अवधेश प्रीत

खत्म हुआ ‘हरे बासों का सफर’

‘पृथ्वी पर एक देश। देश बीच शहर। शहर में मकान। मकान के अंधेरे बंद कमरे में वह बेचैनियों का चिराग जलाकर कुछ लिख रहा है। उसका ‘लिखना’ लिखने की तरह नहीं है जैसे कि उसका ‘जीना’ जीने की तरह नहीं। एक जिद की तरह अपने होने को साबित करने में लगा है और इस तरह वह इस ‘साबितीकरण’ में अपने होने को नष्ट कर रहा है।’ ये पंक्तियां हैं ‘पाखी’ अगस्त 2015 के संपादकीय की ,जिन्हें उसके....

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