अश्विनी कुमार त्रिपाठी

हवा  के  साथ  मिलकर  पंछियों  के  पर को ले डूबा ।

एक 

 

हवा  के  साथ  मिलकर  पंछियों  के  पर को ले डूबा ।

तरक्की  का  धुँआ धरती तो क्या अंबर को ले डूबा  ।।

 

ज़माना  छोड़कर  पीछे  हमें आगे निकलना था  ।

जुनूँ  आगे निकलने का ज़माने भर को ले डूबा  ।।

 

तभी   से  ही  न  कोई   सूर  मीराँ&nb....

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