ममता कालिया

चाय का चाव और दोस्तों का जुड़ाव

रवि अख़बारों और रिसालों के जरिए साहित्य के इलाके में आए। वे लड़कपन में हिंदी ‘मिलाप’ में रचनाएं भेजते। कई बार रचना छप जाती, लिखने का हौसला बुलंद हो जाता। चार पैसे भी हाथ आते। कच्ची क़लम की हरी गंध संपादक को भा जाती। अगली रचना के लिए खिड़की खुल जाती। कई बार वे उर्दू और गुरुमुखी कहानियों के अनुवाद करके भेज देते वे फौरन छप जाते। हिंदी ‘मिलाप’ में रवीन्द्र कालिया ने खूब लिखा।  Subscribe Now

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