अनुज

एक विज़नरी सम्पादक का जाना

मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि लेखन की विधा में संस्मरण से ज़्यादा कठिन दूसरी कोई विधा नहीं। संस्मरण में कल्पना का सहारा लेने की गुंजाइश नहीं होती। हमें वही लिखना होता है, जो हमने भोगा या देखा होता है। इसीलिए जब हम किसी ऐसे इंसान से संबंधित संस्मरण लिख रहे होते हैं, जो इस दुनिया से जा चुका है, तो हमारी ज़िम्मेवारी और भी बढ़ जाती है। 
मैं यह तो नहीं कह सकता कि प्रेम भारद्वाज ....

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