ममता कालिया

ग़म रोजगार के

दिल्ली जैसे शहर में कोई किसी से लम्बी बहस में नहीं पड़ता। समय का टोटा रहता है। धैर्य का भी। धार का और धृति का भी। एक जमाने में यहां टी-हाउस में लम्बी बहसें हुआ करतीं। एक बहस कई-कई दिन चला करती। तब बुद्धिजीवियों के पास बुद्धि भी थी और जीवंतता भी। अब वे अड्डे क्या ऽत्म हुए, अड्डेबाजी भी अलोप हो गई। आजकल एक शब्द से कइ्र काम निकल जाते हैं।

हमने वह दौर भी देखा और य....

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