कृष्ण बिहारी

शफ़ीक़ भाई की लांड्री और उर्दू से मेरा लगाव 

शफ़ीक़ भाई की लांड्री अबू धाबी में मेरा पहला अड्डा बनी मगर इस अड्डे तक पहुँचने की भी एक कथा है। मैंने पहले ही लिखा है कि न जाने कितने अंडर करेंट उस ज़िंदगी में होते हैं जिनमें से गुज़रते हुए कोई सफ़र ज़ारी रहता है। जब मैं अपना परिवार अबू धाबी ले आया तोकुछ दिन एक मित्र परिवार के साथ शेयरिंग में रहा लेकिन जल्द ही एहसास हो गया कि यदि कुछ दिन और साथ रह गया तो मित्रता चौपट हो जाएगी । मित....

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