ओम नागर

टुकड़ा-टुकड़ा, दो मुलाकातें

एक लेखक और एक संपादक का जैसा रिश्ता होता है, वैसा रिश्ता था हमारे बीच। प्रेम भारद्वाज से कुल जमा दो बार मिलना हुआ। जिसमें खास बात यह कि इन दोनों ही मुलाकातों में कोई लंबा चौड़ा-सा संवाद भी नहीं हुआ। लेकिन पाखी के संपादकीय से पाठक के तौर पर एक घनिष्ठ नाता रहा। पत्रिका के अनुक्रम पर नज़र डालने के बाद सबसे पहले प्रेम भारद्वाज का संपादकीय पढ़ता रहा। वो वैसा ही था जैसे धा....

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