फूलचंद मानव  

कोठे

अचानक शीलू सिर झटक देती है। अपने हाथों को देऽती है। कुर्सी की दोनाें बाहों की दोनों हाथ थाप दे रहे हैं। जानती है, पहले हाथ ने धीरे-धीरे थाप देनी शुरू की होगी। फिर लगातार तेज होती गई होगी। मन में घिर आई रुलाई के हगरी होने के साथ-साथ। वह अपने हाथों को अचानक रोक लेती है। हाथ तो रुक जाते हैं, पर मन में घिर आई रुलाई? अंदर उठ रहे बवंडर---? कुछ भी नहीं रुकता। उसे मनी पर गुस्सा ....

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