सुधीश पचौरी

हिन्दी साहित्य के बीते सत्तर बरस

इस किश्त में हम हिंदी साहित्य के जिस अत्यंत ही उखडते बिखरते और बहुत सारे घात-प्रतिघातों के बीच बनते,बिगडते और नए नए पेंचोखमों में उलझते जिस दौर का एक वैचारिक सांस्कृतिक वृत्तांत लिखने जारहे हैं वह इस दौर के मीडिया व साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कविता कहानी व आलोचनात्मक टिप्पणियों  में पर्याप्त मात्र में उपलब्ध है जिसमें कोई चाहे तो अब भी विचरण कर सकता है....

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