प्रसन्न कुमार झा

त्योहार में अपराध

हे ईश्वर!
आज त्योहार है 
संचय के सुख-दुख से 
थोड़े पैसे निकाल कर 
आलू की सब्जी और पुरी खाई है 
तो जरा आलू की माटी झाड़ने वाले से 
और गेंहू के बुआई में गीत गाने वालों से   
मिल आना चाहता हूं।

जिस कमीज को पहन रखा है
जिसकी रंग पक्की है 
और बुनावट अच्छी है 
बुनकर और रंगरेज 
से मिलने का मन कर रहा है। 

उस पोखर के जल को 
छू कर ....

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