऊंटों पे सर से पा जवाहरात लिये
खोजता जलते इस सहरा में कारवां पानी

दाग धरती के दामन पर हैं खून के इतने
रात दिन एक कर रोता है आसमां पानी
चाहता हूं मैं रोये एक दिन कोई इतना
एक पल के लिए हो जाये कहकशां पानी

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