भालचंद जोशी

व्यंग्य की सार्थकता और सामर्थ्य

व्यंग्य निरन्तरता की मांग करता है और निरन्तरता में नवीन की उपस्थिति का आग्रह स्वयं मौजूद हो जाता है। लेकिन निरन्तरता का एक ख़तरा यह है कि व्यंग्यकार खुद को दोहराने लगते हैं। जो भाषा उनकी पृथक पहचान और चमक बना रही होती थी वह कमजोरी हो जाती है। ज्यादा लेख़न का बोझ खासकर व्यंग्य में दोहराव की दरिद्रता लाता है। दिलचस्प यह है कि औरों से ज्यादा खुद लेख़क उस पर मुग्ध होता रहता ह....

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