भारत भारद्वाज

सर्वतंत्र स्वतंत्र अराजक विद्रोही कवि राज कमल चौधरी

‘‘हमरा दुख़ अछि

कविता हमर कांचे रहि गेल

एहि जारनि संउड़ल कहां धधरा 

व्यथा कहब ककरा

कथा कहब ककरा?’’

मुझे दुख है कि मेरी कविता कच्ची रह गई। इस जलावन से लपटें कहां निकलीं। अपने दुख़ की यह....

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